562 बिखरी रियासतों को जोड़कर बनाया अखंड राष्ट्र, खंडित सोमनाथ मंदिर का कराया भव्य पुनर्निर्माण, आधुनिक भारत के शिल्पकार लौहपुरुष ‘सरदार वल्लभभाई पटेल’ को जयंती पर कोटि-कोटि नमन

आज 31 अक्टूबर है, हमारे अपने लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती। आज जब हम भारत के नक्शे को देखते हैं, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो एक विशाल और अटूट देश हमें नज़र आता है, वो नक्शा किसी कागज़ पर नहीं खींचा गया था।

यह नक्शा गढ़ा गया था सरदार पटेल के फौलादी सीने और उनके अजेय संकल्पों से।

ज़रा अगस्त 1947 के उस दौर में लौटकर देखिए। जब अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे थे, तो वो कोई एक मुकम्मल ‘देश’ नहीं छोड़कर गए थे। वो तो एक ऐसा टूटा हुआ आईना छोड़ गए थे जिसके 562 टुकड़े ज़मीन पर बिखरे पड़े थे।

चारों तरफ अराजकता थी, दंगे थे और देश के बंटवारे का दर्द था। ऐसा लग रहा था की सदियों की गुलामी के बाद जो भारत माता आज़ाद हुई हैं, वो अब सैकड़ों छोटे-छोटे देशों में बंट जाएंगी।

लेकिन उस नाज़ुक वक्त में एक शख्स पहाड़ की तरह सीना ताने खड़ा था। एक ऐसा इंसान जो बहुत कम बोलता था, लेकिन जिसकी खामोशी में भी तोपों जैसी गूंज थी।

सरदार पटेल ने अपनी उसी खामोश तपस्या और फौलादी इरादों से इस बिखरे हुए भूगोल को समेटकर आज का वो आधुनिक ‘अखंड भारत’ गढ़ा, जिसकी छांव में आज 140 करोड़ हिंदुस्तानी सुकून से रह रहे हैं।

562 बिखरी हुई रियासतों को एक धागे में पिरोकर दुनिया के सामने खड़ा किया एक विशाल साम्राज्य

अंग्रेज़ जाते-जाते कितनी बड़ी साजिश रच गए थे, ये बात बहुत कम लोग गहराई से जानते हैं। उन्होंने ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ (Indian Independence Act) पास करके भारत की 562 से ज़्यादा रियासतों (Princely States) को एक खतरनाक आज़ादी दे दी थी।

अंग्रेज़ों ने कह दिया था की राजा-महाराजा चाहें तो भारत में मिलें, चाहें तो पाकिस्तान में मिलें, या फिर अपना एक अलग आज़ाद देश बनाकर रहें।

सोचिए ज़रा! अगर ये 562 रियासतें अलग देश बन जातीं, तो आज आपको दिल्ली से मुंबई या जयपुर जाने के लिए भी वीज़ा और पासपोर्ट की ज़रूरत पड़ती।

भारत के टुकड़े-टुकड़े होने का खतरा एकदम सिर पर मंडरा रहा था।

लेकिन सरदार पटेल ने ये मामला अपने हाथों में लिया। उन्होंने अपने बेहद भरोसेमंद और चालाक प्रशासक वी.पी. मेनन (V.P. Menon) के साथ मिलकर एक ऐसा मास्टरप्लान तैयार किया जिसने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों को हैरत में डाल दिया।

पटेल ने ‘कैरट एंड स्टिक’ (Carrot and Stick) यानी प्यार और खौफ दोनों की नीति अपनाई। उन्होंने राजा-महाराजाओं को उनका रुतबा और ‘प्रिवी पर्स’ (पेंशन) देने का भरोसा दिया।

लेकिन साथ ही अपनी उन गहरी और तेज़ आँखों से ये भी साफ़ कर दिया की अगर भारत से अलग होने की सोची, तो अंजाम बहुत बुरा होगा।

दुनिया के इतिहास में आज तक इतना बड़ा भौगोलिक एकीकरण कभी नहीं हुआ। जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क ने अपने देश को एक करने के लिए सालों तक तोपें चलाई थीं, हज़ारों लीटर खून बहाया था।

लेकिन हमारे सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति, अपने रुतबे और अपनी सूझबूझ से बिना एक भी गोली चलाए सैकड़ों नवाबों और राजाओं के मुकुट भारत माता के चरणों में रखवा दिए।

जूनागढ़ के नवाब का गुरूर तोड़कर और हैदराबाद के निज़ाम को घुटनों पर लाकर किया अखंड भारत का सपना साकार

भारत को एक करने के इस महायज्ञ में ज़्यादातर राजा-महाराजा तो खुशी-खुशी साथ आ गए, लेकिन कुछ जगह पेंच फंसा। इनमें सबसे बड़े कांटे थे जूनागढ़ और हैदराबाद।

पहले बात करते हैं जूनागढ़ की। यहां की ज़्यादातर जनता हिंदू थी, लेकिन नवाब था महाबत खान। ये इंसान अपने कुत्तों से इतना प्यार करता था की उनकी शादी में लाखों रुपये उड़ा देता था।

इसी नवाब ने रातों-रात जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में करने का ऐलान कर दिया। लेकिन पटेल कहां बर्दाश्त करने वाले थे!

उन्होंने तुरंत भारतीय सेना की टुकड़ियां जूनागढ़ की तरफ रवाना कर दीं। सेना का नाम सुनते ही नवाब महाबत खान की ऐसी हवा टाइट हुई की वो अपना सारा खज़ाना और अपने प्यारे कुत्तों को हवाई जहाज़ में भरकर रातों-रात कराची भाग गया।

और इस तरह जूनागढ़ हमेशा के लिए भारत का हो गया।

लेकिन असली चुनौती तो हैदराबाद में थी। हैदराबाद का निज़ाम उस्मान अली खान उस वक्त दुनिया के सबसे अमीर लोगों में गिना जाता था।

उसने ऐलान कर दिया की हैदराबाद एक आज़ाद देश रहेगा। सिर्फ इतना ही नहीं, निज़ाम ने ‘रज़ाकार’ (Razakars) नाम की एक खूंखार मिलिशिया तैयार कर ली थी, जो वहां के बहुसंख्यक हिंदुओं पर भयंकर अत्याचार कर रही थी।

लूटपाट और नरसंहार का ऐसा नंगा नाच चल रहा था की किसी की भी रूह कांप जाए।

अब सरदार पटेल के सब्र का बांध टूट चुका था। उन्होंने साफ कह दिया की भारत में इस कैंसर को पनपने नहीं दिया जाएगा।

13 सितंबर 1948 की वो ऐतिहासिक तारीख थी, जब सरदार पटेल के सीधे आदेश पर भारतीय सेना ने मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में हैदराबाद में ‘ऑपरेशन पोलो’ (Operation Polo) का शंखनाद कर दिया।

निज़ाम सोच रहा था की उसकी सेना बहुत बड़ी है, लेकिन भारतीय सेना के शौर्य के आगे उनकी एक न चली।

महज़ 109 घंटों (यानी सिर्फ 5 दिन) के भीतर निज़ाम की पूरी सेना ने घुटने टेक दिए। उसका सारा गुरूर खाक में मिल गया और हैदराबाद हमेशा-हमेशा के लिए अखंड भारत का एक अटूट हिस्सा बन गया।

सदियों के घाव मिटाकर सोमनाथ के खंडहरों में सनातन का खोया हुआ गौरव लौटाने वाले सच्चे भगीरथ

सरदार पटेल बहुत अच्छी तरह जानते थे की कोई भी राष्ट्र सिर्फ ज़मीन के टुकड़ों से नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और अपनी आत्मा से ज़िंदा रहता है।

भारत की सांस्कृतिक आज़ादी के लिए उन्होंने जो किया, वो इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज़ है।

तारीख थी 12 नवंबर 1947। जूनागढ़ विजय के ठीक बाद सरदार पटेल प्रभास पाटन के उस पवित्र क्षेत्र में पहुंचे, जहां कभी भारत की शान रहा सोमनाथ मंदिर हुआ करता था।

लेकिन जब पटेल वहां पहुंचे, तो समुद्र के किनारे उन्हें सिर्फ मंदिर के खंडहर और टूटे हुए पत्थर मिले। ये वही सोमनाथ मंदिर था जिसे महमूद गज़नवी और औरंगज़ेब जैसे आक्रांताओं ने बार-बार तोड़ा और बेदर्दी से लूटा था।

एक सच्चे सनातनी और लौहपुरुष का हृदय उन खंडहरों को देखकर पसीज गया। पटेल ने वहीं आगे बढ़कर समुद्र का पवित्र जल अपने हाथों में लिया और एक ऐतिहासिक प्रतिज्ञा की।

उन्होंने संकल्प लिया की “मैं सोमनाथ का भव्य मंदिर फिर से बनवाऊंगा।”

सरदार पटेल ने कन्हैयालाल मुंशी (K.M. Munshi) के साथ मिलकर सोमनाथ के पुनर्निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाया। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में कह दिया था की सोमनाथ का निर्माण सिर्फ ईंट और गारे का काम नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक आज़ादी की सबसे बड़ी निशानी है।

जब तक सोमनाथ का शिखर फिर से आसमान को नहीं छुएगा, तब तक भारत की आत्मा को असली आज़ादी नहीं मिलेगी।

पटेल के उसी फौलादी संकल्प का नतीजा है की आज हम समुद्र की लहरों के बीच खड़े उस भव्य और सुनहरे सोमनाथ मंदिर को देखते हैं।

देश की आंतरिक सुरक्षा का मजबूत ढांचा और आधुनिक भारतीय नौकरशाही के असली जनक

ज़रा सोचिए, एक नया देश आज़ाद हुआ है, उसके सामने ग़रीबी है, दंगे हैं और प्रशासन के नाम पर सिर्फ अंग्रेज़ों का छोड़ा हुआ लचर सिस्टम है।

ऐसे में देश को एक मज़बूत धागे में कैसे पिरोया जाए? सरदार पटेल वो इंसान थे जिनकी नज़र आज से 100 साल आगे तक का भविष्य देख रही थी।

उन्हें मालूम था की नेताओं की सरकारें तो आएंगी और जाएंगी, लेकिन देश को चलाने और आम आदमी को सुरक्षा देने के लिए एक मज़बूत प्रशासनिक ढांचे की सख्त ज़रूरत है।

इसीलिए उन्होंने आज के ‘आईएएस’ (IAS) और ‘आईपीएस’ (IPS) जैसी ‘ऑल इंडिया सर्विसेज़’ की नींव रखी।

अप्रैल 1947 में दिल्ली के मेटकाफ हाउस में जब सिविल सर्वेंट्स का पहला बैच खड़ा था, तब सरदार पटेल ने ही उन्हें संबोधित करते हुए वो ऐतिहासिक वाक्य कहा था, जिसे आज भी हर आईएएस अधिकारी अपने सीने पर गर्व से सजाता है।

पटेल ने उन्हें “भारत का स्टील फ्रेम” (Steel Frame of India) कहा था। पटेल का वो दूरदर्शी विज़न ही है की आज हमारे पास एक ऐसा मज़बूत पुलिस और प्रशासनिक सिस्टम है, जिसने देश को हर मुश्किल, हर दंगे और हर आपदा में टूटने से बचाए रखा है।

आज राष्ट्रीय एकता दिवस के इस पावन अवसर पर, भारत माता के उस सबसे लाडले और पराक्रमी बेटे को हमारा पूरा देश कोटि-कोटि नमन करता है।

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