सड़कों पर सत्ता परिवर्तन का माहौल बनाकर ‘Vietnam’ की ‘सीक्रेट ट्रिप’ पर निकले राहुल गांधी, क्या भारत में अस्थिरता फ़ैलाने के लिए विदेश में लिखी जा रही कोई नई स्क्रिप्ट

दुनिया के इतिहास में जब भी किसी ‘क्रांति’ की बात होती है ना, तो ज़हन में अक्सर ऐसी तस्वीर बनती है की नेता महीनों तक सड़कों पर सोएंगे, पसीना बहाएंगे, लाठियां खाएंगे और जेल जाएंगे।

लेकिन हमारे भारत की सियासत का अपना एक अलग ही स्वैग है! यहाँ का विपक्ष शायद दुनिया का इकलौता ऐसा विपक्ष है, जो पूरे देश में ‘लोकतंत्र खतरे में है’ का भयंकर सायरन बजाता है, सड़कों पर अस्थिरता का माहौल बनाता है..

और फिर क्रांति की थकान मिटाने के लिए चुपचाप बैग पैक करके विदेश की फ्लाइट पकड़ लेता है।

पिछले कुछ हफ्तों से देश में ऐसा माहौल सेट किया जा रहा था मानो आसमान बस गिरने ही वाला है। मीडिया से लेकर सड़कों तक एक ऐसा नैरेटिव बनाया गया की देश में सब कुछ तबाह हो चुका है, चुनाव आयोग बिक चुका है और अब बस एक ही रास्ता बचा है- सत्ता परिवर्तन!

लेकिन कल यानी रविवार, 18 अक्टूबर 2026 की दोपहर को देश में आग लगाने वाले बयान देने के बाद, ‘क्रांति’ के सबसे बड़े झंडाबरदार राहुल गांधी जी दिल्ली के आईजीआई (IGI) एयरपोर्ट पहुंचते हैं और बेहद खामोशी से वियतनाम (हनोई) का बोर्डिंग पास कटवा लेते हैं।

इसे कहते हैं एकदम प्रीमियम लेवल की ‘हिट एंड रन’ सियासत।

वोट चोरी का रोना और चुनाव आयोग पर हल्ला, जब हार का डर सताए तो रेफरी को ही कटघरे में खड़ा कर दो

जब आपको लगता है की आप मैच नहीं जीत पाएंगे, तो सबसे आसान तरीका क्या होता है? रेफरी पर ही बेईमानी का आरोप लगा दो!

राहुल गांधी ने बिल्कुल यही किया। वियतनाम की फ्लाइट पकड़ने से ठीक पहले, 18 अक्टूबर को ही गोवा की ‘गोंय राखण यात्रा’ (Gõy Rakhonn Yatra) की मार्गाओ रैली में राहुल ने खुलेआम माइक से ऐलान कर दिया की “मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार वोट चोरी लागू करते हैं, अमित शाह उसे ऑपरेट करते हैं और मोदी जी पीछे से प्लानिंग करते हैं।”

मतलब बिना किसी सुबूत के सीधे देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्थाओं को चोर घोषित कर दिया गया।

इनका कॉन्फिडेंस तो देखिए, इंडी गठबंधन के नेता चुनाव आयोग के खिलाफ माहौल बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के परिसर तक पहुँच गए।

वहां जाकर भीड़ जुटाने की कोशिश की गई, मानो कोर्ट कोई जंतर-मंतर हो! लेकिन यहाँ इनका दांव उल्टा पड़ गया। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की बेंच ने इस ड्रामे पर कड़ा ऐतराज़ जताया।

सुप्रीम कोर्ट ने सीधे राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव और महुआ मोइत्रा को नोटिस थमाते हुए साफ कह दिया की “आप न्यायपालिका को डरा-धमका नहीं सकते।”

कमाल की बात तो ये है की जब यही चुनाव आयोग केरल, तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में चुनाव करवाता है और कांग्रेस वहां जीत जाती है..

तब ईवीएम (EVM) भी एकदम फर्स्ट क्लास काम करती है और चुनाव आयुक्त भी एकदम निष्पक्ष होते हैं।

लेकिन जैसे ही बात दिल्ली की आती है, या लोकसभा चुनाव की आती है, तो रातों-रात चुनाव आयोग ‘चोर’ और ‘बिकाऊ’ कैसे हो जाता है?

चुनाव सुधार का तो बस बहाना है असली मकसद तो बांग्लादेश की तर्ज पर ‘सत्ता परिवर्तन’ की आग भड़काना है

कहानी सिर्फ चुनाव आयोग के विरोध तक सीमित नहीं है भाई। चुनाव सुधार तो महज़ एक मुखौटा था, असली एजेंडा तो कुछ और ही चल रहा था।

इन विरोध प्रदर्शनों में अचानक एक बहुत ही खतरनाक शब्द की एंट्री होती है- ‘रिजीम चेंज’ (Regime Change यानी सत्ता परिवर्तन)।

लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन चुनावों के ज़रिए होता है, बैलेट बॉक्स से होता है। लेकिन यहाँ प्रशांत भूषण जैसे सुप्रीम कोर्ट के लिबरल वकीलों ने खुलेआम इस धरने-प्रदर्शन को ‘रिजीम चेंज’ की लड़ाई घोषित कर दिया।

हद तो तब पार हो गई जब ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेताओं ने भारत की तुलना सीधे बांग्लादेश से करनी शुरू कर दी। इन्होने खुलेआम रैलियों में ‘बांग्लादेश के युवाओं’ (Gen Z movement) का उदाहरण देना शुरू कर दिया।

ज़रा सोचिए, इसके पीछे की मानसिकता कितनी ज़हरीली है! इनका सीधा-सीधा इशारा ये था की जिस तरह से बांग्लादेश में सड़कों पर आगज़नी करके, दंगे भड़का कर और चुनी हुई सरकार को हथियारों के दम पर उखाड़ फेंका गया, ठीक वैसा ही मॉडल भारत में भी लागू किया जाए।

जब चुनाव आयोग और ईवीएम पर जनता भरोसा नहीं छोड़ेगी, तो क्या ये लोग सड़कों पर खून बहाकर सरकार बदलेंगे?

बीजेपी ने इस खतरनाक साज़िश को तुरंत भांप लिया। बीजेपी की तरफ से स्मृति ईरानी और सीआर केसवन (CR Kesavan) ने साफ कहा की कांग्रेस और उनके ये लिबरल साथी अच्छी तरह जानते हैं की वो 2029 का लोकसभा चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से नहीं जीत सकते।

इसलिए वो अब बैकडोर से, अलोकतांत्रिक तरीके से देश में दंगे भड़काकर सरकार गिराने का ख्वाब देख रहे हैं।

जब पी. चिदंबरम और पवन खेड़ा जैसे सीनियर कांग्रेसी नेताओं से इस ‘रिजीम चेंज’ वाले बयान पर सवाल पूछा गया, तो वो भी डैमेज कंट्रोल करते हुए इस खतरनाक शब्द को सही ठहराने की कोशिश करते नज़र आए।

मतलब स्क्रिप्ट पूरी तरह से तैयार थी। सड़कों पर आग लगाने का पूरा बंदोबस्त कर लिया गया था। देश के युवाओं को भड़काने का पूरा नैरेटिव सेट हो चुका था।

और जब आग लगाने की पूरी तैयारी हो गई… तो माचिस की तीली फेंक कर हमारे क्रांतिवीर नेताजी अचानक हनोई की ठंडी हवा खाने निकल गए!

गोवा में ‘लोकतंत्र बचाने’ की कसमें और दोपहर में सीधे हनोई की फ्लाइट, कार्यकर्ताओं को सड़क पर छोड़कर छुट्टियां मनाने निकले नेताजी

यार, टाइमिंग की जितनी गज़ब समझ इस पार्टी के आलाकमान को है ना, उतनी शायद दुनिया के किसी भी राजनीतिक विश्लेषक को नहीं होगी।

ज़रा इस ‘क्रांति’ की टाइमलाइन देखिए! 18 अक्टूबर (रविवार) को सुबह-सुबह राहुल गांधी जी गोवा में ‘गोंय राखण यात्रा’ में व्यस्त थे। 2 किलोमीटर पैदल चलकर पसीना बहाया जा रहा था।

मंच से माइक पर दहाड़ते हुए मोदी और शाह को जेल भेजने की भयंकर कसमें खाई जा रही थीं। माहौल एकदम टाइट किया जा रहा था की बस, देश में आज ही लोकतंत्र की वापसी होने वाली है।

लेकिन फिर क्या हुआ? दोपहर होते-होते सारा क्रांतिकारी जोश अचानक हवा हो गया। और उसी रविवार को दोपहर 1:35 बजे दिल्ली से सीधे वियतनाम की उड़ान भर ली गई!

ज़रा उन कॉकरोचों के बारे में सोचिए जो इस ‘रिजीम चेंज’ के झांसे में आकर सड़क पर उतरे थे। ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ (CJP) के वो युवा कार्यकर्ता, जैसे सौरभ दास और आशुतोष रांका, दिल्ली की सड़कों पर पुलिस के डंडे खा रहे हैं।

बेचारों को पकड़-पकड़ कर पुलिस थानों में पीस बॉन्ड (Peace bond) भरवा रही है। वो मुगालते में थे की उनके ‘सुप्रीम लीडर’ उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे।

लेकिन यहाँ तो नेताजी हनोई की ठंडी हवाओं का मज़ा लेने निकल गए।

जब कांग्रेस पार्टी से पूछा गया की भाई, देश में इतनी आग लगी है और आपके नेता अचानक विदेश यात्रा पर क्यों निकल गए? तो उन्होंने घिसा-पिटा जवाब दे दिया -“ये उनका प्राइवेट ट्रिप है।”

वियतनाम की इस सीक्रेट ट्रिप का असली राज़ क्या है, क्या पर्दे के पीछे विदेशी टूलकिट और जॉर्ज सोरोस से जुड़ रहे हैं तार

अब ये ‘प्राइवेट ट्रिप’ वाला झुनझुना पब्लिक को पकड़ाना इतना आसान नहीं है। बीजेपी ने भी इस अजीबोगरीब टाइमिंग पर ऐसा तंज कसा की पूरी कांग्रेस बगलें झांकने लगी।

बीजेपी के प्रवक्ता प्रदीप भंडारी और सुधांशु त्रिवेदी ने सीधा निशाना साधते हुए कहा की राहुल गांधी जी ‘लीडर ऑफ अपोजिशन’ (विपक्ष के नेता) कम और ‘लीडर ऑफ पार्टीइंग एंड टूरिज़्म’ (Leader of Partying) ज़्यादा लग रहे हैं।

लेकिन अगर थोड़ा गहराई में जाएं, तो ये मामला सिर्फ छुट्टियों का नहीं लगता। सोचने वाली बात ये है की जब भी देश के अंदर कोई बहुत बड़ा राजनीतिक भूचाल आता है, या कोई नया नैरेटिव (जैसे रिजीम चेंज) सेट किया जाता है, तो राहुल जी अचानक विदेश क्यों निकल जाते हैं?

वियतनाम ही क्यों? इस ट्रिप को इतना सीक्रेट और लो-प्रोफाइल (Low-profile) क्यों रखा गया है की पार्टी के बड़े नेताओं तक को भनक नहीं थी?

क्या हनोई के किसी बंद कमरे में जॉर्ज सोरोस (George Soros) की फंडिंग वाले एनजीओ और भारत-विरोधी ‘डीप स्टेट’ (Deep State) के आकाओं के साथ कोई नई स्क्रिप्ट लिखी जा रही है?

यह सवाल उठना इसलिए लाज़मी है क्योंकि जब देश में सड़कों पर आग लगाने की साज़िश सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर फेल हो गई, तो अक्सर ऐसे नेता विदेश जाकर नई ‘टूलकिट’ तैयार करवा कर लाते हैं।

शायद बांग्लादेश वाला फॉर्मूला भारत में फिट नहीं बैठा, तो अब वियतनाम की धरती से कोई नया फॉर्मूला इम्पोर्ट करने की तैयारी चल रही है!

पार्ट-टाइम सियासत और फुल-टाइम छुट्टियां, ‘हिट एंड रन’ की इस राजनीति से 2029 का ख्वाब कैसे पूरा करेगी कांग्रेस

सच कहूं तो, अगर 2029 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को हराने की यही ‘मास्टर स्ट्रैटेजी’ है, तो फिर तो बीजेपी वालों को प्रचार करने की ज़रूरत ही नहीं है!

आप सड़कों पर ‘संविधान खतरे में है’ का शोर मचाते हो, देश की सबसे भरोसेमंद संस्थाओं (न्यायपालिका और चुनाव आयोग) को सरेआम कटघरे में खड़ा करते हो, और फिर जब उस माहौल को लीड करने की बारी आती है, तो आप वेकेशन पर निकल जाते हो।

इसे कहते हैं ‘हिट एंड रन’ (Hit and Run) की पॉलिटिक्स- आग लगाओ और भाग जाओ!

क्रांति कभी वीकेंड की छुट्टियों पर नहीं जाती दोस्त। चुनाव आयोग की सीढ़ियों पर तमाशा करने से वोट नहीं मिलते।

लेकिन जब नेताजी का फोकस 2029 के चुनाव से ज़्यादा अपनी सीक्रेट विदेश यात्राओं पर हो, तो आम कार्यकर्ताओं के हिस्से में सिर्फ पुलिस की लाठियां और हताशा ही आती है।

देश की जनता इस पार्ट-टाइम सियासत को बहुत गौर से देख रही है। और यकीन मानिए, जब भी चुनाव होंगे, तो इस ‘टूरिज़्म वाली राजनीति’ का असली जवाब वो उसी EVM पर बटन दबाकर देगी, जिसे ये लोग आज गरिया रहे हैं।

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