खुद को लोकतंत्र का रक्षक और गरीब का मसीहा बताते राहुल गांधी, और अब नवंबर की ‘महारैली’ टालने की मिन्नतें ठुकरा कर त्यौहार में व्यापारियों का 10 हजार करोड़ स्वाहा करने की कर रहे तैयारी

सियासत का खेल भी यार बड़ा गज़ब होता है! एक तरफ मंच पर खड़े होकर माइक पर चीख-चीख कर ‘ग़रीब और आम आदमी’ के हक की दुहाई दी जाती है, और दूसरी तरफ उसी आम आदमी और व्यापारी के पेट पर सरेआम लात पड़ रही होती है।

हमारे देश में नेता जब ‘मसीहा’ बनने की रेस में दौड़ते हैं, तो उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की उनके इस दौड़ने से सड़क किनारे दुकान लगाए बैठे कितने लोगों का धंधा मिट्टी में मिल रहा है।

दिल्ली में आजकल बिल्कुल यही तमाशा चल रहा है।

नवंबर का महीना आ चुका है। आम दिनों में इस वक़्त दिल्ली की सड़कों पर एक अलग ही रौनक होती है। दुकानों पर रंग-बिरंगी लाइटें, बाज़ारों में खरीदारों की भीड़ और हर व्यापारी के चेहरे पर पूरे साल की कमाई करने की एक चमक!

होना तो ये चाहिए था की सरकारें और विपक्ष मिलकर इस त्योहारी सीज़न में बाज़ारों को सहूलियत देते। लेकिन नहीं जनाब, यहाँ तो बाज़ारों में बैरिकेड्स लगाने और सियासी ड्रामे की फुल-प्रूफ तैयारी हो रही है।

खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक बताने वाले राहुल गांधी की एक ज़िद ने इस वक़्त लाखों व्यापारियों की रातों की नींद उड़ा रखी है।

उनकी एक ‘महारैली’ दिल्ली के उस आम दुकानदार का दिवाला निकालने जा रही है, जो पूरे साल बस इसी दीवाली का इंतज़ार करता है की चार पैसे कमाकर अपने बच्चों के लिए नए कपड़े ले जाएगा।

रामलीला मैदान में 10 लाख की भीड़ का टारगेट और वोट बचाओ के नारे से बाज़ारों में पसरा खौफ

अब ज़रा इस पूरे सियासी ड्रामे का कच्चा-चिट्ठा समझिए। कांग्रेस और उनके ‘INDI गठबंधन’ ने ऐलान किया है की 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक बहुत विशाल महारैली की जाएगी।

इस रैली को एकदम भारी-भरकम नारा दिया गया है- “वोट बचाओ, देश बचाओ”। मुद्दा क्या है? चुनाव आयोग, और खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन।

चलिए, मान लेते हैं की विपक्ष का काम है सरकार और सिस्टम से सवाल पूछना। ये उनका लोकतांत्रिक हक़ है। लेकिन भाई साहब, ज़रा इस रैली के टारगेट और टाइमिंग पर गौर फरमाइए!

कांग्रेस का दावा है की इस रैली में पूरे देश से 10 लाख लोग दिल्ली में घुसेंगे। इसके लिए 15 से 20 हज़ार बसों और भारी गाड़ियों का इंतज़ाम किया गया है।

अब आप ही बताइए, जब दिल्ली की पहले से ही जाम से कराहती सड़कों पर एक ही दिन में 20 हज़ार एक्स्ट्रा बसें और 10 लाख लोगों की भीड़ उतरेगी, तो क्या होगा?

लोकतंत्र तो पता नहीं कितना बचेगा, लेकिन दिल्ली का ट्रैफिक और सिस्टम पक्के तौर पर दम तोड़ देगा।

बाज़ारों में वो खौफ पसरा हुआ है की 1 नवंबर को कोई भी इंसान अपने घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करेगा। और जो बाहर से दिल्ली खरीदारी करने आता है, वो तो बैरिकेड्स देखकर ही वापस लौट जाएगा।

चांदनी चौक से सदर बाज़ार तक जाम का डर और 10 हजार करोड़ के त्योहारी कारोबार की चढ़ने वाली बलि

अब आते हैं उस ग्राउंड रिपोर्ट और इकॉनमी पर, जिसे राहुल गाँधी जैसे नेता समझ ही नहीं पाते। दिल्ली के बाज़ारों के लिए अक्टूबर से लेकर जनवरी तक का टाइम किसी ऑक्सीजन से कम नहीं होता।

यही वो पीक सीज़न है जब व्यापारी पूरे साल का घाटा कवर करता है। इस साल 6 नवंबर को धनतेरस है, 8 नवंबर को दीवाली और 10 नवंबर को भैया दूज। मतलब 1 नवंबर का दिन वो दिन है जब बाज़ारों में पैर रखने की जगह नहीं होती।

ज़रा रामलीला मैदान की जियोग्रफी (Geography) तो देखिए!

चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) के चेयरमैन बृजेश गोयल और दिल्ली के व्यापारियों ने बाकायदा नक्शा खोलकर समझाया है की रामलीला मैदान के महज़ 5 किलोमीटर के रेडियस (दायरे) में दिल्ली के 20 सबसे बड़े होलसेल (थोक) और रिटेल मार्केट आते हैं।

चांदनी चौक, सदर बाज़ार, चावड़ी बाज़ार, खारी बावली, नया बाज़ार, करोल बाग, और पहाड़गंज… ये वो बाज़ार हैं जो पूरे उत्तर भारत की सप्लाई चेन चलाते हैं।

इन बाज़ारों की अंदरूनी सड़कों की चौड़ाई कितनी है? मुश्किल से 10 से 12 फीट! यहाँ आम दिनों में रिक्शा और ठेला निकालने में पसीने छूट जाते हैं।

अब ज़रा इमेजिन कीजिए, जब 1 नवंबर को रामलीला मैदान के चप्पे-चप्पे पर भारी पुलिस फोर्स तैनात होगी, रास्ते सील होंगे, चप्पे-चप्पे पर बैरिकेडिंग होगी और लाखों कार्यकर्ताओं की भीड़ नारे लगाती हुई यहाँ से गुज़रेगी…

तो क्या कोई व्यापारी अपनी दुकान खोल पाएगा? क्या हरियाणा, यूपी या राजस्थान से आने वाला थोक का ग्राहक माल खरीदने सदर बाज़ार पहुंच पाएगा?

व्यापारियों का साफ कहना है की इस एक दिन की सियासी नौटंकी और इसके असर से सीधे तौर पर 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने जा रहा है!

10 हज़ार करोड़ कोई मज़ाक है क्या? इससे पहले भी पिछले कुछ महीनों में जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर जो लगातार प्रदर्शन हुए हैं, उनके चलते दिल्ली के बाज़ारों को 3,000 से 4,000 करोड़ का नुकसान पहले ही हो चुका है।

अब व्यापारी और घाटा सहने की हालत में बिल्कुल नहीं हैं। एक तरफ आप कहते हो की देश की इकॉनमी डूब रही है, बेरोज़गारी बढ़ रही है, और दूसरी तरफ जो आदमी खुद कमा-खा रहा है, आप उसके धंधे में पलीता लगाने रामलीला मैदान पहुँच जाते हो!

हाथ जोड़कर मिन्नतें करते रहे व्यापारी और राहुल गाँधी ने थमा दिया 30 सेकंड में पीएम मोदी से बात करने वाला ज्ञान

जब संकट 10 हज़ार करोड़ का हो, तो ज़ाहिर है की व्यापारी चुप नहीं बैठेंगे। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) और दिल्ली के तमाम बड़े व्यापारी संगठनों ने राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान को हाथ जोड़कर एक चिट्ठी लिखी।

उन्होंने अपनी कोई राजनीतिक मांग नहीं रखी। उन्होंने बस इतनी सी गुहार लगाई की-

“सर, हम आपके मुद्दे के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन प्लीज़ इस रैली को 10 नवंबर (दीवाली) के बाद कर लीजिए। या फिर अगर 1 नवंबर को ही करनी है, तो इसे रामलीला मैदान से हटाकर शहर के बाहर ‘बुराड़ी मैदान’ में शिफ्ट कर दीजिए, ताकि शहर का ट्रैफिक और हमारा त्योहार बच जाए।”

ये मांग कितनी जायज़ और प्रैक्टिकल थी! एक ऐसा नेता जो ‘भारत जोड़ो’ के नाम पर पूरे देश में लोगों के दर्द सुनने का दावा करता हो, उससे उम्मीद की जाती है की वो इन दुकानदारों का दर्द समझेगा।

लेकिन जनाब, अहंकार जब सिर चढ़कर बोलता है, तो इंसान को ज़मीन की हकीकत नज़र नहीं आती। राहुल गांधी ने व्यापारियों की इस गुहार को एक झटके में खारिज (Reject) कर दिया।

उनका जो जवाब आया, उसे सुनकर किसी का भी माथा ठनक जाए। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया (X) पर व्यापारियों को सीधा ज्ञान देते हुए लिखा-

“जब वोट ही चोरी हो जाए, तो कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता। न आपकी दुकान, न आपकी बचत और न आपके बच्चों का भविष्य।”

वाह रे मसीहा! मतलब आप एक आम दुकानदार से कह रहे हो की अगर मेरा वोट मुझे नहीं मिल रहा, तो तुम्हारी दुकान भी सुरक्षित नहीं बचेगी। ये तो वही बात हो गई की ‘मेरा काम नहीं बन रहा तो मैं तुम्हारा धंधा भी नहीं चलने दूंगा।’

हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने व्यापारियों को एक अजब-गज़ब अल्टीमेटम थमा दिया।

उन्होंने कहा, “अगर आप चाहते हैं की ये रैली रुके, तो जाकर पीएम मोदी से कहिए की वो चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटा दें… 30 सेकंड में आंदोलन रुक जाएगा।”

क्या बात है! मतलब जिस व्यापारी के माथे पर 10 हज़ार करोड़ के नुकसान की लकीरें खिंची हैं, जिसे ये टेंशन है की वो दीवाली पर कारीगरों को बोनस कैसे बांटेगा, राहुल जी चाहते हैं की वो अपनी दुकान बंद करके मोदी जी के पास जाए और चुनाव आयुक्त बदलवाने की पैरवी करे!

इससे साफ पता चलता है की इन नेताओं को व्यापारियों के 10 हज़ार करोड़ के नुकसान से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता, ये तो बस व्यापारियों के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं।

सिखों के ज़ख्मों वाली 1 नवंबर की तारीख और सत्ता की खींचतान में बलि का बकरा बनता आम दुकानदार

सियासत में हर चीज़ की एक टाइमिंग होती है, और इस महारैली की टाइमिंग को लेकर सिर्फ व्यापारी ही नहीं, बल्कि बीजेपी भी हमलावर है।

बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने एक बहुत ही मार्मिक और गहरा सवाल उठाया है। उन्होंने याद दिलाया की 1 नवंबर का दिन कोई आम दिन नहीं है।

1984 में इसी 1 नवंबर को दिल्ली की सड़कों पर सिख-विरोधी दंगों में बेगुनाह सिखों का कत्लेआम शुरू हुआ था। यह दिन पूरे सिख समुदाय के लिए बहुत संवेदनशील, गहरे घाव और शोक का दिन होता है।

क्या ऐसे दुखद और संवेदनशील दिन पर राजधानी के बीचों-बीच 10 लाख लोगों की भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करना या ढोल-नगाड़े पीटना सही है?

क्या यह जानबूझकर सिखों के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा नहीं है? लेकिन मसीहा जी का अहंकार देखिए। जब बीजेपी ने ये सवाल उठाया, तो राहुल गांधी ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय उल्टा तंज कस दिया।

उन्होंने बीजेपी को जवाब देते हुए कहा की “मेरी रैली का ‘फ्री प्रमोशन’ करने के लिए आपका धन्यवाद!”

सोचिए दोस्त, राजनीति में इंसानियत और संवेदनाएं किस कदर मर जाती हैं।

एक तरफ एक समुदाय के 1984 के दर्दनाक ज़ख्म हैं, दूसरी तरफ लाखों व्यापारियों के 10 हज़ार करोड़ के नुकसान की चीख-पुकार है, लेकिन सियासी मंच पर खड़े होकर मुस्कुराते हुए ‘फ्री प्रमोशन’ का तंज कसा जा रहा है।

अंत में यही बात समझ आती है की ये लोकतंत्र और वोट बचाने की जो बड़ी-बड़ी बातें हैं, ये सिर्फ कैमरों के सामने अच्छी लगती हैं।

असलियत ये है की इस 1 नवंबर की रात जब रैली खत्म होगी, तो ये सारे बड़े नेता अपनी चमचमाती SUV में बैठकर अपने सुरक्षित और महफूज़ बंगलों में लौट जाएंगे।

इनके पास पैसा भी है और मीडिया की हेडलाइंस भी। लेकिन वो आम व्यापारी, वो छोटा दुकानदार जो सदर बाज़ार या चांदनी चौक की संकरी गली में बैठा है…

वो इस ‘लोकतंत्र बचाने’ की आंधी में उजड़ी हुई अपनी दुकान और माल को देखकर अपनी किस्मत को रोता रह जाएगा। वोट बचे न बचे, लेकिन इस बार दिल्ली के व्यापारियों का दिवाला ज़रूर निकल जाएगा।

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