ग्रामीण बंगाल में किया विकास लेकिन शहरों में लगे हड़तालों के ताले, दंगे रोकने वाला सख्त प्रशासन लेकिन हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार का दाग, दो-ध्रुवी विरासत वाले बंगाल के पूर्व CM ‘ज्योति बसु

भारतीय राजनीति में 5 साल सरकार चलाना किसी भी नेता के लिए लोहे के चने चबाने जैसा होता है। लेकिन ज़रा सोच कर देखिए, एक ऐसा नेता जिसने बिना किसी ब्रेक के लगातार 23 साल तक एक राज्य पर राज किया हो!

हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु की। साल 1977 से लेकर 2000 तक, बंगाल का मतलब ही ज्योति बसु हुआ करता था।

आज जब हम ज्योति बसु का नाम लेते हैं, तो लोग अक्सर दो खेमों में बंट जाते हैं। एक खेमा उन्हें गरीबों और किसानों का मसीहा मानता है, तो दूसरा खेमा उन्हें बंगाल की बर्बादी का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार ठहराता है।

लेकिन राजनीति में कोई भी इंसान सिर्फ ‘हीरो’ या ‘विलेन’ नहीं होता। आज हम ज़मीनी हकीकत के आधार पर ज्योति बसु की उस दो-ध्रुवी (Two-sided) विरासत का ऑपरेशन करेंगे, जिसने बंगाल को बनाया भी और बहुत कुछ बिगाड़ भी दिया।

23 साल का एकछत्र राज और लंदन से पढ़कर आए उस वामपंथी नेता की कहानी जिसने बंगाल का इतिहास बदला

वामपंथी राजनीति (Left Politics) का मतलब होता है- मज़दूरों, किसानों और सर्वहारा वर्ग की आवाज़। लेकिन इस आवाज़ का सबसे बड़ा चेहरा कौन बना?

एक ऐसा इंसान जो खुद एक बेहद रसूखदार और अमीर बंगाली परिवार में पैदा हुआ था।

ज्योति बसु का जन्म 8 जुलाई 1914 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता डॉ. निशिकांत बसु उस दौर के एक बहुत माने हुए और रईस डॉक्टर थे।

ज्योति बसु ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के सबसे एलीट स्कूलों में की और फिर वो बैरिस्टर (वकील) बनने के लिए लंदन चले गए।

लंदन की उन्हीं सड़कों पर इनकी मुलाकात कम्युनिस्ट विचारधारा से हुई। मिडिल टेम्पल में वकालत पढ़ने गए बसु वहां मशहूर वामपंथी विचारकों (जैसे हेरोल्ड लास्की) के लेक्चर सुनने लगे।

ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से उनका उठना-बैठना शुरू हो गया। वो भारत से टाई-सूट पहनकर एक रईस वकील बनने गए थे, लेकिन जब 1940 में देश वापस लौटे, तो उनके दिल और दिमाग पर ‘लाल झंडा’ पूरी तरह से छा चुका था।

भारत लौटकर उन्होंने सीधे ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ (CPI) की सदस्यता ले ली। पार्टी ने विलायत से लौटकर आए इस बैरिस्टर को काम क्या दिया?

उन्हें कहा गया की जाइए और रेलवे के कुलियों और मज़दूरों के बीच जाकर यूनियन बनाइए! बसु ने बिना किसी हिचकिचाहट के ज़मीन पर उतरकर ये काम किया।

उनकी मेहनत रंग लाई और 1946 में उन्होंने रेलवे मज़दूरों की सीट से ही अपना पहला चुनाव जीता और बंगाल की विधानसभा में कदम रखा।

आज़ादी के बाद उन्होंने ज़मीनी राजनीति शुरू की और धीरे-धीरे पूरे बंगाल में सीपीएम (CPIM) का सबसे बड़ा चेहरा बन गए। 1977 का वो साल था जब इमरजेंसी के बाद कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में भयंकर गुस्सा था।

इसी लहर में लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल की सत्ता उखाड़ फेंकी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। किसी को अंदाज़ा नहीं था की ये इंसान अगले 23 सालों तक राइटर्स बिल्डिंग (कोलकाता का सचिवालय) से नहीं हिलेगा। लेकिन उन्होंने ये करिश्मा कर दिखाया।

ज़मींदारों को कमजोर करके कैसे ‘ऑपरेशन बरगा’ और पंचायती राज ने ज्योति बसु को बना दिया गरीबों का मसीहा

अब बात करते हैं उनके उन फैसलों की, जिसकी वजह से आज भी बंगाल के गांवों में उनकी पूजा होती है। आज हम शायद अंदाज़ा न लगा पाएं, लेकिन 70 के दशक में बंगाल में ज़मींदारी प्रथा और सामंतवाद अपने चरम पर था।

हज़ारों एकड़ ज़मीन कुछ गिने-चुने रसूखदार ज़मींदारों के कब्ज़े में थी। जो गरीब किसान (बटाईदार या Sharecropper) पुश्तों से उन ज़मीनों पर खून-पसीना एक कर रहे थे, उनके पास ज़मीन का कोई कागज़ नहीं था।

ज़मींदार जब चाहता, उन्हें ज़मीन से लात मारकर निकाल देता था और फसल का ज़्यादातर हिस्सा खुद डकार जाता था।

सत्ता में आते ही ज्योति बसु ने अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला- ‘ऑपरेशन बरगा’ (Operation Barga)।

बसु सरकार ने गांव-गांव में सरकारी बाबू भेजे और रातों-रात लाखों गरीब बटाईदारों के नाम सरकारी रजिस्टर में दर्ज करवा दिए गए।

कानून बना दिया गया की अब ज़मींदार किसी भी किसान को उसकी ज़मीन से बेदखल नहीं कर सकता और फसल का एक तय हिस्सा किसान को ही मिलेगा।

भाईसाहब, इस एक फैसले ने बंगाल के लाखों गरीब परिवारों की ज़िंदगी बदल दी। ज़मींदारों की हेकड़ी निकल गई और गरीब को पहली बार ये एहसास हुआ की कोई सरकार उसके लिए भी खड़ी है।

इसके साथ ही उन्होंने एक और कमाल का काम किया- सत्ता का विकेंद्रीकरण यानी पंचायती राज (Panchayati Raj)। उस दौर में देश के ज़्यादातर राज्यों में सारा फंड और फैसले मुख्यमंत्री के दफ्तर से होते थे।

लेकिन ज्योति बसु ने पंचायतों को सीधे पैसा और पावर दे दी। गांव के फैसले गांव वाले खुद लेने लगे। इसका नतीजा क्या हुआ?

इसका नतीजा ये हुआ की बंगाल के गांव-गांव और गली-गली में लेफ्ट का ऐसा बेस (Cadre base) तैयार हो गया, जिसे उखाड़ने में विपक्ष को पूरे 34 साल लग गए। ग्रामीण बंगाल के लिए ज्योति बसु वाकई किसी मसीहा से कम नहीं थे।

‘चोलबे ना’ का नारा और हड़तालों का दौर जिसने एक समय के इंडस्ट्रियल हब बंगाल को बना दिया उद्योगों का कब्रिस्तान

अब सिक्के को पलटते हैं और चलते हैं उस डार्क साइड की तरफ, जिसके लिए ज्योति बसु को आज भी कोसा जाता है। गांव का किसान तो खुश था, लेकिन शहरों और फैक्ट्रियों में क्या हो रहा था?

एक समय था जब कलकत्ता पूरे हिंदुस्तान का इंडस्ट्रियल और मैन्युफैक्चरिंग कैपिटल हुआ करता था। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, जूट मिलें और कारखाने यहां 24 घंटे धड़कते थे।

लेकिन ज्योति बसु के राज में सीपीएम की ट्रेड यूनियन ‘सीटू’ (CITU) ने मज़दूरों के हक़ के नाम पर ऐसा तांडव मचाया की बंगाल की इकॉनमी की रीढ़ ही टूट गई।

फैक्ट्रियों में काम कम और राजनीति ज़्यादा होने लगी। हर दूसरे दिन बात-बात पर हड़ताल! फैक्ट्री मालिकों का घेराव करके उन्हें बंधक बना लेना तो जैसे एक नॉर्मल सी बात हो गई थी।

हर नुक्कड़ पर लाल झंडा लिए लोग खड़े होते थे और हवा में गूंजता था एक ही नारा- “एई चोलबे ना, चोलबे ना” (यह नहीं चलेगा, नहीं चलेगा)। अगर मालिक ने बोनस नहीं बढ़ाया, तो चोलबे ना! अगर लंच का टाइम कम लगा, तो चोलबे ना!

मज़दूरों के अधिकार मांगना गलत नहीं है, लेकिन इन्होंने इसे गुंडागर्दी में बदल दिया। इसका भयानक नतीजा ये निकला की टाटा, बिड़ला, और डनलप (Dunlop) जैसे देश-विदेश के बड़े कॉर्पोरेट घराने घबरा गए।

उन्होंने रातों-रात अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और बंगाल छोड़कर गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की तरफ भाग गए। देखते ही देखते जो बंगाल पूरे देश को रोज़गार देता था, वहां की फैक्ट्रियों के गेट पर बड़े-बड़े ताले लटक गए।

लाखों मज़दूर हमेशा के लिए सड़क पर आ गए।

सच कहूं तो वामपंथियों ने मज़दूरों का हक़ मांगते-मांगते उन मज़दूरों की नौकरी ही खत्म कर दी।

और सबसे बड़ी विडंबना देखिए, जिस मुख्यमंत्री ने कभी खुद इन हड़तालों को भड़काया था, वही ज्योति बसु अपने आखिरी सालों में विदेशी निवेशकों के सामने हाथ जोड़ते नज़र आए की “प्लीज़ बंगाल में वापस आ जाओ!”

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

जब 1984 और 1992 में पूरा देश दंगों की आग में जल रहा था तब ज्योति बसु का सख्त प्रशासन बना था ढाल

एक प्रशासक (Administrator) के तौर पर ज्योति बसु की एक ऐसी खूबी थी जिसकी तारीफ उनके धुर विरोधी भी करते हैं। वो था उनका साम्प्रदायिक सौहार्द (Communal Harmony) पर ज़ीरो टॉलरेंस वाला रवैया।

इतिहास के पन्ने पलटिए और 1984 के उस खौफनाक दौर में चलिए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। उस वक्त दिल्ली, कानपुर और देश के कई हिस्सों में सिखों का सरेआम कत्लेआम हो रहा था। हर तरफ खून-खराबा था।

लेकिन उस पूरे खौफनाक माहौल में पश्चिम बंगाल (खासकर कोलकाता) एकदम शांत था। क्यों? क्योंकि ज्योति बसु ने अपनी पुलिस को एकदम ‘फ्री हैंड’ (खुली छूट) दे दिया था।

उन्होंने साफ आदेश दिया था की अगर कोई भी दंगाई सड़क पर हिंसा करता दिखे, तो उसे बख्शा न जाए। उन्होंने खुद सड़कों पर उतरकर मोर्चा संभाला और बंगाल में एक भी सिख नागरिक को खरोंच तक नहीं आने दी।

यही नज़ारा 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद भी देखने को मिला। जब पूरा देश साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था और पड़ोसी राज्यों में लाशें गिर रही थीं, तब भी ज्योति बसु ने बंगाल में दंगाइयों को पनपने का कोई मौका नहीं दिया।

प्रशासन पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी की मजाल है कोई धर्म के नाम पर सड़क पर उतर कर बवाल काट दे। दंगे रोकना और बंगाल के सामाजिक ताने-बाने को बचाए रखना, उनकी वो विरासत है जिसके लिए उन्हें हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा।

मरीचझांपी का वो खौफनाक पन्ना जहाँ वामपंथी सरकार के आदेश पर हुआ था दलित हिन्दू शरणार्थियों का दर्दनाक नरसंहार

लेकिन यार, सत्ता का नशा बहुत अजीब होता है। जो सरकार एक तरफ दंगों से लोगों को बचा रही थी, उसी सरकार के दामन पर एक ऐसा खौफनाक दाग लगा है जिसे दशकों तक वामपंथी इतिहासकारों ने छिपा कर रखा।

यह घटना है 1979 की, जिसे इतिहास में ‘मरीचझांपी नरसंहार’ (Marichjhapi Massacre) के नाम से जाना जाता है।

कहानी कुछ यूं है की 1971 के युद्ध और उसके बाद बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) में दलित हिन्दुओं (विशेषकर नमोशूद्र समाज) पर भयंकर धार्मिक अत्याचार हो रहे थे।

अपनी जान, धर्म और औरतों की इज़्ज़त बचाने के लिए हज़ारों हिन्दू शरणार्थी भागकर भारत आए। पहले उन्हें मध्य प्रदेश के दंडकारण्य जैसे बंजर इलाकों में भेजा गया।

सत्ता में आने से पहले यही कम्युनिस्ट नेता उन शरणार्थियों के पास जाकर कहते थे की “जब हमारी सरकार आएगी, तो हम तुम्हें बंगाल में बसाएंगे।”

लेकिन 1977 में कुर्सी मिलते ही ज्योति बसु और उनकी पार्टी के सुर बदल गए। जब इन हज़ारों हिन्दू शरणार्थियों ने बंगाल के सुंदरबन इलाके के ‘मरीचझांपी द्वीप’ पर अपना डेरा जमाया, तो बसु सरकार ने उन्हें घुसपैठिया घोषित कर दिया!

आदेश दिया गया की इन्हें तुरंत यहाँ से खदेड़ो। जब शरणार्थियों ने जाने से मना किया, तो वामपंथी सरकार ने जो किया वो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म से डूब मरने वाली बात थी।

पुलिस ने पूरे मरीचझांपी द्वीप की नाकेबंदी कर दी। उन गरीब शरणार्थियों का राशन, पीने का पानी और दवाइयां सब रोक दी गईं। लोगों ने भूख से तड़पना शुरू कर दिया।

और फिर 31 जनवरी 1979 को पुलिस ने निहत्थे शरणार्थियों पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। सरकारी आंकड़े तो हमेशा की तरह कुछ मौतों की ही गवाही देते हैं, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट्स और चश्मदीदों के रोंगटे खड़े करने वाले बयान बताते हैं की पुलिस फायरिंग, भुखमरी और बीमारियों से सैकड़ों (कुछ के अनुसार हज़ारों) हिन्दू शरणार्थी मारे गए थे।

उनकी लाशों को रातों-रात नदियों में बहा दिया गया। मज़दूरों और गरीबों की आवाज़ बनने का दावा करने वाली सरकार ने अपने ही गरीब हिन्दू शरणार्थियों का जो खून बहाया, वो ज्योति बसु के राज का सबसे काला और कभी न धुलने वाला दाग है।

प्राइमरी स्कूलों से अंग्रेजी हटाने का वो तुगलकी फैसला जिसने बंगाल की एक युवा पीढ़ी का भविष्य बर्बाद किया

अब बात करते हैं उस ‘पॉलिसी ब्लंडर’ की जिसने बंगाल के युवाओं को शिक्षा में पीछे धकेला। वामपंथियों को हमेशा से ये लगता था की ‘अंग्रेजी’ (English) तो साम्राज्यवाद और अमीरों की भाषा है।

1980 के दशक की शुरुआत में ज्योति बसु सरकार ने ‘बंगाली अस्मिता’ और मातृभाषा को बढ़ावा देने के नाम पर एक ऐसा तुगलकी फरमान जारी किया, जिसने एक पूरी पीढ़ी को कुएं का मेंढक बना दिया।

सरकार ने आदेश दिया की राज्य के सभी सरकारी प्राइमरी स्कूलों में अंग्रेजी की पढ़ाई पर पूरी तरह बैन लगा दिया जाए। बच्चों को सिर्फ बंगाली में पढ़ाया जाएगा। सुनने में शायद ये बात मातृभाषा के प्रेम जैसी लगे, लेकिन इसका ज़मीनी असर खौफनाक था।

ज़रा टाइमिंग देखिए! 1990 के दशक में भारत में कंप्यूटर और आईटी (IT) सेक्टर का बूम आ रहा था। कॉर्पोरेट दुनिया के दरवाज़े खुल रहे थे।

ऐसे समय में जब दक्षिण भारत के युवा अपनी अच्छी अंग्रेजी और तकनीकी शिक्षा के दम पर आईटी कंपनियों में धड़ाधड़ नौकरियां ले रहे थे, तब बंगाल का युवा पीछे छूट गया।

चूंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज़्यादातर बच्चे गरीब या मिडिल क्लास घरों से आते थे, उनका बेस ही इतना कमज़ोर हो चुका था की वो कॉर्पोरेट इंटरव्यू क्रैक ही नहीं कर पाए।

और इस पूरे फैसले का सबसे कड़वा सच और पाखंड जानते हैं क्या था? जिन वामपंथी नेताओं ने गरीब बच्चों के स्कूलों से अंग्रेजी हटाई थी, उन खुद के नेता-मंत्रियों के बच्चे महंगे प्राइवेट कॉन्वेंट इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ रहे थे!

कुछ तो विदेशों में जाकर डिग्रियां ले रहे थे। मतलब, नेताओं के बच्चों के लिए अंग्रेजी ‘तरक्की की सीढ़ी’ थी और आम जनता के बच्चों के लिए ‘साम्राज्यवाद की निशानी’।

पुलिस थानों से लेकर स्कूलों तक पार्टी का कब्ज़ा और वो कैडर राज जिसने बंगाल में बोए राजनीतिक हिंसा के बीज

अगर आप आज के बंगाल की राजनीति को देखकर हैरान होते हैं की वहां इतनी राजनीतिक हिंसा और मारकाट क्यों होती है, तो इसका जवाब आपको ज्योति बसु के उसी 23 साल के शासनकाल में मिलेगा।

वामपंथियों ने बंगाल में एक ऐसा सिस्टम खड़ा कर दिया था जिसे ‘पार्टी-सोसाइटी’ (Party-Society) कहा जाता है। मतलब, सरकार और पार्टी के बीच की लाइन ही पूरी तरह से मिटा दी गई थी। सरकार ही सीपीएम (CPM) थी और सीपीएम ही सरकार बन चुकी थी।

ज़रा उस दौर की ग्राउंड रियलिटी को समझिए। अगर गांव या मोहल्ले में दो लोगों के बीच ज़मीन या किसी बात पर झगड़ा हो जाए, तो लोग पुलिस थाने नहीं जाते थे, वो सीधे ‘लोकल पार्टी ऑफिस’ जाते थे।

पुलिस की हिम्मत नहीं होती थी की बिना लोकल पार्टी दादा (नेता) की हरी झंडी के किसी पर एफआईआर लिख ले।

नौकरियों का हाल तो और भी बुरा था। अगर आपको प्राइमरी स्कूल का टीचर बनना है, क्लर्क बनना है, या यहां तक की किसी यूनिवर्सिटी का VC भी बनना है, तो आपकी काबिलियत से ज़्यादा इस बात की अहमियत होती थी कि आपके पास सीपीएम का ‘पार्टी कार्ड’ है या नहीं।

हर स्कूल, कॉलेज, पंचायत और सरकारी दफ्तर में पार्टी का कैडर बिठा दिया गया था। हर सरकारी योजना, राशन कार्ड और यहां तक की बैंक लोन पास कराने के लिए भी पार्टी दफ्तर का ठप्पा ज़रूरी हो गया था। पार्टी ही माई-बाप बन गई थी।

और इस पूरे कैडर राज का सबसे खौफनाक पहलू था- विपक्ष का पूरी तरह से सफाया। लोकतंत्र में विपक्ष का होना ज़रूरी है, लेकिन ज्योति बसु के राज में सीपीएम के कैडर ने विपक्षी दलों (उस समय कांग्रेस और बाद में ममता बनर्जी की टीएमसी) के कार्यकर्ताओं पर ऐसा कहर बरपाया जिसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है।

सरेआम सड़कों पर राजनीतिक हत्याएं, बूथ कैप्चरिंग और विरोधियों को डरा-धमका कर गांव से निकाल देना बंगाल की राजनीति का एक नॉर्मल हिस्सा बन गया।

ममता राज में बंगाल जिस ‘सिंडिकेट राज’ और खूनी चुनावी हिंसा के दलदल में फंसा था, उसके बीज ज्योति बसु के उसी कैडर राज में बोए गए थे और उन्हें सरकारी खाद-पानी देकर बड़ा किया गया था।

साल 2000 आते-आते ज्योति बासु की सेहत बिगड़ने लगी थी। उन्होंने खुद अपनी मर्ज़ी से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और कुर्सी बुद्धदेव भट्टाचार्य को सौंप दी।

साल 2010 में 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

आखिर कैसे याद रखेगा इतिहास?

सच कहूं तो उनकी विरासत एक सिक्के के उन दो पहलुओं की तरह है, जो एक-दूसरे से बिल्कुल उलट हैं।

एक तरफ वो ज्योति बसु हैं जो गरीबों, बटाईदारों और किसानों के मसीहा थे। जिन्होंने ऑपरेशन बरगा से लाखों चेहरों पर मुस्कान ला दी, जिन्होंने बंगाल में एक भी सिख पर आंच नहीं आने दी और 23 साल तक राज्य को एक स्थिर सरकार दी।

लेकिन ठीक दूसरी तरफ वो ज्योति बसु भी खड़े हैं, जिनके राज में एक फलते-फूलते बंगाल के कारखानों में जंग लग गया।

वो शासक जिसके राज में मरीचझांपी के तटों पर हिन्दू शरणार्थियों का खून बहा और जिसने बंगाल की ज़मीन पर राजनीतिक हिंसा का ऐसा खौफनाक स्ट्रक्चर खड़ा किया जो आज तक लोगों की जान ले रहा है।

ज्योति बसु अपने आप में एक पूरा युग थे.. एक ऐसा युग जिसमें रौशनी भी बहुत थी, और अँधेरा भी बहुत गहरा था।

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