चुनाव सुधार के बहाने सत्ता पलटने का एजेंडा, कभी कश्मीर को पाकिस्तान को सौपने की मांग करने वाले ‘प्रशांत भूषण’ ने अब खुलेआम कर दिया ‘रिजीम चेंज’ का ऐलान

सच कहूं तो दिल्ली के कुछ खास कमरों में एक अजीब सा ‘सफेदपोश’ ईकोसिस्टम पलता है। इन बुद्धिजीवियों की सुबह की चाय तब तक हज़म ही नहीं होती, जब तक ये दो-चार बार “भारत में लोकतंत्र खतरे में है” का जाप न कर लें।

इनकी आदत बन चुकी है की जब देश की जनता इन्हें या इनके पसंदीदा नेताओं को वोट देकर सत्ता नहीं सौंपती, तो ये कभी बेचारी ईवीएम (EVM) पर ठीकरा फोड़ते हैं, तो कभी चुनाव आयोग को कोसने लगते हैं।

इतने समय से ये लोग ‘संविधान बचाने’ का एक बहुत ही शानदार चोगा पहनकर घूम रहे थे। बाहर से देखने पर लगता था की भई वाह, देश की कितनी चिंता है इन्हें!

लेकिन झूठ के पांव नहीं होते। चुनाव आयोग के विरोध के नाम पर जो ड्रामा रचा जा रहा था, उसमें इनका ये चोगा गलती से खिसक गया।

इस बार ये कड़वा सच किसी और ने नहीं, बल्कि खुद को न्याय और लोकतंत्र का सबसे बड़ा ठेकेदार बताने वाले वकील साहब यानी ‘प्रशांत भूषण’ ने उगला है।

भरे मंच से, कैमरों के सामने इन्होंने एक ऐसा बयान दे दिया है जिसने पूरी तरह से साबित कर दिया की इनका असली दर्द वोटर लिस्ट या चुनाव सुधार का था ही नहीं।

इनका असली गेम तो इस देश में अराजकता फैलाकर चुनी हुई सरकार को किसी भी तरह कुर्सी से उतारना, यानी ‘रिजीम चेंज’ (Regime Change) करना है।

चुनाव सुधार की आड़ में चल रहा था तख्तापलट का सीक्रेट गेम, प्रशांत भूषण के एक बयान ने फाड़ दिया कॉकरोचों का मुखौटा

हाल ही में दिल्ली के ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई गई। मंच पर कौन-कौन बैठा था? प्रशांत भूषण, AISA (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके।

यह प्रेस कॉन्फ्रेंस जंतर-मंतर को फिर से प्रदर्शन स्थल बनाने और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की मांग को लेकर बुलाई गई थी।

ये बाहर की दुनिया को तो ये दिखा रहे थे की भाई हम तो बस ‘वोटरों के अधिकार’ बचाने आए हैं, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल पूछ रहे हैं।

लेकिन इसी प्रेस कांफ्रेंस के बीच में बातों-बातों में प्रशांत भूषण के अंदर का असली एजेंडा बाहर छलक गया। जब माइक उनके हाथ में आया, तो बड़ी ठसक के साथ उन्होंने सरेआम कह दिया-

“हाँ, हम सब रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन) चाहते हैं! इसमें गलत क्या है? अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश में ज़रूर रिजीम चेंज होगा और हम इसे करवा कर रहेंगे।”

मतलब सोचो यार! आप चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट पर अपनी आपत्ति दर्ज़ करवाते-करवाते अचानक ‘सत्ता पलटने’ की बात पर कैसे आ गए?

दाल में कुछ काला नहीं है भाई, यहाँ तो पूरी दाल ही विदेशी टूलकिट के तड़के से बनी हुई है। इस एक बयान ने शीशे की तरह साफ कर दिया की पेट का दर्द न तो ईवीएम था और न ही वोटर लिस्ट।

असली दर्द ये है की 140 करोड़ की जनता जिस सरकार को चुनकर बिठाती है, उसे कुर्सी से कैसे उतारा जाए। जब आम जनता वोट नहीं दे रही, तो अब ये ‘रिजीम चेंज’ का नैरेटिव सेट करके देश के अंदर एक असंवैधानिक तख्तापलट की जुगाड़ में लग गए हैं।

बात वोटर लिस्ट से शुरू होकर बांग्लादेश मॉडल तक कैसे पहुंच गई, नेहा बोरा और विदेशी टूलकिट का ये खतरनाक कनेक्शन

अगर आपको लग रहा है की प्रशांत भूषण की बात गुस्से में निकल गई होगी, तो ज़रा रुकिए। उस मंच पर प्रशांत भूषण अकेले थोड़े ही थे। उनके ठीक बगल में बैठीं नेहा बोरा ने इस पूरी साज़िश की एक और खौफनाक परत खोलकर रख दी।

उसी प्रेस कांफ्रेंस में नेहा बोरा ने माइक संभाला और लगे हाथ ‘बांग्लादेश के जेन-ज़ी (Gen Z) आंदोलन’ की तारीफों के पुल बांध दिए। मोहतरमा ने बड़े फख्र से कहा की “बांग्लादेश के युवाओं ने हमें रास्ता दिखाया है, हमें उनसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।”

अब ज़रा रुककर ठंडे दिमाग से सोचिए की अभी कुछ महीने पहले बांग्लादेश में आखिर हुआ क्या था? क्या वहां कोई शांतिपूर्ण चुनाव हुआ था? क्या वहां की जनता ने ईवीएम का बटन दबाकर अपनी सरकार बदली थी?

बिल्कुल नहीं! वहां सड़कों पर खुलेआम आगजनी हुई, खून-खराबा हुआ, चुन-चुनकर अल्पसंख्यकों (हिन्दुओं) को मारा गया, फांसी पर लटकाया गया और एक चुनी हुई सरकार का हिंसक तख्तापलट किया गया।

तो सवाल ये उठता है की क्या प्रशांत भूषण और उनकी ये पूरी टीम भारत में भी उसी ‘हिंसक टूलकिट’ और दंगा मॉडल की उम्मीद कर रही है? क्या भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े और मज़बूत लोकतंत्र को अब बांग्लादेश के अराजक और खूनी मॉडल से रास्ता दिखाया जाएगा?

सच कहूं तो ये सिर्फ चुनाव आयोग का विरोध नहीं है, ये भारत की सड़कों पर भी वैसी ही आग लगाने की एक सोची-समझी स्क्रिप्ट है।

जब आप लोकतांत्रिक तरीके से चुनावी मैदान में नहीं जीत पाते, तो आप ऐसे ही विदेशी टूलकिट का सहारा लेकर ‘रिजीम चेंज’ का सपना देखने लगते हैं।

जो 2011 में भारत से कश्मीर तोड़ने की वकालत कर रहे थे वो आज दिल्ली में बैठकर सरकार पलटने का सपना देख रहे हैं

अगर आप प्रशांत भूषण और इस ईकोसिस्टम का इतिहास खंगालेंगे, तो आपको समझ आएगा की ये कोई पहली बार नहीं है जब इनके मुंह से ऐसे देश को अस्थिर करने वाले शब्द निकले हों।

चलिए आपको थोड़ा फ्लैशबैक में लेकर चलते हैं। बात अक्टूबर 2011 की है। वाराणसी में एक प्रेस कांफ्रेंस चल रही थी और माइक पर यही प्रशांत भूषण बैठे थे।

वहां बैठे-बैठे इन्होने खुलेआम कह दिया की-

“कश्मीर में जनमत संग्रह (Plebiscite/Referendum) होना चाहिए। वहां के लोगों को ये चुनने की आज़ादी होनी चाहिए की वो भारत के साथ रहना चाहते हैं या अलग होना चाहते हैं। अगर वो अलग होना चाहते हैं, तो उन्हें अलग कर देना चाहिए।”

मतलब समझ रहे हैं आप? एक भारतीय वकील, जो दिल्ली में बैठता है, वो सरेआम अलगाववादियों और पाकिस्तान की भाषा बोल रहा था की कश्मीरियों को भारत से अलग होने का ऑप्शन मिलना चाहिए।

इनके इस देश-विरोधी बयान के बाद पूरे देश का खून खौल उठा था।

और इसका नतीजा क्या हुआ? 12 अक्टूबर 2011 का वो दिन शायद ही कोई भूला होगा। ‘श्री राम सेना’ और ‘भगत सिंह क्रांति सेना’ के तीन युवा (इंदर वर्मा और उनके साथी) सीधे सुप्रीम कोर्ट के अंदर प्रशांत भूषण के चेंबर में घुस गए थे।

और फिर टीवी कैमरों के सामने इनकी जो जमकर कुटाई हुई थी, जो थप्पड़ और घूंसे चले थे, उसने पूरे देश को दिखा दिया था की भारत का युवा कश्मीर को तोड़ने की बात करने वालों के साथ कैसा सुलूक करता है।

अब यहाँ एक बहुत गहरा और तार्किक सवाल खड़ा होता है। ज़रा सोचिए, जिस इंसान की राजनीतिक सोच का दायरा भारत के मुकुट (कश्मीर) को देश से काटकर अलग करने के इर्द-गिर्द घूमता हो, वो इंसान आज दिल्ली के प्रेस क्लब में बैठकर भारत को ‘लोकतंत्र’ और ‘संविधान’ बचाने का ज्ञान दे रहा है!

जो 2011 में देश का एक हिस्सा तोड़ने की वकालत कर रहा था, वो आज 2026 में पूरे देश की सत्ता पलटने (रिजीम चेंज) का सपना देख रहा है। ऐसे लोगों के मुंह से जब ‘संविधान बचाने’ की बातें निकलती हैं, तो सच कहूं तो हंसी भी आती है और इनके पाखंड पर तरस भी।

सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल और सड़कों पर अराजकता, चुनाव आयोग को बदनाम करने के पीछे का असली वामपंथी प्रयोग

अब ज़रा इस सफेदपोश ईकोसिस्टम के काम करने का तरीका समझ लीजिए। ये लोग आखिर ये पूरा टूलकिट चलाते कैसे हैं? इनका एक सेट पैटर्न है।

सबसे पहले ये अपने पाले हुए NGO और संस्थाओं के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल (PIL) ठोकते हैं। जैसे अभी चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया (SIR) के खिलाफ किया।

इनका मकसद कोर्ट के अंदर बहस करके चुनाव आयोग को एक ‘तानाशाह’ (Despot) या बेईमान संस्था साबित करना होता है।

लेकिन जब कोर्ट से इन्हें फटकार पड़ती है और देश की 140 करोड़ जनता ईवीएम (EVM) का बटन दबाकर इनके मन-मुताबिक सरकार नहीं चुनती, तो इनका घमंड आहत हो जाता है।

ये ये मानने को तैयार ही नहीं होते की जनता ने इन्हें नकार दिया है। इसके बजाय, ये अंपायर (चुनाव आयोग) को ही बेईमान घोषित कर देते हैं।

कोर्ट से लेकर प्रेस क्लब तक माहौल बनाने के बाद, इनके टूलकिट का दूसरा और सबसे खतरनाक चरण शुरू होता है- सड़कों पर अराजकता फैलाना।

ये कॉलेजों के छात्रों और युवाओं को भड़काते हैं, उन्हें झूठे नैरेटिव पिलाते हैं की ‘तुम्हारा भविष्य खतरे में है’, और फिर उसी भीड़ का इस्तेमाल ‘रिजीम चेंज’ वाली आग लगाने के लिए करते हैं।

इनका पूरा वामपंथी प्रयोग इसी बात पर टिका है की अगर तुम बैलेट से नहीं जीत सकते, तो सड़कों पर इतना बवाल काटो की चुनी हुई सरकार को काम ही न करने दिया जाए।

संविधान बचाने का झंडा और नीयत में खोट, देश की जनता को अब इस ईकोसिस्टम की हर चाल से सावधान रहना होगा

अंत में बस इतना ही कहूंगा की प्रशांत भूषण के इस ‘रिजीम चेंज’ वाले ताज़ा बयान ने देश के सामने एक बात शीशे की तरह साफ कर दी है।

इनका ये विरोध किसी नीति, वोटर लिस्ट या चुनाव प्रक्रिया का नहीं है। इनका सीधा-सीधा विरोध इस देश की स्थिरता (Stability) और उस राष्ट्रवादी सोच से है जो आज भारत को दुनिया में एक मज़बूत देश बना रही है।

‘संविधान बचाने’ का झंडा तो बस एक दिखावा है, असल में इनकी नीयत में खोट है।

लेकिन शायद ये दिल्ली में बैठकर ये भूल गए हैं की भारत की जनता बहुत समझदार और परिपक्व है। वो जानती है की देश में सत्ता परिवर्तन विदेशी टूलकिट के डिज़ाइन से, यूट्यूब के फर्जी प्रोपेगैंडा से या प्रेस क्लब में बैठकर दिए गए बयानों से नहीं होता।

लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन 140 करोड़ हिन्दुस्तानियों के वोट से होता है।

जो लोग 2011 में भारत से कश्मीर को तोड़ने का सपना देख रहे थे, उनका वो सपना भी बुरी तरह टूट गया था। और आज जो ये ‘बांग्लादेश मॉडल’ की तारीफें करके दिल्ली की सत्ता पलटने का दिवास्वप्न (Daydream) देख रहे हैं, भारत की जागरूक जनता इनके इस मक़सद को भी कभी कामयाब नहीं होने देगी।

हमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा है, लेकिन इन ‘सफेदपोश’ तख्तापलट के ठेकेदारों पर बिल्कुल नहीं।

अब वक्त आ गया है की देश का हर नागरिक इन अर्बन-नक्सलों के इस ‘लोकतांत्रिक’ मुखौटे के पीछे छिपे अराजक चेहरे को पहचाने।

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