बचपन से लेकर आज तक जो इतिहास हमें रटाया गया है ना, उसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे इस देश को आज़ादी सिर्फ चंद लोगों और एक खास ‘परिवार’ ने ही अपनी जागीर से निकालकर हमें दे दी हो।
जब भी आज़ादी की बात आती है, तो हमारे वो ‘महान’ वामपंथी इतिहासकार गिने-चुने चार-पांच नाम ऐसे पेश कर देते हैं जैसे बाकी का पूरा हिंदुस्तान तो उस वक़्त चैन की नींद सो रहा था।
लेकिन जब आप इस रटे-रटाए इतिहास की चादर हटाकर गहराई में झांकते हैं, तो आपको ऐसे-ऐसे हीरे मिलते हैं जिन्हें जानबूझकर गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया गया था।
इन्हीं अनमोल हीरों में से एक नाम है- महाशय मसुरियादीन पासी। प्रयागराज की माटी का वो लाल जिसने भारत माता की बेड़ियां काटने के लिए अपनी जवानी के सबसे कीमती 9 साल अंग्रेजों की अंधेरी काल कोठरी में गुज़ार दिए।
लेकिन कमाल की बात देखिए, जिन इतिहासकारों के हाथ में आज़ाद भारत का इतिहास लिखने का ठेका था, उनकी कलम मसुरियादीन जी का नाम आते-आते अचानक सूख गई।
ये कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के साथ हुई नाइंसाफी की नहीं है भाई, ये कहानी है उस पूरे पासी समाज के गौरव की, जिसे दशकों तक उसका असली हक़ और सम्मान नहीं दिया गया।

2 अक्टूबर 1911 को जोंधवल गांव में जन्म और एक आम पिछड़े पासी वर्ग के लड़के का आज़ादी का दीवाना बन जाना
आपको जानकर शायद अचरज होगा की मसुरियादीन जी का जन्म भी उसी तारीख को हुआ था जिस दिन महात्मा गांधी का होता है- 2 अक्टूबर।
साल था 1911, और जगह थी प्रयागराज (इलाहाबाद) का जोंधवल गांव। एक बेहद गरीब और सीधे-सादे हिंदू पासी परिवार में उनका जन्म हुआ।
ज़रा सोचिए, उस दौर में जब एक पिछड़े वर्ग के बच्चे के लिए स्कूल का दरवाज़ा देखना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं था, तब इस लड़के ने पढ़ाई लिखाई की ठानी।
उन्होंने ना सिर्फ अच्छी शिक्षा हासिल की, बल्कि अपने ज्ञान, समझदारी और समाज सेवा के दम पर इतनी छोटी उम्र में ही लोगों के बीच ‘महाशय’ की उपाधि भी हासिल कर ली।
‘महाशय’ यूं ही किसी को नहीं कह दिया जाता दोस्त, इसके लिए समाज के दिलों में अपनी जगह बनानी पड़ती है।
जैसे-जैसे वो बड़े हुए, उन्होंने देखा की अंग्रेज़ उनके देश और उनके लोगों के साथ कैसा जानवरों वाला बर्ताव कर रहे हैं।
गांधी जी के विचारों और स्वाधीनता संग्राम की लहर ने इस युवा के दिल में ऐसी आग लगाई की ये आम सा लड़का रातों-रात आज़ादी का दीवाना बन गया। वो समाज की कुरीतियों से भी लड़ रहे थे और अंग्रेज़ों की लाठियों से भी।

कुछ लोगों ने जेल में किताबें लिखीं और इस पासी योद्धा ने 9 साल तक झेली अंग्रेजों की असली यातनाएं
यहाँ पर आकर वामपंथी इतिहासकारों का वो जो ‘इकोसिस्टम’ है ना, उसका सबसे बड़ा पाखंड सामने आता है। आज़ादी की लड़ाई में बहुत से नेता जेल गए थे।
लेकिन भाईसाहब, जेल-जेल में भी फर्क होता था! कुछ VIP नेता ऐसे थे जो जेल में आराम से बैठकर ‘डिस्कवरी ऑफ…’ जैसी मोटी-मोटी किताबें लिख रहे थे।
उन्हें वहां पढ़ने के लिए अख़बार, लिखने के लिए पन्ने, अपनी बेटी को भेजने के लिए चिट्ठियां और चाय-नाश्ता सब बकायदा टाइम पर मिलता था।
लेकिन दूसरी तरफ थे महाशय मसुरियादीन पासी जैसे ज़मीनी नेता! जब ये लोग गिरफ़्तार होते थे, तो इन्हें कोई गेस्ट हाउस वाली जेल नहीं मिलती थी।
1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience) से लेकर 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) तक, मसुरियादीन जी ने अंग्रेजों की असली और खौफनाक यातनाएं झेलीं।
1932 से 1944 के बीच उन्होंने अपनी ज़िंदगी के लगभग 9 साल उन सीलन भरी, अंधेरी काल कोठरियों में काटे जहां इंसान का दम घुट जाए।
वहां ना कोई किताब लिखने की फुर्सत थी और ना ही कोई सुख-सुविधा। वहां सिर्फ अंग्रेज़ों के कोड़े थे और भारत माता के जयकारे।
अब आप ही बताइए, जिस इंसान ने जवानी के 9 साल पत्थर पीसने और लाठियां खाने में निकाल दिए, क्या उसका त्याग उन ‘वीआईपी कैदियों’ से रत्ती भर भी कम था? बिल्कुल नहीं!
लेकिन इतिहास की किताबों में चैप्टर किसके नाम पर छपे? ये तो आप सब जानते ही हैं।
अंग्रेजों के उस काले ‘जरायम पेशा कानून’ के खिलाफ भयंकर बगावत जिसने एक पूरे समाज को अपराधी बता दिया था
अब आते हैं उनके जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई पर, जिसके बिना उनका इतिहास अधूरा है।
अंग्रेज़ कितने शातिर थे, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की उन्होंने भारत में एक बेहद घटिया और अमानवीय कानून लागू कर रखा था- ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ (Criminal Tribes Act), जिसे आम बोलचाल में ‘जरायम पेशा कानून’ कहा जाता था।
इस काले कानून के तहत अंग्रेजों ने पासी समाज और भारत की करीब 200 अन्य जातियों को महज़ इसलिए ‘पैदाइशी अपराधी’ (Born Criminals) घोषित कर दिया था ताकि वो इन जातियों को दबा कर रख सकें।
मतलब अगर पासी समाज के किसी घर में कोई बच्चा पैदा भी हो रहा है, तो अंग्रेज़ों के रिकॉर्ड में वो जन्म से ही ‘अपराधी’ है! थाने में उसकी हाजिरी लगेगी।
ज़रा सोचिए, एक पूरे के पूरे समाज पर कैसा भयंकर कलंक थोप दिया गया था।
महाशय मसुरियादीन पासी जी ने इस कलंक को मिटाने की कसम खा ली। उन्होंने इस काले कानून के खिलाफ एक बहुत बड़ा और भयंकर जन-आंदोलन खड़ा कर दिया।
वो गांव-गांव गए, अपने समाज के लोगों को इकट्ठा किया और अंग्रेज़ों की आंखों में आंखें डालकर इस अमानवीय कानून को चुनौती दी।
दिन-रात एक कर दिया उन्होंने। और आपको पता है? आज़ादी मिलने के बाद जब इस काले कानून को हमेशा के लिए भारत से खत्म किया गया, तो उसमें सबसे बड़ी और अहम भूमिका इसी पासी समाज के शेर की थी।
उन्होंने ना सिर्फ अपने समाज के माथे से ये दाग धोया, बल्कि छुआछूत जैसी बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए ग्राउंड पर जो काम किया, वो आज भी मिसाल है।
सिर्फ सड़कों पर लड़ने वाले योद्धा नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत का संविधान गढ़ने वाले शिल्पकार और 4 बार के सांसद
अब ज़रा उन वामपंथी इतिहासकारों की एक और चालाकी समझिए। ये लोग जब भी किसी पिछड़े वर्ग के महानायक की बात करते हैं, तो अक्सर उन्हें सिर्फ एक ‘आंदोलनकारी’ या सड़कों पर लाठी खाने वाला नेता बताकर छोड़ देते हैं।
मानो उनके पास बौद्धिक (Intellectual) क्षमता थी ही नहीं। लेकिन महाशय मसुरियादीन पासी जी के मामले में इनका ये झूठ भी औंधे मुंह गिर जाता है।
क्या आपको पता है की मसुरियादीन जी सिर्फ जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे? वो उस ऐतिहासिक ‘संविधान सभा’ (Constituent Assembly) के बेहद सम्मानित सदस्य थे, जिसे आज़ाद भारत का संविधान लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी।
जी हाँ! वो शख्स जिसने अपनी ज़िंदगी के 9 साल अंधेरी जेल में काटे थे, वो आज़ादी के बाद भारत का भाग्य लिखने वाली सर्वोच्च संस्था में बैठा था।
उन्होंने बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर और अन्य दिग्गजों के साथ मिलकर इस देश का संविधान गढ़ने में अपना बौद्धिक और वैचारिक योगदान दिया।
और बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। जब देश में पहला चुनाव हुआ और लोकतंत्र की नींव पड़ी, तो जनता ने अपने इस ज़मीनी हीरो को सिर-आंखों पर बिठाया।
मसुरियादीन जी आज़ादी के बाद लगातार 4 बार लोकसभा के सांसद चुने गए (चायल और फूलपुर सीट से)।
ज़रा सोचिए, एक इंसान जो संविधान का रचयिता हो, जो 9 साल जेल में रहा हो, जो 4 बार का सांसद हो… क्या उसका नाम देश के हर बच्चे की जुबान पर नहीं होना चाहिए था? बिल्कुल होना चाहिए था! लेकिन हुआ क्या?
दशकों की गुमनामी के बाद अब लौट रहा है असली सम्मान, CM योगी ने महाशय मसुरियादीन पासी की प्रतिमा का किया अनावरण
महापुरुषों का सम्मान, राष्ट्र के गौरव का सम्मान! 🇮🇳
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने प्रयागराज में महाशय मसूरिया दीन पासी जी की प्रतिमा का अनावरण कर उनके अद्वितीय संघर्ष और योगदान को सम्मान दिया।
आजादी की लड़ाई में 9 वर्ष जेल में बिताने वाले मसूरिया दीन पासी जी ने जेल से बाहर आने… pic.twitter.com/0gZ4dJYIFe— Rohit Sharma (@imRohit_IND) October 15, 2026
दशकों की इस सियासी खामोशी और गुमनामी के बाद, अब आख़िरकार इस चमकते सूरज को उसका असली सम्मान मिल रहा है।
अभी हाल ही में, 15 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने प्रयागराज के तेलियरगंज में महाशय मसुरियादीन पासी जी की एक बहुत ही भव्य प्रतिमा का अनावरण किया है।
ये मूर्ति का अनावरण उन वामपंथी इतिहासकारों को एक तगड़ा जवाब था जिन्होंने पासी समाज के इस गौरव को छुपा कर रखा था।
सीएम योगी ने भरे मंच से ऐलान कर दिया की अब प्रयागराज के प्रमुख चौराहों और संस्थाओं का नाम महाशय मसुरियादीन पासी जी के नाम पर होगा।
लेकिन सबसे तगड़ा पंच योगी जी ने तब मारा, जब उन्होंने बिना नाम लिए सीधे राहुल गांधी और कांग्रेस पर निशाना साधा।
योगी जी ने मंच से डंके की चोट पर कहा की “विपक्ष को याद रखना चाहिए कि आज़ादी की लड़ाई में सिर्फ नेहरू जी ही जेल नहीं गए थे, बल्कि मसुरियादीन पासी जैसे दलित नायक भी 9-9 साल तक अंग्रेज़ों की काल कोठरियों में यातनाएं सह रहे थे।”
ये एक लाइन नहीं थी दोस्त, ये एक बम था जिसने 70 साल के रटे-रटाए इकोसिस्टम की नींव हिला कर रख दी।
योगी जी ने साफ़ संदेश दे दिया की जो सरकारें अपनी असली ‘विरासत’ और महानायकों को भुला देती हैं, उनका सियासी पतन तय होता है।
आज के भारत में अब सिर्फ चंद लोगों की पूजा नहीं होगी, बल्कि उन असली नायकों को भी पूजा जाएगा जिन्होंने सच में ज़मीन पर अपना खून-पसीना बहाया है।
आज जब महाशय मसुरियादीन पासी जी की भव्य प्रतिमा प्रयागराज में सीना ताने खड़ी है, तो वो इस बात का सुबूत है की चाहे सियासत आपको मिटाने की कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन जब समाज और एक राष्ट्रभक्त सरकार जागती है, तो आपके नाम का सूरज फिर से उदय होता है।
