वो नेता जिनको जनता ने बुलाया ‘सड़क वाले CM’, दूर-दराज के पहाड़ी गांवों में सड़क पहुंचाकर लोगों का दिल जीतने से लेकर क्रिकेट जमीन घोटाले में घिरने वाले हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री ‘प्रेम कुमार धूमल’

पहाड़ की सियासत का मिज़ाज भी बिल्कुल वहां के मौसम की तरह होता है। कब कौन सी हवा चले और तख्तापलट हो जाए, कोई नहीं जानता।

अगर आप 90 के दशक के हिमाचल की राजनीति को देखें, तो वहां सिर्फ एक ही नाम की गूंज हुआ करती थी- ‘राजा साहब’ यानी वीरभद्र सिंह। वो राजघराने से आते थे, उनका एक अलग ही शाही रुतबा था।

ऐसे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था की एक साधारण से फौजी परिवार में जन्मा लड़का, जो कॉलेज में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाता हो, वो एक दिन उस राजशाही दबदबे को सीधी टक्कर देगा।

प्रेम कुमार धूमल की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म की उस स्क्रिप्ट की तरह है, जिसमें हीरो अपनी मेहनत और सूझबूझ से सत्ता के शिखर तक पहुंचता है, जनता का मसीहा बनता है..

लेकिन फिर धीरे-धीरे कुछ ऐसे विवादों के भंवर में फंस जाता है की कहानी का अंत एक ट्रेजेडी (Tragedy) की तरह होता है।

चलिए शुरुआत से इस सफर के पन्ने पलटते हैं और जानते हैं की कैसे एक प्रोफेसर हिमाचल का ‘सड़क वाला सीएम’ बन गया।

फौजी पिता का बेटा और अंग्रेजी का प्रोफेसर जो राजशाही के सामने बन गया हिमाचल का ‘आम आदमी’ वाला मुख्यमंत्री

10 अप्रैल 1944… हिमाचल के हमीरपुर जिले का एक छोटा सा गांव है समीरपुर, यहीं प्रेम कुमार धूमल का जन्म हुआ था। उनके पिता कैप्टन महंत राम फौज में थे।

अब ज़ाहिर सी बात है, जिस घर में पिता फौजी हो, वहां का माहौल कैसा होगा! बचपन से ही धूमल के खून में वो फौजी अनुशासन और सादगी घुल गई थी।

गांव से ही शुरुआती पढ़ाई-लिखाई हुई और फिर वो जालंधर चले गए। वहां उन्होंने एमए (MA) और वकालत (LLB) की पढ़ाई पूरी की।

राजनीति में आने से पहले धूमल का सियासत से कोई लेना-देना नहीं था। वो जालंधर के ही एक प्राइवेट कॉलेज (दोआबा कॉलेज) में अंग्रेजी के प्रोफेसर बन गए थे।

आराम की ज़िंदगी चल रही थी। लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंज़ूर था। 80 के दशक में वो बीजेपी से जुड़े और भारतीय जनता युवा मोर्चा में काम करने लगे।

धूमल की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) उनकी छवि थी। वीरभद्र सिंह जहां एक ‘लार्जर देन लाइफ’ वाले नेता थे, जिनसे मिलने से पहले आम आदमी दस बार सोचता था, वहीं धूमल की छवि एकदम इसके उलट थी। वो एक पढ़े-लिखे, शांत और सौम्य स्वभाव वाले व्यक्ति थे।

वो पहाड़ के असली ‘आम आदमी’ वाले नेता बन गए। कोई भी गरीब किसान, कोई भी कर्मचारी उनके पास बिना किसी झिझक के अपनी अर्ज़ी लेकर जा सकता था।

इसी ‘पड़ोस वाले अंकल’ वाली छवि ने उन्हें जनता के बीच बेतहाशा लोकप्रिय कर दिया।

जब पंडित सुखराम के साथ मिलकर प्रेम कुमार धूमल ने कांग्रेस के अभेद्य किले में लगाई सेंध और पहली बार पहना ताज

90 का दशक खत्म होने को था। शांता कुमार के बाद बीजेपी हिमाचल में एक नए चेहरे की तलाश कर रही थी जो वीरभद्र सिंह को टक्कर दे सके। पार्टी ने दांव लगाया प्रेम कुमार धूमल पर।

साल 1998 के विधानसभा चुनाव का माहौल एकदम टाइट था। कांग्रेस और बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर थी। और इसी बीच एक तीसरी ताकत मैदान में थी-पंडित सुखराम की ‘हिमाचल विकास कांग्रेस’ (HVC)।

सुखराम जी कांग्रेस से ही अलग होकर अपनी पार्टी बनाए हुए थे और वो वीरभद्र सिंह से खार खाए बैठे थे। चुनाव के नतीजे आए तो किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। अब सरकार वो बनाता जिसे सुखराम का साथ मिलता।

यहीं पर धूमल ने अपनी गज़ब की राजनीतिक सूझबूझ दिखाई। कांग्रेस के किले को ढहाने के लिए उन्होंने पंडित सुखराम के साथ वो ऐतिहासिक गठबंधन कर लिया, जिसने रातों-रात हिमाचल की सियासत का पासा पलट दिया।

वीरभद्र सिंह देखते रह गए और धूमल ने अपनी पहली सरकार बना ली।

मार्च 1998 से लेकर मार्च 2003 तक उनकी ये पहली पारी चली। यह गठबंधन चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं था, लेकिन धूमल ने अपनी शांत और सुलझी हुई रणनीति से ना सिर्फ पूरे 5 साल सरकार चलाई, बल्कि खुद को हिमाचल में बीजेपी के सबसे बड़े और कद्दावर जननेता के रूप में स्थापित भी कर लिया।

पहाड़ों में गांव-गांव पहुंचाई पक्की सड़कें और जनता ने माथे पर सजा दिया ‘सड़क वाले सीएम’ का रुतबा

अगर आप कभी हिमाचल गए हैं, तो आपको पता होगा की वहां की ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, लेकिन उतनी ही मुश्किल भी।

पहाड़ और गहरी खाइयों वाले इस राज्य में विकास का सबसे बड़ा रोड़ा वहां की भौगोलिक स्थिति ही रही है। एक ज़माना था जब दूर-दराज के गांवों में अगर कोई बीमार पड़ जाए, तो उसे चारपाई पर लादकर मीलों दूर शहर तक लाना पड़ता था।

सेब उगाने वाले बागवानों का आधा माल तो मंडियों तक पहुंचने से पहले ही खड्डों और कच्ची सड़कों की वजह से खराब हो जाता था।

धूमल इस ज़मीनी दर्द को बहुत अच्छी तरह समझते थे। साल 2000 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ (PMGSY) लॉन्च की, तो धूमल ने इसका सबसे तगड़ा और शानदार इस्तेमाल किया।

उन्होंने ठान लिया की गांव-गांव तक डामर वाली पक्की सड़क जरूर पहुंचेगी।

उन्होंने केंद्र से फंड लिया और हिमाचल में सड़कों का ऐसा जाल बिछाया की देखते ही देखते तस्वीर बदल गई।

सेब बेल्ट (Apple Belt) के उन ऊंचाई वाले इलाकों से लेकर निचले हिमाचल के उन गांवों तक पक्की सड़कें पहुंच गईं, जहां के बुजुर्गों ने कभी अपनी ज़िंदगी में गाड़ी के पहिए नहीं देखे थे।

इन सड़कों ने सिर्फ दूरियां कम नहीं कीं, बल्कि पहाड़ की पूरी इकॉनमी (Economy) को बदल कर रख दिया। किसान अब अपनी फसल सीधे मंडियों तक पहुंचाने लगा। बीमारों को एंबुलेंस मिलने लगी।

धूमल का ये काम इतना ज़बरदस्त था की पहाड़ की जनता ने उन्हें एक नया नाम ही दे दिया- ‘सड़क वाले मुख्यमंत्री’। आज भी हिमाचल के किसी दूर-दराज के गांव में चले जाइए, जब भी सड़कों का ज़िक्र आता है, तो वहां के लोग धूमल जी को बड़े सम्मान के साथ याद करते हैं।

प्राइमरी स्कूलों की कायापलट से लेकर पॉलीथिन बैन तक, धूमल सरकार के वो काम जो आज भी मिसाल माने जाते हैं

सड़कों के अलावा अगर धूमल जी को किसी एक चीज़ के लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है, तो वो है शिक्षा के क्षेत्र में किया गया उनका ज़मीनी काम।

खुद एक प्रोफेसर रह चुके थे, इसलिए वो दर्द समझते थे की जब गांव के बच्चे टूटे-फूटे स्कूलों या पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ते हैं, तो उनका भविष्य कैसा होगा।

उन्होंने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया। धूमल सरकार ने नियम बना दिया की हिमाचल के हर प्राइमरी स्कूल में कम से कम 3 ‘पक्के कमरे’ तो होने ही चाहिए।

ये कोई छोटी बात नहीं थी। उस दौर में इस मॉडल की इतनी तारीफ हुई की देश के कई अन्य राज्यों ने भी इसे अपने यहाँ कॉपी करना शुरू कर दिया।

धूमल पहाड़ की उस ताज़ी और साफ हवा को भी बचाकर रखना चाहते थे। उन्होंने राज्य को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए पॉलीथिन पर पूरी तरह से बैन लगा दिया।

हिमाचल जैसे टूरिस्ट स्टेट में ये कदम उठाना बहुत बड़ी हिम्मत का काम था। पर्यावरण को बचाने की उनकी इसी दूरदृष्टि के लिए उनकी सरकार को प्रतिष्ठित ‘गोल्डन पीकॉक अवार्ड’ (Golden Peacock Award) से नवाज़ा गया।

जनता और मीडिया ने उन्हें एक नया ख़िताब दे दिया- ‘ग्रीन चीफ मिनिस्टर’ (Green CM)।

इसके साथ ही उनकी कुछ योजनाएं इतनी हिट रहीं की वो हर घर का हिस्सा बन गईं। जैसे ‘अटल स्कूल यूनिफॉर्म योजना’, जिसमें सरकारी स्कूल के बच्चों को मुफ्त में ड्रेस दी जाती थी।

और ‘अटल बिजली बचत योजना’, जिसके तहत राज्य भर में सीएफएल (CFL) बल्ब बांटे गए ताकि बिजली बचे और लोगों का बिल कम आए। ये सब ऐसे काम थे जिन्होंने धूमल को एक ऐसा नेता बना दिया जो आम आदमी की नब्ज़ पकड़ना जानता था।

बेटे अनुराग ठाकुर का क्रिकेट प्रेम और एचपीसीए (HPCA) जमीन घोटाले का वो दाग जिसने साख पर लगा दिया बट्टा

सियासत की राह कभी भी एकदम सीधी नहीं होती। जहां एक तरफ विकास के फूल खिल रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे विवादों के कांटे भी उगने लगे थे जिन्होंने धूमल जी की उस ‘बेदाग और आम आदमी’ वाली छवि पर सवाल खड़े कर दिए।

अगर आप क्रिकेट के फैन हैं, तो आपने हिमाचल के धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम की तस्वीरें ज़रूर देखी होंगी। बर्फ से ढकी धौलाधार पहाड़ियों के बीच बना वो स्टेडियम दुनिया के सबसे खूबसूरत मैदानों में गिना जाता है।

इस स्टेडियम को बनाने का विज़न धूमल जी के बड़े बेटे अनुराग ठाकुर का था, जो उस वक्त ‘हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन’ (HPCA) के अध्यक्ष थे।

स्टेडियम तो बहुत शानदार बन गया, लेकिन इसके पीछे की ज़मीन का जो खेल हुआ, वो धूमल सरकार के गले की फांस बन गया।

विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने आरोप लगाया की धूमल सरकार ने अपने ही बेटे के क्रिकेट एसोसिएशन (HPCA) को फायदा पहुँचाने के लिए बेशकीमती सरकारी ज़मीनें महज़ कौड़ियों के भाव यानी ‘टोकन लीज़’ (Token Lease) पर दे दीं।

कहा गया की कायदे-कानून ताक पर रखकर ये सारी मेहरबानी की गई।

अब राजनीति में तो ऐसी बातों को तूल मिलना ही था। इस मुद्दे ने इतना भयंकर सियासी बवाल खड़ा किया की जब सरकार बदली, तो इस मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज की गईं।

विजिलेंस की जांच बैठी और धूमल जी से लेकर अनुराग ठाकुर तक को कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े। हालांकि धूमल हमेशा यही कहते रहे की उन्होंने जो भी किया वो राज्य में खेल और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किया था..

लेकिन फिर भी, परिवारवाद और ज़मीन आवंटन का ये ऐसा दाग था जिसने उनकी ईमानदारी वाली चमक को थोड़ा फीका ज़रूर कर दिया।

हिमाचल की राजनीति का सबसे डरावना फोन टैपिंग कांड, जब नेताओं से लेकर पत्रकारों तक की जासूसी ने मचाया था हड़कंप

ज़मीन घोटाले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी की हिमाचल की राजनीति में एक ऐसा बम फूटा जिसने पूरे तंत्र को हिला कर रख दिया।

यह बात है उनके दूसरे कार्यकाल (2007 से 2012) की। इस कांड को आज भी हिमाचल के इतिहास का सबसे बड़ा जासूसी विवाद माना जाता है- मशहूर ‘फोन टैपिंग स्कैंडल’।

हुआ कुछ यूँ की पुलिस और सीआईडी (CID) महकमे पर आरोप लगा की धूमल सरकार के राज में बड़े पैमाने पर लोगों के फोन रिकॉर्ड किए जा रहे थे।

नियम के मुताबिक, स्टेट के होम डिपार्टमेंट ने सुरक्षा के लिहाज़ से सिर्फ 170 फोनों को सर्विलांस पर रखने (टैप करने) की परमिशन दी थी। लेकिन जब जांच हुई, तो पता चला की कंप्यूटर की हार्ड डिस्क में 1100 से ज़्यादा लोगों की कॉल रिकॉर्डिंग्स मौजूद थीं!

जिन लोगों के फोन सुने जा रहे थे, उनमें सिर्फ विपक्ष (कांग्रेस) के नेता ही नहीं थे, बल्कि बीजेपी के अपने बागी नेता, बड़े-बड़े आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अफसर, और यहाँ तक की कई नामी पत्रकार भी शामिल थे।

जब ये भंडाफोड़ हुआ, तो मानो भूचाल आ गया। लोगों की निजता (Privacy) के इस खुले उल्लंघन ने धूमल सरकार की बहुत किरकिरी कराई।

हर कोई एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगा था। कांग्रेस ने इसे सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनाया और आरोप लगाया की धूमल जी अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

भले ही बाद में इसमें कई कानूनी दांव-पेंच चलते रहे, लेकिन इस जासूसी कांड ने जनता के बीच एक अविश्वास पैदा कर दिया था, जिसका नुकसान उन्हें उठाना ही था।

PR एजेंसी पर सरकारी खजाने की बर्बादी और कर्मचारियों की नाराजगी जो चुनाव में पड़ गई भारी

राजनीति में अक्सर ऐसा होता है की जब आप सत्ता के शिखर पर होते हैं, तो ज़मीनी हकीकत से थोड़ा दूर हो जाते हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे थे।

धूमल सरकार को लगने लगा था की उनके विकास के कामों की गूंज हर जगह नहीं पहुँच पा रही है। अपनी ‘इमेज बिल्डिंग’ और उपलब्धियां गिनाने के लिए सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया जो बाद में उसी के गले की हड्डी बन गया।

धूमल सरकार ने दिल्ली की एक बड़ी पीआर (PR) एजेंसी को हायर किया। बात सिर्फ पीआर एजेंसी को हायर करने की नहीं थी, बवाल इस बात पर कटा की इसके लिए सरकारी खजाने से लगभग 40 लाख रुपये खर्च कर दिए गए।

विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया। कांग्रेस ने सड़कों पर उतरकर जनता से कहना शुरू कर दिया की “देखिए, आपके टैक्स का पैसा मुख्यमंत्री जी अपनी पब्लिसिटी और अपना चेहरा चमकाने में उड़ा रहे हैं।”

एक ऐसे राज्य में जहां आम आदमी पाई-पाई जोड़कर चलता हो, वहां यह दांव बहुत उल्टा पड़ गया।

और अगर हिमाचल की राजनीति का एक सबसे बड़ा सच आपको बताऊं, तो वो ये है कि यहाँ ‘सरकारी कर्मचारी’ ही सरकार बनाते हैं और वही सरकार गिराते हैं।

धूमल सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों में कर्मचारियों में भारी रोष पनप रहा था, खासकर पीटीए (Parent Teacher Association) शिक्षकों में।

पीटीए शिक्षक लंबे समय से अपनी नौकरी पक्की करने (Regularization) की मांग कर रहे थे। उम्मीद थी की प्रोफेसर रह चुके सीएम उनकी पीड़ा समझेंगे।

लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा। आरोप लगा की इनकी फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी गईं और जब इन शिक्षकों ने सड़कों पर उतरकर अपना हक मांगना चाहा, तो उन पर लाठियां भांजी गईं।

उस लाठीचार्ज ने आग में घी का काम किया। कर्मचारियों के इस बहुत बड़े वोट बैंक ने धूमल सरकार से मुंह मोड़ लिया, जिसका सीधा असर 2012 के चुनावी नतीजों में दिखा और सत्ता उनके हाथ से फिसल गई।

जब पार्टी ने तो मार ली बाजी लेकिन अपना ही चेला दे गया मात, 2017 की वो दर्दनाक हार जिसने खत्म कर दिया एक शानदार राजनीतिक सफर

राजनीति में हर नेता की ज़िंदगी में एक ऐसा चुनाव ज़रूर आता है जो उसके पूरे करियर का क्लाइमैक्स (Climax) तय कर देता है। प्रेम कुमार धूमल के लिए वो चुनाव था साल 2017 का विधानसभा चुनाव।

ये वो दौर था जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी। बीजेपी आलाकमान ने बहुत सोच-समझकर चुनाव से ठीक पहले प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री का चेहरा (CM Face) घोषित कर दिया।

धूमल जी ने पूरे राज्य में धुआंधार रैलियां कीं। हवा पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में बह रही थी। जब नतीजे आए, तो बीजेपी ने 68 में से 44 सीटें जीतकर बंपर बहुमत हासिल कर लिया।

पार्टी और समर्थकों में जश्न का माहौल था, ढोल-नगाड़े बज रहे थे। लेकिन… हमीरपुर जिले की एक सीट ऐसी थी जहां सन्नाटा पसरा था। वो सीट थी ‘सुजानपुर’, जहां से खुद प्रेम कुमार धूमल चुनाव लड़ रहे थे।

पार्टी तो चुनाव जीत गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा खुद अपनी ही सीट से चुनाव हार गया! राजनीति के इतिहास में ये एक ऐसा महा-उलटफेर था जिसने सबको सन्न कर दिया।

और सबसे बड़ी ट्रेजेडी देखिए, उन्हें हराने वाला कोई और नहीं, बल्कि उनके ही पुराने और सबसे खास सिपहसालार रहे राजिंदर राणा (Rajinder Rana) थे।

एक वक्त था जब राणा को धूमल जी का ‘दायां हाथ’ माना जाता था, लेकिन राजनीति के खेल में गुरु और चेले आमने-सामने आ गए थे और इस बार चेले ने बाज़ी मार ली थी।

सुजानपुर की उस एक हार ने सब कुछ बदल कर रख दिया। बीजेपी को नया मुख्यमंत्री चुनना पड़ा (जयराम ठाकुर को कमान मिली)।

और प्रेम कुमार धूमल, जो एक समय पर हिमाचल की राजनीति के बेताज बादशाह हुआ करते थे.. धीरे-धीरे राज्य की सक्रिय और शीर्ष राजनीति से दूर (sidelined) हो गए।

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