कल 2 अक्टूबर था। देश भर में बापू के भजन चल रहे थे और हर तरफ ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के नारे गूंज रहे थे। लेकिन ज़रा एक पल के लिए रुकिए और उत्तराखंड के किसी भी पहाड़ी इंसान की आंखों में झांक कर देखिए।
आपको वहां 2 अक्टूबर के दिन कोई जश्न नहीं, बल्कि एक ऐसा गहरा, रिसता हुआ ज़ख्म नज़र आएगा जो 32 साल बाद भी नहीं भर सका है।
हम हिंदुस्तान के लोग इतिहास की वो बातें बहुत जल्दी भूल जाते हैं जो हमारी सहूलियत के हिसाब से फिट नहीं बैठतीं।
लेकिन आज का दिन उन खोखले नारों के पीछे छिपे सत्ता के उस खौफनाक सच को उजागर करने का दिन है, जब इसी 2 अक्टूबर की पूर्व संध्या पर एक तथाकथित ‘समाजवादी’ सरकार ने निहत्थे और सो रहे लोगों के सीने में गोलियां उतार दी थीं।
गांधी जयंती की इस ‘अहिंसा’ वाली तारीख पर जो खूनी खेल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में खेला गया, वो किसी विदेशी दुश्मन ने नहीं, बल्कि हमारे अपने ही सिस्टम ने खेला था।
ये वो मनहूस रात है जब लखनऊ में बैठे सत्ता के अहंकार ने देवभूमि के सीधे-साधे पहाड़ियों को अपना दुश्मन मान लिया था।

अहिंसा वाले दिन जब समाजवाद के नाम पर खेला गया खूनी खेल और मौन खड़ा रहा पूरा सिस्टम
विडंबना देखिए ना! जिस देश ने दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया, उसी देश में राजघाट जा रहे लोगों की लाशें बिछा दी गईं। और ये सब किसके राज में हुआ?
उस सरकार के राज में जो दिन-रात ‘समाजवाद’ का झंडा लेकर घूमती थी। मुलायम सिंह यादव उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।
समाजवाद का मतलब तो होता है समाज के हर तबके को साथ लेकर चलना, उनकी आवाज़ सुनना। लेकिन 1994 के उस दौर में समाजवाद की परिभाषा कुछ और ही लिख दी गई थी।
ये वो वक्त था जब पहाड़ का आदमी अपने हक के लिए सड़कों पर था। वो कोई खैरात नहीं मांग रहा था, बस अपना एक UP से अलग राज्य मांग रहा था।
वो राज्य जहां उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान महफूज़ रह सके। लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को ये बात बर्दाश्त नहीं हो रही थी की कल तक जो पहाड़ी सिर्फ उनके लिए वोट बैंक हुआ करते थे, वो आज अपने हक़ के लिए आवाज़ कैसे उठा रहे हैं।
और जब हुक्मरानों का ईगो हर्ट होता है ना, तो फिर वो ना कानून देखते हैं, ना इंसानियत और ना ही महिलाओं का सम्मान।
उस रात जो कुछ भी हुआ, वो एक प्लान किया गया सरकारी नरसंहार था, जिसे अंजाम देने के बाद पूरा का पूरा सिस्टम, पुलिस से लेकर प्रशासन तक, अपनी आंखें मूंद कर खड़ा हो गया।
जब आंखों में नए राज्य का सपना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ा पहाड़ का वो शांतिपूर्ण काफिला

अक्टूबर की शुरुआत थी, पहाड़ों में हल्की-हल्की ठंड दस्तक दे चुकी थी। उत्तराखंड क्रांति दल और तमाम स्थानीय संगठनों के आह्वान पर गढ़वाल और कुमाऊं के कोने-कोने से लोग बसों में भर-भर कर दिल्ली की तरफ निकल पड़े थे।
बसें खचाखच भरी हुई थीं। कोई अपनी बूढ़ी मां के साथ था, कोई अपनी जवान बहन के साथ, तो कोई अपने छोटे बच्चों को गोद में लिए हुए था।
ये कोई पेशेवर गुंडे या दंगाई नहीं थे। ये वो आम, सीधे-साधे और ईमानदार पहाड़ी लोग थे जिन्होंने शायद ही कभी अपनी ज़िंदगी में थाने-कचहरी का मुंह देखा होगा।
इनका मकसद क्या था? इनका मकसद सिर्फ इतना था की 2 अक्टूबर की सुबह दिल्ली पहुंचकर राजघाट पर शांतिपूर्ण धरना देंगे।
उन्हें लगता था की बापू की समाधि के सामने बैठकर जब वो केंद्र सरकार को अपना दर्द बताएंगे, तो शायद दिल्ली के बहरे कानों तक पहाड़ की आवाज़ पहुंच जाए।
इनकी आंखों में एक नए राज्य का, एक नए सवेरे का सुनहरा सपना था। इनके हाथों में ना तो कोई हथियार था, ना लाठियां और ना ही कोई ऐसा इरादा जिससे दिल्ली में कोई बवाल हो।
वो तो बस अपनी धुन में चले जा रहे थे। लेकिन उन मासूमों को ये अंदाज़ा ही नहीं था की जिस रास्ते पर वो अपने सपनों की मंज़िल तलाशने निकले हैं, वहां आगे मुजफ्फरनगर के अंधेरे में खाकी वर्दी पहने मौत उनका इंतज़ार कर रही है।
रामपुर तिराहे पर मुलायम सिंह यादव के आर्डर पर रोक दी गयी बसें, और शुरू हुआ मौत का खेल

उधर, पहाड़ का काफिला जैसे-जैसे नीचे मैदानों की तरफ उतर रहा था, वैसे-वैसे लखनऊ में बैठी मुलायम सिंह यादव की सरकार की सांसें फूल रही थीं।
मुलायम सिंह किसी भी कीमत पर इन आंदोलनकारियों को दिल्ली नहीं पहुंचने देना चाहते थे।
अपने राजनैतिक अहंकार को शांत करने के लिए लखनऊ से एक खौफनाक फरमान जारी हो गया- “चाहे जो हो जाए, जो भी तरीका अपनाना पड़े, ये पहाड़ी दिल्ली की बॉर्डर क्रॉस नहीं करने चाहिए।”
जब किसी सूबे का मुखिया अपनी ही पुलिस को ऐसा ‘फ्री हैंड’ दे देता है, तो समझ लीजिए की वो पुलिस अब रक्षक नहीं, शिकारी बन चुकी है।
1 और 2 अक्टूबर की दरमियानी रात मुजफ्फरनगर के पास उस कुख्यात ‘रामपुर तिराहे’ पर भारी पुलिस बल और पीएसी (PAC) की कई बटालियनें तैनात कर दी गईं।
सड़कों पर भारी-भरकम बैरिकेड लगा दिए गए। ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे किसी दुश्मन देश की सेना को रोकने के लिए बॉर्डर सील किया जा रहा हो।
रात के अंधेरे में जब पहाड़ियों की बसें रामपुर तिराहे पर पहुंचीं, तो पुलिस ने उन्हें रोक लिया। शुरू में बसों में बैठे लोगों को लगा की शायद रूटीन चेकिंग होगी, अभी पांच-दस मिनट में पुलिस वाले जाने देंगे।
कुछ बुजुर्ग लोग नीचे उतरे और पुलिस वालों से हाथ जोड़कर कहा भी की “साहब, हम तो शांति से दिल्ली जा रहे हैं, हमारे पास कुछ नहीं है, हमें जाने दीजिए।”
लेकिन खाकी वर्दी को तो ऊपर से कुछ और ही निर्देश मिले हुए थे। पुलिस वालों की आंखों में उस रात एक अजीब सा खून सवार था।
रात के अंधेरे में निहत्थों पर बरसीं गोलियां और पानी की बौछारों के बीच खून से लाल हो गई सड़कें
रामपुर तिराहे पर जब पुलिस ने बिना किसी वजह के बसें रोकीं और गालियां देना शुरू किया, तो आंदोलनकारियों ने इसका विरोध किया।
आखिर वे अपने ही देश में यात्रा कर रहे थे, किसी ने उन्हें रोकने का क्या हक़ दिया था? लेकिन पुलिस तो किसी की सुनने के मूड में थी ही नहीं।
रात के उस घुप अंधेरे में अचानक पुलिस वालों ने राइफलों की बट (पीछे का हिस्सा) से बसों के शीशे चकनाचूर करने शुरू कर दिए।
जो लोग सो रहे थे, उन्हें कॉलर और बाल पकड़कर बसों से नीचे घसीटा गया। जब पहाड़ के उन सीधे-साधे नौजवानों ने अपनी औरतों और बुजुर्गों को बचाने के लिए पुलिस का विरोध किया, तो खाकी ने अपना आखिरी और सबसे खौफनाक हथियार निकाल लिया- बंदूकें!
बिना कोई चेतावनी दिए, बिना किसी हवाई फायर के, निहत्थे और निहत्थे पहाड़ियों पर सीधे अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी गईं।
अक्टूबर की उस ठंडी रात में निहत्थे लोगों पर एक तरफ से गोलियां चल रही थीं, तो दूसरी तरफ से कड़कड़ाती ठंड में उन पर वाटर कैनन (पानी की बौछारें) और आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे।
लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन पुलिस चुन-चुन कर निशाना लगा रही थी।
ये कोई दंगा कंट्रोल नहीं था भाई, ये किसी मिलिट्री ऑपरेशन की तरह अपने ही नागरिकों का सफाया था। उस रात रामपुर तिराहे की सड़क पर पहाड़ के 7 सपूतों ने अपनी जान गंवा दी।
CBI की चार्जशीट का वो रोंगटे खड़े कर देने वाला खुलासा, जब गन्ने के खेतों में गूंजती रही मातृशक्ति की चीखें
अगर आपको लगता है की गोलियां चलाना और लाशें बिछाना इस पुलिस का सबसे घिनौना काम था, तो आप गलत हैं। गोलियां तो सिर्फ इस हैवानियत की शुरुआत थीं। इसके बाद खाकी ने जो किया, उसे सुनकर इंसानियत आज भी मुंह छुपा लेती है।
देवभूमि की जिन महिलाओं को हम मातृशक्ति मानकर पूजते हैं, उनके साथ रक्षकों ने ही भक्षकों वाला वो सलूक किया, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
यह इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर हुई CBI जांच की उस चार्जशीट का वो काला सच है, जिसे पढ़कर खून खौल जाता है।
सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जब गोलियां चल रही थीं और भगदड़ मची थी, तो पुलिस और पीएसी के जवानों ने बसों में बैठी पहाड़ी महिलाओं को बालों से पकड़कर नीचे खींचा।
उन्हें घसीटते हुए सड़क के किनारे अंधेरे में मौजूद गन्ने के खेतों और झाड़ियों में फेंक दिया गया। वहां उनके कपड़े फाड़े गए, उनके गहने लूटे गए और उनके साथ वहशियाना दरिंदगी की गई।
चार्जशीट के वो आंकड़े आज भी किसी सीने में तीर की तरह चुभते हैं। उस रात 7 महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और 17 से ज्यादा महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बर्बरता हुई।
और यह सब किसके राज में हो रहा था? उस सरकार के राज में जो मंचों से ‘समाजवाद’ और ‘महिला सम्मान’ का ढिंढोरा पीटती है।
सबूत मिटाने का घटिया सरकारी खेल और 32 साल बाद मिला न्याय का वो झुनझुना जो आज भी चुभता है
जब सूरज निकला और इस बर्बरता की खबर दुनिया को पता चली, तो बजाय शर्मिंदा होने के, इस सरकारी सिस्टम ने जो किया, वो और भी ज्यादा खौफनाक था।
तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह, एसपी बृजेंद्र शर्मा और आईजी एसएम नसीम जैसे आला अधिकारियों की मौजूदगी में रात के उस खून और बलात्कार के सबूतों को मिटाने का बेशर्म खेल शुरू हो गया।
सड़क से खून धोया गया, लाशों को छुपाने की कोशिश की गई और महिलाओं को डराया-धमकाया गया ताकि वो मुंह न खोलें। मुलायम सिंह की सरकार ने अपनी पुलिस और प्रशासन को बचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लगा दी।
उसके बाद शुरू हुआ न्याय के नाम पर एक ऐसा भद्दा मज़ाक, जो आज तक चल रहा है। 1994 से लेकर 2024 तक… पूरे 32 साल! पहाड़ के वो पीड़ित लोग न्याय की उम्मीद में कोर्ट-कचहरी की चौखटों पर अपनी एड़ियां घिसते रहे।
कई चश्मदीद गवाह दुनिया छोड़कर चले गए, कई पीड़ित महिलाएं आज भी उस रात के खौफ से बाहर नहीं आ पाई हैं।
और 32 साल बाद सिस्टम ने क्या किया? मार्च 2024 में आख़िरकार सीबीआई कोर्ट ने पीएसी के सिर्फ 2 सिपाहियों (मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप) को दोषी माना और उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई। बस? क्या यही इंसाफ है?
जिन राजनेताओं (मुलायम सिंह और उनके मंत्रियों) के आदेश पर ये पूरी बर्बरता रची गई, उन पर कभी आंच तक नहीं आई।
साल 2000 में बहुत सी कुर्बानियों के बाद उत्तराखंड तो बन गया। लेकिन आज 32 साल बाद भी, जब 2 अक्टूबर का दिन आता है, तो पहाड़ की वादियों में आज भी उन 7 नौजवानों के खून की महक और गन्ने के खेतों से उठी उन महिलाओं की चीखें महसूस होती हैं।
35 साल पहले ‘समाजवाद’ की आड़ में जो पाप आज की रात हुआ था, उसे ना तो पहाड़ कभी भूलेगा, ना देवभूमि कभी माफ़ करेगी, और ना ही इतिहास कभी इसे अपने पन्नों से मिटा पाएगा!
