कभी-कभी लगता है की हमारे देश के टैक्स का पैसा और सरकारी संस्थान आखिर किन दीमकों को पाल रहे हैं?
जब भी हम किसी सरकारी साइंस कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नाम सुनते हैं, तो दिमाग में आता है की वहां के बच्चे फिजिक्स, मैथ्स, स्पेस और देश के भविष्य को संवारने वाली रिसर्च कर रहे होंगे।
लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। अर्बन-नक्सलों का जो इकोसिस्टम पहले सिर्फ जेएनयू (JNU) या जादवपुर यूनिवर्सिटी तक सीमित था, वो अब चुपचाप देश के उन विज्ञान संस्थानों में घुसपैठ कर चुका है, जहां से भारत के आने वाले वैज्ञानिक निकलते हैं।
अभी हाल ही में पुणे से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे देश के राष्ट्रवादियों का पारा गरम कर दिया है।
सोचिए, जिस इंसान पर दिल्ली को जलाने और निर्दोष हिन्दुओं के खून का इल्जाम हो, जो देश के सबसे खूंखार आतंकी कानून (UAPA) के तहत सालों से तिहाड़ जेल में सड़ रहा हो…
उसकी लिखी किताबें और रिसर्च पेपर देश के एक टॉप सरकारी साइंस संस्थान के पाठ्यक्रम (Syllabus) और लाइब्रेरी में बच्चों को पढ़ाए जा रहे थे!
कोई सोच भी कैसे सकता है की जिस उम्र में साइंस के छात्रों को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की किताबें पढ़नी चाहिए, उन्हें एक दंगाई के देश-विरोधी विचारों का पाठ पढ़ाया जा रहा था।
चलिए, इस ‘अकादमिक जिहाद’ का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलते हैं।

टॉप क्लास विज्ञान संस्थान IISER की रामानुजन साइंस लाइब्रेरी में घुसाया गया भारत तेरे टुकड़े का ज़हर
पुणे… छत्रपति शिवाजी महाराज की वीर भूमि, पेशवाओं की धरती, और भारत की सांस्कृतिक व शैक्षिक राजधानी।
इसी पुणे में केंद्र सरकार का एक बेहद प्रतिष्ठित और टॉप क्लास विज्ञान संस्थान है- IISER (Indian Institute of Science Education and Research)।
यहां देश भर से चुनकर वो होनहार बच्चे आते हैं जो साइंस और रिसर्च की फील्ड में कुछ बड़ा करना चाहते हैं।
इस भव्य संस्थान के अंदर एक बेहद शानदार लाइब्रेरी है, जिसका नाम भारत के महान गणितज्ञ ‘श्रीनिवास रामानुजन’ के नाम पर रखा गया है।
रामानुजन वो इंसान थे जिन्होंने अपनी बुद्धि से पूरी दुनिया में भारत का डंका बजाया, अंग्रेजों को भी अपने ज्ञान के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
लेकिन भाईसाहब, इस महान और पवित्र नाम वाली लाइब्रेरी के अंदर वामपंथी प्रशासन ने क्या गुल खिला रखे थे, इसका अंदाज़ा आपको बाहर से बिल्कुल नहीं लगेगा।
अंदर ही अंदर, इस लाइब्रेरी को वामपंथियों ने अपने ज़हरीले प्रोपेगेंडा का अड्डा बना लिया था।
जो छात्र वहां क्वांटम फिजिक्स या बायोटेक्नोलॉजी की किताबें ढूंढने जाते, उनके दिमाग में बड़ी ही चालाकी से (Silent Propaganda के तहत) एक ऐसे आदमी के विचार इंजेक्ट किए जा रहे थे, जिसका साइंस से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।
एक ऐसा आदमी जिसका नाम ही देश-विरोधी नारों का पर्याय बन चुका है। रामानुजन की इस लाइब्रेरी में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाले इकोसिस्टम की किताबें बहुत ही शान से सजाई गई थीं।
2020 के दिल्ली दंगों का खूंखार मास्टरमाइंड उमर खालिद और उसकी किताब का IISER में VIP स्वागत
जिस आदमी की किताब को IISER पुणे की लाइब्रेरी में वीआईपी ट्रीटमेंट मिल रहा था, वो कोई महान वैज्ञानिक या कोई नोबेल प्राइज़ विनर नहीं है। वो है उमर खालिद!
जी हाँ, वही उमर खालिद जो 2020 के भयंकर और खौफनाक हिन्दू-विरोधी दिल्ली दंगों का मुख्य मास्टरमाइंड बताया जाता है।
ये वही शख़्स है जिस पर देश को तोड़ने और दंगों की साज़िश रचने के आरोप में UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) जैसा देश का सबसे कड़ा आतंकी कानून लगा हुआ है।
पिछले 6 सालों से ये आदमी तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे दिन काट रहा है, और कोर्ट ने इसे ज़मानत तक देने से कई बार इनकार कर दिया है क्योंकि इसके खिलाफ सुबूत ही इतने संगीन हैं।
लेकिन पुणे के इस सरकारी विज्ञान संस्थान में बैठे वामपंथी प्रोफेसरों और प्रशासन के लिए उमर खालिद कोई दंगाई नहीं, बल्कि कोई ‘महान स्कॉलर’ है।
हकीकत ये है की उमर खालिद ने अपनी गिरफ़्तारी से पहले JNU से एक PhD की थीसिस लिखी थी, जिसे अब एक किताब की शक्ल दे दी गई है।
इस किताब का नाम है- ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’।
अब बेशर्मी की इंतेहा देखिए। IISER पुणे की ‘श्रीनिवास रामानुजन लाइब्रेरी’ के अंदर जो बड़ा सा डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड लगा है, उस पर इस दंगाई की किताब को पूरे गर्व के साथ “न्यू अराइवल्स (New Arrivals)” यानी ‘नई और ख़ास किताबों’ की वीआईपी लिस्ट में चमकाया जा रहा था।
मतलब, फर्स्ट ईयर का कोई भोला-भाला बच्चा जब लाइब्रेरी घुसे, तो सबसे पहले उसे कलाम साहब नहीं, बल्कि उमर खालिद की किताब दिखे! ये सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं था, ये बाकायदा एक सोची-समझी साज़िश थी।
महाराष्ट्र में ABVP ने IISER के बाहर विरोध प्रदर्शन किया… यह विरोध संस्थान के पाठ्यक्रम में उमर खालिद से जुड़े छह शोध पत्रों को शामिल किए जाने के खिलाफ था…#Maharashtra #ABVP #IISER pic.twitter.com/XzTJERuzxk
— NMF NEWS (@NMFNewsNational) October 27, 2026
सिर्फ किताब नहीं बल्कि 6 रिसर्च पेपर भी बने सिलेबस का हिस्सा, अकादमिक जिहाद का ये है पूरा ब्लूप्रिंट
अगर आपको लग रहा है की मामला सिर्फ एक किताब को लाइब्रेरी के बोर्ड पर डिस्प्ले करने तक सीमित था, तो आप बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं। दाल में सिर्फ काला नहीं था, पूरी की पूरी दाल ही वामपंथी कालिख से भरी हुई थी।
ये एक बहुत ही गहरा और खौफनाक नेक्सस है, जिसे आम बोलचाल में ‘अकादमिक जिहाद’ (Academic Jihad) कहा जाता है।
अंदरखाने से ये बात भी सामने आई की सिर्फ किताब ही नहीं, बल्कि उमर खालिद के लिखे गए 6 अलग-अलग रिसर्च पेपर्स को भी संस्थान के पाठ्यक्रम (Curriculum) और रेफरेन्स मैटेरियल के अंदर चुपचाप शामिल कर लिया गया था।
अब ज़रा इस टूलकिट की टाइमिंग और क्रोनोलॉजी समझिए। आखिर साइंस के कॉलेज में वामपंथी पॉलिटिक्स की किताबें क्यों घुसाई जा रही थीं?
दरअसल, जेएनयू (JNU) और आर्ट्स के कॉलेजों में अब इनका वो पुराना वाला भौकाल नहीं रहा। वहां सनातनी छात्र अब इन्हें मुंहतोड़ जवाब देने लगे हैं।
इसलिए इन अर्बन-नक्सलों ने अपनी स्ट्रैटेजी बदल ली है। अब ये देश के आईआईटी (IITs), एनआईटी (NITs) और आईआईएसईआर (IISER) जैसे साइंस और टेक संस्थानों को टारगेट कर रहे हैं।
साइंस के बच्चे अक्सर अपनी पढ़ाई में इतने बिज़ी रहते हैं की उन्हें बाहर की राजनीति का ज्यादा पता नहीं होता।
इसी भोलेपन का फायदा उठाकर, सिलेबस के बहाने, ये प्रोफेसर बच्चों के दिमाग में अर्बन-नक्सलवाद और एंटी-सिस्टम (Anti-system) विचार भर रहे हैं।
ये साइंस के उन युवा छात्रों की एक नई फौज तैयार करने की साज़िश थी, जो कल को बड़े वैज्ञानिक या इंजीनियर तो बनें, लेकिन उनके दिल में अपने ही देश और अपनी ही संस्कृति के लिए नफरत भरी हो।
एक आतंकवादी कानून के तहत बंद मुजरिम को ‘महान रिसर्चर’ बनाकर पेश करना, इसी ब्रेनवॉश टूलकिट का सबसे खतरनाक हिस्सा है।
Umar Khalid’s thesis is added as a book at IISER, Pune.
This is a central government institution for science research. pic.twitter.com/gWpC26KAOq
— Gems of Indian Academia (@GemsofAcademia) October 24, 2026
X हैंडल ‘जेम्स ऑफ एकेडेमिया’ का बड़ा खुलासा और उसके बाद शुरू हुआ ABVP के छात्रों का रौद्र रूप
ये ‘टुकड़े-टुकड़े’ इकोसिस्टम अपने इस ‘साइलेंट प्रोपेगेंडा’ को बहुत ही गुपचुप तरीके से चला रहा था।
इन्हें लगा था की किसी को कानो-कान भनक नहीं लगेगी और ये बच्चों का ब्रेनवॉश करते रहेंगे। लेकिन कहते हैं ना की पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटता ही है।
इस बार इनका घड़ा फोड़ा सोशल मीडिया की ताक़त ने।
तारीख थी 27 अक्टूबर 2026, जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर एक बहुत ही मशहूर और धाकड़ हैंडल @GemsOfAcademia ने एक ऐसी तस्वीर पोस्ट की जिसने इंटरनेट पर आग लगा दी।
इस हैंडल ने IISER पुणे की ‘श्रीनिवास रामानुजन लाइब्रेरी’ के उसी डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड की फोटो दुनिया के सामने रख दी, जिस पर दंगाई उमर खालिद की किताब पूरे गर्व के साथ चमचमा रही थी।
जैसे ही ये फोटो वायरल हुई, पूरे देश के राष्ट्रवादियों और आम जनता का खून खौल उठा।
सच सामने आते ही मैदान में उतरी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP)!
जैसे ही ABVP की पुणे मेट्रोपॉलिटन यूनिट को इस देश-विरोधी साज़िश की भनक लगी, उन्होंने एक मिनट की भी देरी नहीं की।
ABVP के सैकड़ों कार्यकर्ता और राष्ट्रवादी छात्र तिरंगा और भगवा झंडा लेकर सीधे IISER पुणे के मेन गेट पर धमक पड़े।
ABVP की जॉइंट सेक्रेटरी निधि नारंग (Nidhi Narang) के नेतृत्व में छात्रों ने वहां ऐसा रौद्र रूप दिखाया की अंदर बैठे प्रशासन की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।
गेट के बाहर जमकर बवाल काटा गया। छात्रों का गुस्सा सातवें आसमान पर था और उनके सवाल एकदम सीधे थे-
“हमारे माता-पिता के टैक्स के पैसे से चलने वाले इस प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में भारत के टुकड़े करने वालों का महिमामंडन क्यों किया जा रहा है? जिस आदमी पर दिल्ली को जलाने और हिन्दुओं के खून का इल्जाम है, क्या अब साइंस के बच्चे उसे अपना रोल मॉडल मानेंगे?”
ABVP ने साफ कर दिया की जब तक इस दंगाई की किताब और इसके सारे रिसर्च पेपर्स को सिलेबस और लाइब्रेरी से उखाड़ कर बाहर नहीं फेंका जाता, तब तक ये प्रदर्शन रुकने वाला नहीं है।
वो कहते हैं ना की लातों के भूत बातों से नहीं मानते, बस यही फॉर्मूला वहां एकदम सटीक बैठा।
Indian Institute of Science Education and Research, Pune included thesis associated with Umar Khalid in the library.
ABVP is protesting in the institute..
Well done @ABVPVoice 🙌🏻 pic.twitter.com/eDBpotnjBb
— Trupti Garg (@garg_trupti) October 27, 2026
प्रशासन के छूटे पसीने, भयंकर विरोध के बाद हटाई गयी दंगाई उमर खालिद की किताब
गेट के बाहर ABVP के नारों की गूंज और सोशल मीडिया पर हो रही भयंकर फजीहत को देखकर IISER प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए।
जो प्रोफेसर कल तक खुद को ‘अकादमिक आज़ादी’ का ठेकेदार समझते थे, उन्हें समझ आ गया की अब बात गले तक आ चुकी है और अगर इसे नहीं रोका गया, तो इनकी कुर्सी भी जा सकती है।
दबाव इतना तगड़ा था की संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरपर्सन मदाभूषी मदन गोपाल को तुरंत मैदान में आना पड़ा।
उन्होंने बिना किसी देरी के लाइब्रेरी मैनेजमेंट को आदेश दिया और उमर खालिद की उस ज़हरीली किताब और रिसर्च पेपर्स को तुरंत वहां से हटा (Retract कर) लिया।
अपनी इज़्ज़त बचाने और मामले पर लीपापोती करने के लिए प्रशासन की तरफ से एक रटा-रटाया बयान भी आ गया की “परिसर में किसी भी तरह की अशांति और गलतफहमी से बचने के लिए हमने ये किताब हटा ली है।”
जेएनयू के बाद अब देश के साइंस संस्थानों पर है अर्बन नक्सलियों की नज़र, हर सनातनी छात्र को रहना होगा अलर्ट
खैर, पुणे के IISER में ABVP ने जो डंडा चलाया है, उसने इस इकोसिस्टम की कमर तोड़कर रख दी है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए की ये बीमारी सिर्फ एक कॉलेज या एक किताब तक सीमित नहीं है।
अब वक़्त आ गया है की इस देश का हर छात्र, हर सनातनी जाग जाए। JNU में जब इनकी दाल गलनी बंद हो गई, तो इन अर्बन-नक्सलों ने अपनी दिशा बदल ली है।
अब इनकी गिद्ध जैसी नज़र देश के टॉप मेडिकल, इंजीनियरिंग और साइंस संस्थानों (IITs, NITs, IISER) पर है।
ये जानते हैं की साइंस के होनहार बच्चों का दिमाग पढ़ाई में उलझा रहता है, और यही वो मौका है जब सिलेबस के नाम पर उन्हें देश-विरोधी नैरेटिव घुट्टी में पिलाया जा सकता है।
ये आपके बच्चों को ये नहीं पढ़ाएंगे की भारत ने मंगलयान कैसे बनाया, ये उन्हें ये पढ़ाएंगे की भारत का सिस्टम कितना खराब है और कैसे इस सिस्टम से बगावत करनी चाहिए।
अगर आप किसी कॉलेज में पढ़ते हैं या आपके बच्चे किसी संस्थान में हैं, तो अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखिए।
चेक करते रहिए की आपके कोर्स या लाइब्रेरी में कहीं चुपके से कोई ऐसा देश-विरोधी कूड़ा तो नहीं घुसाया जा रहा है!
और अगर कहीं भी आपको देश-विरोधी विचार या किसी दंगाई का महिमामंडन दिखे, तो चुप मत बैठिए। उसका पुरज़ोर विरोध कीजिए, बिल्कुल वैसे ही जैसे पुणे में ABVP के उन वीर छात्रों ने किया।
शिक्षा के इन पवित्र मंदिरों को किसी भी कीमत पर वामपंथी ज़हर की लैबोरेटरी नहीं बनने देना है।
देश का भविष्य हमारे युवा हैं, और उनके दिमाग को इन ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की परछाई से भी बचाकर रखना हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है!
जय हिन्द!
