आपने अपनी ज़िंदगी में ऐसे कई लोग देखे होंगे जो जैसे ही पढ़ाई या नौकरी के लिए भारत से बाहर जाते हैं, उनका पूरा का पूरा सॉफ्टवेयर ही बदल जाता है।
कल तक जो लड़का नुक्कड़ पर खड़े होकर चाय-समोसे खा रहा होता था, वो अमेरिका या लंदन पहुंचते ही अचानक से ‘एलीट’ बन जाता है।
वो अपने ही देश की संस्कृति को बैकवर्ड मानने लगता है और उसकी ज़बान पर एक बनावटी अंग्रेज़ी हावी हो जाती है।
लेकिन इसी विदेशी ज़मीन पर एक दूसरी तरह के भारतीय भी पनपते हैं। ये वो युवा हैं जो चाहे लंदन में खड़े हों या न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर पर, इनके माथे का चंदन और इनके दिल में धड़कता ‘सनातन’ कभी मैला नहीं होता।
सात समंदर पार जाकर भी ये अपनी जड़ों से चिपके रहते हैं। आज हम भारत के ऐसे ही दो युवाओं की बात करने जा रहे हैं, जो पढ़ाई करने तो विदेश गए थे, लेकिन वहां से लौटने के बाद दोनों ने देश को जो दिया, वो अपने आप में एक बहुत बड़ी केस स्टडी है।
एक तरफ अनुप्रिया नागर है, जो UK की चकाचौंध में रहकर भी अपनी संस्कृति और सनातन से हमेशा जुड़ी रहीं और वो चमत्कार कर दिया जिससे आज पूरी दुनिया भारत के आध्यात्म को गहरायी से जान रही है।
और दूसरी तरफ है देश-विरोधी इकोसिस्टम का चहेता अभिजीत दिपके, जो अमेरिका से पढ़ाई करके तो लौटा, लेकिन अपने साथ कोई विज़न नहीं, बल्कि देश की सड़कों पर अराजकता फैलाने का पूरा का पूरा टूलकिट लेकर आया।

UK की यूनिवर्सिटी से लेकर नीब करौरी बाबा के आशीर्वाद तक, अनुप्रिया नागर ने कैसे बढ़ाया सनातन का मान
चलिए सबसे पहले उस लड़की की बात करते हैं जिसने असली मायने में देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है। हम बात कर रहे हैं अनुप्रिया नागर की।
उम्र महज़ 21 साल! इस उम्र में बच्चे अमूमन रील्स स्क्रॉल करते हैं या पब और पार्टियों में अपना समय बर्बाद करते हैं। लेकिन अनुप्रिया का रास्ता बिल्कुल अलग था।
उसने UK की बहुत ही नामी ‘यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ’ (University of Bath) से इकोनॉमिक्स (अर्थशास्त्र) में बाकायदा अपना ग्रेजुएशन पूरा किया।
लेकिन अनुप्रिया की असली पहचान उसकी ये विदेशी डिग्री नहीं है। उसकी असली पहचान वो संस्कार हैं जो उसने विदेशी ज़मीन पर भी अपने भीतर ज़िंदा रखे।
पढ़ाई के दौरान ही अनुप्रिया के मन में सनातन अध्यात्म और विशेषकर श्री नीब करौरी बाबा (Neem Karoli Baba) के प्रति इतनी गहरी आस्था जगी की उसने कुछ ऐसा कर दिया जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।
जिन नीब करौरी बाबा के कैंची धाम आश्रम में Apple के स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग (Mark Zuckerberg) जैसे अरबपति आकर माथा टेकते हैं और जीवन की दिशा तय करते हैं..
हमारी इस 21 साल की बेटी ने उसी आध्यात्मिक प्रेरणा को पूरी दुनिया के सामने एक सिनेमाई रूप में उतारने की ठान ली। उसने एक फिल्म बनाई- “हनुमान अंश”।
अनुप्रिया की “हनुमान अंश” शुद्ध रूप से सनातन संस्कृति, अध्यात्म और श्री हनुमान जी के आदर्शों को समर्पित एक बेहद खूबसूरत प्रोजेक्ट था।

अब ज़रा आंकड़ों का खेल देखिए। अनुप्रिया की इस फिल्म का बजट था मात्र 2 करोड़ रुपये। आजकल 2 करोड़ में तो बॉलीवुड वाले ढंग का एक सेट भी नहीं लगा पाते..
लेकिन नीब करौरी बाबा के आशीर्वाद और इस लड़की के विज़न ने ऐसा चमत्कार किया की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 400 करोड़ से ज़्यादा का भयंकर कलेक्शन करके इतिहास रच दिया।
आज आम जनता और भक्त इसे सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक असली ‘ईश्वरीय चमत्कार’ मान रहे हैं।
मतलब सोचिए यार! यूके में पढ़ने वाली एक लड़की, जो अर्थशास्त्र की स्टूडेंट है, वो वहां बैठकर अपने धर्म, अपने अध्यात्म और अपने संस्कारों को एक फिल्म में पिरोती है और पूरी दुनिया उसे सिर आंखों पर बिठा लेती है।
और सबसे बड़ी बात क्या है पता है? अनुप्रिया ने इस 150 करोड़ की कमाई से कोई प्राइवेट जेट, महंगे ब्रांड्स या लग्जरी लाइफस्टाइल का दिखावा नहीं किया।
इस सनातनी बेटी ने साफ कह दिया की इस सफलता के पीछे सनातन अध्यात्म और गुरु का हाथ है, इसलिए वो इस मुनाफे को चैरिटी (Charity) और समाज सेवा में दान करेगी।
ये होती है असली शिक्षा! जब आप दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी में पढ़ें, विदेशी ज़मीन पर रहें, पर आपका दिल और आपका पैसा अपनी मातृभूमि और धर्म के लिए समर्पित हो।
अमेरिका की पढ़ाई या देश-विरोधी टूलकिट की ट्रेनिंग, वामपंथियों का ‘युथ आइकॉन’ अभिजीत दिपके
अब ज़रा सिक्के का दूसरा पहलू भी देख लेते हैं। कहानी में एंट्री होती है उस ‘कथित’ यूथ आइकॉन की, जिसे वामपंथी इकोसिस्टम एक बहुत बड़े पढ़े-लिखे क्रांतिकारी नेता के रूप में प्रोजेक्ट करता है- अभिजीत दिपके!
इस बंदे का बैकग्राउंड सुनेंगे तो आपको भी हंसी आ जाएगी। बताया जाता है की ये जनाब पढ़ाई करने के लिए अमेरिका के बोस्टन (Boston University) गए थे।
वामपंथी मशीनरी ने रातों-रात ढोल पीटना शुरू कर दिया की “देखो-देखो, हमारा नेता कितना पढ़ा-लिखा है, उसके पास बोस्टन से पब्लिक रिलेशंस (PR) की मास्टर्स डिग्री है।”

लेकिन भाई, बोस्टन की फ्लाइट में बैठने का मतलब ये थोड़ी है की इंसान कोई बहुत बड़ा विद्वान बन गया!
इसके इकोसिस्टम ने इसकी इस ‘डिग्री’ का खूब हल्ला मचाया, लेकिन मजे की बात ये है की आज तक दुनिया ने इस बंदे का कोई ऐसा अकादमिक (Academic) योगदान या कोई ऐसा रिसर्च पेपर नहीं देखा, जिससे लगे की हां यार, बंदा सच में कुछ पढ़कर आया है।
सच तो ये है की खुद अभिजीत ने भी कभी सीना ठोक कर किसी मंच पर अपनी डिग्री की कोई प्रामाणिक बात नहीं की। ये बस एक हवा-हवाई PR स्टंट था, जिसे इसलिए गढ़ा गया ताकि टीवी डिबेट्स और सोशल मीडिया पर इसे एक ‘विद्वान’ की तरह पेश किया जा सके।
वैसे इंसान विदेश जाता है तो क्या करता है? नई टेक्नोलॉजी सीखता है, पेटेंट लेकर आता है, कोई शानदार स्टार्टअप बनाता है, या फिर अनुप्रिया की तरह कोई ग्लोबल प्रोजेक्ट करता है। लेकिन हमारा ये युवा बोस्टन से क्या सीखकर आया?
ये सीखकर आया की अपने ही देश में सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा कैसे सेट करना है। ये सीखकर आया की किसी भी मुद्दे को राई का पहाड़ बनाकर कैसे सड़कों पर चक्का जाम करना है।
बोस्टन की लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ने के बजाय, लगता है इस बंदे ने वामपंथी टूलकिट का वो पूरा सिलेबस रट लिया की भारत लौटकर लॉ एंड ऑर्डर (Law and order) की धज्जियां कैसे उड़ानी हैं।
जब आपके पास अपनी पढ़ाई के ज़रिए देश को देने के लिए कुछ नहीं होता, तो आप देश की शांति छीनने का ठेका ले लेते हैं।
मई 2026 में इसने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनाई। इस CJP के झंडे तले इन्होंने मेडिकल एग्जाम (NEET) लीक और बेरोज़गारी जैसे संवेदनशील मुद्दों को हाईजैक कर लिया।
छात्रों के हक़ की बात करना एक चीज़ है, लेकिन छात्रों की आड़ में इन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर देश की अलग-अलग सड़कों पर कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई।
इनके तथाकथित शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट का असली चेहरा तब सामने आया जब सड़कों पर भयंकर अराजकता फैलाई गई।
ड्यूटी कर रहे पुलिसवालों से बदतमीज़ी की गई, चक्का जाम किए गए और पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने का माहौल बनाया गया।
इसी नियम तोड़ने और सड़कों पर गुंडागर्दी का माहौल बनाने के चलते ही दिल्ली पुलिस ने कई बार अभिजीत और इसके साथियों को हिरासत में लिया और इन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी। लेकिन क्या इन्हें कोई पछतावा हुआ? बिल्कुल नहीं!
भारत के युवाओं को खुद चुनना होगा की वो संस्कृति से दुनिया जीतना चाहते हैं या अपने ही देश को तोड़ना
आज भारत का युवा पहले से कहीं ज़्यादा समझदार और जागरूक है। उसे समझ में आ रहा है की शिक्षा का असली मक़सद क्या है।
शिक्षा वो नहीं है जो आपको अपनी ही मिट्टी से नफरत करना सिखा दे, जो आपको अपने ही देश के खिलाफ एक मोहरा बना दे।
असली शिक्षा तो वो है जो अनुप्रिया नागर जैसी रचनात्मकता (Creativity) को जन्म दे, जो इंसान को इतना ज़मीन से जुड़ा रखे की विदेशी चकाचौंध भी उसके भीतर के सनातन संस्कारों को हिला न पाए।

सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है, सवाल उस दिशा का है जो हम अपने युवाओं को देना चाहते हैं। आज हर उस छात्र को, जो विदेश जाकर पढ़ने का सपना देखता है, अपने आप से एक बेहद ज़रूरी सवाल पूछना होगा।
आपको तय करना है की आप सात समंदर पार जाकर अनुप्रिया नागर की तरह ‘हनुमान अंश’ बनकर देश का मान बढ़ाना चाहते हैं? अपनी सफलता से दुनिया को चौंकाना चाहते हैं?
या फिर… अभिजीत दिपके की तरह विदेशी डिग्रियों का महज़ एक भ्रम पालकर, वामपंथी टूलकिट का शिकार होकर सड़कों पर एक ‘कॉकरोच’ की तरह अपनी ज़िंदगी और देश का नाम बर्बाद करना चाहते हैं?
दुनिया जीतने का रास्ता अपनी जड़ों को सींचने से होकर गुज़रता है, उन्हें काटने से नहीं।
जिसने अपनी संस्कृति का मान रखा, दुनिया उसी के सामने नतमस्तक होती है। बाकी, अराजकता फैलाने वाले और प्रोपेगेंडा की बौद्धिक जुगाली करने वाले तो इतिहास के कूड़ेदान में हर दौर में पाए ही जाते हैं।
फैसला अब इस देश के युवा को खुद करना है!
