हमारे देश की आज़ादी की लड़ाई का एक ऐसा पन्ना भी है, जो किसी मैदान पर नहीं, बल्कि अदालत के एक बंद कमरे में लड़ा गया था।
एक ऐसी कानूनी जंग, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के उस घमंड को चकनाचूर कर दिया था जिसमें वो कहते थे की उनके राज में सूरज कभी नहीं डूबता।
ये जंग एक ऐसे हीरो ने लिखी जो अपनी आखिरी सांसें गिनते हुए कोर्ट रूम में दहाड़ रहा था… जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के शेरों को सीधे फांसी के फंदे से खींच कर बाहर निकाल लिया था।
आज वक़्त आ गया है उस असली ‘कानूनी योद्धा’ का चिट्ठा खोलने का। वो योद्धा, जिसके तर्कों के आगे अंग्रेज जजों के भी पसीने छूट गए थे।
हम बात कर रहे हैं भारत के महान वकील, सच्चे देशभक्त और आज़ाद हिन्द फौज के तारणहार- भूलाभाई देसाई की।

बॉम्बे हाईकोर्ट का वो सबसे महंगा और धाकड़ वकील जिसने सुख-सुविधाएं छोड़कर पहन लिया था आज़ादी का चोला
भूलाभाई देसाई कोई ऐसा नाम नहीं था जिसे कोई जानता न हो। 1920 और 30 के दशक में अगर आप बॉम्बे हाईकोर्ट के गलियारों में चले जाते, तो वहां सिर्फ एक ही नाम की गूंज होती थी।
भूलाभाई उस दौर के सबसे महंगे, सबसे धाकड़ और सबसे तेज़-तर्रार बैरिस्टर थे। उनकी वकालत का रुतबा ऐसा था की अगर वो किसी केस में खड़े हो जाएं, तो सामने वाले वकील पहले ही आधी हार मान लेते थे।
वो चाहते तो अपनी पूरी ज़िंदगी उसी रेशमी गाउन में, अथाह पैसे और ऐशो-आराम के बीच गुज़ार सकते थे। अंग्रेजों के साथ बैठकर चाय पी सकते थे और उन्हें बड़े-बड़े पद यों ही मिल जाते।
लेकिन जिस इंसान के सीने में देशभक्ति की आग जल रही हो, उसे ये मखमली ज़िंदगी कहाँ रास आने वाली थी! भूलाभाई देसाई ने अपना वो शानदार करियर और सुख-सुविधाएं एक झटके में किनारे कर दीं।
वो पहले एनी बेसेंट की ‘होमरूल लीग’ से जुड़े और फिर महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) में कूद पड़े। इसके लिए उन्होंने जेल की हवा भी खाई।
कांग्रेस के अंदर भी उनका कद कोई छोटा-मोटा नहीं था। उनकी कानूनी समझ और कड़क अंदाज़ को देखते हुए उन्हें ‘सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली’ (यानी उस दौर की संसद) में भेजा गया।
वहां वो कांग्रेस के मुख्य नेता (Leader of the Opposition) बने। असेंबली के अंदर भूलाभाई देसाई का खौफ अंग्रेजों में इस कदर था की जब अंग्रेज कोई भी काला कानून या बिल पास कराने लाते, तो देसाई अपने तर्कों और कानूनी दांव-पेच से संसद के अंदर ही अंग्रेजों की बखिया उधेड़ देते थे।
उनके भाषण इतने सधे हुए और मारक होते थे की वायसराय के अधिकारी भी अंदर ही अंदर कांपते थे। वो सिर्फ सड़कों के नेता नहीं थे, वो दिमाग से लड़ी जाने वाली जंग के असली सेनापति थे।

लाल किले का वो खौफनाक ट्रायल जहाँ अंग्रेज़ लिखना चाहते थे नेताजी के शेरों की मौत की स्क्रिप्ट
अब आते हैं उस दौर पर जिसने भूलाभाई देसाई को इतिहास का सबसे बड़ा हीरो बना दिया। साल था 1945। दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था।
अंग्रेजों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आज़ाद हिन्द फौज’ (INA) के हज़ारों सैनिकों को अरेस्ट कर लिया था। इन सैनिकों ने देश की आज़ादी के लिए अंग्रेजों की सेना छोड़कर नेताजी का साथ दिया था और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हथियार उठा लिए थे।
अंग्रेजों का दिमाग भन्नाया हुआ था। वो हिंदुस्तानियों को एक ऐसा खौफनाक मैसेज देना चाहते थे ताकि आने वाले सौ सालों तक कोई बगावत की हिम्मत न करे।
और इसके लिए उन्होंने एक बहुत ही क्रूर और मनोवैज्ञानिक खेल खेला। उन्होंने मुकदमा चलाने के लिए कोई आम अदालत नहीं चुनी, बल्कि दिल्ली के ‘लाल किले’ को चुना।
लाल किला इसलिए, क्योंकि वो भारत की सत्ता का प्रतीक था। अंग्रेज दिखाना चाहते थे की देखो, तुम्हारी सत्ता के केंद्र में बैठकर हम तुम्हारे हीरोज़ को फांसी पर लटकाएंगे।
हज़ारों सैनिकों में से अंग्रेजों ने तीन सबसे बड़े अफसरों को इस ट्रायल (Red Fort Trials) के लिए चुना- मेजर जनरल शाहनवाज़ खान (एक मुस्लिम), कर्नल प्रेम सहगल (एक हिन्दू), और लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (एक सिख)।
इन तीनों को चुनने का मकसद भी यही था की पूरे भारत के हर मज़हब में ये खौफ बैठ जाए।
इन तीनों पर ‘ब्रिटिश सम्राट के खिलाफ युद्ध छेड़ने’ (यानी सीधे-सीधे देशद्रोह) और हत्या का मुकदमा ठोक दिया गया। मिलिट्री कोर्ट मार्शल लगा दिया गया।
अंग्रेजों की स्क्रिप्ट बिल्कुल तैयार थी। जज उनके, कानून उनका, गवाह उनके। सब कुछ पहले से तय था की ट्रायल के नाम पर बस एक नाटक होगा और आख़िर में इन तीनों शेरों को सरेआम फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा।
हिंदुस्तान का बच्चा-बच्चा जानता था की ये कोई मुजरिम नहीं हैं, ये हमारे आज़ादी के दीवाने हैं।
लेकिन अंग्रेजों के इस खौफनाक कानूनी मकड़जाल को तोड़ेगा कौन? कौन है वो जो लाल किले की उस कालकोठरी में जाकर ब्रिटिश हुकूमत की आंखों में आंखें डालकर कहेगा कि तुम गलत हो?
और यहीं पर एंट्री होती है भारत के उस सबसे बड़े कानूनी योद्धा की!
मौत के मुंह में खड़े होकर लड़ी गई वो कानूनी जंग जिसने आज़ाद हिन्द फौज को बागी नहीं बल्कि एक संप्रभु सेना साबित कर दिया
लाल किले में जब मौत की स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी, तब कांग्रेस ने देश के गुस्से को भांपते हुए एक ‘आईएनए डिफेन्स कमेटी’ (INA Defence Committee) बनाई।
मज़े की बात देखिए, इस कमेटी में पंडित जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। जो नेहरू 25 सालों से वकालत छोड़ चुके थे, वो अचानक अपना गाउन पहनकर एक दिन के लिए कोर्ट में पहुंच गए।
क्यों? क्योंकि कैमरे चमक रहे थे और अखबारों के पहले पन्ने पर तस्वीर छपवानी थी! लेकिन क्या किसी बंदे की ज़िंदगी महज़ फोटो खिंचवाने से बच जाती है? नहीं!
इस केस की पूरी की पूरी ज़िम्मेदारी, सारा कानूनी दारोमदार जिस शख्स के कंधों पर था, वो थे इस कमेटी के चीफ डिफेन्स काउंसेल- भूलाभाई देसाई।
अब ज़रा उस इंसान की हालत सोचिए। भूलाभाई उस वक्त बहुत गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें दिल की गंभीर बीमारी थी। उनके डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दी थी की वो बिस्तर से न उठें, वरना उनकी जान जा सकती है।
लेकिन जब बात नेताजी के उन शेरों की आई, जो देश के लिए फांसी चढ़ने को तैयार थे, तो भूलाभाई ने अपनी जान की परवाह नहीं की। वो बीमार शरीर के साथ लाल किले के उस कोर्ट रूम में जाकर खड़े हो गए।
और फिर वहां जो हुआ, वो इतिहास है! भूलाभाई ने कोर्ट में कोई दया या रहम की भीख नहीं मांगी। उन्होंने कहा ही नहीं की “माय लॉर्ड, इन्हें माफ़ कर दो।”
इसके बजाय, उन्होंने इंटरनेशनल लॉ (International Law – अंतरराष्ट्रीय कानून) का वो ब्रह्मास्त्र (Brahmastra) निकाला जिसके आगे अंग्रेज जजों के भी होश उड़ गए।
देसाई ने डंके की चोट पर कोर्ट में कहा-
“एक गुलाम देश को अपनी आज़ादी के लिए हथियार उठाने और युद्ध लड़ने का पूरा कानूनी अधिकार है! INA के ये सिपाही कोई बागी गुट नहीं हैं। ये ‘आज़ाद हिन्द’ नाम की एक स्वतंत्र सरकार (Provisional Government of Free India) की आधिकारिक सेना हैं। इस सरकार को दुनिया के 9 देशों ने मान्यता दी है और इसके पास अपना क्षेत्र (अंडमान-निकोबार) भी है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत, इन पर देशद्रोह का मुकदमा चल ही नहीं सकता। ये क्रिमिनल नहीं हैं, ये ‘प्रिज़नर्स ऑफ़ वॉर’ (POW – युद्ध बंदी) हैं!”
ये एक ऐसा कानूनी मास्टरस्ट्रोक था जिसने अंग्रेजों को निहत्था कर दिया। देसाई की इस 10 घंटे की मैराथन बहस ने पूरे देश में आग लगा दी।
सड़कों पर बगावत हो गई, यहां तक की ब्रिटिश नेवी (Royal Indian Navy) के भारतीय सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया।
आख़िरकार, ब्रिटिश हुकूमत को घुटनों पर आना पड़ा। उन्हें कोर्ट मार्शल की फांसी की सज़ा को रद्द करना पड़ा। एक बीमार वकील ने लाल किले के अंदर बिना हथियार उठाए, ब्रिटिश साम्राज्य की ताबूत में आख़िरी कील ठोक दी थी।
सियासी गतिरोध तोड़ने की कोशिश और लियाकत अली के साथ वो समझौता जिसमे हो गयी एक बड़ी चूक
अब आप सोचेंगे की जिस इंसान ने देश के लिए इतना बड़ा करिश्मा कर दिया, उसे तो आज़ाद भारत में हीरो की तरह पूजा जाना चाहिए था।
लेकिन यहाँ पर उन्होंने एक बहुत बड़ी गलती कर दी थी। इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे, 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) के दौर में चलना होगा।
जब 1942 में कांग्रेस के सारे शीर्ष नेता (गांधी जी, पटेल, नेहरू) जेल में डाल दिए गए, तो देश की राजनीति में एक अजीब सा ठहराव (Deadlock) आ गया।
कोई दिशा नहीं बची थी। भूलाभाई देसाई उस वक्त खराब सेहत की वजह से जेल से बाहर थे। देश के उस राजनीतिक सन्नाटे को तोड़ने और आज़ादी का कोई रास्ता निकालने के लिए, भूलाभाई ने एक पहल की।
उन्होंने मुस्लिम लीग के बड़े नेता लियाकत अली खान (जो बाद में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने) के साथ चुपचाप बातचीत शुरू की और एक गुप्त समझौता किया, जिसे इतिहास में ‘देसाई-लियाकत पैक्ट’ (Desai-Liaquat Pact – 1945) कहा जाता है।
अगर देखें, तो भूलाभाई की नीयत बिल्कुल साफ थी। वो किसी भी तरह अंग्रेजों को सत्ता छोड़ने पर मजबूर करके एक ‘अंतरिम सरकार’ (Interim Government) बनाना चाहते थे।
लेकिन उन्होंने इस सरकार के लिए जो फॉर्मूला दिया, वो राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ी चूक साबित हुई। फॉर्मूला यह था की केंद्र सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मंत्रियों की संख्या बिल्कुल बराबर (20-20 प्रतिशत) होगी।
दिक्कत यहीं हो गई। उस वक्त मुस्लिम लीग का जनाधार पूरे देश में बहुत कम था, जबकि कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी थी। इस पैक्ट ने मुस्लिम लीग को बिना कुछ किए ही कांग्रेस के बराबर लाकर खड़ा कर दिया।
इसने मुस्लिम लीग को एक ऐसी ताक़त दे दी, जिसकी वो हक़दार नहीं थी। जब कांग्रेस के बड़े नेता जेल से छूटकर बाहर आए, तो उन्होंने इस समझौते को सिरे से खारिज कर दिया।
कांग्रेस हाईकमान भड़क गया की उनके बिना पूछे इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया गया। बस, यही वो एक कदम था जिसने भूलाभाई देसाई को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की नज़रों से हमेशा के लिए उतार दिया।
