नशामुक्त पंजाब का वादा करने वाली AAP सरकार के खिलाफ उतरा किसानों और युवाओं का महा-आंदोलन, अमृतसर से मानसा तक फूंका मुख्यमंत्री भगवंत मान का पुतला

याद है ना आपको वो चुनाव वाले दिन? जब पंजाब की हवाओं में अरविंद केजरीवाल का एक ही नारा गूंज रहा था- ‘इंकलाब’ और ‘बदलाव’। बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं, मंच से बड़े-बड़े दावे किए गए थे।

कहा गया था की बस एक बार हमारे हाथ में झाड़ू थमा दो, तीन महीने के अंदर पंजाब से नशे का ऐसा सफाया करेंगे की लोग भूल जाएंगे चिट्टा क्या होता है।

जनता ने भी सोचा की चलो यार, इतने साल दूसरों को आज़मा लिया, अब AAP को भी मौका देकर देख लेते हैं।

लेकिन भाई, आज हालात इतने बदतर हैं की सूबे में सुबह का ताज़ा दूध मिलना शायद एक पल को मुश्किल हो जाए, लेकिन ‘चिट्टा’ (सिंथेटिक ड्रग्स) आपको किसी भी नुक्कड़ की दुकान के पीछे या गलियों में बड़ी आसानी से मिल जाएगा।

ये जो आज 15 अक्टूबर को पूरे पंजाब की सड़कों पर बवंडर उठा हुआ है, ये कोई रातों-रात भड़की आग नहीं है। ये राजनीति नहीं है।

ये असल में उन हज़ारों लोगों में सुलगता वो दर्द है, जिन्होंने अपने घर के इकलौते और जवान चिरागों को नशे से अपने ही सामने तड़प-तड़प कर मरते देखा है।

आज पूरा “पंजाब बंद” है। बाज़ार बंद हैं, स्कूल ठप्प पड़े हैं, प्राइवेट दफ्तरों पर ताले लटके हैं और नेशनल हाइवे के टोल प्लाज़ा एकदम सूने पड़े हैं।

कौन थे परविंदर सिंह झोटा जिनकी शहादत ने पूरे पंजाब की रगों में उबाल ला दिया है

अब सवाल उठता है की ये आग अचानक इतनी बेकाबू कैसे हो गई? इस पूरे जन-आंदोलन और गुस्से के केंद्र में एक नाम है- परविंदर सिंह झोटा।

मानसा (Mansa) का रहने वाला ये नौजवान कोई बहुत बड़ा राजनेता नहीं था। ना ही इसके पास कोई लाल बत्ती वाली गाड़ी थी और ना ही कोई भारी-भरकम सिक्योरिटी।

ये बस एक आम सा पंजाबी मुंडा था, जिसका खून अपने भाइयों को नशे के दलदल में बर्बाद होते देख खौल उठता था।

परविंदर ने वो काम शुरू किया जो असल में वर्दी वालों का, यानी पुलिस का था। वो अपनी जान हथेली पर रखकर गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले जाता था।

ड्रग पैडलर्स (नशा तस्करों) को रंगे हाथों पकड़ता था, उनकी वीडियो बनाता था और उन्हें घसीट कर पुलिस के हवाले कर देता था। वो पंजाब के युवाओं के लिए एक उम्मीद बन गया था।

लेकिन हमारे सिस्टम का मज़ाक तो देखिए! जो चिट्टे के सौदागर खुलेआम पंजाब की रगों में ज़हर घोल रहे थे, वो तो आराम से सीना तानकर घूमते रहे।

पुलिस की गाड़ियां उनके सामने से गुज़र जाती थीं और किसी की हिम्मत नहीं होती थी उन पर हाथ डालने की। लेकिन जो बंदा उन नशा तस्करों के खिलाफ आवाज़ उठा रहा था, जो सिस्टम को आईना दिखा रहा था, उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई!

परविंदर को एक ड्रग बेचने वाली मेडिकल दुकान की वीडियो बनाने के दौरान गोली मार दी गयी।

इस हत्या ने साबित कर दिया की नीचे से लेकर ऊपर तक ड्रग माफिया और लोकल प्रशासन का नेक्सस (गठजोड़) कितना गहरा है।

सिस्टम की आँखें कितनी ‘तेज़’ हैं ना! ज़हर बेचने वाले इन्हें नज़र नहीं आते, लेकिन ज़हर का पर्दाफाश करने वाला रातों-रात इनकी आँखों में ऐसा खटकने लगता है की उसे ही रास्ते से हटा दिया जाता है।

परविंदर की मौत पंजाब के भविष्य की हत्या है।

अमृतसर के गोल्डन गेट से लेकर लुधियाना तक धू-धू कर जल रहे मुख्यमंत्री भगवंत मान के पुतले

परविंदर सिंह झोटा की शहादत के बाद पंजाब का जो सबर था, वो पूरी तरह से टूट गया। आज ग्राउंड रिपोर्ट की हकीकत ये है की सरकार और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं।

जो किसान कल तक अपने खेतों में धान की कटाई की तैयारी कर रहे थे, आज उन्होंने अपनी दरातियां और ट्रैक्टर वहीं छोड़ दिए हैं और सीधे भगवंत मान सरकार के खिलाफ सड़कों पर मोर्चा खोल दिया है।

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और किसान मज़दूर संघर्ष कमेटी जैसे पंजाब के सबसे बड़े और ताक़तवर किसान संगठन अब आमने-सामने की लड़ाई में उतर चुके हैं।

आज अमृतसर के ऐतिहासिक ‘गोल्डन गेट’ का नज़ारा देखने लायक था। वहां सरवन सिंह पंधेर जैसे दिग्गज किसान नेताओं की अगुवाई में हज़ारों की भीड़ ने मुख्यमंत्री भगवंत मान का बहुत विशाल पुतला फूंका है।

वो पुतला सिर्फ घास-फूस का नहीं था, वो असल में उन वादों की राख थी जो चुनाव के वक्त पंजाब की भोली-भाली जनता को परोसे गए थे।

किसानों की मांग एकदम सीधी, कड़क और साफ है- हमें कोई जांच कमेटी-वमेटी नहीं चाहिए, हमें कोई मुआवज़े का झुनझुना नहीं चाहिए। सीधा मुख्यमंत्री भगवंत मान और पंजाब पुलिस के डीजीपी (DGP) गौरव यादव तुरंत अपना इस्तीफा दें।

सड़कों पर बैठे किसानों का कहना बड़ा ही वाजिब है। वो कह रहे हैं की भाई, जो सरकार और जो पुलिस हमारे बच्चों की जान एक गली छाप ड्रग पैडलर से नहीं बचा सकती, उस सरकार को एक दिन भी कुर्सी पर बैठने का क्या हक है?

बुज़ुर्ग किसान नेताओं को पुलिस का डंडा और एक नौजवान की चिता, क्या ऐसे मिलेगा पंजाब को नशे से छुटकारा

जब कोई सरकार अपने वादों में फेल हो जाती है और जनता सड़कों पर उतर आती है, तो वो अपनी नाकामी छिपाने के लिए सबसे पहले पुलिस के डंडे का ही सहारा लेती है।

पंजाब में भी बिल्कुल यही हो रहा है। इस महा-आंदोलन के दौरान लुधियाना में एक 22 साल के नौजवान जसदीप सिंह की जान चली गई है। बताया जा रहा है की विरोध प्रदर्शन के दौरान करंट लगने से यह हादसा हुआ।

एक तरफ नशा तस्कर नौजवानों को मार रहे हैं, और दूसरी तरफ सिस्टम की लापरवाही प्रदर्शन कर रहे युवाओं की जान ले रही है।

और इस पूरे बवाल में पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली तो सच में ‘काबिल-ए-तारीफ’ है! जब किसी गांव में नशे के सौदागरों को पकड़ने की बात आती है, तो अचानक आपकी गाड़ियों में डीज़ल खत्म हो जाता है।

जब कोई नशा तस्कर खुलेआम चिट्टा बेचता है, तो आपकी आँखों पर ऐसा गांधारी वाला पट्टी बंध जाता है की आपको कुछ नज़र ही नहीं आता।

लेकिन जैसे ही वही आम जनता, वही किसान और युवा अपने हक के लिए, अपने बच्चों की ज़िंदगी की भीख मांगने सड़कों पर उतरते हैं, तो आपकी लाठियों में अचानक से बड़ी फुर्ती आ जाती है।

मोहाली से लेकर अमृतसर तक पुलिस ने जगह-जगह जिस तरह से बैरिकेडिंग की है और प्रदर्शनकारियों के साथ मार-पीट की है, वो साफ बताता है की सरकार डरी हुई है।

जगजीत सिंह डल्लेवाल और सरवन सिंह पंधेर जैसे बड़े और बुज़ुर्ग किसान नेताओं को पुलिस ने मोहाली और अन्य जगहों पर हिरासत में ले लिया है।

अब सरकार को लगता है की वो दो-चार नेताओं को थाने में बिठाकर इस जन-आंदोलन की आवाज़ को दबा देगी। अरे भाई, ये कोई राजनीतिक रैली थोड़ी है जो नेता के ना होने से भीड़ घर लौट जाएगी! ये तो उन लोगों का हुजूम है जिनके घरों में मातम पसरा है।

आप किसान नेताओं को गिरफ़्तार करके इस आग को बुझा नहीं रहे हैं, बल्कि इसमें पेट्रोल डाल रहे हैं।

जब सत्ता के वादे खोखले निकले तो खेतों के बेटों ने खुद उठा लिया है चिट्टे के खिलाफ मोर्चा

इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी बात सरकार के लिए ये है की अब यह सिर्फ किसानों का आंदोलन नहीं रह गया है। यह पंजाब के हर उस आम आदमी की लड़ाई बन चुका है जो इस सिस्टम से तंग आ चुका है।

आप आज सड़कों का नज़ारा देखिए। बाज़ार के दुकानदार अपनी दुकानें बंद करके इनके साथ धरने पर बैठे हैं। कॉलेजों के छात्र, नौजवान और ‘वारिस पंजाब दे’ जैसे संगठन भी पूरे दमखम के साथ इस चिट्टे के खिलाफ जंग में कूद पड़े हैं।

पूरा पंजाब आज एक हो गया है। और हो भी क्यों ना? आप एक किसान का दर्द समझिए यार। वो इंसान जो सुबह 4 बजे उठकर खेतों में पसीना बहाता है, जो पूरे देश का पेट भरता है, वो आज सड़कों पर धक्के क्यों खा रहा है?

क्योंकि उसने जो सपने अपने बेटे के लिए देखे थे, वो सब टूट रहे हैं। किसान ने सोचा था की उसका लड़का बड़ा होकर खेत में ट्रैक्टर चलाएगा या फौज में भर्ती होकर देश की सरहद पर बंदूक उठाएगा।

लेकिन आज उसी किसान को अपने बेटे के हाथ में ट्रैक्टर के स्टीयरिंग की जगह नशे की सिरिंज (इंजेक्शन) दिखाई दे रही है।

ये दर्द किसी भी बाप को पागल कर देने के लिए काफी है। जब बाप को ये दिख जाए की जिस सरकार को हमने चुनकर चंडीगढ़ भेजा था, वो हमारे बच्चों की ज़िंदगी की सुरक्षा करने में पूरी तरह नकारा साबित हो चुकी है, तो फिर उसे खुद ही अपने हाथों में डंडा उठाना पड़ता है।

आज पंजाब का हर एक गांव अपनी चौकसी खुद करने को मजबूर हो गया है। गांव वालों ने अपनी कमेटियां बना ली हैं क्योंकि उन्हें पुलिस और प्रशासन पर अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रहा।

AAP सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान को ये बात बहुत अच्छी तरह से अपने दिमाग में बैठा लेनी चाहिए की वो किस मिट्टी के लोगों से पंगा ले रहे हैं।

ये वही पंजाब के किसान हैं, जिन्होंने दिल्ली के बॉर्डरों पर साल भर बैठकर कड़ाके की ठंड और तपती गर्मी झेली थी।

अगर पंजाब का किसान अपने हकों के लिए दिल्ली को झुका सकता है, तो.. अपने बच्चों की ज़िंदगी और पंजाब की जवानी को बचाने के लिए वो चंडीगढ़ की ईंट से ईंट भी बजा सकता है।

कैमरे के सामने खड़े होकर मीठी-मीठी बातें करने, प्रेस कॉन्फ्रेंस में शेरो-शायरी सुनाने और हवाबाजी वाले विज्ञापनों से अब काम नहीं चलने वाला। वादों की चाशनी बहुत चटा दी आपने, अब पंजाब की जनता को ज़मीन पर एक्शन चाहिए।

परविंदर सिंह झोटा की शहादत उस ज्वालामुखी के फटने की शुरुआत है जिसे अगर समय रहते नहीं रोका गया, तो यह न जाने कितने सियासी महलों को जलाकर राख कर देगा।

पंजाब अपनी जवानी को ऐसे ही सड़कों पर तड़प-तड़प कर मरने नहीं देगा। अब आर-पार की लड़ाई शुरू हो चुकी है, और सच कहूं तो… आम आदमी पार्टी के पास अब छिपने के लिए कोई जगह नहीं बची है!

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