बंगाल का वो लाल जिसने महज़ 17 की उम्र में छेड़ा अंग्रेज़ों के खिलाफ बिगुल, 63 दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए ब्रिटिश हुकूमत को झुकाने वाले क्रांतिवीर ‘जतीन्द्रनाथ दास जी’ को जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि

आज ये जो खुली हवा में हम सांस ले रहे हैं ना, ये आज़ादी हमें किसी ने चांदी की थाली में सजाकर नहीं दी है। इसके लिए 24-25 साल के नौजवानों ने अपने जिस्म की बोटियां तक गलाई हैं, तब जाकर ये देश आज़ाद हुआ है।

आज 27 अक्टूबर है। आज उस फौलादी शेर जतीन्द्रनाथ दास जी (जिन्हें लोग प्यार से जतिन दास कहते थे) की जयंती है जिसने पूरे 63 दिन तक अन्न और जल का एक दाना छुए बिना अंग्रेज़ी हुकूमत की जड़ें हिला दी थी।

ये कहानी बंगाल के उसी लाल की है जिसकी शहादत देखकर खुद मौत भी कांप उठी थी।

आज उस महानायक की याद में यह लेख उस कर्ज़ को याद करने की एक छोटी सी कोशिश है, जिसे हम आज तक चुका नहीं पाए।

छोटी सी उम्र में माँ का साया उठने से लेकर 17 साल की उम्र में अंग्रेज़ों की जेल नापने वाले इस फौलादी शेर की शुरुआत

जतिन दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता में हुआ था। बचपन से ही ज़िंदगी ने इनका कड़ा इम्तिहान लेना शुरू कर दिया था।

जब ये महज़ 9 साल के थे, तभी इनके सिर से माँ का साया हमेशा के लिए उठ गया।

आम तौर पर ऐसी घटनाओं के बाद बच्चे टूट जाते हैं या सदमे में चले जाते हैं, लेकिन जतिन के अंदर एक अलग ही आग धधक रही थी। वो आग थी अपने देश को विदेशियों की बेड़ियों से आज़ाद कराने की।

ये वो दौर था जब देश भर में अंग्रेज़ों के खिलाफ गुस्सा उबल रहा था। साल 1921 में जब महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) का बिगुल फूंका, तब जतिन दास महज़ 17 साल के थे।

ज़रा सोचिए, आज 17 साल के लड़के रील्स में बिजी रहते हैं, लेकिन उस उम्र में इस लड़के ने अंग्रेज़ों के खिलाफ सड़कों पर झंडा उठा लिया। नतीजा क्या हुआ? पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अंग्रेज़ों की काल कोठरी में डाल दिया गया।

लेकिन जेल की वो चारदीवारी जतिन के इरादों को तोड़ने के बजाय उन्हें और भी फौलादी बना गई। जेल से बाहर आकर उन्हें एक बात बिल्कुल साफ़ समझ आ गई थी कि ये गोरे शांति, अपीलों और अनशन की भाषा नहीं समझने वाले। इन्हें इन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा।

कलकत्ता के विद्यासागर कॉलेज से अपनी पढ़ाई-वड़ाई करते हुए ही वो बंगाल के उस समय के सबसे उग्र और मशहूर क्रांतिकारी संगठन ‘अनुशीलन समिति’ से जुड़ गए।

यहीं से जतिन दास की ज़िंदगी का वो धाकड़ चैप्टर शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की नींद उड़ा कर रख दी।

केमिस्ट्री के उस जीनियस की एंट्री जिसने खुद अपने हाथों से बनाए थे दिल्ली असेंबली में धमाका करने वाले बम

आप में से बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे की जतिन दास केमिस्ट्री (रसायन विज्ञान) के एक बेहद होशियार और जीनियस छात्र थे। पढ़ाई में उनका दिमाग एकदम कंप्यूटर की तरह चलता था।

लेकिन उन्होंने अपनी इस पढ़ाई का इस्तेमाल किसी सरकारी नौकरी के लिए या अंग्रेज़ों की चापलूसी करके पैसा कमाने के लिए नहीं किया। उन्होंने इस केमिस्ट्री का इस्तेमाल किया अंग्रेज़ों के परखच्चे उड़ाने वाले बम बनाने में!

सच बता रहा हूँ, जतिन दास को बम बनाने की ऐसी गज़ब की तकनीक आती थी की उस समय के बड़े-बड़े क्रांतिकारी भी उनके इस हुनर के दीवाने थे।

जब मशहूर क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल ने उनके इस ज़बरदस्त टैलेंट को पहचाना, तो उन्होंने तुरंत जतिन को अपने संगठन ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) में शामिल कर लिया।

यही वो जगह थी जहाँ बंगाल के इस शेर की मुलाकात पंजाब के शेर सरदार भगत सिंह से हुई। भगत सिंह और जतिन दास की सोच बिल्कुल एक जैसी थी- देश के लिए मर मिटना।

एचएसआरए (HSRA) को उस वक्त ऐसे ही एक मास्टरमाइंड की ज़रूरत थी जो बिना अंग्रेज़ों की नज़रों में आए, देश के भीतर ही हाई-इंटेंसिटी वाले बम तैयार कर सके। और जतिन दास ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया।

हम सबने इतिहास की किताबों में पढ़ा है की 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंक कर बहरी अंग्रेज़ी सरकार के कान खोले थे।

लेकिन क्या आपको पता है की वो बम किसने बनाए थे? डंके की चोट पर सुन लीजिए भाई, वो बम किसी और ने नहीं, बल्कि खुद जतिन दास ने अपने हाथों से तैयार किए थे!

उन्होंने ही भगत सिंह और बाकी साथियों को बम बनाने की प्रॉपर ट्रेनिंग दी थी। अंग्रेज़ों की खुफिया एजेंसियां दिन-रात एक करके भी इस 24 साल के नौजवान की भनक नहीं लगा पाईं, जो अपनी लैबोरेट्री में बैठकर ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का बारूद तैयार कर रहा था।

जतिन दास वो गुमनाम मास्टरमाइंड थे, जिनके बनाए धमाकों की गूंज सीधे लंदन में बैठे गोरों के कानों तक सुनाई दी थी।

लाहौर जेल का वो खौफनाक सच और गोरे कैदियों के वीआईपी ट्रीटमेंट के खिलाफ जतिन दास का ऐतिहासिक अनशन

असेंबली बम कांड के बाद अंग्रेज़ों की पुलिस पागलों की तरह हमारे क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गई थी। उनके मुखबिर हर जगह फैले हुए थे।

आख़िरकार, 14 जून 1929 को वो दिन आ ही गया जब कलकत्ता से जतिन दास को गिरफ्तार कर लिया गया।

अंग्रेज़ों ने उन पर मशहूर ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ (Lahore Conspiracy Case) में मुक़दमा ठोक दिया और उन्हें लाहौर की बोर्स्टल जेल (Borstal Jail) की उस काल कोठरी में डाल दिया गया, जहाँ का सच सुनकर आज भी रूह कांप जाती है।

लाहौर जेल के अंदर का ग्राउंड फैक्ट ये था की वहाँ गोरे और काले के बीच ऐसा भयंकर भेदभाव होता था जिसे कोई भी स्वाभिमानी इंसान बर्दाश्त नहीं कर सकता था।

जो अंग्रेज़ कैदी मर्डर, चोरी और दुष्कर्म जैसे घिनौने अपराध करके जेल आते थे, उन्हें ‘यूरोपियन’ होने के नाते वीआईपी (VIP) ट्रीटमेंट मिलता था। उन्हें पहनने के लिए साफ़ कपड़े, पढ़ने के लिए अख़बार और खाने के लिए बेहतरीन खाना दिया जाता था।

लेकिन दूसरी तरफ, भारत के जो राजनीतिक कैदी (Political Prisoners) थे, जो अपने देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे, उनके साथ जेलर और पुलिस वाले जानवरों से भी बदतर सलूक करते थे।

उन्हें पहनने के लिए ऐसे फटे-पुराने और गंदे कपड़े दिए जाते थे जिनसे बदबू आती थी। और खाने का तो पूछिए ही मत! रोटियों में मिट्टी मिली होती थी, और दाल में मरे हुए चूहे और कीड़े तैरते हुए मिलते थे।

इस ज़िल्लत को देखकर भगत सिंह और जतिन दास का खून खौल उठा। उन्होंने अंग्रेज़ों के मुंह पर साफ़ कह दिया की, “हम कोई क्रिमिनल या गुंडे-मवाली नहीं हैं। हम राजनीतिक कैदी हैं और हमें हमारा हक़ और इंसानियत वाला सुलूक चाहिए।”

जब अंग्रेज़ों ने उनकी बात अनसुनी कर दी, तो 13 जुलाई 1929 को भगत सिंह और जतिन दास ने उस ऐतिहासिक भूख हड़ताल (Hunger Strike) का बिगुल फूंक दिया, जिसने आगे चलकर पूरे ब्रिटिश अंपायर की चूलें हिला कर रख दीं।

फेफड़ों में जबरन पाइप घुसेड़ कर की गई दरिंदगी और 63 दिनों तक मौत की आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराता रहा बंगाल का लाल

ये कोई आम भूख हड़ताल नहीं थी! इन दीवानों की भूख हड़ताल का मतलब था मौत से सीधा आमना-सामना।

जब दिन बीतने लगे और इन क्रांतिकारियों का वज़न गिरने लगा, तो अंग्रेज़ों की पुलिस बौखला गई। उन्हें डर था की अगर जेल में इनमें से किसी की मौत हो गई, तो पूरे देश में बगावत की आग भड़क उठेगी।

जतिन दास का अनशन तोड़ने के लिए पुलिस वालों ने जो दरिंदगी की, वो कोई इंसान तो कर ही नहीं सकता।

5-6 हट्टे-कट्टे पुलिस वाले उनके हाथ-पैर पकड़ लेते थे और एक डॉक्टर उनके मुंह को ज़बरदस्ती खोलकर उसमें रबर का एक मोटा पाइप घुसेड़ देता था, ताकि पाइप के ज़रिए दूध सीधे उनके पेट में डाला जा सके।

जतिन दास इस ज़ुल्म का डटकर विरोध करते थे।

ऐसी ही एक हाथापाई के दौरान एक दिन वो हुआ, जिसने जतिन दास को मौत के मुंह में धकेल दिया। ज़बरदस्ती करते वक़्त वो रबर का पाइप उनके पेट की नली के बजाय सीधे उनके फेफड़ों (Lungs) में घुस गया।

और उसी पाइप से दूध उनके फेफड़ों में डाल दिया गया।

उन्हें भयंकर दर्द हुआ और तुरंत निमोनिया हो गया। धीरे-धीरे उनके शरीर के एक हिस्से ने काम करना बंद कर दिया और उन्हें लकवा (Paralysis) मार गया।

उनकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। वो बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहे थे।

उनकी ये हालत देखकर अंग्रेज़ सरकार भी डर गई। उन्होंने जतिन के सामने शर्त रखी की “तुम अपनी हड़ताल वापस ले लो, हम तुम्हें तुरंत रिहा कर देंगे।”

लेकिन वो बंगाल का शेर था, कोई गीदड़ नहीं जो मौत से डर जाता! उस फौलादी नौजवान ने अंग्रेज़ों के मुंह पर थूकते हुए कहा, “मैंने ये हड़ताल आज़ादी और सम्मान के लिए की है। अब तो मेरी लाश ही इस जेल से बाहर जाएगी।”

और सच में, वो आख़िरी सांस तक मुस्कुराते रहे, पर अन्न का एक दाना नहीं छुआ।

जतिन दास की शहादत पर जब रो पड़ा पूरा हिंदुस्तान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इस शेर को दी युवा दधीचि की उपाधि

आख़िरकार, 13 सितंबर 1929 को वो मनहूस दिन आ ही गया। पूरे 63 दिन… जी हाँ, 63 दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए, तिल-तिल तड़प कर इस 24 साल के युवा क्रांतिवीर ने भारत माता की गोद में अपने प्राण त्याग दिए।

जैसे ही लाहौर जेल से जतिन दास की शहादत की खबर बाहर आई, पूरा हिंदुस्तान फूट-फूट कर रो पड़ा।अंग्रेज़ों ने डर के मारे उनके शव को चुपचाप कलकत्ता भेजने का फैसला किया।

जतिन दास के अंतिम संस्कार में 5 लाख से ज़्यादा लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उस दिन भरे गले से जतिन दास के बलिदान को याद करते हुए उन्हें ‘भारत का युवा दधीचि’ कहा था। (जिस तरह पुराणों में महर्षि दधीचि ने राक्षसों का नाश करने के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी थीं, वैसे ही जतिन दास ने अंग्रेज़ों का नाश करने के लिए अपने शरीर की बोटियां गला दी थीं)।

जतीन्द्रनाथ दास जी की वो शहादत एक ऐसा ज्वालामुखी थी जिसने आज़ादी की उस लड़ाई में ऐसा बारूद भरा की फिर अंग्रेज़ों का इस देश में टिकना नामुमकिन हो गया।

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