भारतीय राजनीति में कुछ नेताओं का चरित्र ऐसा हो गया है की वे अपनी कुर्सी और सियासी वजूद को ज़िंदा रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
जब इंसान पूरी ज़िंदगी सत्ता की मलाई खा ले, तो उसे बिना पॉवर के रहना वैसे ही काटता है जैसे पानी के बिना मछली को।
कश्मीर की सियासत दशकों से एक ही ढर्रे पर चलती आई है- दिल्ली को गाली दो, कश्मीरियों को डराओ और बीच-बीच में पाकिस्तान का नाम लेकर अपना वोटबैंक चमकाते रहो।
लेकिन 24 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के कद्दावर नेता फारूक अब्दुल्ला ने जो कहा है, उसने राजनीति के हर गिरते हुए स्तर को भी पार कर लिया है।
ये बयान उस पुरानी और जंग खा चुकी सियासत का वो खौफनाक चेहरा है, जो आज भी कश्मीर की भोली-भाली आवाम के कंधों पर बंदूक रखकर अपनी सियासी रोटियां सेंकना चाहता है।
जिस मुल्क ने पिछले साढ़े तीन दशकों में कश्मीर की वादियों को लहूलुहान किया, उस मुल्क को ‘रक्षक’ बताने का ये जो बेशर्म खेल शुरू हुआ है ना, आज इसका पूरा ऑपरेशन करना बहुत ज़रूरी है।
SHOCKING ‼️
Farooq Abdullah crosses the line again!
“Fight, or you will be wiped out. Our Neighbor Pakistan is protecting us, otherwise, Delhi’s intentions are not good. ” pic.twitter.com/0BZQ9DCWu6
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) October 24, 2026
बारामूला से उठी पाकिस्तान प्रेम की वो ज़हरीली चिंगारी जिसने खोल दिया फारूक अब्दुल्ला की अलगाववादी सियासत का असली पन्ना
तारीख थी 24 अक्टूबर 2026, और जगह थी उत्तरी कश्मीर का बारामूला। नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा सम्मेलन चल रहा था।
मंच पर माइक पकड़े खड़े थे 89 साल के फारूक अब्दुल्ला। वो फारूक अब्दुल्ला जो तीन बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जो दिल्ली में बैठकर भारत सरकार के कैबिनेट मंत्री का रुतबा संभाल चुके हैं।
लेकिन जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, लगा ही नहीं की भारत के किसी लोकतांत्रिक राज्य का कोई सम्मानित नेता बोल रहा है।
अचानक उनके अंदर का वो पुराना ‘अलगाववादी’ प्रेम जाग उठा, जिसे वो अक्सर दिल्ली दरबार में छिपा कर रखते हैं।
उन्होंने कश्मीर की आवाम को भड़काते हुए सरेआम उस मुल्क की शान में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए, जिसके भेजे हुए आतंकियों ने न जाने कितनी कश्मीरी मांओं की गोद सूनी की है।
उन्होंने जो कुछ कहा, वो सीधे तौर पर देश की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था। आखिर ऐसी क्या मजबूरी आ गई थी की अपनी उम्र के इस पड़ाव पर फारूक साहब को अचानक सरहद पार वाले मुल्क में अपना मसीहा नज़र आने लगा?
फारूक अब्दुल्ला के बिगड़े बोल, ‘दिल्ली की नीयत में खोट’ और पाकिस्तान में उनको दिखा ‘हमदर्द’
अब ज़रा सुनिए की उन्होंने उस मंच से जहर उगला क्या था। फारूक अब्दुल्ला ने अपने ही लोगों से कहा-
“दिल्ली (भारत सरकार) से किसी न्याय की उम्मीद मत रखो… हमारा पड़ोसी (पाकिस्तान) हर जगह जाता है और कहता है की कश्मीर का मसला अभी हल नहीं हुआ है। वही पाकिस्तान हमें बचा रहा है, वरना दिल्ली वालों की नीयत ठीक नहीं है।”
मतलब गज़ब का पाखंड है भई! दिल्ली की नीयत में खोट है? वो दिल्ली जिसने आपको और आपके परिवार को बरसों तक सिर-आंखों पर बिठाया?
और पाकिस्तान बचा रहा है? अरे फारूक साहब, थोड़ा तो अपनी उम्र और अपने कद का लिहाज़ कर लेते! आप अपने ही देश की राजधानी को विलेन बना रहे हैं और उस मुल्क को अपना ढाल बता रहे हैं जो खुद आतंकवाद का सरगना है।
उन्होंने अपने भाषण में कश्मीरियों को डराते हुए यहाँ तक कह दिया की “लड़ो, वरना तुम्हारी पहचान मिट जाएगी।”
यह वही पुराना ‘खौफ का नैरेटिव’ (Fear Narrative) है। जब आपके पास जनता को देने के लिए विकास का कोई विज़न न हो, तो बस उन्हें उनके वजूद के नाम पर डराना शुरू कर दो।
एक तरफ उनके बेटे उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर दिल्ली के साथ मिलकर काम करने की कसमें खा रहे हैं, और दूसरी तरफ पिता फारूक अब्दुल्ला आवाम के बीच जाकर दिल्ली के खिलाफ ही आग लगा रहे हैं।
जिस मुल्क ने 1947 से लेकर आज तक कश्मीर को सिर्फ खून और आंसू दिए उसे रक्षक बताने वाला ये कैसा मज़ाक
जब कोई इतना बड़ा नेता ऐतिहासिक मंच से इतनी बड़ी झूठ की उल्टी करता है, तो उसे इतिहास का आईना दिखाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। फारूक साहब को शायद याद दिलाना पड़ेगा की उनका तथाकथित ‘रक्षक’ पड़ोसी मुल्क आख़िर है क्या बला!
इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पता चलेगा की इसी ‘हमदर्द’ पाकिस्तान ने 1947 में आज़ादी के ठीक बाद कबाइलियों (Tribals) के भेष में अपनी सेना कश्मीर भेजी थी।
उन्होंने उसी बारामूला में घुसकर निहत्थे कश्मीरियों का वो बेरहम कत्लेआम किया था जिसे याद करके आज भी रूह कांप जाती है।
मकबूल शेरवानी जैसे सच्चे कश्मीरी सपूत को इन्हीं कबाइलियों ने लकड़ी के तख्ते पर कीलें ठोककर मार डाला था, क्योंकि उसने इन हमलावरों का रास्ता भटका दिया था।
और कमाल की बात देखिए, फारूक अब्दुल्ला खुद उसी बारामूला में खड़े होकर आज उसी पाकिस्तान को ‘रक्षक’ बता रहे हैं!
उन आतंकियों ने सिर्फ कश्मीर के हिंदुओं को ही नहीं मारा, बल्कि हज़ारों बेगुनाह कश्मीरी मुसलमानों, पंचायत नेताओं और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों को भी सरेआम गोलियों से भूना।
जो मुल्क हज़ारों कश्मीरियों के खून से नहाया हो, उसे कश्मीरियों का हमदर्द बताना उन हज़ारों शहीदों और बेगुनाह कश्मीरियों की शहादत का सीधा अपमान है।
भारत के टैक्सपेयर्स के पैसों से मिली Z प्लस सुरक्षा और पेंशन का लुत्फ़ उठाकर उसी देश की पीठ में छुरा घोंपने का खेल
फारूक अब्दुल्ला ने एक या दो बार नहीं, बल्कि न जाने कितनी बार भारत के संविधान की कसमें खाई हैं।
आज भी जब वो सड़क पर निकलते हैं, तो भारत सरकार के वो एलीट ब्लैक कैट कमांडो (Z+ Security) उनकी हिफाज़त के लिए अपनी जान दांव पर लगाकर उनके आगे-पीछे चलते हैं।
देश का एक आम आदमी, जो दिन-रात पसीना बहाकर टैक्स भरता है, उसी टैक्स के पैसों से इन नेताओं को भारी-भरकम पेंशन मिलती है, रहने के लिए आलीशान सरकारी बंगले मिलते हैं, और हर तरह की वीआईपी (VIP) सुख-सुविधाएं दी जाती हैं।
आप भारत की पूरी मलाई चाटेंगे, भारत की सुरक्षा एजेंसियों के घेरे में महफूज़ रहेंगे, और फिर उसी भारत के खिलाफ ज़हर उगलकर पाकिस्तान के कसीदे पढ़ेंगे?
सच कहूं तो अगर फारूक साहब को पाकिस्तान इतना ही बड़ा रक्षक और हमदर्द लगता है, तो उन्हें सबसे पहले भारत सरकार की ये Z+ सुरक्षा वापस कर देनी चाहिए!
अगर दिल्ली की नीयत में इतना ही खोट है, तो दिल्ली से मिलने वाली वो मोटी पेंशन और सरकारी सुविधाएं छोड़ क्यों नहीं देते?
जाकर उसी ‘हमदर्द’ पड़ोसी से सुरक्षा मांग लीजिए ना, जो खुद अपने नागरिकों को आटे की एक बोरी के लिए सड़कों पर लड़ा रहा है।
जब अपने ही नेताओं ने दिखा दिया आईना, गुलाम नबी आज़ाद से लेकर सत्ता पक्ष तक ने उधेड़ी पाकिस्तान प्रेमी तर्कों की बखिया
कमाल की बात देखिए की फारूक अब्दुल्ला के इस बयान के बाद वो अपने ही घर में एकदम अलग-थलग पड़ गए हैं।
सत्ता पक्ष तो छोड़िए, उनके खुद के पुराने साथियों और कश्मीर के दिग्गज नेताओं ने भी उन्हें ऐसा आईना दिखाया है की शायद वो आगे से कुछ बोलने से पहले दस बार सोचेंगे।
इस पूरी बहस में सबसे सटीक आयना दिखाया है जम्मू-कश्मीर के ही पूर्व मुख्यमंत्री और डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी (DPAP) के मुखिया गुलाम नबी आज़ाद ने।
आज़ाद साहब ने बिना लाग-लपेट के सीधा कहा, “मैं फारूक साहब की बहुत इज़्ज़त करता हूँ, लेकिन उनका यह बयान पूरी तरह से गलत है। पाकिस्तान हमारा रक्षक नहीं, बल्कि हमारा विनाशक (Destroyer) है।”
ज़रा सोचिए, जब कश्मीर का ही एक इतना बड़ा और तज़र्बेकार नेता यह मान रहा है की पाकिस्तान ने सिर्फ कश्मीर को बर्बाद किया है, तो फिर अब्दुल्ला साहब कौन से पाकिस्तान की बात कर रहे हैं?
सत्ता पक्ष यानी बीजेपी के नेताओं ने भी इस बयान की जमकर बखिया उधेड़ी। आरपी सिंह और रणबीर सिंह पठानिया जैसे नेताओं ने फारूक अब्दुल्ला को PoK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) की हकीकत याद दिलाई।
उन्होंने कहा की जिस मुल्क को फारूक साहब ‘रक्षक’ बता रहे हैं, ज़रा वहां जाकर देखिए की उस रक्षक ने अपने हिस्से वाले कश्मीरियों का क्या हाल कर रखा है।
वहां अवाम आटे की एक बोरी और बिजली-पानी जैसे बुनियादी हकों के लिए सड़कों पर रो रही है और पाकिस्तानी सेना उन पर लाठियां और गोलियां बरसा रही है।
क्या फारूक अब्दुल्ला चाहते हैं की भारत के कश्मीरियों का भी वही हाल हो?
और तो और, इस बयान से इतनी भयंकर फजीहत हुई की हमेशा नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली कांग्रेस पार्टी को भी बगले झांकनी पड़ गईं।
कांग्रेस के नेताओं ने भी इस बयान से कन्नी काट ली क्योंकि उन्हें मालूम है की देश का मूड अब ऐसा है की अगर उन्होंने इस पाकिस्तान प्रेम का ज़रा सा भी समर्थन किया, तो बाकी देश में उनकी खटिया खड़ी हो जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की अचानक ऐसा क्या हो गया की फारूक साहब को पाकिस्तान की इतनी याद सताने लगी?
राज्य में तो अभी-अभी चुनाव हुए हैं, उनकी खुद की पार्टी (नेशनल कॉन्फ्रेंस) सत्ता में आ चुकी है, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ चुके हैं। तो फिर अचानक ये ज़हर क्यों उगला जा रहा है?
तिरंगे की छांव में बैठकर, भारत के टैक्सपेयर्स के पैसों से अपनी तिजोरियां भरकर, और उसी भारत की सुरक्षा एजेंसियों के साए में रहकर पाकिस्तान का गुणगान करने की यह जो दोगली सियासत है, ये किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
