1876-78 का मद्रास अकाल: जब दक्षिण भारत सूख गया, अनाज बन्दरगाहों से बाहर जाता रहा, और अंग्रेजी राज की उदासीनता ने लाखों भारतीयों को भूख, बीमारी और मौत के हवाले कर दिया

1885 याद है। कांग्रेस बनी। एलन ऑक्टेवियन ह्यूम और विलियम वेडरबर्न के नाम पाठ्यक्रम में आ जाते हैं। उस धक्के का साल कम याद है। 1876 से 1878 तक दक्षिण चुप था। मद्रास प्रेसीडेंसी, मैसूर, हैदराबाद और बॉम्बे दक्कन एक साथ संकट में थे। संकट फिर मध्य प्रांत और उत्तर-पश्चिमी प्रांत के कुछ हिस्सों तक बढ़ा। लगभग 6,70,000 वर्ग किलोमीटर। संकटग्रस्त आबादी लगभग 5.85 करोड़। उस समय भारत लगभग 25.5 करोड़ का था।

अतिरिक्त मौतें 56 लाख से 96 लाख। अरूप महारत्न लगभग 82 लाख। विलियम डिगबी, जिन्होंने मद्रास में संकट देखा, लगभग 94 लाख। एक करोड़ ऊपरी तर्क है, बँधी जनगणना नहीं। संस्था खड़ी हुई। सड़क, जिस पर लोग कैंप की तरफ चल रहे थे, दीवार पर नहीं चढ़ी।

सूखा संकट की शुरुआत था। नीति ने तय किया कि किसे मरने दिया जाए।

आप औशविट्ज़ का नाम ले सकते हैं। ऐन फ्रैंक का नाम ले सकते हैं। शिंडलर्स लिस्ट सुनी हुई है, देखा न हो तो भी शीर्षक याद है। अब वही सवाल अपने शहर पर घुमाइए। मद्रास अकाल का नाम बताइए। साल बताइए। वह जिला बताइए जहाँ से लोग कैंप की तरफ चल पड़े थे।

जवाब अक्सर खाली आता है। खाली इसलिए नहीं कि आपने इतिहास नहीं पढ़ा। खाली इसलिए कि यह इतिहास आपको नाम के साथ दिया ही नहीं गया।

एक बार और पूछिए, धीरे। मद्रास अकाल। साल। वह रास्ता जहाँ लोग कैंप की तरफ चले। तीनों में से एक भी अगर तुरंत न आए, तो चुप रहिए। चुप रहना शर्म की बात नहीं है। चुप रहना सबूत है। सबूत इस बात का कि एक घाव पाठ्यक्रम से निकलकर घर की बातचीत तक नहीं पहुँचा।

औशविट्ज़ पर चुप नहीं रहते। नाम आ जाता है। ऐन फ्रैंक पर चुप नहीं रहते। डायरी की तस्वीर आ जाती है। शिंडलर्स लिस्ट पर भी नहीं। शीर्षक ही काफी है। मद्रास पर चुप रह जाते हैं। बंगाल 1943 पर भी, अगर घर में कोई बुज़ुर्ग खुद न सुनाए। यह फर्क याददाश्त का नहीं है। यह फर्क उस चीज़ का है जो बार-बार सुनाई गई, और उस चीज़ का जो एक पंक्ति बनकर रह गई।

खाली जवाब के अंदर तीन परतें हैं:

  • पहली परत: नाम की है। अकाल सुना है। दक्षिण भारत का अकाल, महान अकाल, 1876-78। ये तीन नाम एक ही घटना के हैं। स्कूल में अक्सर एक भी नहीं ठहरता। ठहरता है 1857। ठहरता है 1947। बीच के साल भूख के साल हैं, और भूख के साल भाषण में काम नहीं आते।
  • दूसरी परत: नक्शे की है। मद्रास प्रेसीडेंसी, मैसूर, हैदराबाद, बॉम्बे दक्कन। फिर उत्तर की ओर, मध्य प्रांत और उत्तर-पश्चिमी प्रांत के कुछ हिस्से। लगभग 6,70,000 वर्ग किलोमीटर। संकटग्रस्त आबादी लगभग 5.85 करोड़। यह वाक्य अगर पहली बार पढ़ रहे हैं, तो रुकिए। यह एक ज़िले का किस्सा नहीं है। यह उपमहाद्वीप का एक बड़ा टुकड़ा है, एक साथ भूख के नीचे। नक्शा दीवार पर नहीं टँगा, इसलिए ज़िला नाम याद नहीं रहा। बेल्लारी दक्षिण के अंदर था। मिदनापुर बाद में बंगाल के अंदर। दोनों आज भी खेती करते हैं। राष्ट्रीय कहानी में दोनों धुँधले हैं।
  • तीसरी परत: आँकड़े की है। अतिरिक्त मौतें 56 लाख से 96 लाख। अरूप महारत्न का सावधान अनुमान लगभग 82 लाख। विलियम डिगबी, जिन्होंने मद्रास में संकट अपनी आँख से देखा, लगभग 94 लाख रखते हैं। अक्सर उद्धृत एक करोड़ ऊपरी छोर है, बँधी हुई जनगणना नहीं। यहूदी नरसंहार के मृत लगभग 60 लाख। मद्रास का ऊपरी अनुमान उसके ऊपर बैठता है। निचला अनुमान भी सभ्यता का घाव है। फिर भी बच्चा एक संख्या ज़ोर से सुना सकता है, दूसरी नहीं।

यहीं खाली जवाब खतरनाक होता है। खाली जवाब को लोग विनम्रता समझ लेते हैं। “पता नहीं, शायद मौसम था।” मौसम शुरुआत था। सदी का सबसे तेज़ एल नीनो। मानसून नहीं आया। यह सच है। सच का आधा हिस्सा है। अनाज माल बना रहा। नकदी फसल और निर्यात के रास्ते नहीं रुके। मज़दूरी गिरी, दाम नहीं गिरे। राहत देर से आई, सख्त आई, श्रम-परीक्षा से बँधी। हैजा, मलेरिया और पेचिश भूख पर सवार हुए।

यह दूसरा वाक्य अगर खाली जवाब के ठीक बाद बोल लें, तो खालीपन टूटता है। टूटता इसलिए नहीं कि सब अपराधी एक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। टूटता इसलिए कि मौसम अकेला बहाना नहीं रह जाता।

अपने पास बैठे किसी पढ़े-लिखे आदमी से आज शाम यही तीन सवाल पूछिए। नाम। साल। जिला। जवाब खाली आए, तो उसे सुधारिए मत। उसे वह सीमा बताइए जो आपको अभी मिली है। 56 लाख से 96 लाख। डिगबी। श्रम-परीक्षा। 1885, जब ह्यूम और वेडरबर्न कांग्रेस की तरफ बढ़े, क्योंकि आधिकारिक जवाब काफी नहीं था। एक खाली जवाब दूसरे खाली जवाब को जन्म देता है। एक भरा जवाब मेज़ पर रह जाता है।

बंगाल पर भी यही परीक्षण चलाइए। 1943। 20 लाख से 30 लाख, कुछ अनुमान 38 लाख तक। आधी से ज़्यादा मौतें 1944 में, जब सबसे बुरी कमी ढीली पड़ने लगी थी। डिनायल नीति। दसियों हज़ार नावें। बर्मा का चावल। युद्ध मंत्रिमंडल का महीनों जहाज़ न मोड़ना। लॉर्ड लिनलिथगो अक्टूबर 1943 तक वायसराय रहे। राहत तब सुधरी जब लॉर्ड वेवेल उनकी जगह आए और सेना ने उसी महीने खर्चा सँभाला। सुधार सच था। लाखों के लिए देर भी सच थी। अनाज 1943 के अंत से आया। चोटी के बाद का आना चोटी को वापस नहीं घुमाता। कलकत्ता में युद्ध कार्यालय और सिनेमा चल रहे थे, फुटपाथ पर लाशें थीं। यह वाक्य भी अधिकतर मेज़ों पर नहीं पहुँचता। पहुँचता है बँटवारा। पहुँचती है आज़ादी। भूख बीच में गिर जाती है।

खाली जवाब इसलिए दोहराव माँगता है, भाव नहीं। एक बार बोलिए। दूसरी बार नक्शा साथ रखिए। तीसरी बार आँकड़े की सीमा, ताकि एक करोड़ और 56 लाख में से कोई एक को चुनकर कहानी न बना ले। इतिहासकार सीमा पर असहमत हैं। सीमा के बाहर कोई नहीं है। निचला छोर भी काफी है।

जो जवाब आज खाली है, वह कल भी खाली रहेगा, अगर उसे दीवार, अध्याय और फ़िल्म न मिले। ओहायो का बच्चा खोजे बिना ऐन फ्रैंक से मिल जाता है। चेन्नई और कोलकाता का बच्चा स्कूल खत्म कर सकता है, बिना मद्रास 1877 या बंगाल 1943 को नैतिक इतिहास की तरह मिले। फर्क प्रतिभा का नहीं है। फर्क इस बात का है कि किस खाली जगह को भरना ज़रूरी माना गया।

आज का काम छोटा रखिए। तीन सवाल। एक सीमा। एक वाक्य: सूखा शुरुआत था, नीति ने तय किया कि किसे मरने दिया जाए। खाली जवाब यहीं से भरना शुरू होता है। भाषण से नहीं। मेज़ से।

इस वाक्य को एक बार और पढ़िए। इसमें दो काम एक साथ हो रहे हैं। पहला काम प्रकृति को उसके हिस्से से कम नहीं आँकना। दूसरा काम प्रकृति को पूरी सफ़ाई नहीं दे देना।

बारिश नहीं हुई। यह झूठ नहीं है। सदी का सबसे तेज़ एल नीनो था। मानसून तब नहीं आया जब खेत उसे माँग रहे थे। तालाब गिरे। कुएँ पतले हुए। 1942 में बंगाल पर चक्रवात आया, ज्वार की लहरें आईं, फ़सल में बीमारी लगी। बर्मा जापान के कब्ज़े में चला गया, और बर्मा का चावल कट गया। ये शुरुआत हैं। शुरुआत मौत का पूरा हिसाब नहीं है।

हिसाब वहाँ से शुरू होता है जहाँ अनाज और आदमी अलग हो जाते हैं।

मद्रास में अनाज माल बना रहा। नकदी फसल के रास्ते नहीं रुके। निर्यात के चैनल नहीं रुके। जहाज़ को माल मिला। बाज़ार को खरीदार मिला। जिस मज़दूर का खेत फेल हो चुका था, उसकी मज़दूरी गिर गई। दाम नहीं गिरे। वह उस कीमत तक नहीं पहुँच सका जो व्यापारी बंदरगाह पर पा सकता था। दो तथ्य। बीच में सड़क। सड़क पर लोग कैंप की तरफ चल रहे थे, क्योंकि गाँव में बेचने को कुछ नहीं बचा था और खाने को कुछ नहीं। विलियम डिगबी ने यह संकट मद्रास में अपनी आँख से देखा।

राहत भी नीति थी। देर से आई। सख्त आई। श्रम-परीक्षा से बँधी। भूखे को काम से साबित करना पड़ा कि वह भोजन का हक़दार है। जो चल नहीं सकता था, वह परीक्षा में फेल था। जो फेल था, वह कतार से बाहर था। हैजा, मलेरिया और पेचिश भूख पर सवार हुए। खाली शरीर बुखार से नहीं लड़ता। बीमारी और भुखमरी यहाँ दो कॉलम नहीं हैं। एक ही घटना हैं।

यहीं रुकिए। सूखे ने खेत फेल किया। नीति ने तय किया कि भंडार किसके लिए खुले, मज़दूरी किस स्तर पर रहे, और राहत किसे काम के बदले मिले। तीनों फ़ैसले बारिश के बाद के हैं।

बंगाल में क्रम और साफ़ है, क्योंकि कारण अलग-अलग पड़े हैं। चक्रवात, ज्वार और फ़सल की बीमारी 1942 के झटके थे। बर्मा चावल का कटना युद्ध का झटका था। इसके बाद नीति आई। डिनायल नीति ने तटीय ज़िलों से अतिरिक्त चावल हटाया। दसियों हज़ार नावें ज़ब्त हुईं या नष्ट हुईं। डेल्टा नाव से जीता है। नाव गई, तो नदी का व्यापार गिर पड़ा। एक थाने का अनाज दूसरे थाने तक नहीं चला, सिवाय उसके जो लॉरी का भाड़ा दे सके। युद्ध की महँगाई ने चावल को गरीब की पहुँच से बाहर कर दिया। 1941 की मज़दूरी 1943 का भोजन नहीं खरीदती थी। युद्ध मंत्रिमंडल ने महीनों जहाज़ मोड़ने से इनकार किया। फ़ौजी आपूर्ति पहले रही। बंगाल की भूख रुक सकती थी, यह चुनाव था।

चर्चिल के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने भारतीयों को घृणित लोग कहा, घृणित धर्म वाला, जो खरगोशों की तरह बच्चे जन रहे थे, और अकाल को उनकी अपनी गलती माना। बचाव में दलील है कि वे अकेले कारण नहीं थे, और अनाज अंत से आया। दोनों मान लीजिए। उचित दावा संकरा रहता है। युद्धरत साम्राज्य ने बंगाल के गरीबों पर फ़ौजी आपूर्ति चुनी। कलकत्ता रुका नहीं था। युद्ध कार्यालय थे। सिनेमाघर थे। पेट भरा आधिकारिक जीवन था। फुटपाथ पर लाशें थीं। एक ही शहर, एक ही शाम।

नीति का मतलब एक आदमी का हुक्म नहीं है। नीति का मतलब वह क्रम है जिसमें चीज़ें प्राथमिकता पाती हैं। मद्रास में प्राथमिकता माल और किफ़ायत की रही। बंगाल में प्राथमिकता जहाज़ और युद्ध की रही। दोनों जगह बारिश या युद्ध ने संकट खोला। दोनों जगह दफ़्तर ने तय किया कि किसकी भूख पहले पूरी होगी, और किसकी भूख रुक सकती है।

इस वाक्य को घर ले जाइए और दो टुकड़ों में बाँटिए। पहले टुकड़े पर झगड़ा मत कीजिए। सूखा था। चक्रवात था। बर्मा गिर चुका था। दूसरे टुकड़े पर नाम माँगिए। श्रम-परीक्षा किसने बाँधी। नाव किस हुक्म से नष्ट हुई। जहाज़ किस मंत्रिमंडल ने नहीं मोड़े। अक्टूबर 1943 के पहले कौन वायसराय था। डिगबी ने क्या देखा। यह नामकरण नीति को मौसम से अलग करता है।

अलग होने के बाद ही आँकड़ा अपना वजन पाता है। 56 लाख भी मौसम की दुर्घटना नहीं रह जाते। 20 लाख भी युद्ध का दुष्प्रभाव मात्र नहीं रह जाते। वे उन लोगों की गिनती बन जाते हैं जिन्हें एक क्रम में नीचे रखा गया। क्रम बदला जा सकता था। बदला नहीं गया, या बहुत देर से बदला गया। वेवेल के महीने ने यह साबित किया कि राहत संभव थी। उसने यह भी साबित किया कि संभव चीज़ समय पर नहीं आई।

दूसरा वाक्य पहले को काटता नहीं। उसे पूरा करता है। जो केवल पहला वाक्य बोलते हैं, वे फ़ाइल बंद कर देते हैं। जो दोनों बोलते हैं, वे फ़ाइल खोलते हैं। खोलने के बाद सवाल छोटा है। प्राथमिकता किसने लिखी, और मृत को उस प्राथमिकता की याद राष्ट्रीय दीवार पर क्यों नहीं मिली।

वह साल जब दक्षिण चुप हो गया, 1876 से शुरू होता है और 1878 तक चलता है। चुप होने का मतलब यह नहीं कि आवाज़ नहीं थी। मतलब यह है कि आवाज़ राजधानी तक उस रूप में नहीं पहुँची जिसे नीति बदलनी पड़े। मद्रास प्रेसीडेंसी, मैसूर, हैदराबाद और बॉम्बे दक्कन एक साथ संकट में थे। फिर संकट उत्तर की ओर बढ़ा, मध्य प्रांत और उत्तर-पश्चिमी प्रांत के कुछ हिस्सों में। लगभग 6,70,000 वर्ग किलोमीटर। संकटग्रस्त आबादी लगभग 5.85 करोड़। इस नक्शे को एक बार आँख के सामने रखिए। यह एक ज़िले की त्रासदी नहीं है। यह उपमहाद्वीप का एक बड़ा टुकड़ा है, एक साथ भूख के नीचे।

उसे महान अकाल भी कहते हैं। दक्षिण भारत का अकाल भी। तीन नाम, एक घटना। स्कूल में अक्सर एक भी नहीं ठहरता। ठहरता है विद्रोह। ठहरती है आज़ादी। बीच का साल भूख का साल है, और भूख का साल भाषण में कम काम आता है।

पहला मौसम अभी भी एक कठिन साल हो सकता था। वह सामूहिक मौत इसलिए बना क्योंकि अनाज उन लोगों के पास नहीं रुका जिन्होंने उसे उगाया था, और क्योंकि मज़दूरी गिर गई जब दाम नहीं गिरे। बीमारी के आँकड़े और भुखमरी के आँकड़े साफ़-साफ़ अलग नहीं होते। वे एक ही घटना हैं।

इतिहासकार एक टोल पर सहमत नहीं। देश आखिरी दस लाख पर झगड़ सकता है। बीच के लाखों पर नहीं। यह सीमा ज़ोर से पढ़िए। एक संख्या चुनकर कहानी न बनाइए। सीमा के बाहर इस घटना को कोई गंभीर गिनती नहीं ले जाती।

डिगबी नाम वाला गवाह हैं। उन्होंने प्रेसीडेंसी उन सालों में देखी जब सड़कें भर गईं। लोग राहत कैंपों की तरफ चले, क्योंकि गाँव में बेचने को कुछ नहीं बचा था और खाने को कुछ नहीं। बच्चे साथ थे जो अब चल नहीं पाते थे। वे ऐसे खेतों के पास से गुज़रे जो बराबर नहीं फले थे, ऐसे भंडारों के पास से जो बराबर नहीं खुले थे, ऐसी सरकार के पास से जो अभी भी परीक्षा और किफ़ायत की भाषा बोल रही थी। इस तस्वीर के लिए गढ़ा हुआ नाम ज़रूरी नहीं। सड़क ही रिकॉर्ड है। लंबी चाल के अंत वाला कैंप दया नहीं, अगर चाल पहले ही सबसे कमज़ोर को ले चुकी हो।

बेल्लारी उसी दक्षिण के अंदर था। आज भी वहाँ खेती होती है। राष्ट्रीय कहानी में नाम धुँधला है। धुँधला इसलिए कि ज़िला नक्शा दीवार पर नहीं टँगा। 6,70,000 वर्ग किलोमीटर एक वाक्य बनकर रह गया, तस्वीर नहीं बना।

कमज़ोर आधिकारिक जवाब राजस्व की फ़ाइल में नहीं रुका। उसने एलन ऑक्टेवियन ह्यूम और विलियम वेडरबर्न को 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की ओर धकेला। जो राजनीतिक वर्ग बाद में राष्ट्र का दावा करेगा, वह कुछ हद तक एक ऐसे अकाल से हिला था जिसे साम्राज्य ने बुरी तरह सँभाला था। यह नारा नहीं है। यह तारीख है। कांग्रेस याद है। वे मृत याद नहीं, जिनकी मौत ने उसके जन्म को मजबूर किया।

यहाँ एक सवाल छोड़िए। कांग्रेस का साल आपको याद है। दक्षिण के चुप होने का साल क्यों नहीं।

चुप होने का एक और अर्थ है। गाँव खाली हुए, तो रोज़ की आवाज़ें भी खाली हुईं। हाट की आवाज़। कुएँ पर की आवाज़। उस घर की आवाज़ जहाँ से चलने वाले लौटकर नहीं आए। यह चुप्पी मौसम की नहीं थी। यह उस क्रम की थी जिसमें माल पहले रहा, मज़दूरी पीछे, और राहत सबसे पीछे, वह भी काम की शर्त पर। क्रम बदला जा सकता था। भंडार खुल सकते थे। निर्यात रुक सकता था। परीक्षा के बिना भोजन मिल सकता था। इनमें से जो नहीं हुआ, वह नीति है। नीति के लेखक दफ़्तर में थे। दफ़्तर ने फ़ाइल रखी। आज़ाद भारत को फ़ाइल मिली। अधिकतर बंद रही।

उस साल को याद करने का तरीका भाषण नहीं है। नक्शा है। सीमा है। एक गवाह है। डिगबी। एक तारीख है, 1885, ताकि लोग देखें कि संस्था तो उठी, सड़क नहीं उठी। कक्षा 9 या 10 में यही अध्याय बन सकता है। दीर्घा में यही ज़िले टँग सकते हैं। तमिल या तेलुगु की श्रृंखला वही चाल दिखा सकती है, बिना गढ़े हुए नाम के। जब तक यह नहीं होता, दक्षिण चुप रहता है। चुप बारिश की वजह से नहीं। चुप इसलिए कि देश ने उस साल को ज़ोर से बोलना ज़रूरी नहीं माना।

कलकत्ता, 1943: जीवित स्मृति के अंदर एक भूल

बंगाल का अकाल जीवित स्मृति के अंदर है, या उसके किनारे पर। कोलकाता और ढाका में दादा-दादी अभी भी एक पड़ोसी, एक गली, एक घाट की कहानी उठाए हैं। सार्वजनिक रिकॉर्ड निजी रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता। लगभग 20 लाख से 30 लाख लोग मरे, कुछ अनुमान 38 लाख तक, बंगाल में, आज का पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश। भुखमरी से मरे, और मलेरिया तथा दूसरी बीमारियों से जो भूख ने और भारी कर दीं।

कारण अलग रखने होंगे। वरना वे एक आरोप में घुल जाते हैं, या एक बहाने में। ये झटके थे। पूरी नीति नहीं।

वह खाता जिसे कोई ज़ोर से नहीं पढ़ता

मद्रास और बंगाल वे अकाल हैं जिन्हें पढ़ा-लिखा पाठक मेहनत से आधा याद कर सकता है। पूरा खाता नहीं। 1770 का बंगाल 10 लाख से एक करोड़ के बीच आँका जाता है। 1783-84 का चालीसा अकाल और 1791-92 का दोजी बारा अकाल कभी-कभी लगभग एक-एक करोड़ के पास रखे जाते हैं। 1896-97 और 1899-1900 के अकालों ने उत्तर राज के नीचे और कई लाख मारे। ये सीमाएँ हैं, तर्क हैं, एक पट्टिका पर सिर गिनती नहीं। फिर भी बुलावा है। ज़ोर से पढ़ें तो एक मिनट लगता है। ज़ोर से लगभग कभी नहीं पढ़े जाते।

सदियों के आक्रमण, मंदिर-ध्वंस और सामूहिक हिंसा की भी भारत में सार्वजनिक स्मृति-संस्कृति नहीं है। वह बड़ा सन्नाटा अपना विषय है। यहाँ उसे साबित नहीं करना। केवल नाम लेना है, क्योंकि अकाल का सन्नाटा अकेला अपवाद नहीं है। वह एक आदत के अंदर बैठा है। बड़ी मौत पाठ्यपुस्तक में किसी और चीज़ का कारण बनकर आती है। विद्रोह का, सुधार का, सत्ता-हस्तांतरण का। फिर चली जाती है। मृत को कमरा नहीं मिलता।

साठ लाख को भुलाया नहीं जा सका, यह कैसे हुआ

लगभग 60 लाख यहूदी मारे गए। संख्या जल्दी सिखाई जाती है, अक्सर दोहराई जाती है, और चेहरों से बाँधी जाती है। इसे अविस्मरणीय एक हुक्म ने नहीं बनाया। उन संस्थाओं ने बनाया जिन्होंने अपराध को एक अनुच्छेद बनने नहीं दिया।

बचे लोगों की गवाही कर्तव्य मानी गई, सजावट नहीं। नूर्नबर्ग ने अपराधियों को कटघरे में रखा और रिकॉर्ड में। सालों बाद आइख़मान मुकदमे ने हत्या के दफ़्तर को उस जनता के सामने रखा जो मुँह फेरने लगी थी। इज़राइल ने याद वाशेम बनाया और राष्ट्रीय स्मरण दिवस। यूरोप और उत्तरी अमेरिका ने इतिहास को स्कूली पाठ्यक्रम में डाला। फ़िल्म और किताब की संस्कृति रुकी नहीं। नाईट, शोआ, शिंडलर्स लिस्ट, द पियानिस्ट, और ऐन फ्रैंक अभी भी पाठ्यक्रम में हैं, अभी भी पर्दे पर हैं, अभी भी उन पर बहस है। ओहायो या तेल अवीव का बच्चा इस इतिहास से बिना खोजे मिल सकता है। खोज संग्रहालय, पाठ्यक्रम और स्टूडियो पहले ही कर चुके हैं।

चेन्नई या कोलकाता का बच्चा स्कूल खत्म कर सकता है, बिना 1877 के मद्रास या 1943 के बंगाल को नैतिक इतिहास की तरह मिले। बच्चे को औपनिवेशिक शोषण की एक पंक्ति मिल सकती है। डिगबी नहीं मिलेंगे। श्रम-परीक्षा नहीं। ज़ब्त नाव नहीं। ज़िला नक्शा नहीं, जिसके नीचे टोल की सीमा छपी हो।

अंतर मायने रखता है। नाज़ियों ने अपराध छिपाने की कोशिश की। उन्होंने उसे स्मारक नहीं बनाया। यहूदी समुदायों, इज़राइल, बचे लोगों, और पश्चिम के स्कूलों, संग्रहालयों और फ़िल्मों ने स्मृति बनाई। हत्या करने वालों ने संग्रहालय नहीं चलाया। जिन्हें मिटाया जाना था, और वे समाज जिन्होंने बाद में शर्म का हिस्सा स्वीकार किया, उन्होंने चलाया। यहाँ स्मृति बनी हुई चीज़ है। केवल इसलिए नहीं हुई कि मृत बहुत थे।

भारत ने शोर क्यों नहीं मचाया

चार कारण सन्नाटा समझाते हैं। राष्ट्रीय चरित्र का सिद्धांत नहीं चाहिए। हर एक चुनाव है, या चुनाव न करने की चूक, तारीख के साथ:

  • पहला कारण: औपनिवेशिक फ़ाइल बंद हुई। आज़ाद भारत ने सार्वजनिक प्रति-अभिलेखागार नहीं बनाया। आयोग थे। डिगबी छपे। ज़िला अधिकारी लिख गए। 1947 के बाद वे कागज़ पुस्तकालय और विशेषज्ञ की अलमारी में रहे। प्रति-अभिलेखागार का मतलब होता स्कूलों के लिए संपादित खंड, अकाल रिकॉर्ड का स्थायी दफ़्तर, और ऐसी सार्वजनिक सूची जिसे पत्रकार विश्वविद्यालय के पत्र के बिना खोल सके। वह दफ़्तर नहीं बना। फ़ाइल जली नहीं। उसे वह धूल जमने दी गई जो रिकॉर्ड को अफ़वाह बना देती है।
  • दूसरा कारण: मौसम का बहाना सबको बचाता है। सूखा सच है। 1870 के दशक का एल नीनो सच है। 1942 का चक्रवात सच है। फेल मानसून वह तथ्य है जिस पर सरकार ऊँगली रख सकती है, और अगली सरकार वही ऊँगली वारिस में ले सकती है। अगर बारिश पूरी कहानी है, तो निर्यात की नीति, मज़दूरी का गिरना, श्रम-परीक्षा, डिनायल की नावें और ठुकराए जहाज़ विवरण बन जाते हैं। विवरण को संग्रहालय नहीं मिलता। बहाना राज के लिए सुविधाजनक था, जो लापरवाही पर प्रकृति को तरजीह देता था। राज के बाद भी सुविधाजनक है, क्योंकि मौसम की कहानी ऐसे खलनायक की माँग नहीं करती जिसके वारिस अभी भी राजनीतिक वर्ग में हों।
  • तीसरा कारण: 1947 के बाद राज करने वाली कहानी उपनिवेश-विरोधी गर्व चाहती थी, बिना ऐसे घाव के जिसे सांप्रदायिक कहा जा सके। अकाल बीच की दरार में गिरे। साफ़ आज़ादी के आख्यान को साफ़ विरोधी चाहिए और साफ़ जनता। भूख से सामूहिक मौत इससे गड़बड़ है। वह राजस्व व्यवस्था को घसीटती है, व्यापारी को, प्रांतीय मंत्रालय को, युद्धकालीन मंत्रिमंडल को। वह स्मृति के उन बँटवारों के पास भी बैठती है जिन्हें नेता खोलना नहीं चाहते। इसलिए अकाल पृष्ठभूमि बना। गर्व अग्रभूमि। जो घाव भाषण में काम न आए, वह पाठ्यक्रम से खिसक जाता है।
  • चौथा कारण: संस्कृति उद्योग नहीं था। चेहरों वाला अनिवार्य अध्याय नहीं। राष्ट्रीय संग्रहालय नहीं। हिन्दी, तमिल, तेलुगु या बांग्ला में लगभग कोई लोकप्रिय फ़िल्म नहीं जो 1877 या 1943 को वैसे ले जैसे विश्व सिनेमा यूरोप के 1942 को लेता है। साल में सैकड़ों फ़िल्में बनाने वाले देश ने दूसरे विषय चुन लिए। पारिवारिक नाटक, दूसरे रजिस्टर में विभाजन, परेड की तरह स्वतंत्रता संग्राम। कैंप और फुटपाथ सिनेमा नहीं बने। सिनेमा के बिना, अनिवार्य अध्याय के बिना, ऐसी इमारत के बिना जहाँ परिवार रविवार को जा सके, मौत का आँकड़ा उस किताब की संख्या रहता है जिसे विद्यार्थी खोलते नहीं।

कठिन तुलना यहीं है। यहूदी छोटी जाति थे, प्रवासी बिरादरी के साथ, एक राज्य के साथ, और ऐसी पश्चिमी जनता के साथ जो पहले ही शर्मिंदा थी। भारतीय विशाल जाति थे, जिन्होंने आज़ादी के बाद शोक पर विकास की बात चुनी। दोनों सच हो सकते हैं। केवल एक बहाना है। बड़ा आकार स्मृति को रोकता नहीं। बड़े देश दीर्घा बना सकते हैं। भारत ने आधिकारिक कहानी में योजना, बाँध और इस्पात चुने, और भूख के साल विद्वानों को छोड़ दिए। विकास स्मृति का विलोम नहीं है। उसे विकल्प की तरह इस्तेमाल किया गया।

अपने घर की अलमारी खोलिए। वहाँ स्वतंत्रता की किताब मिलेगी। अकाल की किताब खोजिए। कौन-सी पहले हाथ लगती है?

याद करना असल में कैसा दिखेगा

बात मद्रास अकाल, 1876-78, की है, तो पूरे भारत की आबादी लगभग 25.5 करोड़ थी। यह 1871 की जनगणना के आसपास का आँकड़ा है। 1881 की जनगणना में ब्रिटिश भारत, बर्मा समेत, लगभग 25.4 करोड़ बैठा। बीच के सालों में अकाल और महामारी ने बढ़त रोक दी थी। पूरा देश संकट में नहीं था। इलाका मद्रास प्रेसीडेंसी, मैसूर, हैदराबाद और बॉम्बे दक्कन था, फिर मध्य प्रांत और उत्तर-पश्चिमी प्रांत के कुछ हिस्से। लगभग 6,70,000 वर्ग किलोमीटर।

बाद के बंगाल अकाल, 1943, के समय भारत बहुत बड़ा हो चुका था। 1941 की जनगणना में अविभाजित भारत की आबादी आमतौर पर लगभग 39 करोड़ के पास रखी जाती है। बंगाल की मौतें उसी बड़े देश के अंदर 20 लाख से 30 लाख रहीं, कुछ अनुमान 38 लाख तक।

शुरुआत एक कारण से नहीं हुई। कारण अलग रखने पड़ते हैं।

यह अकाल जीवित स्मृति के किनारे पर है। घरों में कहानी बची है। सार्वजनिक दीवार पर नहीं। चेन्नई या कोलकाता का बच्चा स्कूल खत्म कर सकता है, बिना 1943 को नैतिक इतिहास की तरह मिले।

मद्रास अकाल, 1876-78, इसलिए मायने रखता है कि उसका आकार बहुत बड़ा था, सूखे के बाद नीति ने मौत का टोल तय किया, और उसी झटके ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना को धक्का दिया। वह इसलिए भी मायने रखता है कि भारत उसे अब भी याद नहीं करता।

यह सीमा यहूदी नरसंहार के लगभग 60 लाख मृत लोगों के उसी क्रम में बैठती है, और ऊपरी अनुमान उसके ऊपर। तुलना स्मृति की है, मनुष्य की कीमत की रैंकिंग नहीं।

स्थायी अर्थ यही है। इतनी बड़ी सामूहिक मौत, जो राजनीतिक वर्ग को हिलाकर एक संस्था खड़ी कर सके, सार्वजनिक नैतिक इतिहास नहीं बनी। चेन्नई का बच्चा स्कूल खत्म कर सकता है, बिना 1877 को ऐसे अध्याय की तरह मिले जिसमें नक्शा हो, टोल की सीमा हो, और डिगबी का गवाह हो। यह अकाल सबूत है कि सूखे ने संकट खोला, और नीति ने तय किया कि किसे मरने दिया जाए। यह सबूत भी है कि आज़ाद भारत ने औपनिवेशिक फ़ाइल बंद की, और प्रति-अभिलेखागार नहीं बनाया।

याद एक मूड नहीं है। वस्तुओं का सेट है।

कक्षा 9 या कक्षा 10 का अनिवार्य अध्याय टोल की सीमाएँ ले जाएगा, नीतियाँ, और एक-एक गवाह। मद्रास के लिए डिगबी। बंगाल के लिए चर्चिल की कही गई पंक्ति, बचाव की दलील के साथ। अध्याय सूखे और युद्ध को बाद के फ़ैसलों से अलग करेगा। उस पर छपेगा 56 लाख से 96 लाख, महारत्न के 82 लाख, डिगबी के लगभग 94 लाख, और चेतावनी कि एक करोड़ ऊपरी तर्क है, जनगणना नहीं। बंगाल के लिए 20 लाख से 30 लाख छपेगा, और वे अनुमान जो 38 लाख तक जाते हैं। लिखा होगा कि बंगाल की आधी से ज़्यादा मौतें 1944 में हुईं। जो विद्यार्थी ये सीमाएँ सुना सके, वह अधिकांश वयस्कों से आगे है।

स्थायी दीर्घा ज़िला नक्शे टाँगेगी। मद्रास प्रेसीडेंसी, मैसूर, हैदराबाद, बॉम्बे दक्कन, उत्तर की ओर बढ़ाव। बंगाल के तटीय ज़िले, नावों की ज़ब्ती, खोया बर्मा चावल। दर्शक 6,70,000 वर्ग किलोमीटर और 5.85 करोड़ संकटग्रस्त लोगों को देखेगा, वायसराय के चित्र के नीचे कैप्शन की तरह नहीं। दीर्घा को वैभव नहीं चाहिए। दीवार चाहिए, और ऐसा बजट जो दूसरे साल गायब न हो।

स्मरण की तारीख एक वास्तविक चिह्न से बँधेगी। अक्टूबर 1943, जब वेवेल ने खर्चा सँभाला, एक चिह्न है। दक्षिण के अकाल के दूसरे साल का कोई महीना दूसरा। तारीख पवित्र नहीं। दोहराव पवित्र है। जो देश सार्वजनिक रूप से एक मिनट रुकता है, वह मान चुका होता है कि मिनट बकाया है।

भारतीय भाषाओं की फ़िल्में और लंबी श्रृंखलाएँ, परिवारों के लिए बनी हुई, वह करेंगी जो पाठ्यपुस्तक नहीं कर सकती। कैंपों की सड़कों पर एक तमिल श्रृंखला। उन नावों पर एक बांग्ला श्रृंखला जो वहाँ नहीं थीं। वेशभूषा में व्याख्यान नहीं। ऐसी कहानी जिसमें मज़दूरी फेल हो, दाम टिके रहें, और बच्चा अगले कस्बे तक न पहुँचे। विश्व सिनेमा ने यूरोप के 1942 के लिए यह किया, बिना यह नाटक किए कि काम पूरा हो गया। भारतीय भाषाएँ 1877 और 1943 के लिए कर सकती हैं। अब तक की अनुपस्थिति प्रतिभा की कमी नहीं है। कमीशन की कमी है।

चर्चिल के दोष के ठीक हिस्से पर बहस की इजाज़त इसी काम का हिस्सा है। बहस तेज़ हो सकती है। वह इस नाटक पर खत्म नहीं हो सकती कि मृत फुटनोट हैं। बचाव कह सकता है कि वे अकेले कारण नहीं थे, और अनाज 1943 के अंत से आया। रिकॉर्ड जहाज़ों के इनकार से जवाब दे सकता है, डिनायल नीति से, नष्ट नावों से, और लिनलिथगो के महीनों से। जो जनता दोनों वाक्य सँभाल सके, वह बड़ी हो चुकी जनता है। जो एक भी न सँभाले, उसने तय कर लिया है कि कलकत्ता का फुटपाथ वैकल्पिक है।

अब अपना हिस्सा। इस अध्याय को आप किस कक्षा में रखना चाहेंगे, और किसे गवाह बनाना चाहेंगे। डिगबी को, या उस सड़क को जिस पर नाम नहीं थे?

जो बच्चा ऐन फ्रैंक को जानता है और बेल्लारी या मिदनापुर को नहीं जानता, वह सहानुभूति की परीक्षा में फेल नहीं हुआ। उसे एक अभिलेखागार दिया गया, दूसरा नहीं। बेल्लारी दक्षिण के अकाल के अंदर था। मिदनापुर बंगाल के अंदर। ये नाम उन लोगों के लिए अस्पष्ट नहीं हैं जो आज भी उन ज़िलों में खेती करते हैं। राष्ट्रीय कहानी के लिए अस्पष्ट हैं।

जो जाति अपने अकाल याद नहीं करेगी, वह अपनी नैतिक इतिहास की शिक्षा दूसरी जातियों की फ़िल्मों से लेती रहेगी। ऐसा पहले ही हो रहा है। पर्दे भरे हैं। दीर्घाएँ और जगह हैं। माँग सीधी है। अध्याय बनाइए, दीर्घा बनाइए, तारीख बनाइए, और फ़िल्म। सीमाएँ दीवार पर लिखिए। दोष की बहस को सार्वजनिक होने दीजिए। दक्षिण के लगभग 80 लाख मृत, और बंगाल के 30 लाख मृत, को ऐसा मौसम मानना बंद कीजिए जो किसी और के साथ हुआ। वे किसी और नहीं थे। वे देश थे, उन सालों में जिन्हें देश अभी भी ज़ोर से बोलना नहीं चाहता।

इस अकाल का अर्थ दया का अनुच्छेद नहीं है। अर्थ एक क्रम है। सदी का सबसे तेज़ एल नीनो खेत फेल कर गया। अनाज माल बना रहा। निर्यात नहीं रुका। मज़दूरी गिरी, दाम नहीं गिरे। राहत देर से आई, सख्त आई, श्रम-परीक्षा से बँधी। हैजा, मलेरिया और पेचिश भूख पर सवार हुए। जो केवल बारिश बोलते हैं, वे फ़ाइल बंद कर देते हैं। जो डिगबी, परीक्षा और 1885 को एक साथ रखते हैं, वे फ़ाइल खोलते हैं।

कांग्रेस उस फ़ाइल से निकली। मृत उस फ़ाइल में रह गए। जब तक कक्षा 9 या 10 में नक्शा, सीमा और एक गवाह नहीं होंगे, दक्षिण का वह साल चुप रहेगा। चुप मौसम की वजह से नहीं। चुप इसलिए कि देश ने उसे ज़ोर से बोलना ज़रूरी नहीं माना।

Scroll to Top