30 अक्टूबर का वो दिन जब अयोध्या में राम का नाम लेना बन गया था मौत का फरमान, आज ही के दिन मुलायम सिंह यादव ने निहत्थे कारसेवकों पर चलवाई थी गोलियां और कहलाये थे “मुल्ला मुलायम”

जब भी कैलेंडर पर 30 अक्टूबर की तारीख आती है, तो भारत के इतिहास का एक ऐसा पन्ना फड़फड़ाने लगता है जिस पर किसी बाहरी दुश्मन ने नहीं, बल्कि अपने ही देश की एक ‘सेक्युलर’ सरकार ने निहत्थे देशवासियों का खून बहाया था।

आज 2026 में जब हम अयोध्या में भगवान राम का वो भव्य और दिव्य मंदिर देखते हैं, जो अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ आसमान छू रहा है, तो एक पल के लिए यकीन करना मुश्किल हो जाता है की ये वही आज़ाद भारत है।

यह वही देश है जहां महज़ 36 साल पहले अपनी ही धरती पर, अपने ही आराध्य का नाम लेना ‘कानून व्यवस्था’ के लिए इतना बड़ा खतरा मान लिया गया था की रामभक्तों के सीनों में सीधी गोलियां उतार दी गई थीं।

आज के इस दौर में बैठकर उस वक्त की कल्पना करना भी रोंगटे खड़े कर देता है। कल्पना कीजिए की अयोध्या, जो सदियों से हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र रही है, उसे रातों-रात एक ऐसी छावनी में बदल दिया गया था मानो वह किसी दूसरे देश का बॉर्डर हो।

चारों तरफ बंदूकें ताने पुलिस, PAC और CRPF के जवान। सड़कों पर कंटीले तार, बैरिकेड्स और खौफ का वो सन्नाटा, जिसे चीरकर अगर किसी के होंठों से ‘जय श्री राम’ का नारा निकल जाता, तो उसे मौत का सीधा फरमान समझ लिया जाता था।

उस वक्त उत्तर प्रदेश की कुर्सी पर बैठे सत्ताधीशों ने यह मान लिया था की अपने वोट बैंक को खुश करने और खुद को ‘धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने के लिए अगर हिंदुओं के खून की नदियां भी बहानी पड़ें, तो वो कोई बड़ा सौदा नहीं होगा।

और 30 अक्टूबर 1990 की उस मनहूस सुबह को बिल्कुल यही हुआ।

“अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा”, जब मुलायम सिंह यादव ने खुलेआम दी चुनौती और रामभक्तों ने नंगे पैर अयोध्या की ओर कर दिया कूच

इस खौफनाक गोलीकांड की असली कहानी 30 अक्टूबर को नहीं, बल्कि उसके कई महीनों पहले से ही शुरू हो गई थी।

साल 1990 पूरे देश के लिए एक उबाल का साल था। विश्व हिंदू परिषद (VHP), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा के दिग्गज नेताओं ने राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश के युवाओं से ‘कारसेवा’ का आह्वान कर दिया था।

लालकृष्ण आडवाणी जी की रथयात्रा पूरे देश का माहौल बदल रही थी, जिसे बिहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रोक कर उन्हें गिरफ्तार करवा लिया।

इससे देश भर के रामभक्तों में एक ऐसा आक्रोश पैदा हुआ की लाखों युवाओं ने तय कर लिया की अब चाहे जो हो जाए, वो 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुँच कर रहेंगे।

लेकिन उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम सिंह यादव बैठे थे। सत्ता और पुलिस प्रशासन की ताकत ने उनके भीतर एक ऐसा अहंकार पैदा कर दिया था, जिसे इतिहास में बहुत कम देखा गया है।

उन्होंने मीडिया के सामने डंके की चोट पर एक ऐसा बयान दिया जो इतिहास के पन्नों में उनके माथे पर एक कलंक की तरह हमेशा के लिए चस्पा हो गया।

मुलायम सिंह ने कहा था- “हम देखते हैं कौन जाता है वहां। अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।”

यह बयान बहुसंख्यक समाज की आस्था को एक खुली चुनौती थी। अपने इस ‘परिंदा’ वाले घमंड को सच साबित करने के लिए मुलायम सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी।

उत्तर प्रदेश जाने वाली तमाम ट्रेनें रद्द कर दी गईं, हाईवे सील कर दिए गए, बसों को रोक दिया गया।

ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे अयोध्या में कोई विदेशी सेना घुसपैठ करने वाली हो। पुलिस ने हर जिले, हर कस्बे में चेकिंग शुरू कर दी की कहीं कोई भगवा कपड़े पहने या राम नाम जपता हुआ न मिल जाए।

लेकिन सत्ता के नशे में चूर लोग अक्सर यह भूल जाते हैं की जब आस्था अपने चरम पर होती है, तो उसे बैरिकेड्स या बंदूक की गोलियों से नहीं रोका जा सकता।

सरकार ने सड़कें बंद कीं, तो हजारों कारसेवकों ने खेतों और जंगलों का रास्ता पकड़ लिया। वो खेतों की पगडंडियों से, कीचड़ से, बिना कुछ खाए-पिए, रात-रात भर चलकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से अयोध्या पहुँचने लगे।

जिस सरकार का खुफिया तंत्र यह मानकर चल रहा था की परिंदा पर नहीं मार पाएगा, उसे 30 अक्टूबर की सुबह पता चला की अयोध्या में लाखों परिंदों ने सिर्फ पर ही नहीं मारा था, बल्कि उन्होंने पूरा आसमान ढंक लिया था।

यह सरकार के उस अहंकार की पहली और सबसे बड़ी हार थी।

 

बैरिकेड टूटते ही बाबरी के गुंबद पर लहराया भगवा और फिर लखनऊ से आया दर्दनाक फरमान

30 अक्टूबर 1990 की वो सर्द सुबह, जिसके गर्भ में इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी छिपी थी। अयोध्या की सड़कों पर कारसेवकों का जनसैलाब उमड़ पड़ा था।

वामदेव जी महाराज, अशोक सिंघल और उमा भारती जैसे नेताओं के नेतृत्व में यह निहत्थी भीड़ हनुमानगढ़ी की तरफ बढ़ रही थी। पुलिस ने कई स्तर की बैरिकेडिंग कर रखी थी।

आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे और लाठीचार्ज चल रहा था। लेकिन वो भीड़ किसी डर से नहीं, एक धुन से चल रही थी।

तभी एक ऐसा नज़ारा हुआ जिसने पूरे प्रशासन के हाथ-पांव फुला दिए। कहा जाता है की एक साधु (जिन्हें कुछ रिपोर्ट्स में बाबा वामदेव के रूप में पहचाना गया) ने पुलिस की ही एक खाली बस का स्टेयरिंग अपने हाथों में ले लिया।

उन्होंने बस को स्टार्ट किया और उसे सीधे बैरिकेड्स से टकरा दिया। लोहे के वो भारी बैरिकेड्स ताश के पत्तों की तरह ढह गए और रास्ता खुल गया।

रास्ता खुलते ही कारसेवक उस विवादित ढांचे बाबरी मस्जिद की तरफ दौड़ पड़े। पुलिस देखती रह गई और कुछ ही मिनटों में कोलकाता से आए शरद कोठारी सहित कई कारसेवक ढांचे के गुंबद पर चढ़ गए।

और वहां, उस विवादित गुंबद के ऊपर भगवा झंडा फहरा दिया गया!

जैसे ही गुंबद पर भगवा फहरा, लखनऊ में बैठे सत्ताधीशों के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। मुलायम सिंह यादव को लगा की उनका वो “परिंदा पर नहीं मार पाएगा” वाला दावा अब पूरे देश में उनके राजनीतिक पतन का कारण बन जाएगा।

उन्हें लगा की अगर अभी कुछ नहीं किया गया, तो उनका ‘मुस्लिम वोट बैंक’ हमेशा के लिए खिसक जाएगा।

और फिर, लखनऊ के कमरों से वो खौफनाक और गैर-संवैधानिक फरमान जारी हुआ, जिसने अयोध्या की सड़कों को लहूलुहान कर दिया।

पुलिस और पैरा-मिलिट्री फोर्सेज को निहत्थे कारसेवकों पर ‘ओपन फायरिंग’ (Open Firing) यानी सीधी गोलियां चलाने का आदेश दे दिया गया।

कोई चेतावनी नहीं, कोई हवाई फायर नहीं… सीधा सीने और सिर पर गोलियां मारने का फरमान।

जो लोग कल तक सिर्फ राम धुन गा रहे थे, उन्हें अब पुलिस चुन-चुन कर गोलियों से भून रही थी।

और 30 अक्टूबर का वो दिन महज़ एक ट्रेलर था, क्योंकि मौत का सबसे खौफनाक तांडव तो अभी 2 नवंबर को होना बाकी था।

2 नवंबर की वो सुबह और कोठारी बंधुओं का बलिदान, जब घरों से खींचकर निहत्थे कारसेवकों के सीने में उतारी गई थी सत्ता की सनक

30 अक्टूबर को अयोध्या की सड़कों पर जो खून बहा था, वो इस खौफनाक कहानी का सिर्फ पहला पन्ना था। सत्ता के गलियारों में बैठे लोग तब तक खून के प्यासे हो चुके थे, जब तक की वो अयोध्या से रामभक्तों का नामोनिशान नहीं मिटा देते।

दो दिन के कर्फ्यू और सन्नाटे के बाद आई 2 नवंबर 1990 की वो मनहूस सुबह, जिसे भारत के इतिहास का ‘जलियांवाला बाग’ कहा जाए तो बिल्कुल भी गलत नहीं होगा।

2 नवंबर को हजारों कारसेवक दिगंबर अखाड़े और उसके आस-पास की पतली गलियों में शांति से बैठे थे। उनके हाथों में कोई हथियार नहीं था, कोई पत्थर नहीं था। वो सिर्फ ज़मीन पर बैठकर ‘राम धुन’ गा रहे थे।

लेकिन मुलायम सिंह यादव के आदेश पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरी गली को दोनों तरफ से घेर लिया। निहत्थी भीड़ को वहां से हटने की कोई चेतावनी नहीं दी गई और सीधे फायरिंग शुरू कर दी गई।

इसी दिन की सबसे रुला देने वाली कहानी है कोलकाता से आए दो सगे भाइयों की- राम कुमार कोठारी (22 साल) और शरद कोठारी (20 साल)।

ये वही दिलेर शरद कोठारी थे, जिन्होंने 30 अक्टूबर को विवादित ढांचे के गुंबद पर चढ़कर भगवा फहराया था। पुलिस की नज़रों में ये दोनों भाई अब सबसे बड़े ‘मुजरिम’ बन चुके थे।

जब 2 नवंबर को पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कीं, तो बचने के लिए ये दोनों भाई और कुछ अन्य कारसेवक एक लाल रंग के मकान (जिसे लाल कोठी कहा जाता था) में छिप गए।

लेकिन उस दिन पुलिस कानून की रक्षक नहीं, बल्कि निहत्थों का शिकार करने वाली एक फोर्स बन चुकी थी। चश्मदीदों के मुताबिक, पुलिस ने दरवाज़ा तोड़कर उन दोनों भाइयों को घर से बाहर निकाला।

वो निहत्थे थे, उन्होंने कोई प्रतिरोध नहीं किया, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें बिल्कुल करीब से (Point-blank range) गोलियां मार दीं।

बड़े भाई राम कुमार के सिर में और छोटे भाई शरद के गले में गोली उतारी गई। दोनों सगे भाई वहीं अयोध्या की धूल में तड़पते हुए राम के चरणों में शहीद हो गए।

ज़रा सोचिए उन माता-पिता पर क्या गुज़री होगी, जिन्होंने अपने दो जवान बेटों को धर्म के काम के लिए भेजा था और बदले में उन्हें सरकार की गोलियों से छलनी दो लाशें मिलीं।

पुलिस उस दिन पागलपन की हदें पार कर चुकी थी। लोगों को घरों से खींच-खींच कर मारा जा रहा था। लेकिन उस खौफ के माहौल में भी अयोध्या के स्थानीय निवासियों ने जो हिम्मत दिखाई, वो भी अमर है।

कई चश्मदीदों, जैसे स्थानीय निवासी ओंम भारती जी, की गवाही इतिहास में दर्ज़ है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने छोटे से घर में 100 से ज़्यादा कारसेवकों को पनाह दी थी।

अगर अयोध्या के लोग उस दिन कारसेवकों को अपने घरों में छिपाकर ताले न लगाते, तो मरने वालों की संख्या शायद हज़ारों में होती। सरकार रामभक्तों का शिकार कर रही थी और स्थानीय लोग उन्हें अपनी छाती से लगाकर बचा रहे थे।

सरकारी फाइलों का झूठ और सरयू नदी का लाल पानी, आखिर कितने रामभक्तों की लाशें रेत में दफना दी गईं

जब गोलियों की गूंज शांत हुई और अयोध्या की गलियों में सन्नाटा पसरा, तो एक और खौफनाक षड्यंत्र शुरू हुआ- सच को दफनाने का षड्यंत्र।

मुलायम सरकार ने जो नरसंहार किया था, उसकी गूंज पूरे देश में होने वाली थी, इसलिए आनन-फानन में मौतों के आंकड़ों को छिपाने का गंदा खेल खेला गया।

सरकार ने बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए अपनी फाइलों में दावा किया की इन दो दिनों की फायरिंग में महज़ 15 से 16 लोग मारे गए हैं।

लेकिन जो चश्मदीद वहां मौजूद थे, जो पत्रकार अपनी जान हथेली पर रखकर रिपोर्टिंग कर रहे थे और विश्व हिंदू परिषद के जो कार्यकर्ता वहां थे, उनका सच सरकार के दावों से बिल्कुल उलट था।

उनके मुताबिक मरने वालों का आंकड़ा दर्जनों में नहीं, बल्कि कई सैकड़ों में था।

तो फिर बाकी लाशें गईं कहां? ये सवाल आज भी 1990 की उस सत्ता से पूछा जाता है। पत्रकारों और स्थानीय लोगों की ग्राउंड रिपोर्ट्स में वो खौफनाक सच छपा जिसे पढ़कर आज भी रूह कांप जाती है।

बताया जाता है की मौतों का आंकड़ा कम दिखाने के लिए रात के अंधेरे में पुलिस ने कई लाशों को रेत की बोरियों (Sandbags) में भरा, उनमें भारी पत्थर बांधे और उन्हें चुपचाप सरयू नदी के गहरे पानी में फेंक दिया।

कुछ चश्मदीदों ने यहां तक दावा किया की सरयू नदी का पानी उस दिन लाल हो गया था।

जिन लाशों को नदी में नहीं फेंका जा सका, उन्हें अयोध्या के आस-पास की रेतीली ज़मीन में बिना किसी नाम-पते, बिना किसी अंतिम संस्कार के लावारिसों की तरह दफना दिया गया।

उन गुमनाम कारसेवकों के परिवार वाले आज तक उनके वापस लौटने का इंतज़ार कर रहे होंगे, उन्हें पता ही नहीं चला की उनके बेटों की लाशें किस बालू के नीचे दबी रह गईं।

और इस नरसंहार के सच को देश तक पहुँचने से रोकने के लिए उस तथाकथित ‘लोकतांत्रिक’ सरकार ने प्रेस की आज़ादी का भी गला घोंट दिया।

हिंदी अख़बारों (जैसे आज, दैनिक जागरण) ने जब सड़कों पर पड़ी लाशों की तस्वीरें और सच छापना शुरू किया, तो सरकार के आदेश पर अख़बारों के दफ्तरों पर छापे मारे गए।

अख़बारों के बंडल रातों-रात ज़ब्त कर लिए गए और पत्रकारों को गिरफ्तार किया जाने लगा। सेंसरशिप का एक ऐसा अघोषित आपातकाल (Emergency) लगा दिया गया ताकि देश को यह पता ही न चले की ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर अयोध्या में कितने हिंदुओं की बलि चढ़ाई जा चुकी है।

सत्ता बचाने के लिए निहत्थे हिन्दुओं का खून बहाने वाले मुलायम सिंह यादव कहलाये ‘मुल्ला मुलायम’

जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री अपने ही निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलवाता है, तो आम तौर पर उसे पछतावा होता है, वह माफ़ी मांगता है या कम से कम उस घटना को एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण हादसा’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है।

लेकिन उत्तर प्रदेश की उस सत्ता का अहंकार अपने एक अलग ही चरम पर था।

जो मुलायम सिंह यादव निहत्थे हिंदुओं को मरवाकर खुद को भारत के संविधान और कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा रक्षक बता रहे थे, उन्हें उनके इस ‘कारनामे’ के बाद पूरे देश ने “मुल्ला मुलायम” का तमगा दे दिया।

सेक्युलरिज्म के ठेकेदारों ने इस पूरे नरसंहार को जायज़ ठहराने के लिए एक नैरेटिव गढ़ दिया की “मुलायम सिंह ने जो किया, वो भारत की धर्मनिरपेक्षता और मस्जिदों को बचाने के लिए नितांत आवश्यक था।”

सालों बाद, जब वो माहौल थोड़ा शांत हो गया, तब मुलायम सिंह यादव ने अपने इस फैसले को लेकर जो भड़काऊ और क्रूर बयान दिए, उसने पूरे हिंदू समाज के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया।

2013 और फिर 2016-2017 में कई राजनीतिक रैलियों और साक्षात्कारों में मुलायम सिंह ने सीना ठोक कर एक ऐसा कबूलनामा दिया जिसे सुनकर कोई भी सभ्य समाज कांप उठे।

उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा था- “देश की एकता और मुसलमानों का विश्वास जीतने के लिए अगर मुझे 30 या उससे भी ज़्यादा लोगों को मारना पड़ता, तो सुरक्षा बल मारते। मुझे इस फैसले का कोई अफ़सोस नहीं है।”

यहाँ एक बहुत ही तीखा और चुभने वाला सवाल उठता है। क्या इस देश में ‘एकता’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ सिर्फ तभी साबित होती है जब बहुसंख्यक हिंदू समाज के सीने में गोलियां उतारी जाएं?

क्या मुसलमानों का विश्वास जीतने की कीमत इस देश के रामभक्तों के खून से ही चुकाई जा सकती है?

मुलायम सिंह के उस बयान ने यह साबित कर दिया की 1990 में चली वो गोलियां सिर्फ कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नहीं थीं, बल्कि वो एक सोची-समझी राजनीतिक हत्याएं थीं, जिनका इकलौता मक़सद एक विशेष समुदाय को खुश करके अपनी सत्ता की कुर्सी को फेविकोल से चिपकाए रखना था।

सेक्युलरिज्म के नाम पर रचा गया यह वो पाखंड था, जिसे भारत का सनातनी समाज शायद ही कभी भूल पाए।

गोलियों की गूंज से लेकर भव्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा तक, कारसेवकों के उस बलिदान ने लिख दी नए भारत की तकदीर

वक़्त बहुत बड़ा मरहम भी है और बहुत बड़ा न्यायकर्ता भी। जो लोग सत्ता के नशे में यह सोच बैठे थे की वो गोलियों के दम पर सदियों पुरानी आस्था को कुचल देंगे, वो वक़्त के पहिए को पहचान नहीं पाए।

1990 में अयोध्या की सड़कों पर जो गोलियां चली थीं, उन्होंने भले ही कुछ शरीरों को छलनी कर दिया हो, कुछ माताओं की गोद सूनी कर दी हो, लेकिन हकीकत यह है की उसी खून से, उसी बलिदान से उस भव्य राम मंदिर की असल नींव रखी गई थी।

आज 30 अक्टूबर 2026 है। ठीक 36 साल बीत चुके हैं उस मनहूस दिन को। आज मुलायम सिंह यादव की वो सत्ता नहीं रही, वो अहंकार मिट्टी में मिल चुका है।

लेकिन वो रामभक्त, वो कोठारी बंधु और वो सैकड़ों गुमनाम कारसेवक आज भी इतिहास के पन्नों में और करोड़ों सनातनियों के दिलों में अमर हैं।

आने वाली पीढ़ियों को जब भी अयोध्या के राम मंदिर का इतिहास पढ़ाया जाएगा, तो उन्हें यह ज़रूर बताया जाना चाहिए की एक दौर ऐसा भी था जब इसी आज़ाद देश में राम का नाम लेना मौत का फरमान बन गया था।

ये मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, यह उन लाखों कारसेवकों के संघर्ष, अपमान, आंसुओं और सर्वोच्च बलिदान का सबसे बड़ा विजय स्मारक है।

जय श्री राम! उन सभी अमर बलिदानियों को कोटि-कोटि नमन!

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