जब भी 1962 के भारत-चीन युद्ध का ज़िक्र आता है ना, तो अक्सर लोग मायूस हो जाते हैं। दिल्ली में बैठे नेताओं की उस वक़्त की गलतियों, खराब नीतियों और हार की ही चर्चा ज़्यादा होती है।
लेकिन सच कहूँ तो, ये उस युद्ध का सिर्फ एक अधूरा पहलू है। युद्ध कभी भी सिर्फ हथियारों या दिल्ली में बनी रणनीतियों से नहीं लड़े जाते। युद्ध लड़े जाते हैं उस फौलादी जिगर से, जो सरहद पर बर्फ के बीच खड़े एक फौजी के सीने में धड़कता है।
नेफा (NEFA – आज का अरुणाचल प्रदेश) की उन जमा देने वाली बर्फीली चोटियों पर जब सारी सरकारी नीतियां और बड़े-बड़े प्लान फेल हो चुके थे, तब पंजाब के एक साधारण से गांव से निकले एक भारत माँ के सपूत ने इतिहास रचा था।
हार-जीत तो बहुत दूर की बात है भाई, हमारे इन मुट्ठी भर जवानों ने चीनियों को वो खौफनाक मौत दी थी जिसे उनका मुल्क आज तक नहीं भूल पाया है।
आज उसी शूरवीर की बात करेंगे- ‘परमवीर चक्र’ विजेता सूबेदार जोगिंदर सिंह। जिनकी बहादुरी के किस्से सुनकर खुद चीनी फौज भी नतमस्तक हो जाती है।

मोगा की मिट्टी का शेर जिसने अंग्रेजों से लेकर पाकिस्तान तक हर मोर्चे पर मनवाया था अपनी बहादुरी का लोहा
सूबेदार जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 को पंजाब के मोगा जिले के ‘महला कलां’ नाम के एक छोटे से गांव में हुआ था।
किसानी करने वाले परिवार का ये लड़का बचपन से ही मिट्टी से जुड़ा था और सीने में फौजी बनने की और देश के लिए कुछ कर गुज़रने की आग लिए हुए था।
बस इसी आग ने उन्हें 28 सितंबर 1936 को ब्रिटिश इंडियन आर्मी की ‘सिख रेजिमेंट’ की पहली बटालियन (1 Sikh) तक पहुंचा दिया।
ज़रा उनके तजुर्बे का लेवल तो देखिए! 1962 के युद्ध से बहुत पहले ही वो दूसरे विश्व युद्ध (World War II) में बर्मा के मोर्चे पर अंग्रेजों की तरफ से लड़ चुके थे।
इसके बाद जब 1947-48 में हमारा देश आज़ाद हुआ और पाकिस्तानियों ने कबाइलियों का भेष धरकर कश्मीर पर छुपकर हमला कर दिया था, तब भी ये जोगिंदर सिंह ही थे जिन्होंने अपनी रेजिमेंट के साथ मिलकर श्रीनगर को बचाने में दुश्मनों के ऐसे छक्के छुड़ाए थे की वो अपनी चप्पलें छोड़कर भाग खड़े हुए थे।
बूम ला पास की वो जमा देने वाली ठंड और 30 सिखों के सामने खड़ी हजारों की चीनी फौज
अब आते हैं उस खौफनाक मंज़र पर। अक्टूबर 1962 का महीना था। अरुणाचल प्रदेश (तब का NEFA) के तवांग सेक्टर में 16,000 फीट की ऊंचाई पर ‘बूम ला पास’ (Bum La Pass) के नज़दीक ‘ट्विन पीक्स’ (Twin Peaks) नाम की एक पहाड़ी थी।
यहीं पर सूबेदार जोगिंदर सिंह की ड्यूटी लगी थी।
अगर आप वहां की भौगोलिक स्थिति (Terrain) को समझेंगे, तो आप सुन्न हो जायेंगे। खून को जमा देने वाली माइनस डिग्री की कंपा देने वाली ठंड।
और हमारे जवानों के पास उस वक़्त क्या था? सिस्टम की नाकामी देखिए की ना तो हमारे शेरों के पास बर्फ में पहनने वाले ढंग के स्नो-बूट्स थे, ना भयंकर ठंड रोकने वाले कपड़े और ना ही कोई ऑटोमैटिक आधुनिक हथियार।
हमारे जवान उन पुरानी .303 ली-एनफील्ड (Lee-Enfield) राइफलों के भरोसे खड़े थे, जिनमें हर फायर के बाद हाथ से बोल्ट खींचकर गोली लोड करनी पड़ती है।
लेकिन सामने का नज़ारा इससे भी ज्यादा डरावना था। चीन की ‘पीपल्स लिबरेशन आर्मी’ (PLA) पूरी तरह से आधुनिक ऑटोमैटिक हथियारों, मशीनगनों और भारी मोर्टार से लैस होकर चींटियों के झुंड की तरह पहाड़ पर आगे बढ़ रही थी।
चीनियों ने पूरी प्लानिंग कर रखी थी और वो हजारों की संख्या में थे। और इधर… सूबेदार जोगिंदर सिंह की 11वीं प्लाटून (11th Platoon) में उनके साथ कुल मिलाकर सिर्फ 29-30 सिख जवान थे। जी हां, सिर्फ 30!
ये मुकाबला था 30 बनाम हजारों का। वायरलेस पर संपर्क टूट चुका था और पीछे से कोई कुमुक (मदद) आने की उम्मीद न के बराबर थी।
किसी भी आम इंसान का दिल इस सिचुएशन में काम करना बंद कर देता या वो पीछे हटने का फैसला ले लेता। लेकिन वो मोगा की मिट्टी का सरदार था यार।
उसने अपने बचे-खुचे 30 जवानों को देखा, उनके अंदर जोश भरा और तय कर लिया की चीनी फौज इस पोस्ट से तभी आगे बढ़ेगी, जब इन सिखों के शरीरों में खून की आखिरी बूंद सूख जाएगी।
उन्होंने अपनी पुरानी राइफलें तानीं और दुश्मनों का इंतज़ार करने लगे।

जांघ को चीरती हुई निकली दुश्मन की गोली, पर उस सरदार ने खून से लथपथ होकर भी पोस्ट छोड़ने से कर दिया इंकार
तारीख थी 23 अक्टूबर 1962 और सुबह के करीब 5:30 बज रहे थे। ट्विन पीक्स की उस बर्फीली पहाड़ी पर भयंकर सन्नाटा पसरा था, जिसे अचानक चीनियों के भारी आर्टिलरी फायर ने चीर कर रख दिया।
चीनी फौज ने अपनी पहली चाल चली और करीब 200 सैनिकों की एक पूरी खेप ने भारतीय पोस्ट पर धावा बोल दिया।
सूबेदार जोगिंदर सिंह एकदम शांत थे। उन्होंने अपने जवानों को सही पोज़ीशन लेने का इशारा किया और दुश्मन को नज़दीक आने दिया।
जैसे ही चीनी सैनिक उनके फायर ज़ोन में घुसे, जोगिंदर सिंह ने दहाड़ते हुए फायर का आर्डर दे दिया। 30 सिखों की पुरानी राइफलों से जो आग निकली, उसने कुछ ही मिनटों में उन 200 चीनियों के चीथड़े उड़ा दिए।
चीनियों की लाशें बर्फ पर बिछ गईं और जो बचे, वो उल्टे पांव जान बचाकर नीचे भाग खड़े हुए। चीनियों का पहला और सबसे खौफनाक हमला पूरी तरह से फेल हो चुका था!
लेकिन चीनियों के पास जवानों की कोई कमी नहीं थी। कुछ ही देर बाद उन्होंने खुद को संभाला और 200 ताज़ा सैनिकों की एक नई खेप के साथ फिर से पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी।
इस बार चीनी भारी मोर्टार और मशीनगनों का अंधाधुंध फायर करते हुए आ रहे थे। ये दूसरी लड़ाई इतनी भयंकर थी की आसमान बारूद के धुएं से काला पड़ गया।
इसी अंधाधुंध गोलाबारी के बीच, दुश्मन की एक मशीनगन से निकली गोली सूबेदार जोगिंदर सिंह की जांघ को चीरती हुई निकल गई। खून की धार फूट पड़ी और सफेद बर्फ लाल होने लगी।
उनके प्लाटून के कई जवान अब तक वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। जो बचे थे, उन्होंने सूबेदार साहब से कहा की आप बुरी तरह ज़ख्मी हैं, आपको पीछे हटकर मेडिकल हेल्प लेनी चाहिए।
लेकिन भाई, वो मोगा की मिट्टी का शेर था! पीछे हटना तो उसने सीखा ही नहीं था। उस सरदार ने अपना घाव देखा, दर्द को पी गया और अपने ही हाथों से अपनी जांघ पर एक पट्टी (Tourniquet) कसकर बांध ली ताकि खून बहना रुक जाए।
वो उठे, एक लाइट मशीन गन (LMG) उठाई और दर्द से कराहने के बजाय खुद दुश्मनों पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी।
उनकी इस फौलादी हिम्मत को देखकर बचे हुए जवानों के अंदर भी 100 शेरों की ताकत आ गई। उन्होंने मिलकर चीनियों के इस दूसरे हमले को भी रोक दिया और उन्हें वापस खदेड़ दिया।
जब गोलियां खत्म हुईं तो संगीनों से लिखा गया शौर्य का इतिहास और गूंजा जो बोले सो निहाल का जयकारा
दो बड़े हमलों में मुंह की खाने के बाद चीनी कमांडरों का दिमाग खराब हो गया था। बौखलाए हुए चीनियों ने अब अपना आखिरी और सबसे बड़ा दांव चला। उन्होंने तीसरी बार अपनी पूरी ताकत झोंक दी और एक और विशाल खेप के साथ फाइनल हमला कर दिया।
अब यहाँ से कहानी वो मोड़ लेती है, जो किसी भी फौजी के लिए सबसे बड़ा दुस्वप्न होता है। सूबेदार जोगिंदर सिंह और उनके बचे हुए जवानों के पास अब फायरिंग के लिए एक भी गोली नहीं बची थी।
गोला-बारूद पूरी तरह खत्म हो चुका था। मौत सामने खड़ी दांत दिखा रही थी।
किसी भी आम सेना में ऐसी स्थिति होने पर कमांडर सफेद झंडा लहराकर सरेंडर (आत्मसमर्पण) कर देता है। लेकिन ये ‘सिख रेजिमेंट’ थी, और लीडर थे जोगिंदर सिंह!
उन्होंने अपनी खाली बंदूक को देखा, और एक ऐसा फैसला लिया जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। उन्होंने आदेश दिया- “राइफलों के आगे संगीन (Bayonet/चाकू) लगा लो!”
सूबेदार जोगिंदर सिंह ने अपने पूरी ताकत से वो जयकारा लगाया जिसने तवांग की घाटियों को हिला कर रख दिया- “जो बोले सो निहाल… सत श्री अकाल!”
जयकारे की गूंज के साथ ही वो सरदार अपने बचे हुए शेरों के साथ सीधे चीनियों की उस भारी भीड़ में घुस गया। शुरू हो गया वो खौफनाक ‘हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट’ (हाथापाई की जंग)।
सूबेदार जोगिंदर सिंह ने अकेले ही अपनी संगीन से दर्जनों चीनी सैनिकों को काट डाला। चीनियों के पसीने छूट गए। उनके हाथों में मशीनगनें थीं, लेकिन सामने वाले की आंखों में खौफ देखकर वो भी कांप गए थे।
चीन की सेना भी नतमस्तक होकर भारत के इस शूरवीर की अस्थियों को पूरे सैन्य सम्मान के साथ लौटाने पर हो गई मजबूर
लड़ते-लड़ते सूबेदार जोगिंदर सिंह का शरीर पूरी तरह से छलनी हो चुका था। खून बहुत ज़्यादा बह जाने के कारण वो आखिरकार बेहोश होकर बर्फ पर गिर पड़े।
चीनियों ने उन्हें और उनके कुछ घायल जवानों को युद्धबंदी (POW) बना लिया।
चीनी जेल में सूबेदार साहब को कोई मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दिया गया। जांघ के घाव और जमा देने वाली ठंड के कारण उनके पैरों में गैंग्रीन (Gangrene) फैल गया।
लेकिन उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाया और अंततः चीनी कैद में ही देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
अब ज़रा उस शूरवीर के रुतबे का अंदाज़ा लगाइए। जिन चीनियों को उन्होंने काटा था, वो खुद उनकी इस अदम्य बहादुरी और फौलादी इरादे को देखकर हैरान थे।
सैन्य इतिहास में ऐसा बहुत कम होता है की कोई दुश्मन सेना आपके किसी सैनिक को इतना सम्मान दे। 17 मई 1963 को, चीनी सेना (PLA) ने पूरी दुनिया के सामने नतमस्तक होते हुए सूबेदार जोगिंदर सिंह की अस्थियों (Ashes) को पूरे सैन्य सम्मान (Military Honours) के साथ भारत को लौटाया।
दुश्मन को भी सलाम ठोकने पर मजबूर कर दिया था उस मोगा के शेर ने!
भारत सरकार ने उनके इस अद्वितीय नेतृत्व, कभी न हार मानने वाले जज़्बे और देश के लिए जान न्योछावर कर देने वाले अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत भारतीय सेना के सबसे बड़े और सर्वोच्च सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से नवाज़ा।
