सनातन धर्म के भटके हुए लोगों की कराई घर वापसी, स्वराज का दिया सबसे पहला नारा, वैदिक ज्ञान से सनातन का परचम लहराने वाले समाज सुधारक ‘स्वामी दयानंद सरस्वती’ को पुण्यतिथि पर सादर नमन

आज 30 अक्टूबर है। आज ही के दिन सनातन धर्म के उस सच्चे रक्षक, महान समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।

आज महर्षि दयानंद सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर उनके उस विराट जीवन और सनातन के प्रति उनके उस पागलपन को याद करने का दिन है, जिसका कर्ज़ यह देश शायद कभी नहीं चुका सकता।

बात 12 फरवरी 1824 की है। गुजरात के मोरबी ज़िले के टंकारा गांव में एक बेहद संपन्न और संस्कारी ब्राह्मण परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ।

माता-पिता ने बड़े ही लाड़-प्यार से नाम रखा- ‘मूलशंकर तिवारी’। बचपन से ही मूलशंकर का दिमाग इतना तेज़ था की वो जो एक बार सुन लें, वो हमेशा के लिए याद हो जाए।

मूलशंकर की ज़िंदगी में सबसे बड़ा भूचाल तब आया जब वे महज़ 14 साल के थे। महाशिवरात्रि का दिन था। परिवार के साथ मूलशंकर ने भी व्रत रखा हुआ था और रात के समय शिव मंदिर में जागरण कर रहे थे।

आधी रात को जब सब सो गए, तो इस बालक ने देखा की एक चूहा शिवलिंग पर चढ़कर भगवान को चढ़ाया हुआ प्रसाद खा रहा है।

बस, उसी एक पल ने मूलशंकर के दिमाग में सवालों की झड़ी लगा दी। मूलशंकर ने सोचा की आखिर परमात्मा कहाँ है, वो चूहे को ऐसे अपना प्रसाद क्यों खाने दे रहा।

ईश्वर को जानने की इसी लालसा और सत्य की खोज में मूलशंकर ने अपना घर-बार, सुख-सुविधाएं सब त्याग दीं और निकल पड़े एक अंतहीन यात्रा पर।

भटकते-भटकते वे मथुरा में गुरु ‘स्वामी विरजानंद’ जी की शरण में पहुँचे। गुरु विरजानंद खुद नेत्रहीन थे, लेकिन उनके पास वेदों का वो अथाह ज्ञान था जिसने मूलशंकर को ‘महर्षि दयानंद’ में ढाल दिया।

विदेशी हुकूमत के खिलाफ स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया था ‘स्वराज’ का सबसे पहला नारा

साल था 1876… जब अंग्रेज़ी हुकूमत का चाबुक भारतीयों की पीठ पर सबसे बेरहमी से पड़ रहा था..

उस खौफनाक दौर में महर्षि दयानंद सरस्वती वो पहले इंसान थे, जिन्होंने “स्वराज” (Swaraj – India for Indians) का सबसे पहला और ऐतिहासिक नारा दिया था।

उनका ये ‘स्वराज’ सिर्फ अंग्रेज़ों को भगाने का कोई राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह भारत के उसी वैदिक और सांस्कृतिक गौरव को वापस सिंहासन पर बैठाने की एक हुंकार थी।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का मशहूर नारा, वीर सावरकर का राष्ट्रवाद और यहाँ तक की शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के दादा (सरदार अर्जुन सिंह) के भीतर जो आज़ादी का जुनून था..

वो सब महर्षि दयानंद सरस्वती के इसी वैदिक राष्ट्रवाद की ही तो देन थी!

घर वापसी का वो ऐतिहासिक शंखनाद जिसने जबरन धर्मांतरण कराने वालों की रातों की नींद उड़ा दी थी

19वीं सदी में ईसाई मिशनरी और इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतें हिंदुस्तान के गांवों में खुलेआम घूम रही थीं।

ये लोग डरा-धमका कर या थोड़े से पैसों का लालच देकर भोले-भाले हिन्दुओं को धड़ाधड़ मुसलमान और ईसाई बना रहे थे।

ऐसे नाज़ुक वक्त में महर्षि दयानंद सरस्वती सनातन की सबसे मज़बूत ढाल बनकर खड़े हुए। 7 अप्रैल 1875 को उन्होंने बम्बई में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की और एक नारा दिया- “वेदों की ओर लौटो” (Back to the Vedas)।

स्वामी जी ने डंके की चोट पर उन सभी लोगों के लिए आर्य समाज के दरवाज़े खोल दिए, जिन्हें लालच या डर से अपने धर्म से भटकना पड़ा था।

उन्होंने देश का सबसे पहला और सबसे विराट ‘शुद्धि आंदोलन’ (जिसे आज हम ‘घर वापसी’ कहते हैं) चलाया।

उन्होंने उन हज़ारों हिन्दुओं को पूरे सम्मान और वैदिक मंत्रों के साथ वापस सनातन धर्म में शामिल किया।

इतना ही नहीं, स्वामी जी बहुत अच्छी तरह जानते थे की जब तक हिन्दू समाज जातियों और छुआछूत की बेड़ियों में जकड़ा रहेगा, तब तक बाहरी लोग हमें ऐसे ही काटते रहेंगे।

इसलिए उन्होंने समाज के वंचित वर्ग, हाशिए पर खड़े लोगों और महिलाओं को वो अधिकार वापस दिलाए, जो कुछ पाखंडियों ने उनसे छीन लिए थे।

उन्होंने सरेआम कहा की वेद पढ़ने और जनेऊ पहनने पर समाज के हर वर्ग का बराबर अधिकार है। उन्होंने बंटे हुए हिन्दू समाज को एक ऐसी लोहे की मुट्ठी बना दिया, जिसे तोड़ना धर्मांतरण कराने वालों के लिए नामुमकिन हो गया था।

‘सत्यार्थ प्रकाश’ का ब्रह्मास्त्र जिसने सभी धर्मों के अंधविश्वासों को आईना दिखाया और समाज को जगाया

1875 में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने एक वैचारिक ब्रह्मास्त्र तैयार किया, जिसका नाम था- ‘सत्यार्थ प्रकाश’। यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि सोए हुए हिंदुस्तान को जगाने वाला एक अलार्म था।

उन्होंने सबसे पहले अपने ही हिन्दू समाज के भीतर घुसी कुरीतियों की बखिया उधेड़ी। बाल-विवाह, सती प्रथा, और जन्म के आधार पर फैले छुआछूत जैसी बीमारियों पर उन्होंने करारे तर्कों का प्रहार किया।

और बात सिर्फ अपने समाज तक सीमित नहीं रही! 19वीं सदी के उस दौर में, स्वामी जी ने बिना किसी का खौफ खाए इस्लाम और ईसाई धर्म में मौजूद पाखंडों पर सरेआम शास्त्रार्थ (Debate) किया।

मौलवी हों या बड़े-बड़े पादरी, स्वामी जी के तर्कों के आगे किसी की टिकने की हिम्मत नहीं होती थी। उन्होंने दुनिया को आईना दिखा दिया की सत्य को कभी भी पाखंड के पर्दों से ढका नहीं जा सकता।

गौमाता की रक्षा के लिए देश का सबसे बड़ा हस्ताक्षर अभियान और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का सपना

आप स्वामी जी के विज़न की गहराई देखिए। मुगलों के दौर से लेकर अंग्रेज़ों के शासनकाल तक, देश में गौमाता का खून पानी की तरह बहाया जा रहा था।

किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी की विदेशी हुकूमत की आंखों में आंखें डालकर इस कत्लेआम को रोक सके। लेकिन महर्षि दयानंद वो शेर थे जिन्होंने 1882 में ‘गौ-रक्षिणी सभा’ की स्थापना कर डाली।

गांव-गांव जाकर लाखों लोगों के हस्ताक्षर (Signatures) लिए गए और अंग्रेज़ी हुकूमत की टेबल पर वो ज्ञापन पटक कर कहा गया की भारत की धरती पर गौ-हत्या बंद होनी चाहिए।

इसके साथ ही उनका हिंदी प्रेम भी अद्भुत था। वो जन्म से गुजराती थे। उन्हें संस्कृत का ऐसा प्रकांड ज्ञान था की वो धाराप्रवाह संस्कृत बोल सकते थे।

लेकिन उन्होंने अपना सारा साहित्य, अपने सारे उपदेश ‘हिंदी’ में दिए। क्यों? क्योंकि वो जानते थे की जब तक पूरा देश एक भाषा से नहीं जुड़ेगा, तब तक हम अंग्रेज़ों से नहीं लड़ पाएंगे।

जोधपुर दरबार की वो नर्तकी और दूध में पिसा हुआ कांच, एक रहस्यमयी षड्यंत्र जिसने सनातन के शेर को छलनी कर दिया

लेकिन जो सत्य बोलता है, उसके दुश्मन भी बहुत जल्दी बन जाते हैं। बात सितम्बर 1883 की है।

स्वामी जी जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के विशेष बुलावे पर उनके राजदरबार में पहुंचे हुए थे।

स्वामी जी ने देखा की महाराजा एक ‘नन्ही जान’ नाम की नर्तकी के प्यार में इतने अंधे हो चुके हैं की उन्हें राज-काज और मर्यादा का कोई होश ही नहीं है।

एक सच्चे गुरु की तरह स्वामी जी ने बिना किसी डर के सरेआम महाराजा को फटकार लगाई। उन्होंने कड़े शब्दों में राजा को उस नर्तकी के मोह से बाहर निकलने को कहा।

बस, यही बात उस नर्तकी ‘नन्ही जान’ के दिल में ज़हर की तरह उतर गई। उसने एक बेहद घिनौनी साज़िश रची। उसने जोधपुर दरबार के रसोइए (कुक) ‘जगन्नाथ’ को पैसों का भारी लालच देकर खरीद लिया।

29 सितम्बर 1883 की वो रात थी। जगन्नाथ ने स्वामी जी के पीने वाले दूध में भयंकर ज़हर के साथ-साथ ‘पिसा हुआ कांच’ मिला दिया। जैसे ही स्वामी जी ने वो दूध पिया, उनके शरीर के भीतर मानों आग लग गई।

नसों को कांच ने काटना शुरू कर दिया।

कहते हैं की उस खौफनाक दर्द के बीच इलाज के लिए जिस डॉक्टर (अली मर्दान खान) को बुलाया गया, उसने भी साज़िश के तहत सही इलाज नहीं किया, बल्कि दवाइयों के नाम पर ऐसा कुछ दिया जिससे ज़हर उनके पूरे शरीर में तेजी से फैल गया।

स्वामी जी के मजबूत शरीर से खून रिसने लगा। सनातन के उस शेर को गद्दारों ने छल-कपट से अंदर ही अंदर छलनी कर दिया था।

मैं दुनिया को कैद करने नहीं बल्कि आज़ाद करने आया हूँ, मृत्यु शय्या पर भी अपने हत्यारे को दे दिया जीवनदान

ज़हर अपना काम कर चुका था, लेकिन स्वामी जी का आध्यात्मिक बल अभी भी उस ज़हर से कहीं ज़्यादा भारी था।

जब रसोइए जगन्नाथ को अपनी इस हरकत का अहसास हुआ, तो वो वो दौड़ता हुआ स्वामी जी के बिस्तर के पास आया और फूट-फूट कर रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा।

बिस्तर पर असहनीय पीड़ा से तड़प रहे महर्षि दयानंद ने मुस्कुराते हुए जगन्नाथ की तरफ देखा, उसे अपने पास से कुछ पैसे दिए और कहा-

“जगन्नाथ, तूने यह बहुत बुरा किया। लेकिन मैं दुनिया को कैद करने नहीं, बल्कि आज़ाद करने आया हूँ। ये पैसे ले और जितनी जल्दी हो सके यहाँ से नेपाल भाग जा, क्योंकि अगर मेरे अनुयायियों को तेरा सच पता चल गया, तो वो तुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे।”

आख़िरकार, 30 अक्टूबर 1883 को जब पूरे देश में दीपावली के दीये जल रहे थे, तब आर्यवर्त का सबसे बड़ा सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो गया।

अजमेर में, अपने जीवन के अंतिम क्षणों में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों के मंत्रों का जाप किया, और बहुत ही शांति से अपने प्राण त्याग दिए।

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