अपने देश में “चाइनीज”: पूर्वोत्तर के लोगों के लिए सख्त कानून क्यों जरूरी है

दिल्ली के एक कंटेंट क्रिएटर का 52 सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया। उसमें एक 19 साल का युवक था। वह त्रिपुरा के गोमती जिले से था और काम के सिलसिले में अहमदाबाद में था। वीडियो में उसे “चाइनीज” कहा गया। उसके राज्य का नाम बिगाड़कर बोला गया। उसके चेहरे पर मजाक उड़ाया गया। आसपास के लोग हंसे।

यह कोई पहली घटना नहीं थी। पूर्वोत्तर के लोग सालों से अपने ही देश में ऐसे शब्दों का सामना करते आए हैं। लेकिन इस बार वीडियो बड़े ऑडियंस तक पहुंच गया। क्रिएटर के पास लाखों फॉलोअर्स थे। जब माफी आई, तो उसमें “स्क्रिप्टेड मजाक” वाला बचाव था। पुलिस ने कार्रवाई की। गिरफ्तारी हुई। फिर भी एक सवाल बना रहा। क्या अपने देश में किसी नागरिक को उसकी शक्ल देखकर विदेशी कहना सिर्फ मनोरंजन है?

यह लेख उसी सवाल पर है। वीडियो क्या दिखाता था। क्रिएटर ने क्या कहा। कानून और राजनीति ने कैसे प्रतिक्रिया दी। और क्यों बार–बार “चाइनीज” कहे जाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

वीडियो में क्या दिखा

वीडियो सिर्फ 52 सेकंड का था। लेकिन उन 52 सेकंडों में जो कुछ दिखा, वह साधारण मजाक नहीं था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह क्लिप अहमदाबाद में करीब एक महीने पहले फिल्म हुई थी। जगह पीले रंग के टेंट या कैनोपी के नीचे थी। आसपास कुछ लोग बैठे या खड़े थे। एक नौजवान बैंगनी रंग की शर्ट पहने खड़ा था। उसके सामने अमीर शोकीन था।

वीडियो में शोकीन नौजवान का हाथ पकड़े हुए दिखता है। वह उससे पूछता है कि क्या वह चीन का प्रेसिडेंट है। कुछ रिपोर्ट्स में “चिंगपिंग” जैसे शब्द का जिक्र भी है। जब नौजवान साफ कहता है कि वह त्रिपुरा से है, तब भी सवाल नहीं रुकता। शोकीन उसकी शक्ल पर टिप्पणी करता है। उसे “चाइनीज” कहता है। उसकी सूरत को माइकल जैक्सन से तुलना करता है। साथ ही त्रिपुरा नाम को अश्लील तरीके से बिगाड़कर बोलता है। रिपोर्ट्स में इस बिगाड़े हुए नाम को “च**टपुरा” जैसा बताया गया है।

नौजवान के चेहरे पर असहजता साफ दिखती है। वह बार–बार मुस्कुराता है, लेकिन मुस्कान तनाव वाली लगती है। एक समय वह अपना फोन देखने लगता है, जैसे बात टालना चाहता हो। शोकीन फिर भी हाथ नहीं छोड़ता। कुछ रिपोर्ट्स और शिकायतों में यह भी आरोप लगाया गया है कि इस दौरान अनुचित शारीरिक संपर्क हुआ। हाथ पकड़ना, शरीर के निजी हिस्से को छूने की कोशिश और यौन इशारों वाली टिप्पणियां शिकायतों में शामिल हैं। ये आरोप अभी जांच के अधीन हैं।

आसपास बैठे या खड़े लोग हंसते नजर आते हैं। हंसी निजी नहीं है। इसे कैमरे में रिकॉर्ड किया गया है। पूरा दृश्य जानबूझकर कंटेंट के रूप में बनाया गया लगता है।

बाद में नौजवान का बयान सामने आया। उसने कहा कि उसे पता नहीं था कि उसे फिल्माया जा रहा है। उस समय वह परेशान और अपमानित महसूस कर रहा था। बाद में उसने कहा कि उसने शोकीन को माफ कर दिया है। लेकिन उसकी यह बात कि उसे फिल्माए जाने का इल्म नहीं था, “यह स्क्रिप्टेड और सहमति वाला मजाक था” वाले दावे को कमजोर करती है।

वीडियो में कोई लंबी बातचीत नहीं है। कोई गंभीर बहस नहीं है। सिर्फ एक नौजवान है जो अपने राज्य का नाम बताता है, और उसके चेहरे, शक्ल और राज्य को हंसी का सामान बना दिया जाता है। 19 साल का युवक गोमती जिले से था और हाउसकीपिंग का काम करता था। शोकीन का दावा है कि वह उसके दोस्त के कैफे में काम करता था। लेकिन जो कुछ रिकॉर्ड हुआ, उसमें नौजवान सवालों के जवाब देता दिखता है, मजाक में शामिल होकर हंसता नहीं दिखता।

52 सेकंड में जो दिखा, वह सिर्फ शब्दों का अपमान नहीं था। यह किसी की पहचान को, उसके राज्य को और उसके चेहरे को सार्वजनिक रूप से मजाक का विषय बनाने का दृश्य था। साथ ही शारीरिक संपर्क के आरोपों ने इसे और गंभीर बना दिया। यही वजह है कि यह छोटा सा क्लिप इतनी तेजी से फैल गया और इतनी तीखी प्रतिक्रिया हुई।

क्रिएटर और उसका जवाब

अमीर शोकीन, जिसका असली नाम मुहम्मद अमीर बताया जाता है, दिल्ली का रहने वाला कंटेंट क्रिएटर है। उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर उस समय करीब 1.42 लाख फॉलोअर्स थे। उसने खुद दावा किया है कि उसने 2000 से ज्यादा वीडियो बनाए हैं। उसके वीडियो ज्यादातर स्ट्रीट–स्टाइल कॉमेडी और प्रैंक जैसे कंटेंट के होते हैं, जिनमें वह आम लोगों से बातचीत करता दिखता है।

दिल्ली पुलिस ने उसे सदर बाजार इलाके का “बैड कैरेक्टर” बताया। अधिकारियों के अनुसार 2005 से 2023 के बीच उसके खिलाफ कई मामले दर्ज रहे हैं। इनमें मारपीट, ब्राउलिंग और छेड़छाड़ जैसे आरोप शामिल हैं। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक वह पहले भी कई थानों में केस में नामजद रहा है। यह पृष्ठभूमि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वीडियो वायरल होने के बाद कई लोगों ने कहा कि यह कोई एक बार की गलती नहीं लगती।

जब वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया और आलोचना बढ़ने लगी, तब शोकीन ने माफी के वीडियो पोस्ट किए। उसने कहा कि पूरा क्लिप “स्क्रिप्टेड” था और सिर्फ मनोरंजन के लिए बनाया गया था। उसने दावा किया कि वह नौजवान को पहले से जानता था। उसके अनुसार युवक उसके दोस्त के कैफे में अहमदाबाद में काम करता था। शोकीन ने कहा कि दोनों मजाक कर रहे थे और उसका किसी को अपमानित करने का इरादा नहीं था। उसने हाथ जोड़कर माफी मांगी और कहा कि अगर किसी की भावनाएं आहत हुईं तो वह दिल से माफी चाहता है। उसने त्रिपुरा के लोगों और मुख्यमंत्री से भी माफी मांगी।

लेकिन यह सफाई गुस्से को कम नहीं कर पाई। कई कारण थे। पहला, नौजवान का बाद का बयान। उसने कहा कि उसे पता नहीं था कि उसे फिल्माया जा रहा है। वह उस समय परेशान था। यह बात “दोनों सहमति से मजाक कर रहे थे” वाले दावे से मेल नहीं खाती। दूसरा, वीडियो में जो शब्द इस्तेमाल हुए और जिस तरह शरीर पर संपर्क दिखा, उसे सिर्फ हल्के मजाक के रूप में स्वीकार करना मुश्किल था। तीसरा, क्रिएटर के पास पहले से बड़ा ऑडियंस था। जब ऐसा वीडियो 1.42 लाख फॉलोअर्स तक पहुंचता है, तो “यह सिर्फ मजाक था” कहना कमजोर लगता है।

कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि अगर सच में स्क्रिप्टेड और सहमति वाला वीडियो था, तो बाद में माफी क्यों मांगी? और अगर माफी मांगी, तो पुलिस पूछताछ में “स्क्रिप्टेड” वाले दावे को क्यों खारिज किया गया? रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस ने जांच के दौरान शोकीन के इस दावे को सही नहीं माना।

शोकीन का माफी वाला वीडियो भी आलोचना का शिकार हुआ। कई दर्शकों ने कहा कि माफी में जिम्मेदारी लेने के बजाय बचाव ज्यादा दिख रहा था। “मैं नहीं जानता था कि त्रिपुरा कहां है” जैसी बातें और “यह तो मजाक था” वाला दोहराव लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाया। खासकर पूर्वोत्तर से जुड़े संगठनों और आम लोगों ने कहा कि किसी की शक्ल और राज्य को सार्वजनिक रूप से मजाक का विषय बनाना और फिर उसे स्क्रिप्टेड बताना, पुराना और परिचित पैटर्न है।

इस पूरे जवाब में एक बात साफ रही। क्रिएटर ने वीडियो बनाने का निर्णय लिया। उसने रिकॉर्ड किया। उसने अपलोड किया। और जब प्रतिक्रिया हुई, तब उसने कहा कि यह सिर्फ मनोरंजन था। यह तर्क उन लोगों को मंजूर नहीं हुआ जिनके लिए “चाइनीज” कहे जाना या राज्य का नाम बिगाड़ना सिर्फ मजाक नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अपमान है।

कानूनी और राजनीतिक प्रतिक्रिया

वीडियो वायरल होने के कुछ घंटों के अंदर ही कानूनी और राजनीतिक प्रतिक्रिया शुरू हो गई। यह मामला सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा।

दिल्ली पुलिस ने स्वतः संज्ञान लिया। सदर बाजार थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 192, 196, 352 और 353 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। ये धाराएं उकसावे से दंगा कराने, विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने, जानबूझकर अपमान करने और सार्वजनिक उपद्रव पैदा करने वाले बयानों से जुड़ी हैं। पुलिस ने पहले शोकीन के घर पर छापा मारा, लेकिन वह वहां नहीं मिला। बाद में उसे करोल बाग से गिरफ्तार किया गया, जहां वह रिश्तेदार के यहां छिपा हुआ बताया गया। गिरफ्तारी 22 अक्टूबर को हुई।

स्पेशल पुलिस यूनिट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन (स्पूनर) इस मामले में शुरू से सक्रिय रही। दिल्ली पुलिस की साइबर सेल की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (आईएफएसओ) यूनिट ने वीडियो की तकनीकी जांच संभाली। अधिकारियों ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत, मूल रिकॉर्डिंग, मेटाडेटा और अकाउंट डिटेल्स को सुरक्षित किया जाएगा।

त्रिपुरा में भी कार्रवाई हुई। त्रिपुरा पुलिस ने अपनी अलग एफआईआर दर्ज की। रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें भारतीय न्याय संहिता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और संभवतः अनुसूचित जाति–जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं शामिल की गईं। त्रिपुरा पुलिस की एक टीम दिल्ली भेजी गई ताकि ट्रांजिट रिमांड लिया जा सके और दिल्ली पुलिस के साथ समन्वय हो सके।

राजनीतिक स्तर पर प्रतिक्रिया और तेज रही। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डॉ. माणिक साहा ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे दिल्ली पुलिस से तालमेल करके उचित कार्रवाई सुनिश्चित करें। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक बयान दिया। उन्होंने कहा कि इस व्यक्ति को सजा मिलेगी और दिल्ली तथा त्रिपुरा पुलिस उसे कड़ी सबक सिखाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में ऐसे व्यवहार को सहन करने वाले लोग भी नफरत फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं।

छात्र और युवा संगठनों ने भी शिकायतें दर्ज कराईं। त्रिपुरा स्टूडेंट्स फोरम दिल्ली ने स्पूनर के संयुक्त आयुक्त को शिकायत दी। इसमें नस्लीय उत्पीड़न, अपमान और अनुचित शारीरिक संपर्क के आरोप लगाए गए। यूथ टिप्रा फेडरेशन ने भी आगारतला में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने इसे नस्लीय उत्पीड़न, साइबर बुलिंग और त्रिपुरा के लोगों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी बताया।

एक अप्रमाणित दावा भी सामने आया। त्रिपुरा की भाजपा इकाई ने कहा कि शोकीन कांग्रेस से जुड़ा है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे अप्रमाणित ही माना जा रहा है।

इस पूरी प्रतिक्रिया में दो बातें साफ दिखीं। पहली, जब पूर्वोत्तर से जुड़ा मुद्दा वायरल होता है और राजनीतिक नेतृत्व बोलता है, तो पुलिस दो राज्यों में कार्रवाई करती है। दूसरी, गिरफ्तारी और एफआईआर के बावजूद कई लोगों ने कहा कि ऐसी घटनाएं बार–बार होती हैं। सिर्फ एक मामले में सख्ती काफी नहीं है। कानून लागू होने की रफ्तार और नस्लीय अपमान को लेकर साफ प्रावधानों की जरूरत अब भी बनी हुई है।

घटनाक्रम

  • सितंबर 2026 मध्य: 52 सेकंड का वीडियो अहमदाबाद में फिल्म हुआ।
  • 21 अक्टूबर 2026: क्लिप सोशल मीडिया पर फैला। त्रिपुरा के छात्र संगठनों ने शिकायत दर्ज कराई। किरेन रिजिजू ने निंदा की।
  • 22 अक्टूबर 2026: दिल्ली पुलिस ने स्वतः एफआईआर दर्ज की और करोल बाग से गिरफ्तारी की। त्रिपुरा पुलिस ने अपनी एफआईआर दर्ज की और टीम भेजी। मुख्यमंत्री माणिक साहा ने समन्वय का निर्देश दिया।
  • बाद के दिन: आईएफएसओ और स्पूनर की भागीदारी में जांच जारी। युवक का बयान सार्वजनिक हुआ कि उसे फिल्माए जाने का पता नहीं था और बाद में माफी दे दी।

इतिहास: अपने ही देश में “चाइनीज” कहे जाना

पूर्वोत्तर के लोगों को यह दशकों से सहना पड़ता है। उनकी शक्ल देखकर मुख्य भूमि के कई लोग उन्हें विदेशी मान लेते हैं। दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और दूसरे शहरों के बाजार, हॉस्टल, दफ्तर और सड़कों पर “चाइनीज”, “चिंकी”, “चिंग–चोंग” और “मोमो” जैसे शब्द इस्तेमाल होते रहे हैं। कमरा ढूंढने गए छात्रों से कहा जाता है कि मकान मालिक “चाइनीज” को किराए पर नहीं देते। मजदूरों से पूछा जाता है कि वे अपने देश वापस क्यों नहीं जाते। यात्रियों को राष्ट्रीयता के बारे में रोका और पूछा जाता है। यह पैटर्न इतना पुराना है कि कई युवा पहले से इसकी उम्मीद करके मुख्य शहरों में आते हैं।

सबसे यादगार मामलों में से एक 2014 में दिल्ली में निदो तनियाम की मौत है। अरुणाचल प्रदेश के 19 साल के छात्र को लाजपत नगर में उनकी हेयरस्टाइल और शक्ल के लिए मजाक उड़ाया गया। विवाद बढ़ा। उन्हें पीटा गया और बाद में उनकी मौत हो गई। इस मामले से विरोध हुआ और बेजबरुआ कमेटी बनी। कमेटी ने पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ नस्लीय गालियों को स्पष्ट अपराध बनाने और सजा तय करने की सिफारिश की। कुछ प्रशासनिक कदम हुए। मजबूत कानूनी प्रावधान नहीं बने। कोविड के दौरान इन्हीं चेहरों को “कोरोना” कहा गया। कई शहरों में गाली–गलौज, सेवा से इनकार और शारीरिक हमलों की रिपोर्ट आई। मकान और नौकरी में रोजमर्रा का भेदभाव जारी है।

अमीर शोकीन का वीडियो नई समस्या नहीं लाया। उसने सिर्फ एक घटना रिकॉर्ड की और बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचा दी। गोमती के 19 साल के हाउसकीपिंग वर्कर से अहमदाबाद में पूछा गया कि क्या वह चीन का प्रेसिडेंट है। भारत के नागरिक को अपने देश में होने का सबूत नहीं देना चाहिए। जब सबूत अलग शक्ल हो, तो मांग खुद समस्या बन जाती है।

सख्त कानून और प्रवर्तन की जरूरत क्यों

इस मामले में बीएनएस की मौजूदा धाराएं इस्तेमाल हो रही हैं। दुश्मनी फैलाने और जानबूझकर अपमान वाली धाराएं नस्लीय टिप्पणियों को कवर कर सकती हैं। अगर युवक अनुसूचित जनजाति समुदाय से है और तथ्य मेल खाते हैं तो एससी/एसटी अधिनियम भी लागू हो सकता है। ये औजार मौजूद हैं। फिर भी ऐसी घटनाओं का दोहराव दिखाता है कि रोजमर्रा के व्यवहार को बदलने के लिए ये काफी नहीं हैं। जब 1.42 लाख फॉलोअर्स वाला क्रिएटर किसी को फिल्माकर उसके राज्य का नाम बिगाड़े, उसे चाइनीज कहे और बाद में स्क्रिप्टेड मनोरंजन का दावा करे, तो डर का असर कमजोर रहता है।

“यह सिर्फ मजाक था” वाली दलील साधारण आधार पर गिरती है। जो मजाक एक व्यक्ति को उसकी शक्ल या राज्य के कारण हमेशा हंसी का पात्र बनाए, वह आपसी नहीं होता। जब व्यक्ति कहता है कि उसे फिल्माए जाने का पता नहीं था, तो सहमति का दावा टूट जाता है। प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम मजबूत प्रतिक्रिया वाले क्लिप को बढ़ावा देते हैं। क्रिएटर को व्यूज मिलते हैं। फिल्माए गए व्यक्ति को सार्वजनिक अपमान मिलता है जो नौकरी या हॉस्टल में साथ चल सकता है। ताकत का फर्क साफ है। एक तरफ ऑडियंस और एडिटिंग टूल हैं। दूसरी तरफ 19 साल का मजदूर है।

पूर्वोत्तर की पहचान को निशाना बनाने वाली नस्लीय गालियों के लिए स्पष्ट, सख्त और लगातार लागू होने वाले कानूनी नतीजे लागत बढ़ाएंगे। ऐसे वीडियो होस्ट और बढ़ा–चढ़ाकर दिखाने वाले प्लेटफॉर्म्स की भी जिम्मेदारी बनती है। जब कोई क्लिप पूरे दिन तक फैलने के बाद पुलिस एक्शन में आता है, नुकसान हो चुका होता है। जो प्रवर्तन वायरल होने या मंत्री के पोस्ट का इंतजार करता है, वह अगले युवा के लिए भरोसेमंद सुरक्षा नहीं है।

व्यापक असर

त्रिपुरा और दिल्ली पुलिस का तालमेल सकारात्मक संकेत है। यह दिखाता है कि क्षेत्र से आई शिकायत राजधानी में कार्रवाई ला सकती है। पूर्वोत्तर से पढ़ने या काम करने आए दूसरे युवाओं के लिए यह सीमित राहत है। कई लोग बिना वीडियो बने वही टिप्पणियां सुनते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी और गरिमा के अधिकार के बीच तनाव वास्तविक है। अभिव्यक्ति की आजादी राय और आलोचना की रक्षा करती है। यह राज्य को यह अधिकार नहीं देती कि किसी की जाति या राज्य को बिना नतीजे के सार्वजनिक मजाक का सामान बना दिया जाए। युवक का व्यक्तिगत फैसला कि वह माफ कर दे और राज्य का फैसला कि मामला आगे बढ़ाए, दोनों टिक सकते हैं। माफी व्यक्तिगत है। बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचे रिकॉर्डेड कृत्य की जवाबदेही सार्वजनिक है।

त्रिपुरा, मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और दूसरे राज्यों के युवा मजदूर और छात्र पढ़ाई और नौकरी के लिए मुख्य शहरों में आते रहते हैं। वे होटल, अस्पताल, कॉल सेंटर और विश्वविद्यालयों में योगदान देते हैं। कई लोग कुछ साल बाद घर लौट जाते हैं क्योंकि रोज विदेशी माने जाने का अनुभव भारी पड़ जाता है। 19 साल के युवक से चीन का प्रेसिडेंट पूछने वाला वीडियो उस बोझ की एक और याद दिलाता है।

कौन से सख्त कानून बनने चाहिए

मुख्य रूप से नस्लीय अपमान और भेदभाव को साफ और सख्त अपराध बनाने वाले प्रावधान चाहिए। 2014 में बेजबरुआ कमेटी ने इसी दिशा में सिफारिशें दी थीं। उनमें से कई आज भी पूरी तरह लागू नहीं हुई हैं।

मुख्य सिफारिशें

नस्लीय गाली को अपराध बनाना

“चिंकी”, “चाइनीज”, “मोमो” जैसे शब्दों को, जब वे जानबूझकर किसी की शक्ल या क्षेत्र के आधार पर अपमान करने के लिए इस्तेमाल किए जाएं, अलग से अपराध घोषित किया जाए। इसके लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) में नई धाराएं जोड़ी जाएं या मौजूदा धाराओं को मजबूत किया जाए। बेजबरुआ कमेटी ने आईपीसी की धारा 153C और 509A जैसी नई धाराओं का सुझाव दिया था।

सजा साफ और कड़ी हो

सिर्फ जुर्माना नहीं, बल्कि जेल की सजा का प्रावधान हो। खासकर तब जब अपमान सार्वजनिक रूप से, वीडियो के जरिए, या बड़े ऑडियंस के सामने किया जाए। बार–बार अपराध करने पर सजा बढ़ जाए।

तेज जांच और सुनवाई

ऐसे मामलों की जांच 60 दिनों में पूरी हो और सुनवाई 90 दिनों में हो। फास्ट–ट्रैक कोर्ट या प्राथमिकता वाली सुनवाई का प्रावधान हो।

सभी बड़े शहरों में विशेष इकाई

स्पूनर जैसी इकाई सिर्फ दिल्ली में न रहे। मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता और दूसरे शहरों में भी नॉर्थ ईस्ट सेल और हेल्पलाइन हो।

प्लेटफॉर्म की जवाबदेही

सोशल मीडिया पर नस्लीय अपमान वाला कंटेंट फैलाने पर प्लेटफॉर्म को जल्दी कार्रवाई करने की जिम्मेदारी तय की जाए। बार–बार ऐसा कंटेंट डालने वाले अकाउंट पर सख्ती हो।

क्यों ये जरूरत है

अभी कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता की सामान्य धाराओं (जैसे 192, 196, 352, 353) के तहत होती है। ये धाराएं काम तो करती हैं, लेकिन नस्लीय अपमान को अलग से पहचान नहीं देतीं। नतीजा यह होता है कि आरोपी आसानी से “मजाक था” कहकर बचने की कोशिश करता है। साफ कानून होने से यह बचाव कमजोर पड़ता है और पीड़ित को ज्यादा भरोसा होता है कि उसकी शिकायत गंभीरता से ली जाएगी।

बेजबरुआ कमेटी की रिपोर्ट में ये बातें साफ लिखी गई थीं। समस्या यह है कि सिफारिशें आने के दस साल बाद भी व्यापक केंद्रीय कानून नहीं बना है। कई विशेषज्ञ और पूर्वोत्तर के संगठन कहते हैं कि बिना साफ कानूनी प्रावधान के सिर्फ प्रशासनिक कदम काफी नहीं पड़ते।

अपने ही देश में “चाइनीज” कहे जाने का मतलब

जब भारत का कोई नागरिक पूर्वोत्तर से आता है और उसे अपने ही देश में “चाइनीज”, “चिंकी” या “चीन का प्रेसिडेंट” कहा जाता है, तो यह सिर्फ एक शब्द नहीं होता। यह उस व्यक्ति को बाहरी घोषित करने जैसा है।

पूर्वोत्तर के लोग भारत के नागरिक हैं। उनके पास वही संविधान है, वही पासपोर्ट है, वही अधिकार हैं। फिर भी उनकी शक्ल देखकर कई लोग उन्हें विदेशी मान लेते हैं। यह बात दशकों से चल रही है। दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और दूसरे शहरों में छात्र, मजदूर और यात्री रोज ऐसे शब्दों का सामना करते हैं। मकान किराए पर नहीं मिलता। नौकरी में भेदभाव होता है। सड़क पर पूछा जाता है कि वे अपने देश क्यों नहीं लौट जाते।

2014 में अरुणाचल के छात्र निदो तनियाम को दिल्ली में शक्ल और हेयरस्टाइल पर मजाक उड़ाया गया। बात बढ़ी और उनकी मौत हो गई। उसके बाद बेजबरुआ कमेटी बनी। कमेटी ने साफ कहा था कि “चिंकी” और “चाइनीज” जैसे शब्दों को अपराध बनाया जाए और सजा तय की जाए। सिफारिशें आईं। कुछ प्रशासनिक कदम हुए। लेकिन सख्त और साफ कानूनी प्रावधान आज तक पूरी तरह लागू नहीं हुए।

क्यों सख्त कानून चाहिए

मौजूदा कानूनों में दुश्मनी फैलाने या अपमान की धाराएं हैं। अमीर शोकीन वाले मामले में भी इन्हीं का इस्तेमाल हुआ। लेकिन समस्या यह है कि ये धाराएं रोजमर्रा के व्यवहार को रोकने में काफी नहीं साबित हुईं। जब कोई क्रिएटर बड़े ऑडियंस के सामने किसी की शक्ल और राज्य को मजाक बनाता है और बाद में कहता है कि “यह सिर्फ मजाक था”, तो डर का असर कमजोर रहता है।

सख्त कानून का मतलब यह नहीं है कि हर छोटी बात पर केस हो जाए। इसका मतलब है कि नस्लीय गाली, जो किसी को उसके चेहरे या राज्य के आधार पर विदेशी घोषित करे, उसके लिए साफ सजा हो। जब सजा साफ और लगातार लागू हो, तब लोग ऐसे कंटेंट बनाने से पहले सोचते हैं। प्लेटफॉर्म भी ज्यादा जवाबदेह होते हैं।

अपने देश में “चाइनीज” कहे जाना सिर्फ अपमान नहीं है। यह यह सवाल खड़ा करता है कि क्या भारत में सभी नागरिक बराबर हैं, या कुछ लोगों को हर बार अपना होना साबित करना पड़ता है। जब तक इस सवाल का जवाब सख्त कानून और उसके लागू होने से नहीं मिलेगा, पूर्वोत्तर के युवा मुख्य शहरों में पढ़ने और काम करने के बावजूद खुद को पूरा नागरिक महसूस नहीं कर पाएंगे।

सिर्फ कानून बनाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।

कानून जरूरी है, लेकिन अकेला पर्याप्त नहीं है।

जब कोई शब्द या व्यवहार बार–बार अपमान पैदा करता है और उसे “मजाक” कहकर बचाया जाता है, तब कानून से एक साफ संदेश जाता है। यह बताता है कि “चाइनीज” या “चिंकी” कहना स्वीकार्य नहीं है। सजा का डर कुछ लोगों को रोक सकता है। क्रिएटर और आम लोग दोनों सोचने लगते हैं। अमीर शोकीन वाले मामले में भी मौजूदा धाराओं के तहत कार्रवाई हुई। बिना कानून के पुलिस के पास इतनी सीधी कार्रवाई का आधार नहीं रहता।

लेकिन इतिहास दिखाता है कि सिर्फ कानून काफी नहीं होता।

2014 में निदो तनियाम की मौत के बाद बेजबरुआ कमेटी ने सख्त प्रावधानों की सिफारिश की थी। कुछ प्रशासनिक कदम हुए। स्पूनर जैसी इकाई बनी। हेल्पलाइन शुरू हुई। फिर भी नस्लीय गाली–गलौज और भेदभाव की घटनाएं रुक नहीं पाईं। कई मामलों में सजा दर बहुत कम रही है। शिकायत दर्ज होती है, लेकिन आरोप साबित करना मुश्किल होता है। गवाह पीछे हट जाते हैं। “यह तो मजाक था” वाला बचाव बार–बार काम करता है।

कानून से क्या बदल सकता है और क्या नहीं

कानून से ये बातें बेहतर हो सकती हैं:

  • अपमान को गंभीरता से लिया जाना
  • बड़े ऑडियंस वाले क्रिएटर पर जवाबदेही
  • शिकायत करने वाले को थोड़ा ज्यादा सुरक्षा का अहसास
  • प्लेटफॉर्म पर दबाव

कानून से ये बातें अपने आप नहीं बदलतीं:

  • लोगों की सोच कि पूर्वोत्तर के लोग “अलग” दिखते हैं
  • स्कूलों और कॉलेजों में पूर्वोत्तर के इतिहास और संस्कृति की कमी
  • रोजमर्रा की छोटी–छोटी टिप्पणियां जो कानूनी मामला नहीं बनतीं
  • मकान मालिकों का भेदभाव या नौकरी में अनौपचारिक पक्षपात

वास्तविक बदलाव तब आता है जब तीन चीजें साथ चलें। पहला, साफ और लागू होने वाला कानून। दूसरा, पुलिस और अदालतों की तेज और लगातार कार्रवाई। तीसरा, शिक्षा और सामाजिक चेतना। जब बच्चे स्कूल से यह सीखें कि पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा है और वहां के लोग विदेशी नहीं हैं, तब शब्दों का इस्तेमाल बदलता है।

संक्षेप में कहें तो कानून समस्या का एक हिस्सा हल कर सकता है। यह जवाबदेही बनाता है और “मजाक” के नाम पर अपमान को थोड़ा मुश्किल करता है। लेकिन पूरे समाज की सोच बदलने के लिए कानून के साथ जागरूकता, शिक्षा और रोजमर्रा की जवाबदेही भी चाहिए। सिर्फ कानून बना देने से लोग अचानक पूर्वाग्रह छोड़ नहीं देते।

अपने ही देश में “चाइनीज” कहे जाने का मतलब

जब भारत का कोई नागरिक पूर्वोत्तर से आता है और उसे अपने ही देश में “चाइनीज”, “चिंकी” या “चीन का प्रेसिडेंट” कहा जाता है, तो यह सिर्फ एक शब्द नहीं होता। यह उस व्यक्ति को बाहरी घोषित करने जैसा है।

पूर्वोत्तर के लोग भारत के नागरिक हैं। उनके पास वही संविधान है, वही पासपोर्ट है, वही अधिकार हैं। फिर भी उनकी शक्ल देखकर कई लोग उन्हें विदेशी मान लेते हैं। यह बात दशकों से चल रही है। दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और दूसरे शहरों में छात्र, मजदूर और यात्री रोज ऐसे शब्दों का सामना करते हैं। मकान किराए पर नहीं मिलता। नौकरी में भेदभाव होता है। सड़क पर पूछा जाता है कि वे अपने देश क्यों नहीं लौट जाते।

2014 में अरुणाचल के छात्र निदो तनियाम को दिल्ली में शक्ल और हेयरस्टाइल पर मजाक उड़ाया गया। बात बढ़ी और उनकी मौत हो गई। उसके बाद बेजबरुआ कमेटी बनी। कमेटी ने साफ कहा था कि “चिंकी” और “चाइनीज” जैसे शब्दों को अपराध बनाया जाए और सजा तय की जाए। सिफारिशें आईं। कुछ प्रशासनिक कदम हुए। लेकिन सख्त और साफ कानूनी प्रावधान आज तक पूरी तरह लागू नहीं हुए।

क्यों सख्त कानून चाहिए

मौजूदा कानूनों में दुश्मनी फैलाने या अपमान की धाराएं हैं। अमीर शोकीन वाले मामले में भी इन्हीं का इस्तेमाल हुआ। लेकिन समस्या यह है कि ये धाराएं रोजमर्रा के व्यवहार को रोकने में काफी नहीं साबित हुईं। जब कोई क्रिएटर बड़े ऑडियंस के सामने किसी की शक्ल और राज्य को मजाक बनाता है और बाद में कहता है कि “यह सिर्फ मजाक था”, तो डर का असर कमजोर रहता है।

सख्त कानून का मतलब यह नहीं है कि हर छोटी बात पर केस हो जाए। इसका मतलब है कि नस्लीय गाली, जो किसी को उसके चेहरे या राज्य के आधार पर विदेशी घोषित करे, उसके लिए साफ सजा हो। जब सजा साफ और लगातार लागू हो, तब लोग ऐसे कंटेंट बनाने से पहले सोचते हैं। प्लेटफॉर्म भी ज्यादा जवाबदेह होते हैं।

अपने देश में “चाइनीज” कहे जाना सिर्फ अपमान नहीं है। यह यह सवाल खड़ा करता है कि क्या भारत में सभी नागरिक बराबर हैं, या कुछ लोगों को हर बार अपना होना साबित करना पड़ता है। जब तक इस सवाल का जवाब सख्त कानून और उसके लागू होने से नहीं मिलेगा, पूर्वोत्तर के युवा मुख्य शहरों में पढ़ने और काम करने के बावजूद खुद को पूरा नागरिक महसूस नहीं कर पाएंगे।

निष्कर्ष

भारत के एक नागरिक को एक वीडियो में चाइनीज कहा गया जिसे बाद में मनोरंजन बताकर बचाव किया गया। गोमती जिले का युवक अहमदाबाद में पीले टेंट के नीचे खड़ा था और उसने अपने घर का जवाब दिया। जवाब को कंटेंट बना दिया गया। दो राज्यों की पुलिस ने मामले दर्ज किए। गिरफ्तारी हुई। ये कदम जरूरी हैं। लेकिन अगर अगला क्लिप फिर हानिरहित मजाक माना जाए जब तक वह वायरल न हो जाए, तो ये काफी नहीं हैं। पूर्वोत्तर के लोगों की नस्लीय स्टीरियोटाइपिंग को विशेष रूप से संबोधित करने वाले सख्त कानून, राजनीतिक ध्यान का इंतजार न करने वाला तेज प्रवर्तन और किसी के चेहरे को मजाक मानने से सामाजिक इनकार जरूरी हैं। पूर्वोत्तर के लोग अपने ही देश में बाहरी नहीं हैं। उन्हें हर बार यह साबित नहीं करना चाहिए जब कोई फोन और ऑडियंस वाला व्यक्ति उनकी शक्ल को मजाकिया समझ ले।

एक 19 साल का युवक अपने राज्य का नाम बता रहा था। उसे वीडियो में “चाइनीज” कहा गया। उसके राज्य का नाम अश्लील तरीके से बिगाड़ा गया। बाद में कहा गया कि यह स्क्रिप्टेड मनोरंजन था। पुलिस ने गिरफ्तारी की। माफी मांगी गई। लेकिन मुद्दा यहीं खत्म नहीं होता।

पूर्वोत्तर के लोग भारत के नागरिक हैं। उनकी शक्ल देखकर उन्हें विदेशी मानना और सार्वजनिक रूप से मजाक बनाना, उनके साथ रोज होने वाला अनुभव है। निदो तनियाम से लेकर आज तक कई घटनाएं हुई हैं। बेजबरुआ कमेटी ने सख्त प्रावधानों की सिफारिश की थी। फिर भी साफ कानून नहीं बना। नतीजा यह है कि हर नई घटना के बाद वही बहस दोहराई जाती है।

सख्त कानून समस्या का पूरा हल नहीं है। लेकिन बिना साफ सजा के “यह तो मजाक था” वाला बचाव बार–बार काम करता रहता है। जब तक नस्लीय गाली को गंभीर अपराध नहीं माना जाएगा और उसे लागू नहीं किया जाएगा, पूर्वोत्तर के युवा मुख्य शहरों में पढ़ते और काम करते हुए भी खुद को पूरा नागरिक महसूस नहीं कर पाएंगे।

अपने देश में किसी को “चाइनीज” कहना मजाक नहीं है। यह उसे बाहरी बताना है। जब तक यह बात कानून और समाज दोनों जगह साफ नहीं होगी, ऐसे वीडियो बनते रहेंगे और माफी के बाद भी वही घाव खुला रहेगा।

Scroll to Top