नाकाबिल होने पर ट्रेनी पायलट ने चुना SC/ST Act ब्लैकमेलिंग का रास्ता, और यूपी के लेखपाल ने दी झूठा मुकदमा लगाने की धमकी, कब तक इस कानून के नाम पर ब्लैकमेल होता रहेगा OBC और सामान्य वर्ग

एक वक्त था जब आम आदमी मोहल्ले के गुंडों या किसी बड़े क्रिमिनल से डरता था। लेकिन आज का मिडिल क्लास आदमी, चाहे वो जनरल वर्ग का हो या फिर ओबीसी (OBC) समाज का, वो गुंडों से इतना नहीं डरता जितना किसी छोटी-मोटी बहस से डरने लगा है।

ऐसा नहीं है की लोगों की हिम्मत टूट गई है, बल्कि डर इस बात का है की सड़क पर अगर किसी की साइकिल से आपकी बाइक टच भी हो जाए, या खेत की मेड़ को लेकर कोई छोटी सी कहासुनी हो जाए, तो सामने वाला तुरंत अपनी जेब से एक ऐसा ‘लीगल हथियार’ निकाल लेता है जिसका कोई तोड़ नहीं है।

और उस हथियार का नाम है- SC/ST एक्ट।

जो कानून कभी पिछड़ों की सुरक्षा का ‘कवच’ हुआ करता था, वो आज अपनी आपसी खुन्नस निकालने, ब्लैकमेल करने और दूसरों की जिंदगी तबाह करने की ‘तलवार’ बन चुका है।

हालात इतने भयानक हो चुके हैं की अब तो सरकारी अधिकारी भी आम जनता को डराने के लिए खुलेआम इसी एक्ट की धमकी देने लगे हैं।

आज हम जिन दो ताज़ा मामलों (अक्टूबर 2026) पर बात करने जा रहे हैं, वो दिखाते हैं कैसे इस SC/ST कानून की वजह से जनरल और OBC वर्ग की जिन्दगी नर्क बनती जा रही है।

एक घटना ज़मीन से जुड़ी है, जहाँ हरदोई के खेतों में न्याय करने गया एक अधिकारी खुलेआम जाति पूछकर एक युवक को SC/ST एक्ट में फंसाने की धमकी देता है।

और दूसरी घटना सीधे आसमान से जुड़ी है, जहाँ कॉरपोरेट और एविएशन सेक्टर के अंदर अपनी नाकामी और अयोग्यता छिपाने के लिए एक ट्रेनी पायलट अपने ही सीनियर पायलट्स पर इस एक्ट का हंटर चला देता है।

हरदोई में खेत नापने आए अधिकारी ने पहले जाति पूछी और फिर दे दी SC/ST Act लगाने की धमकी

ज़रा यूपी के हरदोई का ये ताज़ा मामला सुन लीजिए। इसी महीने अक्टूबर का ये वीडियो पूरे सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हुआ है। घटना हरदोई जिले की सदर तहसील के सखौरा गांव (बेहटी माजरा) की है।

गांव में ज़मीन का कोई पुराना विवाद था। राजस्व विभाग (Revenue Department) की एक पूरी टीम, जिसमें लेखपाल आलोक त्रिपाठी और बाकी अधिकारी शामिल थे, वहां ज़मीन की पैमाइश (नाप-जोख) करने पहुंची थी।

वहां गौरव पांडेय नाम का एक लड़का खड़ा था। उसका सीधा सा कहना था की भाई, ये हमारी 30 साल पुरानी पुश्तैनी ज़मीन है, इसकी नाप-जोख पूरी ईमानदारी और कायदे से होनी चाहिए।

बहस होने लगी। बहस लोकतंत्र में कोई जुर्म तो है नहीं! लेकिन इसके बाद जो हुआ..

लेखपाल आलोक त्रिपाठी ने बीच बचाव करने या नियम समझाने के बजाय, अचानक गौरव से उसकी ‘जाति’ पूछ ली। गौरव ने कहा, “मैं पांडेय हूँ (यानी ब्राह्मण) और दूसरा पक्ष पासी समाज से है।”

बस! इतना सुनना था की लेखपाल महोदय का असली रूप बाहर आ गया। उन्होंने खुलेआम, पूरी बेशर्मी से अपने कर्मचारियों की तरफ देखते हुए कहा- “चलो, इस पर SC/ST वाला लगाओ!”

ज़रा सोचिए इस बात को! जो अधिकारी कुर्सी पर बैठकर न्याय करने आया था, जिसके हाथ में सरकार ने कानून की ताकत दी है, वो खुद एक सामान्य वर्ग के युवक को चुप कराने के लिए SC/ST एक्ट का इस्तेमाल एक हथियार की तरह कर रहा है।

वो उसे डरा रहा है की अगर तूने अपने हक की आवाज़ उठाई, तो मैं तेरे ऊपर ऐसा केस ठोकूंगा की तेरी ज़िंदगी जेल में सड़ जाएगी।

जब ये वीडियो वायरल हुआ और लोगों में भयंकर उबाल आया, तब जाकर हरदोई के एसडीएम मयंक कुंडू ने दिखावे के लिए जांच बैठा दी।

लेकिन सवाल ये है की क्या ये सिर्फ एक लेखपाल की कहानी है? बिल्कुल नहीं।

ये उस पूरी मानसिकता का सबूत है जहाँ सिस्टम में बैठे लोग भी जान चुके हैं की जनरल और ओबीसी को दबाने का सबसे ‘सुविधाजनक’ तरीका यही है की उन पर ये वाला एक्ट लगा दो, सामने वाला अपने आप घुटनों पर आ जाएगा।

अभी प्लेन उड़ाने के लिए नाकाबिल था युवा, इसलिए उड़ान भरने से रोका.. तो सीनियर्स पर तान दी SC/ST Act की लीगल बंदूक

चलिए, खेतों और गांव की पगडंडियों से निकलकर थोड़ा आसमान की तरफ चलते हैं। आपको लगता होगा की कॉर्पोरेट वर्ल्ड या एविएशन (Aviation) जैसे हाई-टेक प्रोफेशन में तो सिर्फ मेरिट (योग्यता) चलती होगी। तो लोग अपनी जाति-पाति छोड़कर सिर्फ टैलेंट की बात करते होंगे।

लेकिन जनाब, जब नाकामी और अयोग्यता सिर पर सवार होती है, तो वहां भी अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए इसी एक्ट की आड़ ली जाती है।

इंडिगो एयरलाइंस (IndiGo) का ये बिल्कुल लेटेस्ट मामला है, जिसने पूरी एविएशन इंडस्ट्री को सन्न कर दिया है। इंडिगो में एक 35 साल के ट्रेनी पायलट (अशोक कुमार) की ट्रेनिंग चल रही थी।

आपको पता ही होगा की कमर्शियल प्लेन उड़ाना कोई मज़ाक नहीं है। वहां पीछे सैकड़ों मुसाफिरों की जान आपके हाथ में होती है।

इसलिए, एक ट्रेनी पायलट को अकेले विमान उड़ाने (Solo flying) के लिए अपने सीनियर इवैल्यूएटर्स से ‘क्लीयरेंस सर्टिफिकेट’ लेना पड़ता है। ये टेस्ट बहुत कड़ा होता है।

जब अशोक कुमार के तीन सीनियर पायलटों (तापस डे, मनीष साहनी और कैप्टन राहुल पाटिल) ने उसका टेस्ट लिया, तो उन्होंने देखा की ये बंदा तो विमान उड़ाने के लिए तकनीकी रूप से पूरी तरह से ‘अनफिट’ (Fit to fly नहीं) है।

अगर इसे क्लीयरेंस दे दिया गया और आसमान में कोई इमरजेंसी आ गई, तो ये सैकड़ों यात्रियों की जान जोखिम में डाल देगा। अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए, उन सीनियर पायलट्स ने उसे क्लीयरेंस देने से साफ मना कर दिया।

अब लॉजिक तो ये कहता है की अगर आप टेस्ट में फेल हो गए हैं, तो अपनी कमी मानिए, और मेहनत कीजिए और अगली बार पास होकर दिखाइए।

लेकिन नहीं! यहां तो शॉर्टकट का ज़माना है। इस ट्रेनी पायलट ने अपनी नाकामी मानने के बजाय, सीधा जाकर बेंगलुरु पुलिस में एक जीरो एफआईआर (Zero FIR) दर्ज करवा दी। और केस किस धारा में किया? SC/ST एक्ट के तहत!

आरोप लगाया गया की इन तीनों सीनियर पायलटों ने उसे जातिसूचक गालियां दीं और कहा की “तुम प्लेन उड़ाने के लायक नहीं हो, जाकर जूते सिलो।”

अब आप खुद सोचिए। कॉकपिट के अंदर, जहाँ हर सेकंड फ्लाइट सेफ्टी पर बात होती है, जहाँ पूरा माहौल प्रोफेशनलिज्म से भरा होता है, वहां तीन सीनियर पायलट अचानक जातिसूचक गालियां देने लगेंगे?

इंडिगो ने तुरंत इन आरोपों को सिरे से बेबुनियाद बताया है। लेकिन ट्रेनी पायलट का मकसद तो पूरा हो गया ना!

उसने अपनी अयोग्यता को छिपाने के लिए अपने सीनियर्स पर एक ऐसा लीगल बम फोड़ दिया, जिससे उनका पूरा करियर और मानसिक शांति खतरे में पड़ गई।

ये घटना सिर्फ एक पायलट की नहीं है, ये देश के पूरे कॉर्पोरेट और मेरिट-बेस्ड सिस्टम की है।

अगर कोई डॉक्टर सर्जरी सही से नहीं कर पा रहा और उसका सीनियर उसे OT से बाहर निकाल दे, तो क्या वो भी बाहर आकर SC/ST एक्ट लगा देगा? ऐसे तो देश का पूरा सिस्टम ही पंगु हो जाएगा यार!

योग्यता गई भाड़ में, अब अगर आपने किसी के काम में गलती निकाली तो SC/ST Act लगाकर सीधे भेजेंगे सलाखों के पीछे

आज हालत ये हो गई है की अगर कोई जूनियर कामचोरी कर रहा है, डेडलाइन मिस कर रहा है या कंपनी का नुकसान कर रहा है, तो भी उसे नौकरी से निकालने से पहले HR डिपार्टमेंट दस बार सोचता है।

उन्हें पता है की अगर इस कर्मचारी का संबंध उस ‘खास’ वर्ग से हुआ, तो अगले ही दिन कंपनी के गेट पर पुलिस खड़ी होगी और बॉस के नाम पर SC/ST एक्ट का फर्जी मुकदमा दर्ज हो चुका होगा।

अरे जनाब, मेरिट (Merit) और टैलेंट का तो मानो मर्डर ही कर दिया गया है! आप दिन-रात एक करके पढ़ाई करते हैं, डिग्रियां लेते हैं, अपनी योग्यता के दम पर किसी ऊंचे पद पर पहुंचते हैं।

लेकिन आपकी सारी डिग्रियां और सालों की मेहनत उस एक एफआईआर (FIR) के आगे रद्दी के कागज़ बन जाती है, जो महज़ खुन्नस निकालने के लिए लिखवाई गई है।

अगर कोई इंसान योग्यता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है, तो सिस्टम को उसे सुधारने या बाहर करने का हक होना चाहिए।

लेकिन इस SC/ST एक्ट ने अयोग्यता (Incompetence) को एक ऐसा सुरक्षा कवच पहना दिया है जहाँ ‘सहानुभूति’ के नाम पर खुलेआम ब्लैकमेलिंग चल रही है।

लोग काम करना नहीं चाहते, लेकिन प्रमोशन सबसे पहले चाहते हैं। और अगर आपने उनकी कामचोरी पर सवाल उठा दिया, तो आप रातों-रात ‘जातिवादी’ घोषित कर दिए जाएंगे।

ये कैसा सिस्टम बना दिया है हमने जहाँ एक झूठा आरोप आपकी पूरी ज़िंदगी भर की इज़्ज़त को दो कौड़ी का कर देता है?

जनरल और ओबीसी समाज के लिए कैसे एक खौफनाक बुरे सपने में बदल चुका है ये कानून

दिल्ली में बैठकर कानून बनाने वाले नेताओं को अक्सर लगता है की SC/ST एक्ट का शिकार सिर्फ जनरल कैटेगरी (जैसे ब्राह्मण, राजपूत, बनिया) ही होते हैं।

लेकिन गांव-देहात वाला आम आदमी जानता है की इस कानून की सबसे भयंकर मार अगर किसी पर पड़ रही है, तो वो है हमारा ओबीसी (OBC) समाज।

मध्य प्रदेश का आधिकारिक डाटा तो खुद कहता है की 80% SC/ST मुक़दमे सीधे से OBC समाज से जुड़े होते हैं!

यादव, कुर्मी, जाट, गुर्जर, मौर्य, लोधी- ये वो किसान और कामगार जातियां हैं जो दिन-रात खेतों में पसीना बहाती हैं।

गांवों की ज़मीनी हकीकत शहरों से बिल्कुल अलग होती है। वहां झगड़े किसी कॉर्पोरेट प्रेजेंटेशन पर नहीं, बल्कि खेत की मेड़, नाली के पानी, या रास्ते की निकासी को लेकर होते हैं।

जब दो पड़ोसियों या गांव वालों के बीच कोई आम सी कहासुनी या धक्का-मुक्की होती है, तो वो सिर्फ एक साधारण सा झगड़ा होता है। उसमें जाति का कोई लेना-देना नहीं होता।

लेकिन जैसे ही मामला पुलिस थाने की चौखट पर पहुंचता है, वहां उस झगड़े को अचानक ‘जातिसूचक गालियों’ और ‘उत्पीड़न’ का रंग दे दिया जाता है।

क्योंकि उन्हें पता है की अगर नॉर्मल मारपीट की धारा लगाएंगे, तो तुरंत ज़मानत मिल जाएगी। लेकिन अगर SC/ST एक्ट ठोक दिया, तो सामने वाला ओबीसी या जनरल परिवार पूरी तरह टूट जाएगा, डर जाएगा और फिर शुरू होगा समझौते के नाम पर पैसों की उगाही का गंदा खेल।

ज़रा NCRB और अदालतों के आंकड़े उठाकर देख लीजिए! साफ़ पता चलता हैकी ट्रायल के बाद 60 से 70 प्रतिशत से ज़्यादा केस या तो झूठे पाए जाते हैं या फिर उनमें राज़ीनामा (समझौता) हो जाता है।

अदालतें खुद मान चुकी हैं की एफआईआर में लिखी गई 90% कहानियां एकदम मनगढ़ंत और कॉपी-पेस्ट होती हैं। लेकिन जब तक अदालत का वो ‘बाइज्जत बरी’ होने वाला फैसला आता है, तब तक उस निर्दोष युवा की नौकरी की उम्र निकल चुकी होती है।

उसके बाप-दादा की ज़मीन वकीलों की फीस भरने में बिक चुकी होती है। उस 70% झूठे मुकदमों में बर्बाद हुई ज़िंदगियों का हिसाब कौन देगा? क्या सरकार उनका खोया हुआ सम्मान और वो कीमती साल वापस लौटा सकती है?

सवाल ये है की आख़िर कब तक? वोट बैंक के लालच में आप देश के करोड़ों निर्दोष नागरिकों (जनरल और ओबीसी) को ब्लैकमेलिंग की इस भट्टी में कब तक झोंकते रहेंगे?

प्रावधान ये होना चाहिए की अगर जांच या ट्रायल के बाद ये साबित हो जाए की SC/ST एक्ट का केस पूरी तरह से ‘फर्जी’ और खुन्नस निकालने के लिए किया गया था, तो झूठा केस करने वाले को भी ठीक उतने ही साल की जेल और भारी जुर्माना होना चाहिए!

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