जिस बंगाल में कभी दुर्गा विसर्जन पर लगती थी रोक, आज वहीँ 3000 ढाकियों ने माँ शक्ति के आगमन पर बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड, शुभेंदु सरकार के आते ही अपनी सनातनी पहचान वापस पा रहा नया बंगाल

बंगाल में जब सर्दियां दस्तक देने वाली होती हैं ना, तो वहां की हवाओं में एक अलग ही जादू घुल जाता है। शरद ऋतु की वो हल्की-हल्की ठंड और दूर किसी रेडियो पर गूंजता बीरेंद्र कृष्ण भद्र का महालया पाठ…

सच कहूं तो ये माहौल ही ऐसा होता है की इंसान दुनिया भर की सारी टेंशन भूलकर बस माँ शक्ति की भक्ति में डूब जाना चाहता है।

लेकिन इस साल का जो नज़ारा है, वो पिछले कई दशकों से बिल्कुल अलग है। इस बार बंगाल की हवा में एक आज़ादी, एक बेखौफ सनातनी हुंकार और नए बंगाल के उदय की गूंज है।

कोलकाता के ईडन गार्डन्स से उठती नए बंगाल की वो गूंज जिसने पूरे देश को मंत्रमुग्ध कर दिया

ज़रा कोलकाता के उस ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स स्टेडियम की कल्पना कीजिए। बचपन से हमने इस मैदान को सिर्फ तब देखा है जब यहाँ भारत का कोई कड़क क्रिकेट मैच हो रहा हो या फिर किसी वर्ल्ड कप का फाइनल।

लेकिन आज इस स्टेडियम की तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां कोई चौके-छक्के नहीं लग रहे, बल्कि यहां सनातन संस्कृति और बंगाल की आत्मा का एक ऐसा महाकुंभ सजा है, जिसे देखकर हर सनातनी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

स्टेडियम के अंदर घुसते ही माँ दुर्गा की जो ऊर्जा महसूस हो रही थी, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वहां मौजूद हर इंसान की आंखों में एक चमक थी।

ये चमक थी अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने की। ये चमक थी उस ‘न्यू बंगाल’ की, जो अब तुष्टिकरण के अंधेरे कमरों से बाहर निकलकर डंके की चोट पर अपनी पहचान दुनिया के सामने रख रहा है।

पूरे मैदान को जिस भव्यता के साथ सजाया गया है, वो ऐसा लग रहा है मानो साक्षात स्वर्ग को ही ईडन गार्डन्स की ज़मीन पर उतार लाया गया हो।

वहां एक पूरे राज्य की आत्मा अपनी बेड़ियों को तोड़कर जश्न मना रही है।

वो भी क्या दिन थे जब कलेंडर देखकर तय होती थी विसर्जन की तारीखें, अब डंके की चोट पर हो रहा माँ शक्ति का सत्कार

ज़रा कुछ साल पीछे चलते हैं। भाई, वो भी क्या ‘अद्भुत’ दौर था ना! जब हमारे सिस्टम (TMC) में बैठे लोग दुर्गा पूजा से हफ्तों पहले कलेंडर और पंचांग लेकर बैठ जाया करते थे।

पूजा-पाठ के लिए नहीं, बल्कि ये चेक करने के लिए की कहीं माँ दुर्गा के विसर्जन के दिन कोई और ‘जुलूस’ तो नहीं निकल रहा!

याद है ना आपको? अगर विसर्जन और मुहर्रम की तारीख गलती से आस-पास भी आ जाती थी, तो हमारा वो तथाकथित ‘सेक्युलर’ सिस्टम तुरंत फरमान जारी कर देता था- “भई, विसर्जन को दो दिन के लिए होल्ड पर डाल दो, पहले उन्हें अपना जुलूस निकालने दो।”

मतलब, बहुसंख्यक हिंदू समाज अपने ही राज्य में, अपने ही सबसे बड़े त्योहार पर, अपनी ही माँ को विदा करने के लिए प्रशासन से भीख मांगता था।

वो सेक्युलरिज्म का ऐसा अफीम था, जिसने बंगाल की असली पहचान को ही बंधक बना लिया था।

लेकिन आज हालात देखिए। आज किसी को कलेंडर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ रही। आज सरकार खुद आगे बढ़कर, रेड कार्पेट बिछाकर ईडन गार्डन्स जैसे इंटरनेशनल मैदान में डंके की चोट पर माँ भवानी का स्वागत कर रही है।

आज सनातनियों को अपने त्योहार मनाने के लिए किसी से ‘परमिशन’ नहीं मांगनी पड़ रही। इसे कहते हैं तुष्टिकरण की बेड़ियों से असली आज़ादी!

वो जो कल तक हमारी आस्था पर ताले लगाते थे, आज वो साइड में खड़े होकर 3000 ढाकों की गूंज और आसमान में माँ दुर्गा का ड्रोन शो देखने को मजबूर हैं।

3000 ढाक की ऐसी गगनभेदी हुंकार जिसने गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सुनहरे अक्षरों से दर्ज करा दिया सनातन का नाम

दुर्गा पूजा का मतलब क्या होता है, ये आपको बंगाल के ‘ढाक’ (पारंपरिक ढोल) की आवाज़ ही समझा सकती है। ढाक पर जब थाप पड़ती है, तो वो सीधे आपके दिल की धड़कन से जाकर जुड़ती है।

अब ज़रा सोचिए, एक या दो ढाक नहीं… पूरे बंगाल के 23 अलग-अलग ज़िलों से चुनकर लाए गए पूरे 3000 ढाकी (ढाक बजाने वाले कलाकार) जब ईडन गार्डन्स के मैदान पर एक साथ खड़े हुए होंगे, तो कैसा नज़ारा होगा!

सफेद धोती और लाल गम्छा पहने ये 3000 कलाकार सिर्फ ढोल लेकर नहीं खड़े थे, ये अपने-अपने इलाके की पूरी विरासत अपने कंधों पर उठाकर लाए थे।

और फिर जैसे ही इशारा हुआ… 3000 ढाकों पर एक साथ थाप पड़ी! भाई साहब, यकीन मानिए, उस गूंज ने पूरे कोलकाता शहर को ऊर्जा से भर दिया।

वो आवाज़ इतनी रूहानी और इतनी गगनभेदी थी की स्टेडियम में बैठे हज़ारों लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। आंखों से बस खुशी के आंसू बहने ही बाकी थे।

इन 3000 ढाकियों ने एक-दूसरे से ताल से ताल मिलाकर पूरे 5 मिनट तक बिना रुके, बिना थके एक साथ ढाक बजाई। ये कोई मामूली परफॉरमेंस नहीं थी।

मंच पर बाकायदा गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guinness World Record) की टीम मौजूद थी, जो एक-एक सेकंड नोट कर रही थी।

और जैसे ही ये 5 मिनट पूरे हुए, बंगाल की धरती ने इतिहास रच दिया। गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अधिकारियों ने खुद मंच पर आकर इस अद्भुत और ऐतिहासिक क्षण का सर्टिफिकेट सौंपा।

ये वो आवाज़ थी जिसे सालों तक सियासी फायदों के लिए दबाकर रखा गया था, और आज वो आवाज़ दुनिया का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बनकर गूंज रही थी।

जब 3000 ड्रोन्स ने आसमान में उकेरी माँ दुर्गा की मूरत तो पूरा कोलकाता सराबोर हो गया भक्ति और आधुनिकता के संगम में

ज़मीन पर तो ढाक की थाप से जादू हो ही रहा था, लेकिन असली नज़ारा तो आसमान में होना बाकी था। ईडन गार्डन्स की लाइट्स जैसे ही डिम हुईं, रात के अंधेरे को चीरते हुए 3000 ड्रोन्स ने एक साथ उड़ान भरी।

अक्सर लोग कहते हैं ना की हमारी सनातनी संस्कृति बहुत पुरानी है और ये आज की मॉडर्न टेक्नोलॉजी के साथ मेल नहीं खाती। उन सब लोगों को ये नज़ारा देखना चाहिए था।

इन 3000 ड्रोन्स ने हवा में एक-दूसरे के साथ ऐसा कमाल का सिंक्रोनाइज़ेशन (तालमेल) दिखाया की आसमान में साक्षात माँ दुर्गा की 10 भुजाओं वाली विशाल और अलौकिक आकृति उभर आई!

हवा में तैरती हुई माँ भवानी की वो मूरत इतनी भव्य और जीवंत लग रही थी, मानो माँ सच में स्वर्ग से उतरकर पूरे नूतन बंगाल को अपना आशीर्वाद दे रही हों।

और जैसे ही आसमान में माँ की आकृति पूरी हुई, चारों तरफ से ऐसी गज़ब की आतिशबाजी (Fireworks) शुरू हुई जिसने पूरी रात को दीवाली की तरह रोशन कर दिया।

स्टेडियम में बैठा हर एक शख्स अपनी जगह पर खड़ा हो गया और हर तरफ से सिर्फ ‘जय माँ दुर्गा’ और ‘जय श्री राम’ के नारे गूंजने लगे।

वो पल इतना भावुक और इतना शक्तिशाली था की आप चाहे कितने भी कठोर क्यों न हों, वहां की ऊर्जा आपको अपने वश में कर ही लेती।

छऊ नृत्य से लेकर बाऊल संगीत तक बंगाल के 23 जिलों ने ईडन गार्डन्स के मैदान में उतार दिया अपना पूरा सांस्कृतिक गौरव

बंगाल की संस्कृति सिर्फ हावड़ा ब्रिज, पीली टैक्सी और रसगुल्ले तक सीमित नहीं है भाई! इस राज्य के चप्पे-चप्पे में कला और सादगी बसती है।

ईडन गार्डन्स का वो मैदान पूरे बंगाल का एक ‘मिनी-मैप’ बन गया है। इस भव्य आयोजन में सिर्फ कोलकाता के लोग नहीं, बल्कि राज्य के पूरे 23 जिलों से चुन-चुनकर कलाकारों को एक ही छत के नीचे लाया गया था।

एक तरफ पुरुलिया (Purulia) के कलाकार अपने विशाल और रंग-बिरंगे मुखौटे पहनकर ‘छऊ नृत्य’ (Chhau dance) की वो जादुई परफॉरमेंस दे रहे थे, जिसमें वीर रस और शिव-पार्वती की कथाएं झलक रही थीं।

तो वहीं दूसरी तरफ, बाऊल (Baul) गायकों के हाथों में बजते ‘एकतारे’ की मीठी गूंज पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना रही थी।

सफेद ज़मीन और लाल बॉर्डर वाली पारंपरिक ‘गरद’ साड़ियों में सजी बंगाली महिलाएं जब शंख बजाते हुए और उलूध्वनि (Uludhvani) करते हुए झूम रही थीं, तो ऐसा लग रहा था मानो साक्षात देवियां ही ज़मीन पर उतर आई हों।

ये 23 जिलों का वो एकजुट रूप था, जो दुनिया को बता रहा था की चाहे हम अलग-अलग जिलों में रहते हों, हमारी बोलियां थोड़ी अलग हों, लेकिन जब बात हमारी सनातनी विरासत और माँ दुर्गा की आती है, तो हम सब एक ‘नूतन बंगाल’ की अखंड आत्मा हैं।

शुभेंदु अधिकारी का सुशासन और अमित शाह की दूरदृष्टि, कैसे तुष्टिकरण के दलदल से निकलकर वापस अपनी जड़ों से जुड़ रहा बंगाल

ये जो इतना बड़ा बदलाव आया है, ये कोई रातों-रात हुआ चमत्कार नहीं है। इसके पीछे सालों की तपस्या, संघर्ष और एक बहुत ही गहरी चाणक्य नीति है।

इस भव्य आयोजन को देखकर अगर किसी एक शख्स को सबसे ज़्यादा धन्यवाद दिया जाना चाहिए, तो वो हैं देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह जी।

ये अमित शाह जी की ही वो दूरदृष्टि और लंबी रणनीतियां थीं, जिन्होंने बंगाल को उस राजनीतिक दलदल से बाहर निकाला जहाँ कटमनी, भ्रष्टाचार और हिन्दू-विरोध का कॉकटेल चल रहा था।

और अब जब बंगाल की कमान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के हाथों में आई है, तो उन्होंने साबित कर दिया है की एक सच्चा सनातनी शासक कैसा होता है।

सत्ता में आते ही उन्होंने अपना सबसे पहला फोकस इस बात पर रखा की बंगाल को उसकी वो खोई हुई ‘सांस्कृतिक पहचान’ वापस लौटाई जाए, जिसे वामपंथियों और टीएमसी के दौर में पूरी तरह से कुचल दिया गया था।

इस पूरे महालया और दुर्गा पूजा इवेंट में कहीं भी कोई फालतू की राजनीति नहीं थी। कोई भाषणबाज़ी नहीं थी। था तो सिर्फ अपनी जड़ों (Roots) से जुड़ाव।

शुभेंदु सरकार ने दिखा दिया की जब एक राष्ट्रवादी सरकार कुर्सी पर बैठती है, तो वो सिर्फ सड़कें या पुल नहीं बनाती, बल्कि वो एक पूरे समाज के स्वाभिमान को दोबारा खड़ा करती है।

सच कहूं तो, ईडन गार्डन्स में बना गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड और वो 3000 ड्रोन्स का जादुई शो तो बस एक शुरुआत है। ये सिर्फ एक ट्रेलर है उस पिक्चर का, जो अब बंगाल की धरती पर रिलीज़ हो चुकी है।

तुष्टिकरण के घने और काले बादलों को चीरकर ‘नूतन बंगाल’ का जो सूरज निकला है, उसकी चमक अब रुकने वाली नहीं है। आज बंगाल फिर से अपने उसी रूप में लौट रहा है, जिस रूप ने कभी आज़ादी की लड़ाई में पूरे देश को दिशा दिखाई थी।

वो बंगाल जो रवींद्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद के सपनों का बंगाल था।

माँ शक्ति का आशीर्वाद इस राज्य को मिल चुका है, और अब इस ‘नए बंगाल’ के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सफर को दुनिया की कोई भी ताकत नहीं रोक सकती!

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