इस लेख में हम विस्तार से देखेंगे कि कैसे ‘मजबूत सरकार’ के दावों के बावजूद परीक्षा तंत्र बार-बार फेल हो रहा है। नीचे मुख्य सेक्शन, प्रमुख आंकड़े और इंटरैक्टिव सवाल दिए गए हैं।
मुख्य आंकड़े: 150+ पेपर लीक | 7.5 करोड़ युवा प्रभावित | NTA में 30 से कम स्थायी कर्मचारी | कन्विक्शन रेट लगभग शून्य | 44 परीक्षाएं रद्द

सीधी सी बात है, जब आप एक ‘मजबूत सरकार’ होने का दावा करते हैं, तो जनता आपसे हर मोर्चे पर उसी मज़बूती की उम्मीद लगा बैठती है।
आप आज के सिस्टम को देखें, तो एक बहुत ही अजीब और खटकने वाला विरोधाभास नज़र आता है।
एक तरफ हमारे पास एक ऐसा सरकारी तंत्र है जो ‘डिजिटल इंडिया’ का ऐसा भौकाल टाइट कर चुका है की आज गांव के नुक्कड़ पर सब्ज़ी बेचने वाला भी QR Code दिखाकर यूपीआई (UPI) से पेमेंट ले रहा है। सरकार देश भर में एक्सप्रेस-वे का जाल बिछा रही है, वंदे भारत जैसी हाई-स्पीड ट्रेनें दौड़ रही हैं..
लेकिन, ज़रा रुकिए! इसी ‘डिजिटल और हाई-टेक’ सिस्टम से जब आप कहते हैं की “हुज़ूर, देश के युवाओं के लिए एक 3 घंटे का एग्ज़ाम बिना पर्चा लीक हुए करवा दीजिए,” तो इस पूरे तंत्र की सांसें फूलने लगती है।
ये कोई मज़ाक है क्या? जो सिस्टम 140 करोड़ लोगों का आधार कार्ड का डेटा सुरक्षित रखने का दावा करता है, वो एक प्रिंटिंग प्रेस या बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम से परीक्षा केंद्र तक जाने वाले एक छोटे से लोहे के बक्से को सुरक्षित नहीं रख पा रहा!
सरकार का यह कैसा ‘सुशासन’ है जो पेपर लीक गैंग के आगे घुटनों के बल रेंगता हुआ दिखाई देता है?
राजनीतिक नज़रिए से देखें तो यह सत्ता के ज़मीनी हकीकत से कट जाने का सबसे बड़ा ‘सेल्फ-गोल’ है। सरकार को शायद लगता है की वो सिर्फ हाईवे बनाकर और डिजिटल इकॉनमी का आंकड़ा दिखाकर चुनाव जीत लेगी। लेकिन हकीकत ये है की जिस युवा वोटर ने 2014 से लेकर आज तक पार्टी को अंधा समर्थन दिया, आज वही युवा अपने भविष्य को कौड़ियों के भाव बिकता हुआ देख रहा है।
सत्ता के रणनीतिकारों को शायद दिल्ली में बैठकर इस बात का अंदाज़ा ही नहीं लग पा रहा है की जब एक छात्र सालों की मेहनत के बाद पेपर लीक की वजह से बेबस हो जाता है, तो उसके भीतर सिस्टम के खिलाफ कितनी भयंकर नफरत का लावा सुलग रहा होता है।
आप हर चीज़ का इल्ज़ाम विपक्ष के सिर पर नहीं फोड़ सकते। अगर सत्ता आपकी है, सिस्टम आपका है, पुलिस आपकी है, तो फिर इस एजुकेशन सिस्टम के निकम्मेपन की ज़िम्मेदारी भी आपको ही लेनी होगी।

✍ पढ़ें और सोचें: ‘मज़बूत सरकार’ की मज़बूती कहाँ तक?
- डिजिटल इंडिया, UPI और वंदे भारत वहाँ चमकते हैं जहाँ तकनीक दिखती है। तो सोचिए, इसी चमक के बीच एक 3 घंटे के एग्ज़ाम का पर्चा सुरक्षित क्यों नहीं रह पाता?
- आपकी नज़र में ‘मज़बूत सरकार’ की असली कसौटी क्या होनी चाहिए: हाईवे और आँकड़े, या हर युवा के लिए निष्पक्ष मौक़ा?
1. विकास के दावों और खोखले इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच पिसती भारत की शिक्षा व्यवस्था
पिछले एक दशक में 150 से ज़्यादा सरकारी परीक्षाओं के हो चुके हैं पेपर लीक

पिछले एक दशक (लगभग 2014 से 2024-2026 तक) के आंकड़े उठाकर देख लीजिए। पूरे देश में छोटी-बड़ी मिलाकर 150 से ज़्यादा सरकारी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं!
जी हाँ, 150 से ज़्यादा! और इसका खामियाज़ा किसने भुगता है? देश के लगभग 7.5 करोड़ युवाओं ने!
ज़रा एक पल के लिए इस 7.5 करोड़ के नंबर को अपने दिमाग में प्रोसेस कीजिए। यूरोप के कई देशों (जैसे जर्मनी या फ्रांस) की तो कुल आबादी ही इतनी होती है।
💡 क्या आप जानते हैं?
आँकड़ों के हिसाब से 150 से ज़्यादा पेपर लीक और लगभग 7.5 करोड़ प्रभावित युवा, यानी औसतन हर लीक करीब 5 लाख युवाओं पर भारी पड़ा।
मतलब हमारे देश में एक पूरे यूरोप जितनी युवा आबादी सिर्फ इसलिए अवसाद और डिप्रेशन में धकेल दी गई क्योंकि हमारे सिस्टम में बैठे बाबू और अफ़सर एक परीक्षा का पर्चा सुरक्षित नहीं रख सके।
यहाँ सबसे ज़्यादा चुभने वाली बात ये है की हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ हमारे इसरो (ISRO) के वैज्ञानिक चाँद के उस हिस्से (Dark side of the moon) पर चंद्रयान उतार रहे हैं जहाँ आज तक कोई देश नहीं पहुँच पाया।
हम स्पेस टेक्नोलॉजी में दुनिया के बाप बन रहे हैं। लेकिन ज़मीन पर हमारा एजुकेशन सिस्टम इतना खोखला हो चुका है की एक सॉल्वर गैंग का मामूली सा गुर्गा 10-20 लाख रुपये देकर पूरा का पूरा सिस्टम हैक कर लेता है।
आंकड़े बताते हैं की आज पेपर लीक कोई छिटपुट घटना नहीं रह गई है। यह हज़ारों करोड़ रुपये का एक सुसंगठित (Organised) उद्योग बन चुका है।
कोचिंग सेंटर के मालिक, प्रिंटिंग प्रेस वाले, पेपर ट्रांसपोर्ट करने वाली एजेंसियां और शिक्षा विभाग के भ्रष्ट अधिकारी- इन सबने मिलकर एक समानांतर (Parallel) सरकार बना ली है। हालत तो ये है की इनके पास बाकायदा एक ‘मेनू कार्ड’ होता है। आपको कांस्टेबल बनना है? इतने लाख दो। क्लर्क बनना है? इतने लाख दो। मेडिकल की सीट चाहिए? उसका रेट अलग है।
और सरकार? सरकार तब जागती है जब पर्चा टेलीग्राम और व्हाट्सएप पर 100-100 रुपये में बिक चुका होता है और युवा सड़कों पर उतरकर आक्रोश जताता है।
7.5 करोड़ युवाओं का ठगा जाना कोई साधारण प्रशासनिक फेलियर नहीं है बॉस! यह इस बात का सबूत है की आपने इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी के नाम पर जो महल खड़े किए हैं, उनकी नींव में दीमक लग चुकी है।
आप 5 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना दिखा रहे हैं, लेकिन जो युवा उस इकॉनमी को चलाएगा, उसे आपने पेपर लीक माफिया के हाथों नीलाम होने के लिए छोड़ दिया है।

✍ रुकिए, एक पल सोचिए: महल और उसकी नींव
- 7.5 करोड़ युवा प्रभावित हुए। अपने आसपास किसी ऐसे साथी या रिश्तेदार को याद कीजिए जिसकी तैयारी पर पर्चा लीक का साया पड़ा हो। उन पर क्या बीती होगी?
- चंद्रयान और पेपर लीक, दोनों हक़ीक़तें एक ही देश की हैं। आपके हिसाब से फ़र्क किस चीज़ का है: संसाधनों का, इच्छाशक्ति का या जवाबदेही का?
2. (NTA)- नेशनल टेस्टिंग एजेंसी या नेशनल तमाशा एजेंसी
आउटसोर्सिंग के भरोसे चल रहे सिस्टम ने किया 24 लाख NEET अभ्यर्थियों के भविष्य का सौदा

जब भी कोई बड़ा संकट आता है, तो सरकारें एक बहुत ही पुराना और आज़माया हुआ नुस्खा अपनाती हैं- एक नई ‘एजेंसी’ बना दो।
2017-18 के आस-पास जब अलग-अलग परीक्षाओं में गड़बड़ियां शुरू हुईं, तो केंद्र सरकार ने बड़े गाजे-बाजे के साथ ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ यानी NTA का गठन किया। ढिंढोरा पीटा गया की यह अमेरिका की तर्ज पर बनी एक वर्ल्ड-क्लास एजेंसी होगी, जो एकदम अचूक, पारदर्शी और फूलप्रूफ (Foolproof) परीक्षाएं करवाएगी।
लेकिन आज जब आप NTA के स्ट्रक्चर का पोस्टमार्टम करते हैं, तो पता चलता है की जिसे हम ‘सुपर एजेंसी’ समझ रहे थे, वो दरअसल एक खोखला कागज़ी शेर है। युवाओं ने तो अब फ्रस्ट्रेशन में इसका नाम बदलकर ‘नेशनल तमाशा एजेंसी’ ही रख दिया है।
आप संसद में शिक्षा मंत्रालय द्वारा दिए गए जवाबों और आधिकारिक आरटीआई (RTI) के आंकड़ों को उठाकर देख लीजिए, आपका सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा। NTA हर साल देश भर के लगभग डेढ़ से दो करोड़ बच्चों की परीक्षाएं (NEET, JEE, CUET, UGC-NET आदि) आयोजित करवाती है।
लेकिन क्या आप जानते हैं की इस इतनी बड़ी एजेंसी को चलाने के लिए इनके पास खुद का ‘परमानेंट स्टाफ’ कितना है? 30 से भी कम!
जी हाँ। लगभग 24-25 स्थायी अधिकारियों के भरोसे करोड़ों बच्चों का भविष्य टिका हुआ है। बाकी के डेढ़ सौ-दो सौ लोग कॉन्ट्रैक्ट वाले हैं, जिन्हें डेपुटेशन पर लाया गया है या फिर वे दिहाड़ी कर्मचारी हैं।
अब सवाल उठता है की फिर ये परीक्षा करवाता कौन है? यहीं से शुरू होता है ‘आउटसोर्सिंग’ (Outsourcing) का वो भयानक खेल, जिसने पूरे परीक्षा तंत्र को सड़ा कर रख दिया है। NTA असल में खुद कोई परीक्षा नहीं करवाती, वो सिर्फ ‘टेंडर’ बांटती है। पेपर सेट करने से लेकर, सॉफ्टवेयर बनाने, सर्वर मैनेज करने, पेपर को प्रिंटिंग प्रेस से छपवाने और उसे ट्रंक में भरकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने का सारा काम ‘प्राइवेट थर्ड-पार्टी वेंडर्स’ (निजी कंपनियों) को आउटसोर्स कर दिया गया है।
💡 क्या आप जानते हैं?
हर साल डेढ़ से दो करोड़ परीक्षार्थी और 30 से भी कम स्थायी कर्मचारी। मोटे हिसाब से हर स्थायी कर्मचारी के हिस्से पाँच लाख से ज़्यादा परीक्षार्थी आते हैं।
ज़रा दिमाग लगाइए। आप देश के सबसे मेधावी और होनहार डॉक्टरों को चुनने जा रहे हैं (नीट के ज़रिेए), और उस परीक्षा की सुरक्षा आपने उन प्राइवेट वेंडर्स के हाथ में दे दी है जिन्हें L-1 (Lowest Bidder यानी सबसे कम पैसा कोट करने वाला) के आधार पर ठेका मिला है।
इन प्राइवेट कंपनियों का कोई ‘स्टेट स्टेक’ (राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी) नहीं होता। इनका काम सिर्फ प्रॉफिट कमाना है। जब कोई प्राइवेट कंपनी का डिलेवरी बॉय या सेंटर ऑपरेटर पेपर लीक करता है, तो सरकार ज़्यादा से ज़्यादा क्या करती है? उस कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर देती है या उस पर जुर्माना ठोक देती है। कंपनी जुर्माना भरती है और किसी दूसरे नाम से फिर टेंडर भर देती है।
लेकिन उस एक छोटी सी ‘आउटसोर्सिंग’ की चूक में जिस छात्र के जीवन का एक पूरा साल और उसके पिता की गाढ़ी कमाई बर्बाद हो जाती है, उसकी भरपाई कौन करेगा?
NTA का पूरा मॉडल ही ‘ज़िम्मेदारी से भागने’ का मॉडल है, और यही सरकार का सबसे बड़ा एडमिनिस्ट्रेटिव फेलियर है।
✍ ज़रा हिसाब लगाइए: ज़िम्मेदारी आख़िर किसकी?
- जब ठेका L-1 यानी सबसे कम बोली लगाने वाले को मिलता है, तो क्या सस्तेपन और सुरक्षा में टकराव होता है? क्या हर परीक्षा के लिए सबसे सस्ता विकल्प सही माना जाए?
- कंपनी ब्लैकलिस्ट होकर नए नाम से लौट आती है, पर छात्र का साल नहीं लौटता। सज़ा और भरपाई के बीच संतुलन आप कैसे बैठाएँगे?
3. NEET 2024 के घोटाले से सरकार ने नहीं लिया कोई सबक, और 2026 में आखिरकार गवानी पढ़ी शिक्षा मंत्री को अपनी कुर्सी
सिस्टम की यह बीमारी कितनी गहरी हो चुकी है, इसका सबसे खौफनाक और ताज़ा उदाहरण है मई 2026 में हुआ NEET-UG का महाघोटाला।

2024 के नीट घोटाले से सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा, और 2026 में ठीक वही कहानी, वही स्क्रिप्ट और वही किरदार फिर सामने आ गए। इस बार भी लगभग 24 लाख छात्रों ने दिन-रात एक करके NEET की तैयारी की थी। लेकिन परीक्षा के दिन से ही सुगबुगाहट शुरू हो गई की पेपर तो रात में ही बंट चुका था।
🕒 एक नज़र में: टाइमलाइन
- मई 2026: NEET-UG परीक्षा, और परीक्षा के दिन से ही पर्चा लीक की सुगबुगाहट।
- जुलाई 2026: भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बीच शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा।
जांच की आंच जब आगे बढ़ी, तो तार एक बार फिर बिहार-झारखंड के उसी कुख्यात माफिया नेक्सस से जुड़ते नज़र आए। हज़ारीबाग के ओएसिस स्कूल (Oasis School) जैसे सेंटर्स का नाम फिर से रडार पर आया, जहाँ बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम से परीक्षा केंद्र तक जाने वाले उस ‘बीच के रास्ते’ में ई-रिक्शा और प्राइवेट गाड़ियों के ज़रिए पेपर की सील से छेड़छाड़ की गई और पूरा पर्चा लीक कर दिया गया।
और बेशर्मी देखिए! जब रिज़ल्ट आया तो रैंक में ऐसा भयंकर इन्फ्लेशन (उछाल) दिखा की 650-660 नंबर लाने वाले (जो अमूमन टॉपर की लिस्ट में होते हैं) बच्चे भी किसी ढंग के सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट पाने की रेस से बाहर हो गए। सॉल्वर गैंग के जिन गुर्गों ने लाखों रुपये में पेपर खरीदा था, वो टॉप मार गए। यहीं से शुरू होता है सरकार का वो ‘पॉलिटिकल सुसाइड’, जिसकी चर्चा हमने शुरुआत में की थी।
जब 24 लाख बच्चों के परिवारों ने सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर बवाल काटना शुरू किया, तो सरकार ने वही अपना पुराना घिसा-पिटा ‘डिनायल मोड’ (इंकार करने का रवैया) अपना लिया। शुरुआत में कहा गया की “कहीं कोई पेपर लीक नहीं हुआ है, ये सब विपक्ष की साज़िश है।” लेकिन जब परतें उखड़नी शुरू हुईं, सीबीआई और पुलिस ने पेपर लीक गैंग के सरगनाओं को गिरफ्तार करना शुरू किया, तब सरकार का यह झूठ उनके ही गले की फांस बन गया।
देश का युवा अब सिर्फ ट्वीट नहीं कर रहा था, वो सड़कों पर उतर आया था। जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक छात्रों के इस ‘संसद चलो मार्च’ ने सत्ता की चूलें हिला कर रख दीं। दबाव इतना भयंकर हो गया की आखिरकार सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को डैमेज कंट्रोल के लिए उतरना पड़ा। जुलाई 2026 आते-आते यह साफ़ हो गया की अगर अब कोई बड़ा ‘बलि का बकरा’ नहीं ढूंढा गया, तो पूरे देश का युवा वोटर बीजेपी से हमेशा के लिए छिटक जाएगा।
इसी भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के चलते आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा। एक मंत्री का इस्तीफा कोई छोटी बात नहीं होती। यह इस बात का आधिकारिक कबूलनामा (Official Confession) था की आपका पूरा एजुकेशन सिस्टम कोलैप्स कर चुका है।
लेकिन सवाल ये है की क्या एक चेहरे को बदल देने से वो सिस्टम ठीक हो जाएगा जो अंदर से खोखला है? क्या मंत्री के इस्तीफे से उन 24 लाख बच्चों को उनका वो साल वापस मिल जाएगा जो तनाव, डिप्रेशन और सड़कों पर धक्के खाने में बीत गया?
सत्ता को समझना होगा की डैमेज कंट्रोल में लिया गया एक्शन कभी ‘सुशासन’ नहीं कहलाता, वो सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने की एक हताश कोशिश होती है, जिसे आज का युवा बहुत अच्छी तरह से समझ रहा है।
✍ पढ़ें और परखिए: एक इस्तीफ़ा, क्या काफ़ी है?
- क्या एक चेहरा बदलने से खोखला सिस्टम ठीक हो जाएगा। किसी बड़ी चूक के बाद जवाबदेही का सही रूप क्या है: इस्तीफ़ा, सुधार या दोनों?
- पहले ‘कोई लीक नहीं हुआ’ का दावा और फिर जाँच व गिरफ़्तारियाँ। शुरुआती इंकार छात्रों और जनता के भरोसे पर क्या असर डालता है?
4. यूपी पुलिस कांस्टेबल से लेकर राजस्थान REET तक, हर जगह बिकाऊ है पर्चा
अगर आपको लगता है की यह बीमारी सिर्फ केंद्र या NTA तक सीमित है, तो आप मुगालते में हैं। जब आप दिल्ली से निकलकर राज्यों की तरफ रुख़ करते हैं, तो पता चलता है की राज्यों के परीक्षा तंत्र का तो बाकायदा जनाज़ा निकल चुका है। जब हम ‘डबल इंजन’ या ‘सिंगल इंजन’ की सरकारों के गुड गवर्नेंस (Good Governance) मॉडल का रिव्यू करते हैं, तो ग्राउंड पर स्थिति बेहद डरावनी नज़र आती है।

राज्य चाहे कोई भी हो, सत्ता में चाहे कोई भी क्षत्रप (Local leader) बैठा हो, एजुकेशन और एम्प्लॉयमेंट (रोज़गार) के नाम पर हर जगह एक ही जैसी सड़न फैली हुई है। चलिए, सबसे पहले बात करते हैं उत्तर प्रदेश की।
फ़रवरी 2024 में यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती की परीक्षा आयोजित हुई। पदों की संख्या थी लगभग 60,244 और फॉर्म भरने वाले युवाओं की संख्या सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे- 48 लाख!
💡 क्या आप जानते हैं?
लगभग 60,244 पद और 48 लाख आवेदक, यानी हर एक पद के लिए औसतन करीब 80 दावेदार।
जी हाँ, 48 लाख युवा, जो इस बात का सीधा प्रमाण है की ज़मीन पर बेरोज़गारी का आलम क्या है। उन 48 लाख घरों में एक उम्मीद जगी थी की चलो, खाकी वर्दी मिलेगी तो घर की गरीबी दूर होगी।
लेकिन परीक्षा वाले दिन क्या हुआ? जिस पुलिस महकमे में भर्ती होने के लिए युवा पसीना बहा रहे थे, उसी महकमे का पर्चा टेलीग्राम (Telegram) और WhatsApp पर कौड़ियों के भाव बिक रहा था। सोशल मीडिया पर परीक्षा से पहले ही आंसर-की (Answer Key) तैरने लगी। हालात इतने बेकाबू हो गए की योगी सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और रातों-रात परीक्षा रद्द करनी पड़ी।
यूपी एसटीएफ (STF) ने इस मामले में 287 से ज़्यादा दलालों और पेपर सॉल्वर गैंग के गुर्गों को गिरफ्तार किया। ज़रा सोचिए! आप माफियाओं के घर गिराने का दावा करते हैं, लेकिन आपके ही नाक के नीचे एक शिक्षा माफिया (Education Mafia) 48 लाख युवाओं का भविष्य चुरा ले जाता है। यह प्रशासनिक नाकामी नहीं तो और क्या है?
और ये सिर्फ यूपी का हाल नहीं है। राजस्थान का बहुचर्चित ‘रीट’ (REET) 2021 का पेपर लीक हो, या बिहार का BSSC और बीपीएससी (BPSC) का लगातार पर्चा लीक होना- हर जगह एक ‘भ्रष्ट नेक्सस’ काम कर रहा है। कोचिंग सेंटर्स, प्रिंटिंग प्रेस के मालिक और राज्य लोक सेवा आयोग के अंदर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों ने मिलकर एक ऐसा कॉर्पोरेट सिंडिकेट बना लिया है, जिसे तोड़ पाना अब किसी भी सरकार के बस की बात नहीं लग रही।
युवाओं के बीच अब यह आम धारणा बन चुकी है की “जब तक आपके पास 15-20 लाख का जुगाड़ नहीं है, आप राज्य सरकार की कोई ढंग की नौकरी नहीं पा सकते।” सरकारों के लिए इससे बड़ा तमाचा और कोई नहीं हो सकता की उनका युवा अपने ही सिस्टम से पूरी तरह हार मान चुका है।
✍ ठहरिए और सोचिए: 48 लाख उम्मीदें, 60 हज़ार कुर्सियाँ
- इतने कम पदों के लिए इतने ज़्यादा आवेदन रोज़गार की किस तस्वीर की तरफ़ इशारा करते हैं? और जब नौकरी की चाह इतनी बड़ी हो, तो पर्चा लीक का नुकसान कितना गहरा हो जाता है?
- राज्य कोई भी हो, सड़न एक-सी है। तो क्या यह समस्या किसी एक दल या सरकार की है, या पूरे ढाँचे की? आपकी क्या राय बनती है?
5. झारखंड में 44 सरकारी परीक्षाएं रद्द और 26 दिन का अनशन
JSSC CGL के भयंकर घोटाले ने उधेड़ दी परीक्षा तंत्र की बखिया

सिस्टम की इस ढिठाई का सबसे ताज़ा और दर्दनाक नज़ारा इसी साल यानी 2026 के अगस्त-अक्टूबर महीने में झारखंड में देखने को मिला है। झारखंड एक ऐसा राज्य है जहाँ युवा दशकों से अपने हक के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन इस बार जेएसएससी सीजीएल (JSSC CGL – संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा) और जेपीएससी (JPSC) में जो भयंकर घपला हुआ, उसने राज्य के परीक्षा तंत्र की बखिया उधेड़ कर रख दी।
झारखंड में सीजीएल (CGL) की यह परीक्षा कोई आम परीक्षा नहीं थी। यह सालों से लटकी हुई थी, और जब 2026 में आख़िरकार आयोजित हुई, तो भ्रष्टाचार का तांडव देखने को मिला। एग्जाम सेंटर्स से खुलेआम पेपर लीक की खबरें आईं, ओएमआर (OMR) शीट्स से छेड़छाड़ की गई, और तो और, कई जगहों पर तो ब्लैंक (खाली) ओएमआर शीट छोड़ने वालों का सिलेक्शन लिस्ट में नाम आ गया।
जब यह घोटाला सामने आया, तो झारखंड का युवा जो अब तक सिर्फ सोशल मीडिया पर रो रहा था, सड़कों पर उतर आया। रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इस ऐतिहासिक और दर्दनाक आंदोलन का गवाह बना। छात्रों ने वहां 26 दिन तक भूख हड़ताल और आमरण अनशन किया। 26 दिन!
एक पल के लिए सोचकर देखिए, वो लड़के और लड़कियां जो लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ने के लिए पैदा हुए थे, वो 26 दिन तक भूखे-प्यासे एक स्टेडियम में बैठे रहे ताकि सरकार उनका हक न मार सके। उनकी नसें सूखने लगीं, कई छात्रों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, लेकिन सत्ता के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी।
दबाव जब इतना बढ़ा की पूरी राज्य मशीनरी कोलैप्स होने की कगार पर आ गई, तब जाकर सरकार को झुकना पड़ा। और इसका अंजाम क्या हुआ? सरकार को सिर्फ जेएसएससी सीजीएल ही नहीं, बल्कि 2014 से लेकर अब तक हुई कुल 44 सरकारी परीक्षाओं को रद्द करने का फरमान जारी करना पड़ा।
📌 आँकड़ों में झारखंड
44 सरकारी परीक्षाएँ रद्द (2014 से अब तक), 26 दिन का भूख हड़ताल और आमरण अनशन, और जगह रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम।
आप इस खबर की गहराई समझिए! 2014 से लेकर अब तक की 44 परीक्षाएं रद्द! इसका सीधा सा मतलब है की पूरे एक दशक का सिस्टम, पूरा का पूरा रिक्रूटमेंट बोर्ड, सब कुछ सिर्फ एक छलावा था। 12 सालों में जो भी नौकरियां दी गईं, जो भी परीक्षाएं हुईं, वो सब संदेह के घेरे में आ गईं। यह कोई राजनैतिक हार-जीत का मुद्दा नहीं है; यह एक पूरे देश के प्रशासनिक तंत्र (Administrative Machinery) का सड़ जाना है।
यह सवाल पूछना लाज़िमी है की जब सरकार अपने पुलिस महकमे, राजस्व विभाग या शिक्षा विभाग के लिए ईमानदारी से एक बाबू (Clerk) तक की भर्ती नहीं कर सकतीं, तो वो विकास क्या खाक करेंगी?
झारखंड के इन ताज़ा प्रोटेस्ट ने पूरे देश के युवाओं को एक मेसेज दे दिया है- सिस्टम अपने आप कभी ठीक नहीं होगा, जब तक आप उसकी गर्दन नहीं पकड़ेंगे।
लेकिन दूसरी तरफ, सत्ताधारी दलों के लिए यह वो राजनीतिक घाव है जो आने वाले हर चुनाव में उनसे रिस-रिस कर खून मांगेगा, क्योंकि सड़कों पर बैठा हर वो युवा एक वोटर भी है, और वो अपना ये दर्द ईवीएम (EVM) का बटन दबाते वक्त भूलने वाला नहीं है।
✍ पढ़ें और विचारिए: 26 दिन की भूख, और उसके बाद
- क्या किसी व्यवस्था को सुनने के लिए अनशन ज़रूरी होना चाहिए? सुनवाई के बेहतर रास्ते क्या हो सकते हैं?
- 44 परीक्षाएँ रद्द होने का मतलब है कि कई ईमानदार चयनित लोग भी अधर में हैं। ऐसी हालत में सही और ग़लत, दोनों तरह के अभ्यर्थियों के साथ न्याय कैसे हो?
6. कड़े कानूनों का दिखावा और सज़ा के नाम पर सन्नाटा

सरकारें जब भी किसी बड़े मोर्चे पर फेल होती हैं, तो जनता का ध्यान भटकाने के लिए उनके पास एक सेट-फॉर्मूला होता है- संसद में एक ‘नया और सख्त कानून’ पास कर दो। इससे मीडिया को हैडलाइन मिल जाती है, प्रवक्ताओं को टीवी डिबेट्स में चिल्लाने का मसाला मिल जाता है और आम जनता को लगता है की “चलो, अब तो सरकार ने डंडा चला दिया है।” पेपर लीक के मामले में भी बिल्कुल यही हुआ।
जब देश भर में छात्रों का गुस्सा उबाल पर था, तब केंद्र सरकार ने आनन-फानन में ‘Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024’ लागू किया।
📜 क़ानून एक नज़र में
Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024: दावा था 1 करोड़ रुपये तक जुर्माना और 10 साल तक की जेल का।
इसे ऐसे पेश किया गया जैसे यह कोई जादू की छड़ी हो। इस कानून के तहत ढिंढोरा पीटा गया की पेपर लीक करने वालों पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगेगा और 10 साल तक की जेल होगी। बाद में जब जुलाई 2026 में नीट और नेट के कैंसिलेशन का बवाल बढ़ा, तो इसमें और भी कड़े अमेंडमेंट्स (संशोधन) जोड़ने की बात कही गई, जिसमें फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स (Fast-track courts) के गठन का दावा किया गया।
लेकिन जब आप इन ‘कागज़ी शेरों’ की हकीकत खंगालते हैं, तो आपको हँसी के साथ-साथ रोना भी आता है। कानून बनाना आसान है, लेकिन उसे लागू कौन करेगा?
ज़मीन पर उन्हीं अधिकारियों को कानून लागू करना है, जो खुद इस सिस्टम की सड़न का हिस्सा हैं। अगर किसी बीमारी का वायरस ही शरीर के इम्यून सिस्टम में घुस जाए, तो बाहर से आप कितनी भी कड़वी दवा खा लें, असर नहीं होगा।
कानून में आपने 10 साल की सज़ा लिख दी, बहुत अच्छी बात है। लेकिन उस सज़ा तक पहुँचने के लिए एक निष्पक्ष और तेज़ जांच (Investigation) की ज़रूरत होती है। जब पेपर लीक होता है, तो सबसे पहले लोकल पुलिस एफआईआर (FIR) दर्ज करती है। लोकल पुलिस और लोकल माफियाओं के रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। जब तक मामला क्राइम ब्रांच (Crime Branch) या सीबीआई (CBI) तक पहुँचता है, तब तक डिजिटल और फिजिकल सबूतों (Evidence) को या तो मिटा दिया जाता है या वे इतने कमज़ोर हो जाते हैं की कोर्ट में टिक ही नहीं पाते।
नतीजा? फास्ट-ट्रैक कोर्ट सिर्फ फाइलों का गट्ठर बनकर रह जाते हैं। सज़ा के नाम पर सन्नाटा पसरा रहता है और जिन सरगनाओं को ‘किंगपिन’ (Kingpin) बताकर पकड़ा जाता है, वो कुछ ही महीनों में अच्छी-खासी बेल लेकर बाहर आ जाते हैं और फिर से अपना धंधा चालू कर देते हैं।
कड़े कानूनों का यह दिखावा सिर्फ सरकार की नाकामी को छिपाने का एक ‘बैंड-एड’ (Band-Aid) है, जो उस कैंसर को ठीक नहीं कर सकता जो पूरे परीक्षा तंत्र को खा चुका है।
✍ सोचिए ज़रा: क़ानून लिखना आसान, लागू करना कठिन
- किसी भी क़ानून की असली ताक़त कहाँ होती है: सज़ा की कठोरता में, या सज़ा मिलने की निश्चितता में?
- वायरस जब इम्यून सिस्टम में ही हो, तो बाहर की दवा बेअसर रहती है। जब निगरानी करने वाले ही तंत्र का हिस्सा हों, तो निष्पक्ष जाँच कैसे संभव है?
