आजकल टीवी खोलो या सोशल मीडिया देखो, तो आपको एक बहुत ही सेट पैटर्न नज़र आएगा। जैसे ही कहीं चुनाव के नतीजे आते हैं और एक खास पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ता है, तो झट से एक रटा-रटाया टूलकिट एक्टिव हो जाता है।
पत्रकारों को बुलाकर कैमरे के सामने चिल्लाया जाता है की “ईवीएम (EVM) हैक हो गई है!” फिर कुछ भारी-भरकम शब्द उछाले जाते हैं- ‘लोकतंत्र खतरे में है’, ‘डिक्टेटरशिप आ गई है’, ‘हमारा मैंडेट चुरा लिया गया है’..
और सामने वाले को ‘वोट चोर’ का सर्टिफिकेट बांट दिया जाता है।
सच कहूं तो ये रोना-धोना इतनी बार हो चुका है की अब पब्लिक भी इसे देखकर चैनल बदल देती है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की दूसरों की चुनी हुई सरकारों पर उंगली उठाने वाले, दूसरों को ‘वोट चोर’ कहने वाले इन लोगों का अपना इतिहास क्या है?
ये जो आज ‘लोकतंत्र-लोकतंत्र’ चिल्ला रहे हैं, इनकी अपनी सियासत की बुनियाद ही आज़ाद भारत के इतिहास की सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ (Mandate Theft) पर टिकी हुई है।
अरे भाई, आप तो आज ईवीएम और वीवीपैट (VVPAT) मशीन में चोरी की बात करते हैं। ज़रा इतिहास के पन्ने पलटकर देखिए, आपके अपने ही कुनबे ने तो 1946 में बिना किसी मशीन, बिना किसी ईवीएम और बिना किसी हैकिंग के पूरी की पूरी ‘प्रधानमंत्री’ की कुर्सी ही उड़ा ली थी!
एक ऐसा नेता जिसे पार्टी के भीतर किसी ने एक वोट तक नहीं दिया, उसे रातों-रात पिछले दरवाज़े से देश के 40 करोड़ लोगों के सिर पर बैठा दिया गया।
और जिस लौह पुरुष को सौ फीसदी लोकतांत्रिक बहुमत मिला था, उसके हाथ से सत्ता की चाबी ऐसे छीन ली गई जैसे कोई राजा अपने सिपाही से उसकी तलवार मांग लेता है।

1946 का वो ऐतिहासिक चुनाव जो महज़ कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का नहीं बल्कि आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री का चुनाव था
इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे, यानी 1946 के उस गर्म माहौल में जाना होगा। दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था। अंग्रेजों की कमर टूट चुकी थी और उन्हें समझ आ गया था की अब हिंदुस्तान पर और ज्यादा दिन राज करना उनके बस की बात नहीं है।
इसी बीच ब्रिटेन से ‘कैबिनेट मिशन’ (Cabinet Mission) भारत पहुंचता है। तय ये होता है की अंग्रेज अब सत्ता भारतीयों को सौंपेंगे, लेकिन उससे पहले देश को चलाने के लिए एक ‘अंतरिम सरकार’ (Interim Government) बनाई जाएगी।
अब यहीं से शुरू होता है असली पावर गेम। इस अंतरिम सरकार का ढांचा कुछ ऐसा था की इसका नेतृत्व वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल का ‘वाइस-प्रेसिडेंट’ करने वाला था।
और ये अघोषित रूप से तय हो चुका था की कांग्रेस पार्टी का जो भी राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा, वही इस काउंसिल का प्रमुख बनेगा।
आसान भाषा में कहें तो 1946 में जो भी कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाता, वही सीधे तौर पर आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री (Prime Minister) बनने वाला था। ये कोई आम पार्टी चुनाव नहीं था दोस्त, ये देश के सबसे बड़े सिंहासन की लड़ाई थी।
उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद। वे 1940 से ही इस कुर्सी पर काबिज थे। सच कहूं तो जब उन्हें हवा लगी की अब अध्यक्ष ही देश का पीएम बनेगा, तो उनका मन भी डोल गया था।
वो किसी न किसी बहाने इस कुर्सी पर चिपके रहना चाहते थे। लेकिन महात्मा गांधी को ये मंज़ूर नहीं था। गांधी जी ने मौलाना आज़ाद को साफ शब्दों में संदेश भिजवा दिया की बहुत हो गया, अब अध्यक्ष पद के लिए नए सिरे से चुनाव होगा।
मौलाना को बेमन से हटना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए नामांकन (Nomination) की आखिरी तारीख तय की- 29 अप्रैल 1946।
अब पूरे देश की नज़रें इस बात पर टिक गईं की आखिर कौन होगा वो शख्स जो इस विशाल और मुश्किलों से घिरे भारत की कमान संभालेगा।
रेस में दो ही सबसे बड़े चेहरे थे- सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू।
एक तरफ ज़मीन से जुड़ा वो लौह पुरुष था जिसने किसानों के पसीने को महसूस किया था, और दूसरी तरफ वो आदर्शवादी नेता था जिसकी नज़रें हमेशा आसमान और किताबों में ही उलझी रहती थीं।
15 प्रांतीय कमेटियों की वोटिंग में सरदार पटेल का डंका और नेहरू का ‘जीरो’ स्कोर जिसे आज भी छुपाया जाता है

अब बात करते हैं वोटिंग की, क्योंकि सारा दूध का दूध और पानी का पानी तो यहीं होना है। कांग्रेस के अपने ही संविधान के अनुसार, उस वक्त अध्यक्ष चुनने का हक़ दिल्ली में बैठे कुछ वीआईपी नेताओं (वर्किंग कमेटी) को नहीं था।
यह हक़ पूरे देश में फैली 15 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों (Provincial Congress Committees – PCCs) को दिया गया था। यही वो कमेटियां थीं जो ज़मीनी हकीकत जानती थीं। इन्हें ही तय करना था की इनका नेता कौन होगा।
नामांकन मांगे गए और जब नतीजे सामने आए, तो वो आंकड़े आज भी कांग्रेस के ‘लोकतंत्र प्रेमी’ नेताओं के मुंह उतारने के लिए काफी हैं।
15 प्रांतीय कमेटियों में से पूरी की पूरी 12 कमेटियों ने डंके की चोट पर सिर्फ और सिर्फ एक नाम प्रस्तावित किया- सरदार वल्लभभाई पटेल!
बाकी बची 3 कमेटियों ने आचार्य कृपलानी और पट्टाभि सीतारमैया का नाम आगे किया (या यूं कहें की किसी एक नाम पर सहमति नहीं बना पाईं)।
लेकिन ज़रा रुकिए, इसमें एक नाम तो गायब ही है! जी हां, जवाहरलाल नेहरू! आपको यह जानकर भयंकर हैरानी होगी की उन 15 प्रांतीय कमेटियों में से 0 (शून्य) कमेटी ने नेहरू का नाम लिया। एक भी नहीं!
मतलब सोचिए, जिस लोकतंत्र और मैंडेट (Mandate) का रोना आज रोया जाता है, उस शुद्ध लोकतांत्रिक तरीके से नेहरू पूरी तरह से रिजेक्ट हो चुके थे।
पार्टी का ज़मीनी कैडर उन्हें अपना नेता, अपना प्रधानमंत्री बिल्कुल नहीं देखना चाहता था। पटेल के पास 80 प्रतिशत से ज़्यादा का प्रचंड बहुमत था।
और प्रांतीय कमेटियों का पटेल को चुनना कोई भावुक फैसला नहीं था, इसके पीछे बहुत ही सॉलिड वजहें थीं। पटेल हवाई बातें नहीं करते थे, वो एक ठेठ ज़मीनी प्रशासक थे।
पार्टी का फंड जुटाने से लेकर, कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने और हर प्रांत के नेताओं को एक साथ साध कर चलने का सारा काम सरदार पटेल ही संभालते थे।
वो संगठन के असली ‘बॉस’ थे। दूसरी तरफ, प्रांतीय कमेटियां नेहरू की खामियों को बहुत अच्छे से जानती थीं। उन्हें पता था की नेहरू बहुत ‘इम्पल्सिव’ (भावनाओं में बहने वाले) और ‘हवा-हवाई’ किस्म के नेता हैं।
देश बंटवारे की आग पर बैठा था, 560 से ज़्यादा रियासतों को एक करना था, दंगे भड़क रहे थे। ऐसे में देश को एक सख्त, प्रैक्टिकल और लोहे जैसे इरादे वाले प्रशासक की ज़रूरत थी, न कि किसी ऐसे नेता की जो दुनिया भर की विदेश नीति पर तो ज्ञान बांट दे, लेकिन ज़मीन पर अपने ही लोगों को न संभाल पाए।
इसीलिए पूरे देश ने एक स्वर में सरदार पटेल को अपना प्रधानमंत्री चुन लिया था। लोकतंत्र अपनी मुहर लगा चुका था।
लेकिन किसे पता था की दिल्ली के बंद कमरों में लोकतंत्र की पीठ में छुरा घोंपने की एक ऐसी पटकथा लिखी जा रही है, जो इस पूरे जनादेश को ही कचरे के डिब्बे में डाल देगी।
जब एक व्यक्ति की जिद के आगे लोकतंत्र पर वीटो रखा गया और पलट दिया गया पूरा जनादेश
अब कहानी में वो ट्विस्ट आता है, जिसे सुनकर आपको समझ आएगा की सत्ता की भूख असल में होती क्या है। तारीख थी 29 अप्रैल 1946।
दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक बुलाई गई थी। मेज़ पर चुनाव के नतीजे रखे थे। 15 में से 12 कमेटियों का वोट सरदार पटेल के नाम था और नेहरू के खाते में एक बड़ा सा ‘शून्य’ था।
लोकतंत्र ने अपना फैसला सुना दिया था और नियम के हिसाब से उस दिन सरदार पटेल को आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री घोषित कर दिया जाना चाहिए था।
लेकिन इसी कमरे में महात्मा गांधी भी मौजूद थे, जिनका जवाहरलाल नेहरू के प्रति एक अजीब और अंधा मोह था। जाने-माने पत्रकार दुर्गा दास अपनी मशहूर किताब “India from Curzon to Nehru and After” में इस घटना का बहुत ही सटीक ज़िक्र करते हैं।
जब गांधी जी ने देखा की नेहरू को तो किसी ने पूछा तक नहीं है, तो उन्होंने नेहरू की तरफ देखते हुए कहा- “जवाहर, किसी भी प्रांतीय कमेटी ने तुम्हारा नाम नहीं लिया है। सिर्फ वर्किंग कमेटी के कुछ सदस्य तुम्हारा नाम ले रहे हैं।”
गांधी जी की इस बात का मतलब था की वो नेहरू से उम्मीद कर रहे थे की वो बड़प्पन दिखाएंगे और खुद ही पटेल के लिए रास्ता छोड़ देंगे। लेकिन वहां तो कुछ और ही चल रहा था!
नेहरू ने गांधी जी की बात सुनकर एक शब्द नहीं कहा। वो बिल्कुल खामोश बैठे रहे। ये कोई आम खामोशी नहीं थी दोस्त, ये एक ऐसी ज़िद और गुरूर की खामोशी थी जो चीख-चीख कर कह रही थी की “मैं किसी के नीचे नंबर-2 बनकर काम नहीं करूंगा।”
नेहरू का ये अड़ियल रवैया देखकर गांधी जी धर्मसंकट में पड़ गए। उन्हें लगने लगा की अगर नेहरू को उनकी मनपसंद ‘प्रधानमंत्री’ की कुर्सी नहीं दी गई, तो वो पार्टी तोड़ देंगे, बागी हो जाएंगे या अंग्रेज़ों के सामने एक ऐसा तमाशा खड़ा कर देंगे जिससे आज़ादी की पूरी प्रक्रिया ही खटाई में पड़ जाएगी।
बस, यहीं से ‘लोकतंत्र’ को ताक पर रखने और एक व्यक्ति की ज़िद को 40 करोड़ हिंदुस्तानियों के जनादेश के ऊपर थोपने का वो वीटो (Veto) लगा दिया गया।

एक सादे कागज़ पर रची गई असंवैधानिक चाल, इतिहास की सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ के साथ नेहरू बन गए देश के पहले प्रधानमंत्री
अब जब नेहरू ने साफ कर दिया की वो तो कुर्सी लेकर ही मानेंगे, तो एक ऐसा ‘मैनेजमेंट’ किया गया जिसे आज की राजनीति में ‘मैंडेट की चोरी’ कहते हैं।
आचार्य कृपलानी (जो खुद वहां मौजूद थे और बाद में इसका अपनी आत्मकथा में ज़िक्र भी किया) ने गांधी जी का इशारा समझा। उन्होंने झट से एक सादा कागज़ उठाया और उस पर अपनी मर्जी से जवाहरलाल नेहरू का नाम लिख दिया।
अब मज़ाक देखिए! कांग्रेस के संविधान के मुताबिक अध्यक्ष चुनने का हक़ तो 15 प्रांतीय कमेटियों का था, वर्किंग कमेटी के पास ये अधिकार था ही नहीं।
लेकिन आचार्य कृपलानी ने उसी सादे कागज़ पर दिल्ली में बैठे कुछ लोकल वर्किंग कमेटी के सदस्यों के हस्ताक्षर करवा लिए। मतलब जिस आदमी को ज़मीनी कैडर ने पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया था, उसे महज़ एक कागज़ की पर्ची के दम पर ‘सिलेक्ट’ (Select) कर लिया गया।
पर्ची तैयार होने के बाद, गांधी जी ने वो कागज़ सरदार वल्लभभाई पटेल की तरफ बढ़ाया और उनसे कहा की वो अपना नाम वापस (Withdraw) ले लें।
ज़रा एक मिनट के लिए रुक कर सोचिए! अगर आज का कोई नेता होता जिसके पास 80 प्रतिशत से ज़्यादा का प्रचंड बहुमत होता, जिसे पूरे देश ने अपना नेता चुना होता, और उससे यूं कुर्सी छीन ली जाती… तो वो क्या करता?
वो वहीं बगावत कर देता, पार्टी के दो टुकड़े कर देता और अपना हक छीन कर लेता। सरदार पटेल चाहते तो एक सेकंड में नेहरू को किनारे कर सकते थे क्योंकि पूरी पार्टी उनके इशारे पर नाचती थी।
लेकिन वो सरदार पटेल थे, कोई कुर्सी के भूखे सियासतदान नहीं। वो गांधी जी को अपना गुरु मानते थे। उन्होंने देखा की देश आज़ादी के मुहाने पर खड़ा है। अंग्रेज़ अभी गए नहीं हैं और अगर कांग्रेस के दो सबसे बड़े नेताओं में फूट पड़ गई, तो पूरा देश बंट जाएगा।
सिर्फ इसी देशप्रेम और एकता के लिए, उस लौह पुरुष ने बिना एक पल गंवाए, बिना कोई बहस किए, अपनी उम्मीदवारी वापस लेने वाले कागज़ पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।
एक झटके में… महज़ एक झटके में पूर्ण बहुमत वाले नेता ने ज़ीरो वोट वाले नेता के लिए देश का सबसे बड़ा सिंहासन खाली कर दिया। और इस तरह, बिना किसी ईवीएम मशीन के नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए।
ये आज़ाद भारत के इतिहास की सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ थी।
आज जब कांग्रेस के नेता या उनके समर्थक बहुत ही मासूम शक्ल बनाकर ‘चुनी हुई सरकारों’ पर सवाल उठाते हैं… जब वो कहते हैं की “बीजेपी वाले वोट चोर हैं”, “मैंडेट चुरा लिया”, “लोकतंत्र की हत्या हो गई”…
तो सच में बड़ी हंसी आती है।
जिस पार्टी की पूरी की पूरी सियासत ही 1946 के उस काले अध्याय और ‘वोट चोरी’ की बुनियाद पर खड़ी हो, जिसने बिना एक भी वोट पाए एक व्यक्ति को सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया हो, वो आज किस मुंह से ईवीएम और लोकतंत्र की दुहाई देते हैं?
