उत्तर प्रदेश की राजनीति भी बड़ी अजीब है! रैलियों के मंच पर जब नेताजी चढ़ते हैं, तो माइक हाथ में लेकर ऐसी दहाड़ मारते हैं की लगता है जैसे इनसे बड़ा कोई बाहुबली है ही नहीं।
खुद को ‘पीडीए’ (PDA) का सबसे बड़ा रक्षक बताना, महिला सुरक्षा की बड़ी-बड़ी कसमें खाना और चुनाव आते ही आधी आबादी (महिलाओं) को लुभाने के लिए लोकलुभावन वादे करना… ये सब तो हमारे नेताजी के बांए हाथ का खेल है।
लेकिन, ज़रा सोचिए, क्या हो जब यही दहाड़ता हुआ नेता अचानक किसी मौलाना या कठमुल्ले के सामने आकर ‘मौन व्रत’ धारण कर ले?
हम सब जानते हैं की जब राजनीति में ‘वोटबैंक’ का तराज़ू सेट किया जाता है, तो उसमें अक्सर नेता लोगों के सिद्धांत बहुत हल्के पड़ जाते हैं।
लेकिन क्या सत्ता की भूख, कुर्सी की लालसा और मुस्लिम समुदाय के वोटों का लालच इतना बड़ा हो सकता है की एक पति, एक इतना बड़ा राजनेता, अपनी ही पत्नी के कपड़ों पर सरेआम की गई इतनी नीच और ओछी टिप्पणी को चुपचाप पी जाए?
क्या तुष्टिकरण का नशा इतना गहरा हो सकता है की इंसान अपने घर की इज़्ज़त पर भी पर्दा डाल दे?
यही वो चुभता हुआ सवाल है जिसने आज उत्तर प्रदेश की करोड़ों सनातनी माताओं और बहनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
यूपी की महिलाएं आज सीधे तौर पर अखिलेश यादव से पूछ रही हैं की जो व्यक्ति ‘मुस्लिम वोटबैंक’ खिसकने के डर से अपनी अर्धांगिनी का सरेआम अपमान सह सकता है, वो कल को सूबे का मुख्यमंत्री बनकर हमारी बेटियों की रक्षा का दावा कैसे कर सकता है?
चलिए, आज उस घटना की पूरी परतें खोलते हैं, जिसने तुष्टिकरण के इस खतरनाक और महिला-विरोधी चेहरे को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया।
संसद के पास की मस्जिद का वो दौरा और मौलाना साजिद रशीदी की डिंपल यादव पर अभद्र टिप्पणी

अब ज़रा इस पूरे घटनाक्रम को समझिए की आख़िर हुआ क्या था। बात जुलाई की है, जब संसद का सत्र चल रहा था। अखिलेश यादव अपनी पत्नी और मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव के साथ दिल्ली में संसद भवन के पास स्थित एक मस्जिद में गए थे।
वहां उनकी मुलाक़ात रामपुर के सांसद और इमाम मोहिबुल्लाह नदवी से हुई थी। एक नेता के तौर पर, चुनाव जीतने के बाद वहां जाना और तस्वीरें खिंचवाना उनकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है।
लेकिन असली तमाशा इसके बाद शुरू हुआ। इस मस्जिद दौरे की तस्वीरें टीवी और सोशल मीडिया पर आईं। इसके बाद ‘रिपब्लिक भारत’ टीवी चैनल पर एक डिबेट चल रही थी।
उस डिबेट में ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन का अध्यक्ष, मौलाना साजिद रशीदी बैठा हुआ था। इस मौलाना ने लाइव टीवी पर लाखों दर्शकों के सामने सांसद डिंपल यादव के कपड़ों (पहनावे) को लेकर एक बेहद अश्लील, ज़हरीली और ओछी टिप्पणी कर डाली।
इस मौलाना का दर्द ये था की डिंपल यादव ने मस्जिद में साड़ी क्यों पहनी थी और अपना सिर क्यों नहीं ढका था? ज़रा इसकी सोच देखिए!
भारत की सबसे शालीन, सबसे मर्यादित और पारंपरिक पोशाक ‘साड़ी’ है। एक सनातनी महिला साड़ी पहनकर पूरे सम्मान के साथ खड़ी है, लेकिन इस मौलाना ने टीवी पर सारी हदें पार करते हुए कह दिया की डिंपल यादव वहां “नंगी बैठी थीं”।
मतलब, आप सोच रहे हैं इनकी मानसिकता का स्तर? इन कट्टरपंथियों की नज़रों में अगर कोई महिला सर से पैर तक काले टेंट (बुर्का या हिजाब) में नहीं ढकी है, तो वो ‘निर्वस्त्र’ है!
एक हिन्दू महिला, जो एक चुनी हुई सांसद भी है, उस पर सरेआम इस्लामी नियम थोपने की यह घटिया कोशिश इस बात का सबूत है की इनकी सोच में महिलाओं के लिए कितनी नफरत और हिकारत भरी है।
और बेशर्मी तो देखिए, जब डिबेट में इस पर बवाल हुआ, तो इस मौलाना ने माफ़ी मांगने के बजाय अपने बयान को सही ठहराते हुए कहा की इस्लाम के हिसाब से तो सिर ढकना ज़रूरी है।

साड़ी बनाम हिजाब की तुलना और सेक्युलरिज्म के ठेकेदारों का पाखंड
इस मौलाना ने अपना ज़हर यहीं तक सीमित नहीं रखा। उसने डिंपल यादव की तुलना समाजवादी पार्टी की ही एक अन्य सांसद (कैराना से मुस्लिम सांसद) इकरा हसन से कर डाली।
उसने कहा की इकरा हसन तो हिजाब और अबाया पहनकर रहती हैं, डिंपल को भी वैसा ही रहना चाहिए था।
अब यहां सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की क्या भारत के लोकतंत्र में, क्या हमारे आज़ाद देश में, अब महिलाओं के कपड़ों का सर्टिफिकेट इमाम और मौलाना बांटेंगे?
क्या भारत की सनातनी महिलाएं अब फतवों के हिसाब से तय करेंगी की उन्हें क्या पहनना है और क्या नहीं?
पत्नी का हुआ इतना बड़ा अपमान, लेकिन वोटबैंक बचाने के लिए अखिलेश यादव ने साध ली चुप्पी
अब आते हैं उस बात पर जो इस पूरे कांड में सबसे ज़्यादा चुभने वाली थी। चलिए, एक मौलाना की सोच तो वैसी ही है जैसी सदियों से चली आ रही है, उससे किसी को कोई ख़ास उम्मीद थी भी नहीं।
लेकिन अखिलेश यादव? वो तो एक पति हैं ना! ज़रा सोचिए, भारत के किसी आम मोहल्ले में अगर कोई राह चलता आदमी भी किसी की पत्नी के कपड़ों पर ऐसी घटिया टिप्पणी कर दे, तो एक आम हिन्दुस्तानी पति का खून खौल उठता है। वो मरने-मारने पर उतारू हो जाता है।
लेकिन एक पूर्व मुख्यमंत्री, जो खुद को यूपी का सबसे बड़ा नेता मानता है, उसका खून अचानक बर्फ़ कैसे बन गया?
जब संसद के बाहर पत्रकारों ने अखिलेश यादव से इस मौलाना की टिप्पणी पर सवाल पूछा, तो पूरे सनातनी समाज को उम्मीद थी की अखिलेश भड़केंगे, उस मौलाना को सरेआम उसकी जगह दिखाएंगे।
लेकिन हुआ क्या? अखिलेश यादव ने मौलाना को एक शब्द नहीं कहा! उलटा, वो अपनी झल्लाहट पत्रकारों पर ही उतारने लगे।
बेहद डरे हुए और रक्षात्मक लहजे में अखिलेश ने कहा- “क्या पहन कर आएं बताओ… जो लोकसभा में पहनकर आते हैं, वही हमारी हर जगह ड्रेस होगी।”
और इसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी चुप्पी को जस्टिफाई करने के लिए एक ऐसा बहाना मारा जो उनके अंदर के डर को साफ दिखा रहा था।
उन्होंने कहा, “मैं नहीं चाहता की किसी के साथ हिंसा हो।” अरे नेताजी, अपनी पत्नी के सम्मान में दो कड़े शब्द बोलना ‘हिंसा’ कब से हो गया?
असल में यह हिंसा का डर नहीं था दोस्त! यह ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के दरकने का खौफ था। उन्हें डर था की अगर आज इस मौलाना को कुछ कड़ा बोल दिया, तो कहीं यूपी का वो ‘मुस्लिम वोटबैंक’ ना छिटक जाए जिस पर उनकी पूरी राजनीति टिकी है।
इसे कहते हैं सत्ता की भूख! वोटबैंक का चश्मा चढ़ाकर इंसान अपनी ही अर्धांगिनी के सम्मान पर कैसे आंखें मूंद लेता है, अखिलेश यादव की ये लीपापोती उसका सबसे बड़ा और शर्मनाक उदाहरण बन गई।
उत्तर प्रदेश की कैबिनेट मंत्री और बीजेपी की कद्दावर नेत्री बेबी रानी मौर्य ने अखिलेश यादव की इसी कायरता पर वो प्रहार किया, जो एकदम निशाने पर जाकर लगा।
उन्होंने डंके की चोट पर कहा, “सत्ता पाने की लालसा में अपनी ही पत्नी का अपमान सहन करना बेहद शर्मनाक है।”
समाज में सीधा संदेश गया की इनके लिए घर की चौखट के सम्मान से बड़ा वो बैलेट बॉक्स है जिसमें तुष्टिकरण के वोट गिरते हैं।
जो खुद की पत्नी के स्वाभिमान की रक्षा ना कर सका, वो पूरे उत्तर प्रदेश की बेटियों का पहरेदार कैसे बनेगा
अब बात सिर्फ एक राजनेता या एक मौलाना की नहीं रह गई है। बात अब उत्तर प्रदेश की उन 10-12 करोड़ माताओं, बहनों और बेटियों की सुरक्षा की है जो रोज़ घर से बाहर निकलती हैं। जो स्कूल जाती हैं, जो नौकरी पर जाती हैं।
आज यूपी की आधी आबादी अखिलेश यादव की तरफ उंगली उठाकर एक बहुत ही सीधा और चुभने वाला सवाल पूछ रही है।
सवाल ये है की अगर कल को सूबे की सत्ता आपके हाथ में आ गई, और यूपी के किसी चौराहे पर… किसी बरेली, मुरादाबाद या रामपुर में… कोई मनचला या कोई कट्टरपंथी किसी आम सनातनी बेटी के कपड़ों पर ऐसी ही फब्तियां कसेगा, तो क्या आप एक्शन लेंगे?
अगर कोई मौलाना कल को किसी कॉलेज जाने वाली हिंदू लड़की को हिजाब न पहनने पर ‘नंगा’ कह देगा, तो क्या तब भी आप मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर यही कहेंगे की “मैं नहीं चाहता की किसी के साथ हिंसा हो”?
क्या तब भी आप उस कट्टरपंथी के खिलाफ इसलिए मुंह नहीं खोलेंगे क्योंकि आपको उसका वोट चाहिए?
यार, जो इंसान अपनी ही पत्नी का सम्मान नहीं बचा सका, जो खुद एक सांसद है, उसके हाथ में 25 करोड़ की आबादी वाले इस विशाल सूबे की बच्चियों का भविष्य सौंपने की भूल कोई कैसे कर सकता है?
जब घर के अंदर आग लगी हो और घर का मुखिया पानी डालने के बजाय पड़ोसी के वोट गिन रहा हो, तो ऐसे मुखिया से पूरे मोहल्ले की हिफाज़त की उम्मीद करना बेवकूफी नहीं तो और क्या है।
राजनीति अपनी जगह है, विचारधाराएं अपनी जगह हैं, लेकिन जब बात नारी के सम्मान और स्वाभिमान की आए, तो वहां किसी भी तरह का तुष्टिकरण बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
अखिलेश यादव ने अपनी चुप्पी से उस मौलाना को तो शायद बचा लिया, लेकिन उन्होंने उत्तर प्रदेश की करोड़ों महिलाओं का भरोसा हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया है।
यूपी की जनता अब समझ चुकी है की जो नेता वोटबैंक के सामने अपनी अर्धांगिनी के स्वाभिमान का सौदा कर ले, वो कल सत्ता में आकर उनकी बेटियों की हिफाज़त की गारंटी कभी नहीं बन सकता।
