दंतेवाड़ा के 76 शहीदों की मौत पर जश्न और आतंकियों के लिए इंसाफ की मांग, वामपंथी एजेंडे से देश को बांटने वाली ‘नेहा बोरा’ बन गई राहुल गांधी के मंच की VIP मेहमान

कहते हैं की जब राजनीति में संकट के दिन लंबे खिंच जाएं, तो इंसान हाथ-पैर मारने के चक्कर में अक्सर वो कदम उठा लेता है जो उसकी पूरी जमा-पूंजी पर पानी फेर दे।

140 साल पुरानी उस कांग्रेस पार्टी का हाल भी आजकल कुछ ऐसा ही नजर आ रहा है, जिसने दशकों तक देश की सत्ता के मजे लूटे हैं।

कभी पूरे देश के कोने-कोने में अपने झंडे फहराने वाली पार्टी की हालत आज यह हो गई है की उसे संसद से लेकर सड़क तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए JNU के हॉस्टलों से उधारी का नैरेटिव और किराए के चेहरे लाने पड़ रहे हैं।

ज़रा हालिया के चुनाव आयुक्त के खिलाफ इनके प्रोटेस्ट को देखिये। दिल्ली की सड़कों पर जब विपक्ष का मार्च निकला, तो उस हुजूम में दशकों से सफेद खादी पहनकर राजनीति कर रहे पुराने कांग्रेसी दिग्गज नदारद थे या पीछे धकिया दिए गए थे।

आगे कौन चल रहा था? राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के ठीक बराबर में कदम से कदम मिलाकर चल रही थी 28-29 साल की एक ऐसी वामपंथी छात्र नेता, जिसकी पूरी राजनीति का इकलौता आधार ही देश की व्यवस्था, अदालतों और सुरक्षाबलों को कटघरे में खड़ा करना रहा है।

नाम है- नेहा बोरा।

लेकिन सवाल सिर्फ एक लड़की का नहीं है। सवाल उस गहरी और खतरनाक राजनीतिक मजबूरी का है, जहां चुनाव जीतने के टोटके जब फेल हो जाते हैं, तो पार्टियां ऐसे अराजक तत्वों को अपनी गोद में बिठा लेती हैं जिनका इतिहास ही देश की अस्मिता को तार-तार करने का रहा है।

सरहद पर तिरंगे की रक्षा करने वाले फौजी पिता ने 10 साल पहले ही तोड़ दिया था रिश्ता, कौन है AISA की सरगना ‘नेहा बोरा’

किसी भी इंसान को समझने से पहले उसकी जड़ों को देखना चाहिए। नेहा बोरा का ताल्लुक उत्तराखंड के खटीमा से है।

पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए किया, फिर अंबेडकर यूनिवर्सिटी से एमए की डिग्री ली और उसके बाद सीधे जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) के ‘स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स’ में पीएचडी करने पहुंच गईं।

साथ में थोड़ा-बहुत रंगमंच (थिएटर) का शौक भी पाल रखा था। कागजों पर देखें तो लगेगा की वाह, एक पढ़ा-लिखा युवा चेहरा आंदोलन कर रहा है।

लेकिन इस अकादमिक चोले के पीछे जो असली चेहरा है, वो है कम्युनिस्ट पार्टी की वामपंथी छात्र शाखा AISA (All India Students’ Association) की राष्ट्रीय अध्यक्ष का।

इस कहानी का सबसे आंखें खोलने वाला पहलू तो खुद नेहा बोरा के अपने घर से जुड़ा है। उनके पिता भारतीय सेना (Indian Army) के एक सम्मानित रिटायर्ड जवान हैं।

ज़रा उस बदनसीब फौजी पिता के दिल पर हाथ रखकर सोचिए, जिसने अपनी पूरी जवानी सरहद पर देश के तिरंगे को सलामी देते हुए गुजार दी।

उसी पिता की अपनी औलाद जब दिल्ली आकर उन्हीं जवानों और सुरक्षाबलों के खिलाफ जहर उगलने वाले गिरोह की सरगना बन जाए, तो उस बाप पर क्या बीतती होगी?

ये कोई हवा-हवाई बात नहीं है दोस्त। खुद नेहा बोरा ने एक इंटरव्यू में यह राज खोला था की उनके पिता ने पिछले करीब 10 सालों से उनसे बातचीत तक बंद कर रखी है।

पिता का साफ मानना है की उनकी बेटी की यह तथाकथित वामपंथी राजनीति और कुछ नहीं, बल्कि उस वर्दी और उस देश के साथ खुली गद्दारी है जिसकी उन्होंने जिंदगी भर हिफाजत की।

अब देखिए, जिस फौजी पिता ने देश के स्वाभिमान की खातिर अपनी ही बेटी से मुंह मोड़ लिया, उसी बेटी को 10 जनपथ और राहुल गांधी अपने सिर-माथे पर बिठाकर विपक्ष का ‘पोस्टर चेहरा’ बनाने में लगे हैं।

इसे राजनीति की मजबूरी कहें या वैचारिक दिवालियापन?

बाटला हाउस के आतंकियों के लिए AISA ने निकाला मार्च, और शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की शहादत का उड़ाया मजाक

नेहा बोरा जिस AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर आज लोकतंत्र और संविधान की दुहाई दे रही हैं, उस संगठन का असली चाल, चरित्र और चेहरा क्या है? इसके लिए हमें ज्यादा पीछे जाने की जरूरत भी नहीं है।

ज़रा 19 सितंबर 2025 की तारीख याद कर लीजिए। यह वही दिन था जब 2008 के कुख्यात बाटला हाउस एनकाउंटर को 17 साल पूरे हुए थे।

उस दिन जामिया के बाहर AISA के कार्यकर्ताओं ने बाकायदा एक विरोध मार्च निकाला था। जानते हैं इनके हाथों में तख्तियां किस बात की थीं?

उन तख्तियों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- “We demand justice for Atif and Sajid” (हमें आतिफ और साजिद के लिए इंसाफ चाहिए)।

अब ज़रा नई पीढ़ी को यह याद दिलाना बहुत जरूरी है की ये आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद आखिर थे कौन, जिनके लिए नेहा बोरा का संगठन छाती पीट-पीट कर इंसाफ मांग रहा था।

ये इंडियन मुजाहिद्दीन (IM) के वो खूंखार दरिंदे थे, जिन्होंने देश की राजधानी दिल्ली, जयपुर और वाराणसी की भरी-पूरी भीड़भाड़ वाली मंडियों में सिलसिलेवार बम धमाके करवाए थे।

इन धमाकों में 30 से ज्यादा बेकसूर नागरिकों के चीथड़े उड़ गए थे, सैकड़ों लोग जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए थे।

और जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जामिया नगर के एल-18 मकान में इन आतंकियों को घेरा, तो हमारे देश के एक जांबाज सपूत, जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा ने अपने सीने पर आतंकियों की गोलियां खाकर देश की रक्षा की थी।

उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से नवाजा गया था। लेकिन नेहा बोरा के इस संगठन ने कभी उस शहीद मोहन चंद शर्मा के अनाथ बच्चों के लिए कोई मार्च नहीं निकाला।

इनके आंसू सिर्फ उन आतंकियों के लिए बहे जो खून की होली खेलकर मारे गए थे।

सोचिए, जो संगठन अदालत से साबित हो चुके आतंकवादियों को ‘बेकसूर’ और देश की खातिर जान देने वाले पुलिस अफसरों को ‘कातिल’ साबित करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देता हो, उसकी नेता अगर आज संसद की दहलीज तक पहुंचने वाले विपक्ष के नेताओं के साथ कदमताल कर रही हो, तो क्या यह महज एक इत्तेफाक है?

या फिर सत्ता की भूख में अब यह भी फर्क मिट चुका है की आप किसके साथ खड़े हैं?

दंतेवाड़ा में जब नक्सलियों ने 76 CRPF जवानों को भून दिया था, तब JNU में जश्न मना रही थी नेहा बोरा की AISA

AISA और इस वामपंथी जमात का यह सुरक्षाबल-विरोधी डीएनए कोई नया नहीं है। इनकी जड़ें उस खूनी माओवादी सोच से जुड़ी हैं जो बस्तर के जंगलों में घात लगाकर हमारे जवानों की पीठ में खंजर घोंपती है।

साल 2010 की वह मनहूस अप्रैल की सुबह कोई कैसे भूल सकता है? छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा (ताड़मेटला) में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के गश्ती दल को घेरकर बारूदी सुरंगों और ऑटोमैटिक हथियारों से भून दिया था।

हमारे 76 बहादुर जवानों के पार्थिव शरीर खून से लथपथ बस्तर के जंगलों में पड़े थे। पूरा देश स्तब्ध था, हर घर में मातम पसरा था और शहीदों के गांवों में चूल्हे तक नहीं जले थे।

लेकिन उस काली रात को दिल्ली के जेएनयू परिसर में क्या हो रहा था? वहां शोक सभा नहीं हुई थी दोस्त! वहां DSU और इसी AISA के पैरोकारों ने जवानों की शहादत पर जश्न मनाया था, तालियां बजाई थीं और पर्चे बांटे थे।

उनके लिए वह ‘क्रांति’ की जीत थी कि 76 वर्दीधारी मार दिए गए।

यह वही वैचारिक तार है जो जंगलों में बंदूकों से जवानों की जान लेता है और शहरों के विश्वविद्यालयों में सेमिनार हॉलों में बैठकर उसी हिंसा को ‘क्रांति’ का नाम देकर जायज ठहराता है।

नेहा बोरा इसी वैचारिक नर्सरी से निकलकर आज मुख्यधारा की राजनीति का चेहरा बनने की कोशिश कर रही हैं।

लाल टीशर्ट के पीछे छिपा वो अंतरराष्ट्रीय कोड, भारत में भी सड़कों पर उपद्रव कराकर इंपोर्ट किया जा रहा बांग्लादेश का तख्तापलट मॉडल

जब घर में अपनी बात का असर खत्म होने लगे, तो इंसान बाहर से हवा लेने की फिराक में रहता है। हमारे यहां के कुछ वामपंथी और विपक्षी कुनबे के साथ भी बिल्कुल यही सीन चल रहा है।

भारत के आम मतदाता इन्हें बार-बार चुनावों में आईना दिखा रहे हैं, लेकिन इन्हें अपनी गलतियों से सीखने के बजाय पड़ोसी मुल्कों की बर्बादी में अपने लिए सत्ता का शॉर्टकट नजर आने लगा है।

ज़रा 14 अक्टूबर 2026 की उस तारीख को नोट कर लीजिए। इसी दिन नेहा बोरा का एक वीडियो संदेश सोशल मीडिया पर तैरने लगा, जिसे देखकर किसी भी समझदार नागरिक के कान खड़े हो जाएं।

यह संदेश भारत के किसी मुद्दे पर नहीं, बल्कि बांग्लादेश के छात्र संगठन ‘सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट’ (SSF) के राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए भेजा गया था।

यह वही संगठन है जिसने बांग्लादेश में चुनी हुई सरकार के खिलाफ सड़कों पर ऐसा खूनी तांडव रचा की प्रधानमंत्री को जान बचाकर मुल्क छोड़ना पड़ा, संसद में उपद्रवी घुस गए, और अल्पसंख्यक हिन्दुओं के घरों को राख के ढेर में तब्दील कर दिया गया।

अब उस आगजनी और तख्तापलट को देखकर नेहा बोरा के मुंह से क्या अल्फाज निकले? उन्होंने कैमरे के सामने बड़े गर्व से कहा-

“हम आपसे प्रेरणा लेते हैं, आपके आंदोलनों से सबक लेते हैं… हमारे देश में जो जेन-जी (Gen-Z) आंदोलन दिख रहा है, उसकी शुरुआत पहले बांग्लादेश में हुई थी। हमें रास्ता दिखाने के लिए बधाई।”

ज़रा इस बयान की गहराई को समझिए! आप किससे प्रेरणा ले रहे हैं? उस भीड़ से जिसने संसद भवन पर कब्जा कर लिया था? उस उन्मादी हुजूम से जो सड़कों पर आग लगाकर फैसले तय कर रहा था?

यानी साफ-साफ संदेश यह है की जो काम भारत का वोटर अपने वोट की ताकत से नहीं कर रहा, वो काम ये लोग सड़कों पर भीड़ का तमाशा खड़ा करके, आगजनी करवाकर और ‘तख्तापलट’ का माहौल बनाकर करना चाहते हैं।

इस पूरी साजिश की नौटंकी को और धार देने के लिए प्रतीकों का जो खेल खेला जा रहा है, वो भी कम दिलचस्प नहीं है। आपने नेहा बोरा की उस लाल रंग की टी-शर्ट पर गौर किया होगा, जिस पर एक खास खोपड़ी वाला लोगो (One Piece मंगा का सिंबल) छपा हुआ था।

ऊपरी तौर पर कोई इसे पॉप-कल्चर का फैशन बताकर पल्ला झाड़ सकता है, लेकिन खुफिया और जमीनी राजनीति को समझने वाले जानते हैं की यही सिंबल श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन पर कब्जे के दौरान दिखा था, यही लोगो नेपाल के हिंसक प्रदर्शनों में लहराया गया था और यही ढाका की सड़कों पर तख्तापलट का झंडा बना था।

मतलब पूरी दुनिया से एक खास अराजकता का ‘टूलकिट’ उधार लिया जा रहा है, ताकि किसी तरह भारत के शांत माहौल में भी आग सुलगाई जा सके।

और मजे की बात देखिए, खुद को गांधी की विरासत का वारिस बताने वाली पार्टी इस विदेशी ‘अराजकता मॉडल’ की खुली ब्रैंडिंग कर रही है।

खड़गे और डीके शिवकुमार जैसे दिग्गज नेता पीछे धकेले गए, राहुल गांधी ने नेहा बोरा को मीडिया के सामने थमाया माइक

अब आते हैं इस पूरे ड्रामे के सबसे शर्मनाक पहलू पर। कल्पना कीजिए उस कांग्रेस कार्यकर्ता की हालत की, जिसने 30-40 साल तक पार्टी का झंडा ढोया, धूप में पसीना बहाया।

कर्नाटक में सरकार बनाकर देने वाले डीके शिवकुमार हों या पार्टी के औपचारिक राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे… इन दिग्गजों को आजकल क्या नसीब हो रहा है?

अक्टूबर 2026 के दिल्ली मार्च की वो तस्वीरें सबने देखी हैं। चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की तरफ बढ़ते विपक्ष के उस हुजूम में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी किसके साथ कदमताल कर रहे थे?

अनुभवी सांसदों और पूर्व मुख्यमंत्रियों को कोहनी मारकर किनारे कर दिया गया और आगे चल रही थीं वही वामपंथी पोस्टर-गर्ल नेहा बोरा।

राहुल गांधी बाकायदा उनके और प्रियंका गांधी के कंधों पर हाथ रखकर पीछे चल रहे थे, जैसे कोई नया राजनीतिक मसीहा मिल गया हो।

तमाशा यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके बाद राहुल गांधी के आवास पर जब पूरे ‘इंडिया ब्लॉक’ के दिग्गज नेताओं की हाई-टी बैठक हुई, तो प्रेस के सामने अपनी बात रखने के लिए माइक किसे थमाया गया? किसी पूर्व केंद्रीय मंत्री को? किसी सीनियर सांसद को?

जी नहीं! माइक सीधा थमा दिया गया जेएनयू की उसी वामपंथी छात्र नेता को!

इसे कहते हैं वैचारिक कंगाली! जब अपनी दुकान में बेचने के लिए कोई सामान न बचे, तो पड़ोस की दुकान से उधारी का प्रोपेगेंडा उठाकर बेचना पड़ता है।

क्या सत्ता हासिल करने की यह बेचैनी इतनी बढ़ चुकी है की आप उन लोगों को गले लगाएंगे जो कल तक बाटला हाउस के आतंकियों के लिए ‘इंसाफ’ के पोस्टर लहरा रहे थे?

क्या कुर्सी का लालच इतना बड़ा हो गया है की आप उन संगठनों के साथ मंच साझा करेंगे जो हमारे 76 जवानों की शहादत पर जेएनयू के कमरों में तालियां पीटते थे?

और सबसे बड़ा सवाल- क्या भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को ढाका या कोलंबो बनाने का सपना देखना किसी भी तरह से देशभक्ति कहला सकता है?

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