अकबर की पचास हज़ार की सेना पर भारी पड़ी इस हिन्दू शेरनी की मुट्ठी भर टुकड़ी, 16 सालों तक मुग़लों को लोहे के चने चबवाने वाली गोंडवाना की महारानी ‘दुर्गावती’ को 502वीं जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि

आज 5 अक्टूबर है। वही पावन दिन जब 502 साल पहले इस धरती पर एक ऐसी हिन्दू शेरनी ने जन्म लिया था, जिसने अपनी आज़ादी और अपने स्वाभिमान के लिए मुगलों की पचास हज़ार की तोपखाना लिए खड़ी फौज के दाँत खट्टे कर दिए थे।

हम बात कर रहे हैं गोंडवाना की अजेय महारानी, वीरांगना दुर्गावती की। आज उनकी 502वीं जयंती पर पूरा देश उस महान देवी के सामने नतमस्तक है।

चलिए, आज उस शौर्य गाथा को करीब से जानते हैं जिसने भारतीय इतिहास में सनातन स्वाभिमान की सबसे बड़ी लकीर खींच दी।

महारानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में स्थित अभेद्य ‘कालिंजर किले’ में हुआ था।

वो महोबा के उसी महान और प्रतापी चंदेल राजपूत वंश के राजा कीरत राय की बेटी थीं, जिस वंश के राजाओं ने दुनिया को खजुराहो के भव्य मंदिर दिए।

राजपूत और गोंड समाज के ऐतिहासिक गठबंधन से बनी वो अजेय शक्ति जिसने 16 साल तक गोंडवाना को सोने की चिड़िया बना दिया

साल 1542 में चंदेलों की इस बेटी का विवाह गोंडवाना (जिसे गढ़ा-कटंगा भी कहा जाता था) साम्राज्य के प्रतापी गोंड राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह से हुआ।

शादी के कुछ ही साल बाद, 1550 में राजा दलपत शाह का अचानक निधन हो गया। उस वक्त रानी का बेटा ‘वीर नारायण’ महज़ 5 साल का था।

चारों तरफ से दुश्मनों की नज़रें गोंडवाना पर गड़ी थीं। सबको लगा की एक कमज़ोर औरत है, आसानी से उसका राज्य हड़प लेंगे। लेकिन रानी दुर्गावती ने रोने-धोने के बजाय तुरंत अपने राज्य की कमान अपने हाथों में ले ली।

अगले 16 सालों तक उन्होंने गोंडवाना पर जो राज किया, उसने इस राज्य को सच में ‘सोने की चिड़िया’ बना दिया। उन्होंने सुरक्षा के लिहाज़ से अपनी राजधानी ‘सिंगौरगढ़’ से हटाकर सतपुड़ा की ऊंची पहाड़ियों में स्थित ‘चौरागढ़’ के किले में शिफ्ट कर दी।

उनके सुशासन का आलम ये था की लोग लगान (टैक्स) के रूप में अनाज या तांबे के सिक्के नहीं, बल्कि शुद्ध सोने के सिक्के और हाथी दिया करते थे।

आज जो आप जबलपुर में ‘रानीताल’, ‘चेरीताल’ और ‘अधारताल’ जैसी शानदार जल संरचनाएं देखते हैं, वो रानी दुर्गावती के उसी विकास मॉडल की गवाही देती हैं।

उनका राज सिर्फ तलवार का राज नहीं था, बल्कि अपनी जनता की भलाई और खुशहाली का राज था।

अकबर की नीयत में खोट और गोंडवाना की अथाह दौलत लूटने के लिए आसफ खान को भेजी गई पचास हज़ार की मुग़ल फौज

अब बात करते हैं उस दौर की मुग़ल सत्ता की। जब दिल्ली के तख्त पर बैठे अकबर ने मालवा पर कब्ज़ा कर लिया, तो उसकी सीमाएं गोंडवाना से जा लगीं।

अकबर को जब पता चला की गोंडवाना में कितनी अथाह दौलत है और वहां की रानी के पास 1000 से ज़्यादा बेहतरीन नस्ल के सफेद हाथी हैं, तो उसके मुँह में पानी आ गया।

साल 1564 में अकबर ने कड़ा-मानिकपुर के अपने सबसे क्रूर और खूंखार सूबेदार ‘आसफ खान’ को एक बहुत बड़ा फरमान दिया।

उसने आसफ खान को पचास हज़ार सैनिकों की एक विशाल फौज और भारी तोपखाने के साथ गोंडवाना को मिट्टी में मिलाने के लिए भेज दिया।

जब ये खबर गोंडवाना पहुँची, तो रानी के सबसे वफादार वज़ीर और सेनापति ‘आधार सिंह’ ने रानी को सलाह दी की महारानी, मुगलों की सेना पचास हज़ार की है और हमारे पास महज़ कुछ हज़ार सैनिक हैं। उनके पास बारूद उगलने वाली तोपें हैं। हमें अभी पीछे हट जाना चाहिए या सुलह कर लेनी चाहिए।

लेकिन तब गोंडवाना की उस शेरनी ने जो जवाब दिया, वो आज भी हमारे रोंगटे खड़े कर देता है। रानी ने अपनी म्यान से तलवार निकालते हुए कहा- “कलंक और अपमान का जीवन जीने से हज़ार गुना भली है सम्मान की मौत!”

रानी ने तय कर लिया था की मुगलों के आगे घुटने टेकने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, जंग होगी और आर-पार की होगी।

नर्रई नाले के युद्ध में मुट्ठी भर वीरों ने कैसे तोड़ा मुग़लों का घमंड और तोपों का मुकाबला अपनी तलवारों से किया

रानी दुर्गावती कोई अंधी जज़्बाती योद्धा नहीं थीं, वो एक गज़ब की रणनीतिकार (Tactician) थीं। उन्हें मालूम था की अगर मुगलों की विशाल सेना से खुले मैदान में लड़ाई हुई, तो उनकी तोपें भारी पड़ेंगी।

इसलिए रानी ने युद्ध के लिए जबलपुर के पास ‘नर्रई’ नाम की एक बेहद संकरी घाटी को चुना। इस घाटी के एक तरफ ऊंची खड़ी पहाड़ियां थीं और दूसरी तरफ नर्मदा और गौर नदी उफान मार रही थी।

मुगलों की भारी-भरकम फौज को इस संकरे नाले में घुसना ही पड़ा।

रानी अपनी महज़ 5,000 गोंड और राजपूत सैनिकों की टुकड़ी के साथ अपने सबसे प्रिय सफेद हाथी ‘सरमन’ पर सवार होकर मुगलों पर टूट पड़ीं।

पहले दिन की लड़ाई इतनी भयंकर थी की मुगलों को दिन में तारे दिख गए। रानी की तलवार जिधर भी घूमती, मुगलों के सिर धड़ से अलग हो जाते।

मुट्ठी भर गोंड आदिवासियों और राजपूतों ने मिलकर मुग़ल सेना में ऐसा कत्लेआम मचाया की आसफ खान की फौज में भगदड़ मच गई। पहले दिन के युद्ध में मुगलों का भारी नुकसान हुआ और उन्हें हार कर पीछे हटना पड़ा।

पचास हज़ार की फौज मुट्ठी भर वीरों के सामने पानी मांगती हुई नज़र आ रही थी।

मुग़लों के हाथ लगने के बजाय खुद अपने सीने में उतारी कटार, गोंडवाना की इस अमर वीरांगना ने लिख दी सबसे महान शौर्य गाथा

पहला दिन रानी के नाम रहा, लेकिन 24 जून 1564 को दूसरे दिन के युद्ध में परिस्थितियां बदलने लगीं। मुगलों ने अपनी सबसे भारी तोपों का मुँह खोल दिया। नर्रई की घाटी में तोपों के गोलों से आग बरसने लगी।

रानी के कई बहादुर सेनापति वीरगति को प्राप्त हो गए। इसी बीच उनका बेटा वीर नारायण भी बुरी तरह घायल हो गया।

रानी ने तुरंत अपने कुछ वफादार सैनिकों के साथ बेटे को युद्धभूमि से सुरक्षित स्थान पर भिजवा दिया और खुद मौत का कफन बांधकर वापस मैदान में डट गईं।

वो साक्षात देवी चंडी का रूप धर चुकी थीं। तभी मुगलों की तरफ से आया एक सननता हुआ तीर रानी की गर्दन में आकर धंस गया। रानी ने बिना कोई परवाह किए उस तीर को अपने हाथों से खींच कर निकाल फेंका। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।

एक दूसरा तीर सीधा उनकी आँख के पास आकर लगा। इस तीर को निकालते समय तीर का अगला हिस्सा उनकी आँख के पास ही टूट कर फँस गया, जिससे भयंकर खून बहने लगा और रानी बेसुध होने लगीं।

जब मुग़ल सैनिकों ने देखा की रानी घायल हैं, तो वो उन्हें ज़िंदा पकड़ने के लिए गिद्धों की तरह आगे बढ़ने लगे। जब रानी दुर्गावती को एहसास हो गया की अब युद्ध जीतना और बचना दोनों नामुमकिन है, तो उन्होंने अपनी म्यान से अपनी कटार निकाली और एक ही झटके में उसे अपने सीने के आर-पार कर लिया।

रानी दुर्गावती ने मुगलों के सामने झुकने के बजाय एक सच्चे वीर की तरह वीरगति को गले लगा लिया।

आज जब हम 5 अक्टूबर को उनकी 502वीं जयंती मना रहे हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए की रानी दुर्गावती का यह सर्वोच्च बलिदान नारी शक्ति और हिन्दू स्वाभिमान का वो चमकता हुआ सूरज है जिसकी गर्मी आज भी हमारे दिलों में महसूस होती है।

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