विषय-सूची
- चुनाव आयोग को बदनाम करने वाला 13 करोड़ वोटरों का वो सफेद झूठ
- लोकतंत्र के रक्षकों पर वार करने के लिए Indian Express ने गढ़ा फर्जी नैरेटिव
- कांग्रेस की 81 लाख की वो सीक्रेट डील और महेश जेठमलानी का खुलासा
- सुपारी जर्नलिज़्म या चुनावी फंडिंग
- रामनाथ गोयनका अवार्ड्स से लेकर Express Adda तक
- राजा खुद दरबार में बैठ जाए तो प्रजा क्या सोचेगी
- PM मोदी का मज़ाक उड़ाने वाला ‘द टेलीग्राफ’ अखबार
- सुबह अख़बार के पन्नों पर विचारधारा का चीरहरण
- दस साल की सत्ता के बाद भी विरोधी मीडिया से ‘गुड बॉय’ का सर्टिफिकेट…
- जनता ने दिया पूर्ण बहुमत, लेकिन बौद्धिक वैलिडेशन के लिए…
- जो कार्यकर्ता रात-दिन पार्टी का बचाव कर रहा है…
- चुनाव दुश्मन को गले लगाकर नहीं बल्कि अपने ज़मीनी दोस्तों की फ़ौज…
सियासत का एक बहुत पुराना और कड़वा उसूल है की कोई भी पार्टी सिर्फ अपने नेताओं के चेहरे पर नहीं, बल्कि अपने उस आम समर्थक के पसीने पर चुनाव जीतती है जो ज़मीन पर दरी बिछाता है।
ज़रा उस आम कार्यकर्ता की साइकोलॉजी को समझने की कोशिश कीजिए। एक आम समर्थक या आईटी सेल का युवा 40-45 डिग्री की चिलचिलाती धूप में पार्टी का झंडा लेकर खड़ा होता है।
वो सोशल मीडिया पर दिन-रात उस वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम से भिड़ता है, जो उसकी पार्टी, उसकी सरकार और उसकी विचारधारा को दिन-रात गालियां देता है।
वो अपने ही दोस्तों और रिश्तेदारों से बहस मोल ले लेता है, सिर्फ इसलिए ताकि अपनी पार्टी के फैसलों को डिफेंड कर सके।
लेकिन ज़रा सोचिए, उस बेचारे समर्थक के दिल पर क्या गुज़रती होगी जब वो शाम को थक-हार कर टीवी खोलता है और देखता है की जिन अख़बारों और पत्रकारों से वो दिन भर सोशल मीडिया पर भिड़कर आ रहा है..
पार्टी के बड़े-बड़े मंत्री और खुद सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता उन्हीं पत्रकारों के साथ किसी फाइव-स्टार इवेंट में मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं!
ये कोई कल्पना नहीं है भाई, ये आज की बीजेपी का सबसे कड़वा सच है। एक तरफ पार्टी का पूरा कैडर उस इकोसिस्टम की धज्जियां उड़ाने में लगा है जो भारत के लोकतंत्र और संस्थाओं को बदनाम कर रहा है, और दूसरी तरफ बीजेपी की टॉप लीडरशिप उसी इकोसिस्टम के कार्यक्रमों- जैसे ‘रामनाथ गोयनका अवार्ड्स’ और ‘एक्सप्रेस अड्डा’- में अतिथि बनकर अपनी शोभा बढ़ा रही है।
जब कोई सत्ता अपने ही सबसे वफादार सिपाहियों को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ मान ले और विरोधियों को सर-आँखों पर बिठाने लगे, तो समझ लीजिए की हार की नींव वहीं से पड़नी शुरू हो जाती है।
| मुद्दा / विवाद | कड़वा सच और सत्ता का ‘सेल्फ-गोल’ |
|---|---|
| 13 करोड़ वोटरों का झूठ | ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने चुनाव आयोग को बदनाम करने के लिए 13 करोड़ वोटर कटने की भ्रामक खबर छापी। |
| 81 लाख की ‘डील’ | महेश जेठमलानी का खुलासा कि बंगाल चुनाव में कांग्रेस ने इसी अखबार को 81 लाख रुपये दिए थे। |
| BJP की ‘वैलिडेशन’ की बीमारी | जो अखबार देश में अराजकता फैलाता है, उसी के इवेंट्स में जाते हैं बीजेपी के दिग्गज |

1. चुनाव आयोग को बदनाम करने वाला 13 करोड़ वोटरों का वो सफेद झूठ
‘The Indian Express’ अखबार ने कैसे देश में फैलाई अराजकता
अब बात करते हैं एकदम ठोस तथ्यों की। ये पूरा बवाल आख़िर शुरू कहाँ से हुआ और उस अख़बार ने ऐसा क्या छापा की पूरा देश हिल गया?
बात अभी हाल ही की है, सितंबर 2023 (या 2024) की। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ (Indian Express) ने देश के चुनाव आयोग (ECI) के खिलाफ एक बहुत बड़ी और कथित “इन्वेस्टिगेटिव सीरीज़” छापने का दावा किया।
इस अख़बार ने अपने पन्नों पर ऐसा तिलिस्म रचा की पढ़ने वाले को लगे जैसे भारत में लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है। रिपोर्ट में एक भयंकर फर्जी और भ्रामक दावा किया गया की ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (SIR) के नाम पर चुनाव आयोग ने देश भर में 13 करोड़ वोटरों के नाम ही वोटर लिस्ट से उड़ा दिए हैं।
मतलब 13 करोड़ लोग रातों-रात गायब कर दिए गए! ज़रा इस नंबर की गंभीरता को समझिए। 13 करोड़ की आबादी तो दुनिया के कई बड़े देशों की भी नहीं होती। और ये नैरेटिव ऐसे सेट किया गया मानों ये सारे नाम किसी एक विशेष राजनीतिक दल को फायदा पहुँचाने के लिए काटे गए हों।
चुनाव आयोग को तुरंत सामने आकर इस पूरी रिपोर्ट को सिरे से खारिज करना पड़ा।
चुनाव आयोग ने बाकायदा आंकड़े देकर बताया की ये रिपोर्ट पूरी तरह से भ्रामक है और वोटर लिस्ट का अपडेशन एक नियमित और पारदर्शी प्रक्रिया है जिसमें मृतक या डुप्लीकेट वोटरों के नाम हटाए जाते हैं और नए जोड़े जाते हैं।
ओपइंडिया (OpIndia) से लेकर कई स्वतंत्र विश्लेषकों ने इस अख़बार के चिथड़े उड़ाते हुए इसे “फर्जी और चुनाव प्रक्रिया में अविश्वास फैलाने वाला” बताया।
लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। एक्सप्रेस का मक़सद ख़बर देना नहीं था भाई, उनका मक़सद था देश में एक ऐसी ‘अराजकता’ फैलाना जिससे आम जनता के मन में पूरी चुनाव प्रक्रिया को लेकर ही शक पैदा हो जाए।
2. लोकतंत्र के रक्षकों पर वार करने के लिए Indian Express ने गढ़ा फर्जी नैरेटिव
ज्ञानेश कुमार और बाकी दो चुनाव आयुक्तों के बीच अनबन की मनगढ़ंत कहानी

झूठ सिर्फ 13 करोड़ वोटरों तक सीमित नहीं था। एक अख़बार जब अपनी साख को ताक पर रखकर एजेंडा चलाने पर उतर आता है, तो वो किसी भी हद तक जा सकता है।
एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर फूट डालने और उसे एक कमज़ोर संस्था साबित करने की भी पूरी स्क्रिप्ट लिखी।
रिपोर्ट में बकायदा दावा किया गया की मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और बाकी दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) के बीच भयंकर अनबन चल रही है। कहानी गढ़ी गई की पिछले 10 महीनों में संधू और जोशी ने ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर 14 बार आपत्तियां (Objections) जताई थीं!
इसे ऐसे पेश किया गया जैसे चुनाव आयोग के अंदर कोई गृहयुद्ध चल रहा हो और मुख्य चुनाव आयुक्त एक तानाशाह की तरह काम कर रहे हों।
सच्चाई क्या थी? सच्चाई ये थी की चुनाव आयोग ने इन सभी दावों को बकवास करार दिया और ऑन रिकॉर्ड बताया की आयोग के सारे बड़े फैसले सर्वसम्मति (Unanimously) से लिए गए थे। ये महज़ एक अंदरूनी विचार-विमर्श की प्रक्रिया थी जिसे अख़बार ने ‘विद्रोह’ का नाम दे दिया।
लेकिन सवाल ये है की ये झूठ गढ़ा क्यों गया? सच कहूँ तो, ये विपक्ष के हाथों में एक ‘हथियार’ पकड़ाने की साज़िश थी। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर और इसकी कटिंग हाथ में लेकर विपक्षी पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क तक जमकर बवाल काटा।
उन्होंने कहना शुरू कर दिया की “देखिए! अख़बार कह रहा है कि आयोग बिका हुआ है, लोकतंत्र खतरे में है!” एक फर्जी रिपोर्ट ने पूरे देश के सियासी माहौल में ज़हर घोल दिया।
अब ज़रा उस क्रोनोलॉजी को समझिए जो एक तटस्थ विश्लेषक को सोचने पर मजबूर करती है। जो अख़बार खुलेआम भारत की चुनावी संस्था को दागदार करने का खेल खेल रहा है, जिसने 13 करोड़ वोटरों का ऐसा तिलिस्म खड़ा किया की देश में दंगे जैसी स्थिति बन जाए…
उसी अख़बार के दरबार में अगर देश की सत्ताधारी पार्टी के नेता मेहमान बनकर जाएंगे, तो इसे क्या कहा जाएगा?
| ‘इंडियन एक्सप्रेस’ का फर्जी दावा | चुनाव आयोग (ECI) द्वारा सामने लाया गया सच |
|---|---|
| 13 करोड़ वोटरों के नाम रातों-रात लिस्ट से काट दिए गए। | आंकड़ा फर्जी है। यह महज़ रूटीन वोटर लिस्ट अपडेशन था जिसमें मृतक नाम हटाए गए। |
| चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों में भयंकर फूट है। | कोई फूट नहीं। चुनाव आयोग के सभी बड़े फैसले ‘सर्वसम्मति’ (Unanimously) से हुए। |
| CEC ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर 14 बार आपत्तियां जताई गईं। | यह सिर्फ ‘आंतरिक विचार-विमर्श’ था, जिसे अखबार ने जानबूझकर ‘विद्रोह’ बता दिया। |
| देश की पूरी चुनाव प्रक्रिया शक के घेरे में है। | यह विपक्ष को सुप्रीम कोर्ट में हंगामा करने का मौका देने वाला एक तैयार ‘टूलकिट’ था। |
3. कांग्रेस की 81 लाख की वो सीक्रेट डील और महेश जेठमलानी का खुलासा
इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता को कर दिया बेनकाब

जब आप पत्रकारिता के लबादे में छिपे सियासी एजेंडे को डिकोड करते हैं, तो अक्सर तहखाने से ऐसी चीज़ें निकलती हैं जो गंभीर सवाल खड़े कर देती हैं।
13 करोड़ वोटरों के कटने वाली वो फर्जी खबर महज़ एक अख़बार की गलती या किसी रिपोर्टर की ‘ओवर-इमेजिनेशन’ का नतीजा नहीं थी।
राजनीति और पत्रकारिता के इस नेक्सस (Nexus) का सबसे सनसनीखेज सच तब बाहर आया, जब सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ वकील और बीजेपी से ही जुड़े नेता महेश जेठमलानी ने एक ऐसा बम फोड़ा जिसने पूरी लुटियंस दिल्ली में हड़कंप मचा दिया।
अभी हाल ही की बात है, जेठमलानी जी ने Twitter (X) पर बाकायदा कागज़ात और दस्तावेज़ शेयर करते हुए एक भयंकर दावा किया।
उन्होंने डंके की चोट पर बताया की पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को लगभग 81.45 लाख रुपये की मोटी पेमेंट की थी।
जी हां, 81 लाख रुपये! अब कोई भी अकलमंद इंसान ये पूछ सकता है की भाई, एक राजनीतिक दल किसी अख़बार को चुनाव के बीचों-बीच इतनी भारी भरकम रकम क्यों दे रहा है?
क्या ये महज़ विज्ञापनों का पैसा था, या फिर इसके पीछे वो ‘इकोसिस्टम’ काम कर रहा था जिसका इकलौता मक़सद चुनाव आयोग (ECI) जैसी संवैधानिक संस्थाओं की साख पर बट्टा लगाना है?
ज़रा क्रोनोलॉजी को समझिए यार। एक तरफ अख़बार को कांग्रेस पार्टी से लाखों रुपये की फंडिंग मिलती है, और दूसरी तरफ वही अख़बार ठीक उसी वक़्त देश के चुनाव आयोग के खिलाफ ’13 करोड़ वोटरों’ की फर्जी रिपोर्ट छापकर एक ऐसा नैरेटिव खड़ा कर देता है जो सीधे-सीधे विपक्ष को फायदा पहुंचाता है।
| महेश जेठमलानी का खुलासा | तीखे सवाल |
|---|---|
| बंगाल चुनाव और 81 लाख का पेमेंट | क्या यह इत्तेफाक है कि 81 लाख लेने वाला अखबार ही चुनाव आयोग पर फर्जी सीरीज़ चलाता है? |
| राजनीतिक ‘सुपारी’ का शक | क्या विपक्ष ने पैसे देकर खबर प्लांट करवाई, ताकि सुप्रीम कोर्ट में बवाल काटने का ग्राउंड बन सके? |
| बीजेपी आलाकमान की ‘चुप्पी’ | जब अपना ही सांसद सबूत दे रहा है, तो नेता इस अखबार का बॉयकॉट करने के बजाय उनके इवेंट में क्यों जाते हैं? |
4. सुपारी जर्नलिज़्म या चुनावी फंडिंग
आखिर बंगाल चुनाव के उस काले पैसे ने कैसे सेट किया फेक नैरेटिव
क्या ये महज़ एक मासूम इत्तेफाक है? सियासत में इतने सीधे इत्तेफाक नहीं होते। जब आप किसी मीडिया हाउस को 81 लाख रुपये देते हैं, तो वो पैसा सिर्फ कागज़ और स्याही के लिए नहीं दिया जाता।
वो पैसा दिया जाता है एक खास तरह का ‘नैरेटिव’ (Narrative) गढ़ने के लिए।
इस घटना ने इस डिबेट को जन्म दे दिया की क्या ये पत्रकारिता के नाम पर ‘सुपारी जर्नलिज़्म’ (Supari Journalism) का नया दौर है? जहाँ विपक्ष अपने मनमुताबिक ख़बरें प्लांट करवाता है ताकि देश के भीतर एक अराजक माहौल खड़ा किया जा सके।
जब सुप्रीम कोर्ट में बैठकर कांग्रेसी और वामपंथी वकील चुनाव आयोग के खिलाफ जहर उगल रहे थे, तो उनके हाथ में उसी अख़बार की कटिंग थी जिसे उन्होंने खुद लाखों रुपये दिए थे।
मतलब, पहले पैसे देकर खबर छपवाओ, और फिर उसी खबर को ‘सच्चाई’ बताकर कोर्ट में हंगामा करो! ये टूलकिट का सबसे क्लासिक और गंदा रूप है।
लेकिन इस पूरे खेल में सबसे बड़ा विडंबना क्या है? विडंबना ये है की महेश जेठमलानी खुद बीजेपी के नेता हैं। वो खुद चिल्ला-चिल्ला कर अपनी ही पार्टी को बता रहे हैं की “भाइयों, ये अख़बार 81 लाख लेकर तुम्हारे और चुनाव आयोग के खिलाफ हिट जॉब (Hit Job) कर रहा है।”
लेकिन बीजेपी की टॉप लीडरशिप के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता की ये पैसा कहाँ से आया और इसका क्या मक़सद था। उन्हें तो बस इस बात की फ़िक्र है की इंडियन एक्सप्रेस के अगले इवेंट में उनकी सीट आगे की लाइन में रिज़र्व है या नहीं!
जब आप उस मीडिया हाउस को गले लगा रहे हैं जो 81 लाख लेकर आपके सिस्टम को डैमेज कर रहा है, तो फिर आप सियासत नहीं कर रहे, आप अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।
5. रामनाथ गोयनका अवार्ड्स से लेकर Express Adda तक
जब खुद PM मोदी और BJP नेता विरोधी अखबार के कार्यक्रमों में जाकर देने लगे मान्यता

लुटियंस दिल्ली की राजनीति और वहां के इकोसिस्टम को अगर समझना हो, तो आपको इनके द्वारा आयोजित किए जाने वाले उन ‘इलीट’ कार्यक्रमों को देखना होगा, जो फाइव-स्टार होटलों के बंद और चमचमाते हॉल्स में होते हैं।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का ‘रामनाथ गोयनका अवार्ड्स’ (RNG Awards) या फिर उनका मशहूर ‘एक्सप्रेस अड्डा’ (Express Adda) कोई आम पत्रकारिता वाले कार्यक्रम नहीं हैं।
सच कहूँ तो ये इस वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम के लिए किसी ‘कुंभ मेले’ से कम नहीं होते।
यहाँ देश भर के वो सारे स्वघोषित बुद्धिजीवी, पत्रकार और लिबरल एक्टिविस्ट जुटते हैं, जिनका दिन सत्ताधारी पार्टी को गरियाने से शुरू होता है और रात उसी सरकार के ‘फासीवादी’ होने का रोना रोकर खत्म होती है।
अब कायदे से तो जिस मंच पर आपके खिलाफ दिन-रात ज़हर उगलने वाले लोग बैठे हों, जिस अख़बार ने 81 लाख रुपये की फंडिंग के शक में आपके ही चुनाव आयोग को डैमेज करने की साज़िश रची हो, उस अख़बार के कार्यक्रमों से सत्ताधारी दल को कम से कम दस मील की दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
लेकिन मज़ाक देखिए! इन्हीं कार्यक्रमों की पहली कतार में आपको बीजेपी के सबसे कद्दावर नेता, बड़े-बड़े कैबिनेट मंत्री और सरकार के मुख्य रणनीतिकार बैठे हुए नज़र आ जाएंगे।
कभी देश के प्रधानमंत्री खुद इन अवार्ड शोज़ में जाकर मुख्य अतिथि (Chief Guest) बन जाते हैं और उन पत्रकारों को बधाइयां देते हैं, जिनकी टाइमलाइन खंगालेंगे तो वो सिर्फ सरकार और उनकी विचारधारा के खिलाफ नफरत से भरी मिलेगी।

कभी बीजेपी के फायरब्रांड प्रवक्ता और केंद्रीय मंत्री ‘एक्सप्रेस अड्डा’ के मंच पर जाकर बड़े इत्मीनान से चाय-कॉफी की चुस्कियां लेते हैं और अंग्रेज़ी में इंटरव्यू देते हैं ताकि वो वहां बैठी लुटियंस की एलीट जनता को ये दिखा सकें की “देखो, हम कितने लिबरल और टॉलरेंट (Tolerant) हैं!”
भाईसाहब, ये टॉलरेंस नहीं है, ये एक वैचारिक आत्महत्या है। आप जिस मंच पर जाकर अपनी बौद्धिकता का भौकाल टाइट करने की कोशिश कर रहे हैं, वो मंच उसी अख़बार का है जो अगले दिन सुबह आपके ही 13 करोड़ वोटरों के कटने की फर्जी खबर छापकर देश में आग लगाने की तैयारी कर रहा होता है।
आप वहां जाकर रेड कार्पेट पर चलते हैं, उनके संपादकों के साथ हंसते हुए तस्वीरें खिंचवाते हैं, और वो सम्पादक आपकी उसी तस्वीर का इस्तेमाल करके अपने अख़बार की ब्रांडिंग करता है।
क्या सत्ता के नशे में चूर इन नेताओं को इतनी सी क्रोनोलॉजी समझ नहीं आती की वो अनजाने में ही सही, विरोधियों के हाथों का खिलौना बन रहे हैं?
6. राजा खुद दरबार में बैठ जाए तो प्रजा क्या सोचेगी
पार्टी नेतृत्व की इस बड़ी भूल से कैसे जायज़ ठहराए जा रहे हैं वामपंथी झूठ
ज़रा इसे एक आम वोटर और पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ता के नज़रिए से समझने की कोशिश कीजिए। जब देश का प्रधानमंत्री, गृह मंत्री या सरकार का कोई बहुत बड़ा चेहरा किसी अख़बार के मंच पर जाकर बैठता है, तो सियासत की भाषा में इसे ‘लेजिटिमाइज़’ (Legitimize) करना कहते हैं।
मतलब, आप अपने पद की गरिमा और अपनी सत्ता की पूरी ताक़त उस अख़बार के पीछे खड़ी कर रहे हैं। आप देश को ये मैसेज दे रहे हैं की “ये अख़बार जो भी है, जैसा भी है, हम इसे मान्यता देते हैं।”
अब सोचिए की पार्टी का जो बेचारा आईटी सेल का लड़का या ज़मीनी कार्यकर्ता दिन-रात पब्लिक को ये समझाने में लगा है की फलां मीडिया हाउस वामपंथी है, ये विदेशी फंडिंग से चलता है, ये एंटी-हिन्दू या एंटी-गवर्नमेंट है… उस कार्यकर्ता की पूरी मेहनत पर कैसे पानी फिर जाता है।
मान लीजिए की चुनाव का माहौल है। कोई आम कार्यकर्ता किसी गांव की चौपाल पर या नुक्कड़ पर बैठकर लोगों को समझा रहा है की “चाचा इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग के खिलाफ जो 13 करोड़ वोटरों वाली खबर छापी है, वो बिल्कुल फेक और झूठी है! ये अख़बार तो विपक्ष के एजेंडे पर काम करता है।”
अब वो चाचा अगर थोड़ा सा भी न्यूज़ देखता होगा, तो पलटकर क्या जवाब देगा? वो सीधे कहेगा, “अरे बेटा! अगर ये अख़बार इतना ही झूठा, फर्जी और देश-विरोधी है, तो कल रात टीवी पर तुम्हारे बड़े वाले मंत्री जी वहां चीफ गेस्ट बनकर अवार्ड क्यों बांट रहे थे? वो वहां ठहाके क्यों लगा रहे थे? अगर अख़बार खराब है, तो तुम्हारे नेताओं को वहां जाने की क्या मज़बूरी है?”
बताइए! उस बेचारे कार्यकर्ता के पास इस सवाल का क्या जवाब होगा? वो बगलें झांकने के अलावा कुछ नहीं कर पाएगा।
जब ‘राजा’ खुद ही विरोधियों के दरबार में जाकर बैठ जाए और उनकी शान में कसीदे पढ़ने लगे, तो प्रजा तो यही सोचेगी ना की राजा और विरोधी अंदर से एक ही हैं।
ये जो दिखावे की कुश्ती चल रही है, ये सिर्फ पब्लिक को बेवकूफ बनाने के लिए है। लुटियंस मीडिया इसी दिन का इंतज़ार करता है।
जब भी उन पर ‘पेड न्यूज़’ या ‘फेक नैरेटिव’ का आरोप लगता है, वो बेशर्मी से अपनी ढाल बनाकर कह देते हैं की “हम पर बायस्ड (Biased) होने का आरोप गलत है, देखिए खुद सरकार के टॉप मंत्री हमारे यहाँ आते हैं!”
पार्टी लीडरशिप की ये ‘वैलिडेशन’ की भूख और ‘न्यूट्रल’ दिखने की बीमारी ने वामपंथी झूठ को वो आवरण पहना दिया है, जिसे चीरना अब आम कार्यकर्ता के बस की बात नहीं रह गई है।
आप करोड़ों रुपये खर्च करके अपना खुद का मीडिया इकोसिस्टम खड़ा करने की बात करते हैं, लेकिन जब ‘क्रेडिबिलिटी’ (Credibility) का ठप्पा देने की बारी आती है, तो आप वो ठप्पा अपने दुश्मनों के माथे पर लगा देते हैं।
अगर राजनीति के इसी आत्मघाती खेल को ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहा जाता है, तो फिर यकीन मानिए, ऐसी चाणक्य नीति पार्टी की पूरी वैचारिक ज़मीन को बंजर बनाने के लिए काफी है।
7. PM मोदी का मज़ाक उड़ाने वाला ‘द टेलीग्राफ’ अखबार
और उसी के पैरेंटल ग्रुप ABP के मंच पर स्पीच देने जाते BJP नेता

चलिए, अगर आपको लगता है की इंडियन एक्सप्रेस वाला मामला महज़ एक ‘अपवाद’ था, तो आइए आपकी इस गलतफहमी को भी दूर कर देते हैं।
बीजेपी लीडरशिप की इस ‘सेल्फ-गोल’ वाली आदत का एक और सबसे बड़ा उदाहरण है कोलकाता से छपने वाला अख़बार ‘द टेलीग्राफ’ (The Telegraph) और उसका पैरेंटल ग्रुप ‘एबीपी’ (ABP)।
जो लोग पत्रकारिता को फॉलो करते हैं, उन्हें बहुत अच्छे से पता है की ‘द टेलीग्राफ’ का एजेंडा क्या है। यह अख़बार अपनी ख़बरों के लिए कम और अपने ‘फ्रंट पेज’ की हेडलाइंस के लिए ज़्यादा जाना जाता है।
हर सुबह इस अख़बार का पहला पन्ना इस तरह डिज़ाइन किया जाता है की उसमें प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह, बीजेपी सरकार और राइट-विंग विचारधारा का खुलेआम और सबसे भद्दा मज़ाक उड़ाया जा सके।
ये अख़बार आलोचना नहीं करता, ये ‘कैरेक्टर असैसिनेशन’ (Character Assassination) करता है। हर सुबह इनका फ्रंट पेज किसी वामपंथी पैम्फलेट की तरह छपता है, जिसका इकलौता मक़सद बीजेपी और उसकी पूरी आइडियोलॉजी को नीचा दिखाना और सनातनी विचारकों को ‘जाहिल’ साबित करना होता है।
इस अख़बार ने कभी इस बात को छुपाया भी नहीं है की वो एंटी-गवर्नमेंट और एंटी-मोदी हैं। वो डंके की चोट पर अपनी नफरत को पत्रकारिता का नाम देकर परोसते हैं।
अब तर्क के हिसाब से तो एक सत्ताधारी पार्टी को ऐसे मीडिया हाउस से दो गज़ की दूरी बनाकर रखनी चाहिए, है ना? लेकिन रुकिए… यहीं तो बीजेपी का वो ‘महान चाणक्य दिमाग’ काम करना बंद कर देता है!
8. सुबह अख़बार के पन्नों पर विचारधारा का चीरहरण
शाम को उसी मीडिया हाउस के इवेंट में मुस्कुराते सत्ताधारी

जिस अख़बार ने सुबह-सुबह अपनी हेडलाइन में देश के प्रधानमंत्री का अपमान किया है, उसी अख़बार के मालिक यानी एबीपी ग्रुप (ABP Group) के सबसे बड़े इवेंट ‘एबीपी आइडियाज़ ऑफ इंडिया समिट’ (ABP Ideas Of India Summit) में शाम को बीजेपी के टॉप कैबिनेट मंत्री, रणनीतिकार और बड़े-बड़े प्रवक्ता सज-धज कर पहुँच जाते हैं।
भाई, ये कैसा दोगलापन है? आप किस विचारधारा की बात करते हैं? जिस मंच के पीछे खड़े होकर ये मीडिया हाउस दिन-रात आपके खिलाफ ज़हर उगल रहा है, आप उसी मंच पर अतिथि बनकर जाते हैं और वहां बैठकर बड़ी-बड़ी बौद्धिक (Intellectual) बातें करते हैं।
आप वहां जाकर इंटरव्यू देते हैं, कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं और उनके सवालों का जवाब ऐसे देते हैं जैसे आप किसी बहुत ‘निष्पक्ष’ और ‘पवित्र’ मंच पर बैठे हों।
ये सिर्फ ‘द टेलीग्राफ’ तक सीमित नहीं है। आप किसी भी बड़े लिबरल मीडिया हाउस का नाम ले लीजिए। जो लोग सुबह-शाम अपने पोर्टल पर लिखते हैं की “भारत में फासीवाद आ गया है, लोकतंत्र मर चुका है, मोदी एक तानाशाह है”, शाम को उसी पोर्टल या चैनल के कॉनक्लेव (Conclave) में सरकार के बड़े-बड़े मंत्री वीआईपी गेस्ट बनकर बैठे होते हैं।
एक तरफ आपका वो ज़मीनी कार्यकर्ता है जो बंगाल की सड़कों पर ‘द टेलीग्राफ’ और वहां की लोकल लिबरल मशीनरी से लड़ रहा है, और दूसरी तरफ आपके नेता उसी ग्रुप के इवेंट में जाकर कड़क चाय की चुस्कियां ले रहे हैं।
जब आम पब्लिक ये नज़ारा देखती है, तो उसके दिमाग में क्या सिग्नल जाता है? पब्लिक सोचती है की “यार, ये सब तो अंदर से मिले हुए हैं। बाहर कार्यकर्ता फालतू में एक-दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं, असली मज़े तो इनके नेता ले रहे हैं।”
जब आप खुद ही उस मंच को वैधता (Validity) दे रहे हैं जो आपकी आइडियोलॉजी को गाली देता है, तो आप किस मुंह से अपने कार्यकर्ता को उम्मीद करने को कहते हैं की वो आपकी पार्टी के लिए ज़मीन पर खून-पसीना बहाएगा?
सत्ता का ये वो नशा है जहाँ नेता ज़मीनी हकीकत से इतना कट जाता है की उसे अपने सम्मान और अपनी पार्टी के अपमान के बीच का फर्क ही दिखना बंद हो जाता है।
| मीडिया हाउस का वामपंथी एजेंडा | बीजेपी लीडरशिप का आत्मघाती ‘सेल्फ-गोल’ |
|---|---|
| इंडियन एक्सप्रेस 13 करोड़ वोटरों का झूठ छापता है। | नेता ‘रामनाथ गोयनका अवार्ड्स’ में जाकर उन्हीं पत्रकारों को अवार्ड बांटते हैं। |
| ‘द टेलीग्राफ’ फ्रंट पेज पर एंटी-मोदी प्रोपेगेंडा चलाता है। | बीजेपी रणनीतिकार ‘ABP आइडियाज़ ऑफ इंडिया’ समिट में वीआईपी मेहमान बनते हैं। |
| कांग्रेस से 81 लाख की सीक्रेट फंडिंग के सबूत आते हैं। | पार्टी आलाकमान इसे भूलकर उस मीडिया हाउस को लेजिटिमाइज़ (वैध) करता रहता है। |
| कार्यकर्ता दिन-रात गालियां खाकर फेक न्यूज़ बेनकाब करता है। | नेता उसी झूठे मंच को ‘पवित्र’ बताकर अपने ही कैडर का मनोबल गिराते हैं |
9. दस साल की सत्ता के बाद भी विरोधी मीडिया से ‘गुड बॉय’ का सर्टिफिकेट पाने की ये मानसिक गुलामी क्यों

अब ज़रा इस पूरी राजनीति के उस मनोवैज्ञानिक पहलू (Psychological aspect) पर बात करते हैं, जिसे समझे बिना आप इस ‘सेल्फ-गोल’ की गहराई को नहीं नाप सकते।
जब आप किसी भी लोकतंत्र में 10 साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाते हैं, तो इसका सीधा सा मतलब होता है की देश की जनता आप पर अंधा भरोसा करती है।
2014 और 2019 के आम चुनावों में भारत की जनता ने बीजेपी को वो ऐतिहासिक जनादेश दिया जिसके लिए पार्टियां दशकों तक तरसती हैं। जनता ने ईवीएम (EVM) का बटन दबाकर साफ कर दिया की उन्हें आपके विज़न, आपकी नीतियों और आपकी राष्ट्रवाद वाली लाइन पर पूरा भरोसा है।
तर्क के हिसाब से तो इतने प्रचंड बहुमत के बाद किसी भी सत्ताधारी दल का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर होना चाहिए। उसे किसी बाहरी सर्टिफिकेट की ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिए।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी की लीडरशिप के साथ एक बहुत ही अजीब और हैरान करने वाला ‘सिंड्रोम’ जुड़ा हुआ है।
सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बावजूद, देश भर में अपनी रैलियों में लाखों की भीड़ जुटाने के बावजूद, दिल्ली में बैठे इन नेताओं के भीतर आज भी एक ‘गुड बॉय’ (Good Boy) का सर्टिफिकेट पाने की भूख छटपटाती रहती है।
और सबसे बड़ी विडंबना देखिए की ये सर्टिफिकेट इन्हें किससे चाहिए? इन्हें ये ठप्पा उसी ‘लुटियंस ईकोसिस्टम’ और वामपंथी मीडिया से चाहिए, जो सुबह से लेकर रात तक इन्हें ‘फासीवादी’, ‘तानाशाह’ और ‘लोकतंत्र का हत्यारा’ साबित करने के लिए विदेशी अखबारों में कॉलम लिखता है।
जो मीडिया हाउस अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर भारत सरकार की छवि को तार-तार करते हैं, जो अख़बार 81 लाख की डील के शक के घेरे में आकर चुनाव आयोग को डैमेज करते हैं, बीजेपी के शीर्ष नेताओं को उन्हीं के हाथों से ‘बौद्धिक वैलिडेशन’ (Intellectual Validation) चाहिए!
यह देखकर सच में हैरानी होती है की जो नेता ज़मीन पर इतने मज़बूत हैं, वो वैचारिक और बौद्धिक लड़ाई में इतने कमज़ोर और लाचार क्यों नज़र आते हैं? क्यों वो उन पत्रकारों और संपादकों के दरबार में जाकर मुस्कराते हुए पोज़ देते हैं, जिनका इकलौता एजेंडा ही उनकी विचारधारा को खत्म करना है?
10. जनता ने दिया पूर्ण बहुमत, लेकिन बौद्धिक वैलिडेशन के लिए आज भी वामपंथी दरबार में हाज़िरी लगाने की हीन भावना
इस पूरे पाखंड के पीछे दरअसल एक बहुत गहरी ‘हीन भावना’ (Inferiority Complex) काम कर रही है। इसे समाजशास्त्र की भाषा में ‘न्यू एलीट’ (New Elite) और ‘ओल्ड एलीट’ (Old Elite) की लड़ाई कहा जाता है।
वामपंथी और लिबरल ईकोसिस्टम ने आज़ादी के बाद से ही देश के बड़े-बड़े संस्थानों, अख़बारों, यूनिवर्सिटीज और बौद्धिक क्लबों पर कब्ज़ा जमा रखा है। उन्होंने खुद को ‘इंटेलेक्चुअल’ होने का इकलौता ठेकेदार घोषित कर रखा है।
जब बीजेपी सत्ता में आई, तो उनके पास ज़मीनी ताक़त तो थी, चुनाव जीतने की मशीनरी भी थी, लेकिन उनके नेताओं के भीतर कहीं न कहीं यह खौफ बैठ गया की जब तक ये अंग्रेज़ी बोलने वाला, वाइन का गिलास पकड़ने वाला लुटियंस का ईलीट क्लब हमें ‘स्टेट्समैन’ (Statesman) नहीं मानेगा, तब तक हमारा कद बड़ा नहीं होगा।
ये नेता अपने ही समर्थकों और राइट-विंग विचारकों को ‘गंवार’ मानकर उनसे दूरी बना लेते हैं। इन्हें लगता है की अगर कोई राइट-विंग का पत्रकार या यूट्यूबर इनकी तारीफ कर रहा है, तो वो तो उसका काम है, उसमें क्या बड़ी बात है?
असली ‘अचीवमेंट’ तो तब है जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ या ‘द टेलीग्राफ’ का संपादक हमें अपने कार्यक्रम में चीफ गेस्ट बनाकर बुलाए और हमारी तारीफ में दो शब्द बोल दे!
ज़रा वामपंथियों और विपक्ष के नेताओं का रवैया देखिए। क्या आपने कभी किसी बड़े कांग्रेसी या लेफ्ट के नेता को देखा है की वो किसी कट्टर राइट-विंग मीडिया हाउस या चैनल के किसी बड़े इवेंट में जाकर रेड कार्पेट पर चल रहा हो और उनके साथ बैठकर ठहाके लगा रहा हो? कभी नहीं!
वो लोग अपनी विचारधारा को लेकर एकदम स्पष्ट हैं। वो ऐसे चैनलों का बाकायदा बॉयकॉट (Boycott) करते हैं। वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके पत्रकारों को बाहर निकाल देते हैं और अपने ईकोसिस्टम के पत्रकारों को अपनी पलकों पर बिठाकर रखते हैं।
लेकिन बीजेपी के नेताओं का हाल बिल्कुल उल्टा है। ये अपने समर्थक पत्रकारों और वैचारिक लेखकों को तो दरवाज़े के बाहर खड़ा रखते हैं, उन्हें कोई एक्सक्लूसिव इंटरव्यू नहीं देते।
लेकिन जैसे ही कोई धुर-विरोधी लिबरल अख़बार इन्हें अपने किसी ‘अड्डा’ या ‘कॉनक्लेव’ का इनविटेशन भेजता है, ये सारे काम छोड़कर अपनी नई जैकेट पहनकर वहां दौड़े चले जाते हैं।
यह हीन भावना पार्टी की जड़ों में तेज़ाब डालने का काम कर रही है। जब सत्ता के शिखर पर बैठे लोग ही इस बौद्धिक गुलामी से आज़ाद नहीं हो पा रहे हैं, तो वो देश को ‘डिकोलोनाइज़’ (Decolonize) करने या वैचारिक रूप से मज़बूत बनाने की बात किस मुंह से करते हैं?
आप ज़मीन पर कितनी भी बड़ी चुनाव जीतने की मशीन क्यों न खड़ी कर लें, लेकिन जब तक आप वैचारिक रूप से अपने विरोधियों के सामने घुटने टेकते रहेंगे और उनके दरबार में हाज़िरी लगाकर ‘गुड बॉय’ का तमगा मांगते रहेंगे, तब तक आप असल मायनों में कभी भी इस ईकोसिस्टम को नहीं हरा सकते।
11. जो कार्यकर्ता रात-दिन पार्टी का बचाव कर रहा है उसकी पीठ में छुरा घोंपता BJP नेताओं का यह कदम
राजनीति में सबसे खतरनाक चीज़ हार नहीं होती, सबसे खतरनाक चीज़ होती है अपने ही समर्थकों की खामोशी और उनकी आँखों में दिखने वाली निराशा।
दिल्ली में बैठकर ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेलने वाले रणनीतिकारों को शायद इस बात का अंदाज़ा भी नहीं है की ज़मीन पर उनका जो कैडर खड़ा है, वो आज किस मानसिक पीड़ा से गुज़र रहा है।
आप पश्चिम बंगाल, केरल या तमिलनाडु जैसे राज्यों के उस आम कार्यकर्ता के बारे में सोचिए। वो कार्यकर्ता जो अपनी जान हथेली पर रखकर वामपंथी और विरोधी इकोसिस्टम से लड़ रहा है।
वो लाठियां खाता है, उस पर झूठी एफआईआर (FIR) होती हैं, उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। वो ये सब इसलिए सहता है क्योंकि उसे लगता है की उसकी पार्टी और दिल्ली में बैठे उसके बड़े नेता एक बहुत बड़ी वैचारिक लड़ाई लड़ रहे हैं।
लेकिन जब वही कार्यकर्ता अख़बारों और टीवी पर देखता है की जिन लोगों ने उसके खिलाफ नैरेटिव गढ़ा, जिन मीडिया हाउसेज ने चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर 13 करोड़ वोटरों के नाम काटने का फर्जी दाग लगाकर देश में अराजकता फैलाई, और जो अख़बार 81 लाख की डील के शक के घेरे में हैं…
उन्हीं अख़बारों के मालिकों और संपादकों के साथ उनके टॉप के नेता ठहाके लगा रहे हैं! जब वो देखता है की ‘द टेलीग्राफ’ जैसे अख़बार जो हर सुबह सनातनी विचारधारा और पार्टी लीडरशिप का भद्दा मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हीं के पैरेंटल ग्रुप के ‘आइडियाज़ ऑफ इंडिया समिट’ में पार्टी के रणनीतिकार जाकर बौद्धिक ज्ञान बघार रहे हैं… तो उस कार्यकर्ता के भीतर का भरोसा कांच की तरह टूट कर बिखर जाता है।
उसे लगने लगता है की यार, जब हमारे नेताओं को ही इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की कौन हमें गाली दे रहा है, तो मैं सड़क पर क्यों अपना खून बहाऊं?
उसे समझ आ जाता है की ऊपर बैठे लोगों के लिए ये सब महज़ एक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और सत्ता का खेल है, जिसमें असली मोहरे की तरह सिर्फ ज़मीनी कार्यकर्ता पिस रहा है।
ये सिर्फ एक भूल नहीं है, ये अपने ही सबसे वफादार सिपाहियों की पीठ में खंजर घोंपने जैसा है।
आप अपने कैडर को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ (Taken for granted) लेकर एक या दो चुनाव तो जीत सकते हैं, लेकिन जब कोई वैचारिक लड़ाई लंबी चलती है, तो बिना सेना के कोई सेनापति कभी युद्ध नहीं जीत सकता।
12. चुनाव दुश्मन को गले लगाकर नहीं बल्कि अपने ज़मीनी दोस्तों की फ़ौज खड़ी करके जीते जाते हैं
सियासत का एक बहुत ही सीधा और अटल नियम है जिसे कोई भी चाणक्य नीति कभी झुठला नहीं सकती। चुनाव कभी भी अपने दुश्मनों को मंच पर बिठाकर, उन्हें अवार्ड देकर या न्यूट्रल दिखने का ढोंग रचकर नहीं जीते जाते।
चुनाव हमेशा अपने उस ज़मीनी वोटर और कार्यकर्ता को चार्ज (Charge) रखकर जीते जाते हैं जो पोलिंग के दिन सुबह 6 बजे उठकर दस लोगों को घर से निकाल कर बूथ तक ले जाता है।
बीजेपी की टॉप लीडरशिप को आज ये कड़वा सच स्वीकार करना ही होगा की उनका ये अति-आत्मविश्वास (Overconfidence) उन्हें एक बहुत गहरी खाई की तरफ ले जा रहा है।
10 साल की सत्ता ने शायद नेताओं के भीतर एक ऐसा नशा पैदा कर दिया है की उन्हें लगने लगा है की “हम तो मोदी जी के नाम पर वैसे भी जीत ही जाएंगे, कैडर जाए भाड़ में।”
इसी नशे का नतीजा है की आज कई राज्यों में जब चुनाव होते हैं, तो पार्टी का वो पक्का वोटर और बूथ लेवल का कार्यकर्ता चुपचाप घर बैठ जाता है।
वो ना तो पार्टी के खिलाफ वोट डालता है और ना ही विपक्ष के साथ जाता है, वो बस साइलेंट होकर ‘नोटा’ (NOTA) का बटन दबा देता है या वोट डालने ही नहीं जाता।
और जब चुनाव के नतीजे आते हैं और पार्टी को झटके लगते हैं, तब यही रणनीतिकार सिर खुजलाते हुए पूछते हैं की “यार, हम तो इतनी योजनाएं लाए थे, फिर हार कैसे गए?”
हार इसलिए गए भाई क्योंकि आपका जो वोटर आपको बूथ पर जिताता था, उसका आपने वैचारिक रूप से मनोबल ही तोड़ दिया था!
कुल मिलाकर बात इतनी सी है की आप लुटियंस मीडिया के सामने चाहे कितने भी रेड कार्पेट बिछा लें, उनके अड्डा और अवार्ड शोज़ में जाकर चाहे कितने भी कसीदे पढ़ लें… ये इकोसिस्टम कभी आपका सगा नहीं होने वाला।
जिस दिन आप सत्ता से ज़रा भी कमज़ोर पड़ेंगे, ये सबसे पहले आपकी ही राजनीतिक कब्र खोदने के लिए फावड़ा लेकर खड़े होंगे। आप अपनी ही ‘चाणक्य नीति’ के जाल में ऐसे उलझ गए हैं की अब वो नीति आपके लिए दवा नहीं, बल्कि एक नासूर बन चुकी है।
अगर 81 लाख के आरोपों वाले और 13 करोड़ के फर्जी वोटरों का तिलिस्म रचने वाले इकोसिस्टम से अब भी पार्टी लीडरशिप का मोहभंग नहीं हुआ, तो फिर वो दिन दूर नहीं जब ‘सत्ता के इस चक्रव्यूह’ में फंसी पार्टी को ज़मीन पर अपना बचाव करने के लिए एक भी झंडा उठाने वाला नहीं मिलेगा।
