जब भी भारतीय राजनीति में ताकत, खौफ और ग्लैमर की बात होती है, तो दक्षिण से एक ही नाम गूंजता है- जे. जयललिता।
पुरुष-प्रधान द्रविड़ राजनीति, जहाँ बड़े-बड़े मूंछों वाले नेताओं का राज चलता था, वहां एक अकेली औरत ने बिना किसी राजनीतिक गॉडफादर के पूरे 30 साल तक सिस्टम को अपनी उँगलियों पर नचाया।
लोग उन्हें प्यार से ‘अम्मा’ कहते थे, लेकिन उनका खौफ ऐसा था की अच्छे-अच्छों की जुबान बंद हो जाती थी। इनकी ज़िंदगी की कहानी किसी ब्लॉकबस्टर साउथ इंडियन फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है।
लेकिन ये सत्ता और गुरूर उन्हें खैरात में नहीं मिला था। इसके पीछे एक ऐसा खौफनाक अपमान और आंसुओं का समंदर छिपा है, जिसे याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
बात है 25 मार्च 1989 की। तमिलनाडु विधानसभा का सत्र चल रहा था। जयललिता उस वक्त विपक्ष की नेता थीं।
सदन के अंदर सत्ता पक्ष (करुणानिधि की पार्टी DMK) और विपक्ष के बीच भयंकर बहस छिड़ गई। बात इतनी बिगड़ गई की सत्ता के नशे में चूर कुछ विधायकों ने जयललिता पर हमला कर दिया।
भरी विधानसभा में उनके बाल खींचे गए। हाथापाई हुई और इसी छीना-झपटी में उनकी साड़ी का पल्लू फट गया। लोकतंत्र के उस मंदिर में एक औरत का सरेआम चीरहरण हो रहा था और बड़े-बड़े नेता तमाशा देख रहे थे।
लेकिन वो औरत टूटी नहीं। फटे कपड़ों, बिखरे बालों और आँखों में इंतकाम के आंसू लिए जब जयललिता विधानसभा से बाहर निकलीं, तो उन्होंने वहीं खड़े-खड़े एक ऐसी खूंखार कसम खाई जिसने पूरे तमिलनाडु की राजनीति का भूगोल बदलकर रख दिया।
उन्होंने प्रतिज्ञा ली- “अब मैं इस सदन में तभी कदम रखूंगी, जब मैं यहाँ की मुख्यमंत्री बन जाऊंगी!”
और इसके बाद जो हुआ, वो इतिहास है। लेकिन इस इंतकाम वाली अम्मा के बनने से पहले एक और कहानी है, जो जानना बहुत ज़रूरी है।

15 साल की उम्र में मजबूरी में किया सिनेमा का रुख और बन गई सिल्वर स्क्रीन की सबसे बड़ी सुपरस्टार
सच कहूं तो जयललिता को राजनीति या सिनेमा से कोई खास लगाव नहीं था। 24 फरवरी 1948 को मैसूर के एक अयंगर ब्राह्मण परिवार में जन्मीं जयललिता पढ़ाई में बेहद तेज़ थीं।
उनका सपना था की वो पढ़-लिखकर एक बड़ी वकील बनें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
जब वो सिर्फ दो साल की थीं, तभी उनके पिता का साया सिर से उठ गया। घर की माली हालत खराब होने लगी, तो उनकी माँ ‘संध्या’ ने मजबूरन तमिल सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया।
घर चलाने की इसी जद्दोजहद में माँ के दबाव में आकर जयललिता को भी महज़ 15 साल की कच्ची उम्र में मेकअप पोतकर कैमरे के सामने खड़ा होना पड़ा।
जिस उम्र में लड़कियां स्कूल और कॉलेज की दुनिया जीती हैं, उस उम्र में वो सेट पर पसीना बहा रही थीं। लेकिन टैलेंट तो कूट-कूट कर भरा था उनमें।
देखते ही देखते वो तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिंदी सिनेमा की सबसे महंगी और टॉप सुपरस्टार बन गईं। उन्होंने अपने करियर में 140 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया और सिल्वर स्क्रीन पर तहलका मचा दिया।
इसी सिनेमा के सफर के दौरान उनकी ज़िंदगी में एक ऐसे शख्स की एंट्री हुई, जिसने उन्हें राजनीति का रास्ता दिखाया। वो थे उस दौर के सबसे बड़े सुपरस्टार और बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने एम. जी. रामचंद्रन (जिन्हें लोग प्यार से MGR कहते थे)।
एमजीआर उनके को-स्टार भी थे और मेंटर भी। 1982 में एमजीआर ही वो शख्स थे जो जयललिता का हाथ पकड़कर उन्हें अपनी पार्टी (AIADMK) में लेकर आए।
जयललिता की फर्राटेदार इंग्लिश, गज़ब की भाषण कला और करिश्मे को देखकर एमजीआर ने उन्हें राजनीति का ककहरा सिखाया और अपना राजनीतिक वारिस बनाना शुरू कर दिया।

एमजीआर के निधन के बाद शव यात्रा से दिया गया धक्का और वहीं से हुआ एक खूंखार नेत्री का जन्म
सब कुछ ठीक चल रहा था, जयललिता पार्टी में धीरे-धीरे अपना कद बढ़ा रही थीं। लेकिन तभी 1987 में एक ऐसा भूचाल आया जिसने जयललिता की दुनिया उजाड़ दी।
उनके मेंटर और मुख्यमंत्री एमजीआर का निधन हो गया। एमजीआर की मौत के बाद पार्टी में भयंकर गुटबाज़ी शुरू हो गई। एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन का गुट नहीं चाहता था की जयललिता पार्टी पर कब्ज़ा करें।
अब शुरू हुआ जयललिता के संघर्ष का सबसे बुरा दौर। एमजीआर के निधन के बाद जानकी गुट के नेताओं ने जयललिता को बुरी तरह बेइज़्ज़त करना शुरू कर दिया।
हद तो तब हो गई जब एमजीआर की अंतिम यात्रा निकाली जा रही थी। जयललिता अपने गुरु के पार्थिव शरीर के पास खड़ी होकर रो रही थीं।
तभी जानकी गुट के एक नेता ने उन्हें सरेआम धक्के मारकर उस गन-कैरिज (शव वाहन) से नीचे सड़क पर गिरा दिया। लाखों की भीड़ के सामने भारत की एक टॉप सुपरस्टार और राज्यसभा सांसद को सड़क पर धक्के मार दिए गए।
कोई आम इंसान होता तो शायद इस ज़लालत के बाद राजनीति छोड़कर घर बैठ जाता। लेकिन जयललिता अलग ही मिट्टी की बनी थीं।
उस धक्के ने उनके अंदर की उस सहमी हुई औरत को मार दिया, और वहां जन्म हुआ दक्षिण की उस सबसे खूंखार नेत्री का जिसे आगे चलकर ‘आयरन लेडी’ कहलाना था।
इस अपमान के घूंट को पीकर जयललिता ने ठान लिया की अब वो पीछे नहीं हटेंगी। 1989 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जानकी गुट को ज़मीन सुंघा दी।
जनता ने एमजीआर के असली वारिस के रूप में जयललिता को स्वीकार कर लिया। जानकी रामचंद्रन राजनीति से पीछे हट गईं और जयललिता ने पूरी AIADMK पार्टी पर अपना एकछत्र कब्ज़ा जमा लिया।
अब वो कोई बेचारी अभिनेत्री नहीं, बल्कि तमिलनाडु की सबसे कड़क और ताकतवर विपक्ष की नेता बन चुकी थीं।

सत्ता के शिखर पर एकछत्र राज जहाँ बड़े-बड़े मंत्री सरेआम ज़मीन पर लेटकर करते थे साष्टांग दंडवत
1989 में विधानसभा के अंदर खाई गई वो कसम अब सच होने जा रही थी। 1991 के चुनाव आ चुके थे। इसी दौरान राजीव गांधी की हत्या हो गई और पूरे तमिलनाडु में कांग्रेस-AIADMK गठबंधन के पक्ष में एक भयंकर सहानुभूति की लहर दौड़ गई।
जयललिता के करिश्मे और इस लहर ने मिलकर ऐसा तूफान खड़ा किया की विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया। और इसी के साथ, फटे कपड़ों में विधानसभा से निकली वो औरत एक शाही रथ पर सवार होकर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गई।
लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही जयललिता का जो रूप दुनिया के सामने आया, उसने अच्छे-अच्छों के पसीने छुड़ा दिए। वो सिर्फ एक राजनेता नहीं रहीं, बल्कि एक ‘कल्ट’ (Cult) बन गईं।
उनकी पार्टी में कोई लोकतंत्र नहीं था। जो अम्मा ने कह दिया, वो पत्थर की लकीर! उनका खौफ ऐसा था की कोई उनकी आँखों में आँखें डालकर बात करने की हिम्मत नहीं कर सकता था।
भारतीय राजनीति में चापलूसी तो बहुत देखी गई है, लेकिन जयललिता के राज में जो हुआ, वो मनोवैज्ञानिक वर्चस्व (Psychological Dominance) की चरम सीमा थी।
60-70 साल के बुजुर्ग मंत्री, सफेद बालों वाले सांसद और बड़े-बड़े आईएएस (IAS) अफसर उनके सामने सरेआम ज़मीन पर लेटकर ‘साष्टांग दंडवत’ (पैर छूना) करते थे।
जब उनका हेलिकॉप्टर आसमान से गुज़रता था, तो नीचे खड़े मंत्री हाथ जोड़कर ज़मीन पर लेट जाते थे। कैबिनेट मीटिंग में किसी मंत्री की हिम्मत नहीं होती थी की वो उनके सामने बिना इज़ाज़त कुर्सी पर बैठ जाए।
पूरी की पूरी सरकार, पूरा का पूरा सिस्टम एक अकेली औरत के इशारों पर कठपुतली की तरह नाच रहा था।
मुंहबोले बेटे की वो शाही शादी और घर से निकली 10 हज़ार साड़ियां जिसने पहली बार हिला दी सत्ता
सत्ता इंसान की आँखों पर पट्टी बांध देती है, और जयललिता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी ज़िंदगी में दौलत और दिखावे का एक ऐसा भद्दा दौर शुरू हुआ, जिसने उनके माथे पर भ्रष्टाचार का वो कलंक लगा दिया जो मरते दम तक नहीं धुला।
इस कहानी में एंट्री हुई उनकी सबसे करीबी सहेली शशिकला की। शशिकला और उनका परिवार (जिसे लोग मन्नारगुड़ी माफिया कहते थे) जयललिता के पोएस गार्डन (Poes Garden) वाले घर में शिफ्ट हो गया।
1995 में जयललिता ने शशिकला के भतीजे वी.एन. सुधाकरन को अपना मुंहबोला बेटा बना लिया। और फिर हुई उस मुंहबोले बेटे की वो शाही शादी, जिसे देखकर पूरे देश का जबड़ा खुला का खुला रह गया!
यह कोई आम शादी नहीं थी भाई साहब! इस शादी में पानी की तरह ऐसा पैसा बहाया गया की इसका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज़ हो गया।
डेढ़ लाख से ज़्यादा मेहमान बुलाए गए। पूरे चेन्नई शहर को लाइटों और फूलों से ऐसे सजाया गया जैसे कोई हॉलीवुड की फिल्म का सेट हो।
डाइनिंग हॉल इतने बड़े थे की उनमें कई फुटबॉल के मैदान समा जाएं। जब जयललिता और शशिकला हीरे-जवाहरात से लदकर और एक जैसी रेशमी साड़ियां पहनकर बाहर निकलीं, तो जनता का माथा ठनक गया।
गरीबी में जीने वाली तमिलनाडु की जनता ने जब अपनी मुख्यमंत्री का ये अट्टहास और दौलत का नाच देखा, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
नतीजा? 1996 के चुनावों में जनता ने अम्मा का सारा गुरूर तोड़ दिया और वो बुरी तरह चुनाव हार गईं।
लेकिन असली भूचाल तो चुनाव हारने के बाद आया। जब सत्ता गई, तो उनके पोएस गार्डन वाले महल पर एंटी-करप्शन ब्यूरो का छापा पड़ा।
और अंदर से जो मिला… भाई साहब, वो किसी खजाने से कम नहीं था! छापों में 10,500 कीमती रेशमी साड़ियां, 750 जोड़ी इम्पोर्टेड जूते, 28 किलो सोना और 91 महंगी घड़ियां बरामद हुईं।
ये आंकड़े इतने खौफनाक थे की पूरे देश की मीडिया हिल गई। इसी घटना के बाद उन पर ‘आय से अधिक संपत्ति’ (Disproportionate Assets) का वो ऐतिहासिक केस दर्ज हुआ, जिसने उनकी ज़िंदगी भर रातों की नींद हराम कर दी।
जब सत्ता में लौटते ही अम्मा ने आधी रात को दरवाज़ा तोड़कर करवाया 78 साल के करुणानिधि को गिरफ्तार
भ्रष्टाचार के आरोपों और मुकदमों के बावजूद जयललिता की राजनीति खत्म नहीं हुई। 2001 के चुनावों में वो फिर से एक बार करिश्माई तरीके से सत्ता में लौट आईं।
और कुर्सी पर बैठते ही उनके दिमाग में सबसे पहली बात क्या आई? ‘बदला’!
जी हाँ, जयललिता कभी किसी का एहसान नहीं भूलती थीं, और किसी का अपमान तो बिल्कुल नहीं! उन्हें याद था की कैसे 1989 में उनके धुर-विरोधी एम. करुणानिधि (DMK नेता) के इशारे पर भरी विधानसभा में उनकी साड़ी खींची गई थी।
अब वो मुख्यमंत्री थीं और पुलिस उनके कंट्रोल में थी।
तारीख थी 30 जून 2001… रात के लगभग 1:30 बज रहे थे। अचानक चेन्नई पुलिस की कई गाड़ियां पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के घर पर पहुँच गईं।
पुलिस ने घर का दरवाज़ा तोड़ा और सीधे करुणानिधि के बेडरूम में घुस गई। करुणानिधि उस वक्त 78 साल के बुजुर्ग थे। पुलिस ने बिना किसी वारंट और बिना किसी लिहाज़ के उस 78 साल के पूर्व मुख्यमंत्री को घसीटते हुए घर से बाहर निकाला और गिरफ्तार कर लिया!
करुणानिधि चीखते रहे, उनके कपड़े फट गए, लेकिन अम्मा की पुलिस को कोई रहम नहीं आया। सन टीवी (Sun TV) ने इस पूरी घटना का लाइव टेलीकास्ट कर दिया।
एक 78 साल के दिग्गज नेता को आधी रात को गुंडों की तरह घसीटकर ले जाने वाले उस खौफनाक मंज़र ने दिल्ली तक की राजनीति में सुनामी ला दी।
तत्कालीन वाजपेयी सरकार भी इस घटना से हिल गई थी। लेकिन जयललिता को किसी की परवाह नहीं थी। उन्होंने दुनिया को बता दिया था की अगर कोई ‘अम्मा’ से टकराएगा, तो उसका अंजाम कितना खौफनाक हो सकता है।
एक रुपये की इडली और क्रैडल बेबी स्कीम से लेकर वीरप्पन के खात्मे तक गरीबों की मसीहा बनने का सफर
अब आपके दिमाग में एक सवाल ज़रूर उठ रहा होगा की यार, जिस नेत्री के घर से 10 हज़ार साड़ियां मिलीं, जिसके राज में मंत्री ज़मीन पर लोटते थे, उस तानाशाह औरत को तमिलनाडु की जनता चुनाव दर चुनाव अपना मुख्यमंत्री क्यों चुनती रही?
जनता बेवकूफ तो नहीं है!
यहीं से शुरू होता है जयललिता का वो दूसरा रूप, जिसने उन्हें एक आम नेता से उठाकर ‘अम्मा’ (माँ) के दर्जे पर बैठा दिया था।
जयललिता को बहुत अच्छे से पता था की अगर सत्ता में बने रहना है, तो गरीब जनता की थाली और उनके आंसू पोंछने होंगे। उनका प्रशासन इतना गज़ब का था की अच्छे-अच्छे राजनेता आज भी उनकी नकल करते हैं।
सबसे पहले बात करते हैं 1992 की उस ‘क्रैडल बेबी स्कीम’ (Cradle Baby Scheme) की। उस दौर में तमिलनाडु के कई ज़िलों में कन्या भ्रूण हत्या (Female infanticide) बहुत भयंकर स्तर पर थी।
लोग बेटियों को पैदा होते ही मार देते थे। जयललिता ने सरकारी अस्पतालों और प्राइमरी हेल्थ सेंटरों पर एक ‘पालना’ (Cradle) रखवा दिया और ऐलान किया की जो भी अपनी बच्ची को नहीं पाल सकता, उसे मारने के बजाय चुपचाप इस पालने में छोड़ जाए, सरकार उस बच्ची को पालेगी और पढ़ाएगी।
इस एक फैसले ने रातों-रात हज़ारों बच्चियों की जान बचा ली।
फिर उन्होंने शुरू किया ‘फ्रीबीज़’ (मुफ्त योजनाओं) का वो कल्ट, जिसने पूरे राज्य की तस्वीर बदल दी। उन्होंने ‘अम्मा’ ब्रांड लॉन्च किया।
‘अम्मा कैंटीन’ (Amma Unavagam) खोली गईं, जहाँ महज़ 1 रुपये में इडली और 5 रुपये में पेट भर सांभर-चावल मिलने लगा।
चेन्नई की सड़कों पर मज़दूरी करने वाला कोई भी इंसान अब भूखा नहीं सोता था। स्कूली बच्चों को मुफ्त साइकिल और लैपटॉप बांटे गए।
गरीब महिलाओं के घरों में मुफ्त मिक्सर-ग्राइंडर और पंखे पहुँच गए। 10 रुपये में ‘अम्मा मिनरल वाटर’ मिलने लगा। यही वजह थी की करप्शन के कितने भी आरोप लगें, एक गरीब आदमी के लिए जयललिता किसी भगवान से कम नहीं थीं।
और लॉ एंड ऑर्डर (कानून-व्यवस्था) के मामले में तो वो किसी से समझौता नहीं करती थीं। याद है वो कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन? जिसने तीन दशकों तक कर्नाटक और तमिलनाडु की पुलिस की नाक में दम कर रखा था।
2004 में उसी वीरप्पन का काम तमाम करने वाली स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को जयललिता का ही पूरा बैक-अप और फ्री-हैंड मिला हुआ था।
इसके अलावा, चेन्नई में पानी की किल्लत दूर करने के लिए 2001 में पूरे राज्य में ‘रेनवाटर हार्वेस्टिंग’ (Rainwater Harvesting) को अनिवार्य करने वाला उनका दूरदर्शी फैसला आज भी पूरे देश में एक मिसाल है।
शशिकला के मन्नारगुड़ी माफिया का खौफ और वो केस जिसने पहली बार किसी सिटिंग सीएम से छीन ली कुर्सी
खैर, विकास के कितने भी काम कर लो, लेकिन जो पाप आपने किए हैं, कानून उनकी सज़ा तो एक न एक दिन ज़रूर देता है।
जयललिता की सबसे बड़ी ताकत उनका करिश्मा था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी उनकी सहेली ‘शशिकला’।
पूरे तमिलनाडु में यह बात खुलेआम कही जाती थी की सरकार अम्मा नहीं, बल्कि शशिकला और उसके रिश्तेदार चला रहे हैं। इस पूरे कुनबे को लोग ‘मन्नारगुड़ी माफिया’ (Mannargudi Mafia) कहते थे।
ट्रांसफर, पोस्टिंग, टेंडर… सब कुछ शशिकला के इशारों पर होने लगा था।
और इसी शशिकला के साथ किए गए उस 10 हज़ार साड़ियों वाले भ्रष्टाचार (आय से अधिक संपत्ति) का जिन्न आखिरकार 18 साल बाद 2014 में बोतल से बाहर आ गया।
केस बैंगलोर की स्पेशल कोर्ट में चल रहा था। 27 सितम्बर 2014 का वो दिन भारतीय राजनीति में एक भूचाल लेकर आया।
स्पेशल कोर्ट के जज जॉन माइकल डी-कुन्हा (John Michael D’Cunha) ने वो ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसने ‘आयरन लेडी’ का तिलिस्म तोड़ दिया।
जयललिता को दोषी करार दिया गया। उन्हें 4 साल की जेल और 100 करोड़ रुपये का भयंकर जुर्माना ठोंका गया! फैसले के तुरंत बाद उन्हें कोर्ट से ही गिरफ्तार करके बैंगलोर की सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब कोई ‘सिटिंग मुख्यमंत्री’ (पद पर रहते हुए CM) भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी ठहराई गई और उसकी कुर्सी छिन गई।
जब वो जेल गईं, तो उनके समर्थकों ने पूरे तमिलनाडु में कोहराम मचा दिया, कइयों ने तो सदमे में अपनी जान तक दे दी।
अपोलो अस्पताल के वो रहस्यमयी 75 दिन और एक ऐसी आयरन लेडी का अंत जिसका कोई वारिस नहीं था
हालाँकि, अम्मा इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं थीं। 2015 में वो ऊपरी अदालत से बरी होकर बाहर आईं और फिर से कुर्सी पर बैठ गईं।
लेकिन असली जादू तो 2016 के विधानसभा चुनावों में दिखा। तमिलनाडु का एक पुराना इतिहास था की वहाँ कोई भी पार्टी लगातार दो बार चुनाव नहीं जीतती थी।
लेकिन 2016 में जयललिता ने अपनी लोकप्रियता के दम पर 32 साल का ये पुराना रिकॉर्ड तोड़ डाला और लगातार दूसरी बार शानदार बहुमत से सत्ता में वापसी की।
आप यकीन नहीं करेंगे की कुल मिला कर 6 बार जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी।
उन्होंने साबित कर दिया की वो भले ही जेल जाकर आई हों, लेकिन जनता की नज़रों में असली बॉस वही हैं।
लेकिन कहानी अपने सबसे खौफनाक और रहस्यमयी क्लाइमैक्स की तरफ बढ़ रही थी। सत्ता में लौटने के कुछ ही महीनों बाद, 22 सितम्बर 2016 को जयललिता को अचानक चेन्नई के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया।
कहा गया की उन्हें डिहाइड्रेशन और बुख़ार है।
फिर शुरू हुए अपोलो अस्पताल के वो रहस्यमयी 75 दिन! पूरे ढाई महीने तक जयललिता उस अस्पताल के एक बंद कमरे में रहीं। किसी को, यहाँ तक की बड़े-बड़े केंद्रीय मंत्रियों और राज्यपाल तक को उनसे मिलने की इज़ाज़त नहीं थी।
सिर्फ शशिकला और कुछ खास डॉक्टर्स ही अंदर जा सकते थे। पूरे अस्पताल को एक किले में तब्दील कर दिया गया था।
बाहर सड़कों पर हज़ारों-लाखों समर्थकों की भीड़ दिन-रात रोती रही, अपने खून से खत लिखती रही, दुआएं मांगती रही। लेकिन अंदर क्या चल रहा है, अम्मा ज़िंदा भी हैं या नहीं, यह सच किसी को नहीं बताया गया।
और फिर 5 दिसम्बर 2016 की वो मनहूस रात आई, जब अस्पताल ने आधिकारिक तौर पर घोषित कर दिया की जयललिता अब इस दुनिया में नहीं रहीं।
उस रात के साथ ही दक्षिण की राजनीति के एक पूरे युग का खामोश अंत हो गया। जिस औरत ने 30 सालों तक अपने दम पर एक विशाल राजनीतिक साम्राज्य खड़ा किया, जिसके एक इशारे पर सत्ता उठती और बैठती थी, वो अपने पीछे एक बहुत बड़ा सूनापन छोड़ गई।
जयललिता की सबसे बड़ी त्रासदी यही थी की उनका कोई अपना परिवार नहीं था, कोई वारिस नहीं था जिसे वो अपनी गद्दी सौंप सकतीं।
उनकी मौत के बाद उनकी ही वो पार्टी (AIADMK) जिसे उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था, वो गुटबाज़ी और लालच की भेंट चढ़कर बिखर गई।
भरी विधानसभा में बेइज़्ज़ती के आंसुओं से शुरू हुआ वो सफर, अपोलो अस्पताल के एक ठंडे और रहस्यमयी कमरे में हमेशा के लिए खामोश हो गया।
लेकिन आज भी, तमिलनाडु के किसी गरीब आदमी से पूछेंगे, तो वो यही कहेगा की नेता तो बहुत आएंगे और जाएंगे, लेकिन हमारी ‘अम्मा’ सिर्फ एक थी, और उनके जैसी आयरन लेडी इस देश की राजनीति में अब दोबारा कभी पैदा नहीं होगी।
वैसे तो भारतीय राजनीती में बहुत सारी महिलाएं आई हैं, लेकिन जो छाप जयललिता छोड़ कर गयी, उसकी बराबरी शायद ही कोई दूसरी महिला मंत्री कर पाए।
