आज 15 अक्टूबर को हम उस महान तपस्वी, उस कर्मयोगी और भारत के उस अनमोल रत्न की 95वीं जयंती मना रहे हैं, जिनके नाम मात्र से ही करोड़ों युवाओं की रगों में बिजली दौड़ जाती है।
जी हाँ, आज भारत के 11वें राष्ट्रपति और हमारे ‘मिसाइल मैन’ डॉ. अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम (Dr APJ Abdul Kalam) का जन्मदिन है।
दुनिया के इतिहास में बहुत से वैज्ञानिक हुए, बहुत से राष्ट्रपति हुए, लेकिन मुझे नहीं लगता की कोई भी शख्सियत ऐसी हुई होगी जिसके जाने पर पूरा का पूरा मुल्क ऐसे फूट-फूट कर रोया हो, जैसे उनके घर का कोई अपना बड़ा-बुज़ुर्ग चला गया हो।
कलाम साहब नए, आधुनिक और एक ताकतवर भारत के वो शिल्पकार थे, जिन्होंने इस देश को ज़मीन से उठकर सीधे अंतरिक्ष की आंखों में आंखें डालना सिखाया।
उन्होंने सिर्फ मिसाइलें ही नहीं बनाईं, बल्कि करोड़ों हिंदुस्तानियों के सीने में वो आग भर दी जिसे ‘आत्मविश्वास’ कहते हैं।
आज उनकी 95वीं जयंती पर, आइए उनके उस संघर्षपूर्ण सफर पर फिर से नज़र डालते हैं, जिसे पढ़कर आज भी दुनिया नतमस्तक हो जाती है।

रामेश्वरम की तंग गलियों में अखबार बांटने वाला वो बच्चा जिसके एक सपने ने बदल दी हिंदुस्तान की तकदीर
एक ऐसा महामानव जिसने भारत को परमाणु ताकत बना दिया, उसका बचपन महलों में नहीं, बल्कि बेहद गरीबी और संघर्ष की भट्टी में तपा था।
15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम की तंग गलियों में एक बहुत ही साधारण से परिवार में कलाम साहब का जन्म हुआ। उनके पिता जैनुलाब्दीन एक बहुत छोटी सी नाव चलाते थे और उसी से घर का खर्च चलता था।
घर के हालात ऐसे थे की परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए छोटे से कलाम को सुबह-सुबह रामेश्वरम की सड़कों पर दौड़-दौड़ कर ‘दीनामणि’ (Dinamani) नाम का तमिल अख़बार बेचना पड़ता था।
लेकिन गरीबी कभी भी इस बच्चे के सपनो को निगल नहीं पाई। ‘श्वार्ट्ज हायर सेकेंडरी स्कूल’ में पढ़ाई के दौरान ही उन्हें आसमान में उड़ने वाले पक्षियों को देखकर कुछ कर गुज़रने की धुन सवार हो गई थी।
इसके बाद वो रुके नहीं, उन्होंने ‘मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ (MIT) से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।
यहां एक बहुत ही दिलचस्प और भावुक फैक्ट है, जो शायद बहुत कम लोग जानते हैं। इंजीनियरिंग करने के बाद कलाम साहब का सबसे बड़ा सपना था इंडियन एयरफोर्स में फाइटर पायलट बनना।
उन्होंने बाकायदा देहरादून जाकर इसका इंटरव्यू भी दिया था। लेकिन किस्मत का खेल देखिए, एयरफोर्स में उस समय सिर्फ 8 वैकेंसी थीं और कलाम साहब का नंबर 9वां आया था! वो पायलट नहीं बन पाए।
वो बहुत निराश हुए और ऋषिकेश चले गए। वहां स्वामी शिवानंद जी ने उन्हें समझाया की शायद ईश्वर ने तुम्हारे लिए कुछ और बहुत बड़ा सोच रखा है।
और वाकई, जो इंसान एयरफोर्स का एक जहाज उड़ाने से चूक गया था, किस्मत को तो उसे मिसाइलों का भगवान बनाना था!

जब भारत का उड़ाया जा रहा था मज़ाक तब कलाम साहब के SLV-III और रोहिणी ने दुनिया का मुंह कर दिया था बंद
एयरफोर्स से रिजेक्ट होने के बाद कलाम साहब 1969 में ISRO (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) से जुड़ गए। ये वो दौर था जब भारत स्पेस की दुनिया में घुटनों के बल चलना सीख रहा था।
हमारे वैज्ञानिक बैलगाड़ियों और साइकिलों के पीछे रॉकेट के पुर्जे रखकर ले जाते थे और दुनिया के बड़े मुल्क (खासकर पश्चिमी देश) हम पर हंसते थे।
लेकिन डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. कलाम जैसे जिद्दी इंसानों ने ठान लिया था की दुनिया को जवाब काम से देना है।
कलाम साहब को भारत के पहले स्वदेशी ‘सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल’ (SLV-III) का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाया गया। यह सफर आसान नहीं था।
1979 में जब SLV-III की पहली उड़ान हुई, तो वो एक भयंकर फेलियर साबित हुई। रॉकेट बंगाल की खाड़ी में जा गिरा। पूरा सिस्टम टूट चुका था, लेकिन कलाम साहब ने हार नहीं मानी।
उन्होंने फिर से दिन-रात एक कर दिया और अपनी टीम को खड़ा किया।
और फिर आया 18 जुलाई 1980 का वो ऐतिहासिक दिन! इसी SLV-III ने श्रीहरिकोटा से उड़ान भरी और ‘रोहिणी’ (Rohini) सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा (Orbit) में स्थापित कर दिया।
इस एक घटना ने दुनिया का मुंह बंद कर दिया था। इसी कामयाबी के साथ भारत दुनिया के उन गिने-चुने एक्सक्लूसिव ‘स्पेस क्लब’ (Space Club) देशों की लिस्ट में शामिल हो गया, जिनके पास खुद की रॉकेट तकनीक थी।

अग्नि और पृथ्वी जैसी घातक मिसाइलों का जन्म और ऐसे बने देश के दुश्मनों के लिए खौफ का दूसरा नाम हमारे मिसाइल मैन
अंतरिक्ष फतह करने के बाद देश को ज़रूरत थी अपनी सीमाएं सुरक्षित करने की। साल 1983 में कलाम साहब DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) में आए।
उस समय भारत मिसाइलों के मामले में बहुत पीछे था और अमेरिका, रूस जैसे देशों ने हमें मिसाइल तकनीक देने से साफ मना कर दिया था। उनका सोचना था की भारत कभी अपने दम पर मिसाइल बना ही नहीं पाएगा।
यहीं से शुरुआत हुई कलाम साहब के उस ब्रह्मास्त्र की, जिसे दुनिया IGMDP (इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम) के नाम से जानती है।
इस प्रोग्राम की कमान सीधे कलाम साहब के हाथों में थी। उन्होंने कसम खाई की हम विदेशों के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे, बल्कि स्वदेशी तकनीक से देश को अभेद्य बनाएंगे।
उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर मिसाइलों की जो फौज खड़ी की, उसने पाकिस्तान और चीन दोनों की रूह कंपा दी। उन्होंने ज़मीन से ज़मीन पर मार करने वाली मारक ‘पृथ्वी’ (Prithvi), दुश्मन के एयरक्राफ्ट को हवा में ही उड़ा देने वाली ‘आकाश’ (Akash) और ‘त्रिशूल’ (Trishul), और दुश्मन के टैंकों को भस्म कर देने वाली एंटी-टैंक मिसाइल ‘नाग’ (Nag) का निर्माण किया।
लेकिन कलाम साहब का सबसे बड़ा और भयानक आविष्कार था ‘अग्नि’ (Agni) मिसाइल! जब ‘अग्नि’ का सफल परीक्षण हुआ, तो इसकी खौफनाक मारक क्षमता देखकर पूरी दुनिया दहल गई थी।
ये वो मिसाइल थी जो हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के घर में घुसकर तबाही मचा सकती थी। इन्हीं स्वदेशी मिसाइलों ने भारतीय सेना को वो ताकत दी, जिसके दम पर आज भारत दुश्मनों की आँखों में आँखें डालकर बात करता है।
देश को ये सुरक्षा कवच पहनाने के कारण ही पूरा मुल्क डॉ. कलाम को “मिसाइल मैन” के नाम से पूजने लगा।

अमेरिकी सैटेलाइट्स की आंखों में धूल झोंककर पोखरण की रेत में रची थी भारत के परमाणु महाशक्ति बनने की सबसे बड़ी स्क्रिप्ट
मिसाइलों से दुश्मनों की नींद उड़ाने के बाद कलाम साहब ने देश के लिए एक और ऐसा काम किया, जिसने दुनिया के चौधरी बने बैठे अमेरिका का सारा घमंड चकनाचूर कर दिया।
बात है साल 1998 की, जब देश में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी। अटल जी ने फैसला लिया की अब भारत को दुनिया के सामने सीना ठोककर परमाणु परीक्षण करना होगा।
इस बेहद सीक्रेट और खतरनाक मिशन ‘ऑपरेशन शक्ति’ (Operation Shakti) का चीफ प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर डॉ. कलाम को ही बनाया गया।
उस वक्त अमेरिका की खूफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के एडवांस जासूसी सैटेलाइट्स दिन-रात राजस्थान के पोखरण पर टकटकी लगाए बैठे थे।
मजाल है की परिंदा भी पर मार जाए और अमेरिका को खबर न हो! लेकिन कलाम साहब और उनकी टीम ने इन अंग्रेजों की आंखों में ऐसी धूल झोंकी की इन्हें भनक तक नहीं लगी।
अमेरिकी सैटेलाइट्स को चकमा देने के लिए कलाम साहब और उनके वैज्ञानिक सिर्फ रात के अंधेरे में काम करते थे और सुबह होने से पहले सब कुछ वापस छुपा देते थे।
कलाम साहब खुद वहां आर्मी की वर्दी पहनकर घूमते थे और उनका कोडनेम रखा गया था ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’। ऐसा इसलिए किया गया ताकि दुनिया को लगे की वहां बस भारतीय सेना की कोई रूटीन एक्सरसाइज चल रही है।
और फिर 11 और 13 मई 1998 को पोखरण की रेत में वो भयानक धमाके हुए, जिनकी गूंज सीधे वाशिंगटन तक सुनाई दी!
जब तक अमेरिका के सैटेलाइट कुछ समझ पाते, तब तक भारत एक अजेय ‘परमाणु महाशक्ति’ (Nuclear Superpower) बन चुका था। अमेरिका हाथ मलता रह गया और कलाम साहब ने भारत का सीना पूरी दुनिया में गर्व से चौड़ा कर दिया।
साल 2002 से 2007 का वो स्वर्णिम काल आज भी भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है, जब डॉ. कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बने।
वो देश के पहले ऐसे राष्ट्रपति बने जिन्हें पूरा मुल्क प्यार से ‘पीपल्स प्रेसिडेंट’ (जनता का राष्ट्रपति) कहने लगा।
जीवन की आखिरी सांस और आखिरी धड़कन भी सिर्फ देश के युवाओं के नाम, IIM शिलांग का वो आखिरी यादगार लेक्चर
अमूमन लोग रिटायरमेंट के बाद आराम करना पसंद करते हैं, कोई पेंशन लेकर घर बैठ जाता है तो कोई दुनिया घूमने निकल जाता है।
लेकिन कलाम साहब तो सिर्फ काम करने और इस देश को आगे बढ़ाने के लिए ही पैदा हुए थे। उन्होंने 2020 तक भारत को एक विकसित देश (Developed Nation) बनाने का ‘विजन 2020’ तैयार किया था।
और इसी सपने को साकार करने के लिए वो रिटायरमेंट के बाद एक टीचर बन गए। वो दिन-रात पूरे देश का दौरा करते, स्कूलों-कॉलेजों में जाते और बच्चों के अंदर सपनों की आग भरते।
और फिर आया 27 जुलाई 2015 का वो दिन, जिसने पूरे हिंदुस्तान को रुला दिया। कलाम साहब मेघालय के IIM शिलांग में छात्रों को ‘Creating a Livable Planet Earth’ (रहने योग्य धरती बनाना) विषय पर लेक्चर दे रहे थे।
वो बच्चों के बीच खड़े थे, हाथ में माइक था और वो पढ़ा रहे थे… और तभी उन्हें एक ज़बरदस्त दिल का दौरा पड़ा। वो वहीं स्टेज पर गिर पड़े और हमेशा-हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गए।
ज़रा सोचिए… उस महान इंसान ने अपनी ज़िंदगी का आखिरी सेकंड और आखिरी धड़कन भी देश के युवाओं और शिक्षा के नाम कर दी।
एक सैनिक जैसे बॉर्डर पर लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होता है, वैसे ही हमारा ये मिसाइल मैन अपने ज्ञान के मंच पर खड़ा होकर दुनिया से रुखसत हुआ।
आज उनकी 95वीं जयंती पर पूरा भारत उस अख़बार बांटने वाले बच्चे को, उस ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ को, और हमारे उस सबसे प्यारे ‘जनता के राष्ट्रपति’ को नम आंखों से सलाम कर रहा है।
