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- 👉 1. कांग्रेस ने बार-बार मोदी जी के परिवार का अपमान करके अपनी लुटिया खुद डुबोई
- 👉 2. पटना में मल्लिकार्जुन खड़गे की भयंकर बदज़ुबानी
- 👉 3. राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम में माँ का मज़ाक
- 👉 4. विलासराव मुत्तेमवार का राजशाही घमंड
- 👉 5. राज बब्बर का 97 साल की माँ पर तंज
- 👉 6. पवन खेड़ा का गौतमदास वाला भद्दा तंज
- 👉 7. आपदा को अवसर में कैसे बदलें – मोदी की रणनीति
- 👉 8. माता-पिता का अपमान राजनीतिक आत्महत्या है

राजनीति की बिसात पर अक्सर एक बात बहुत दावे के साथ कही जाती है की चुनाव जीतने के लिए बहुत तगड़ा मैनिफेस्टो, बड़ी-बड़ी रैलियां और भारी-भरकम वादे चाहिए।
लेकिन ये एकलौता सच नहीं है। सच कहूं तो, भारत में चुनाव कागज़ों पर लिखी नीतियों से कम और जनता के जज़्बातों से ज़्यादा जीते जाते हैं।
आप किसी भी आम हिंदुस्तानी की नब्ज़ टटोल कर देख लीजिए। आप उस इंसान को दो बातें सुना देंगे, वो शायद हँस कर टाल दे। आप उसकी विचारधारा को गलत ठहरा देंगे, वो बहस कर लेगा। लेकिन, अगर आपने उसके परिवार, खासकर उसके बूढ़े या दुनिया से जा चुके माता-पिता पर उंगली उठाई, तो वो इंसान आपको कभी माफ नहीं करेगा।
हमारा भारत श्रवण कुमार का देश है भाई! यहाँ माँ-बाप को भगवान के बराबर दर्ज़ा दिया जाता है। और राजनीति का सबसे बड़ा उसूल यही है की आपकी लड़ाई सामने वाले नेता से है, उसके उन माता-पिता से नहीं जिनका राजनीति की ABCD से भी कभी कोई वास्ता नहीं रहा।
लेकिन ताज्जुब की बात देखिए की देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकार इतनी सी बेसिक बात आज तक नहीं समझ पाए।
इस सीरीज़ के 13th एपिसोड में हम बात करेंगे की कैसे विपक्ष ने जब-जब अपनी राजनीतिक लड़ाई में मोदी जी के स्वर्गीय माता-पिता को घसीटा, तब-तब इस देश की जनता ने उन्हें वोट की चोट से ऐसा जवाब दिया की वो आज तक संभल नहीं पाए।
1. कांग्रेस ने बार-बार मोदी जी के परिवार का अपमान करके अपनी लुटिया खुद डुबोई
आप ज़रा इस पूरी क्रोनोलॉजी को समझिए। राजनीति में किसी भी पार्टी की हार-जीत हवा में नहीं होती। लोग कहते हैं की बीजेपी एक चुनाव जीतने की मशीन है, उसके पास बहुत तगड़ा नैरेटिव सेट करने की कला है।
पर सच तो ये है की बीजेपी कोई जादुई छड़ी लेकर नहीं घूम रही। वो बस बहुत शांति से किनारे पर खड़ी रहती है और इंतज़ार करती है।
उन्हें पता है की विपक्ष के नेताओं के अंदर एक खास किस्म का सामंती अहंकार भरा हुआ है। उन्हें लगता है की अगर कोई नेता किसी बहुत बड़े राजनीतिक ‘खानदान’ से नहीं आता, अगर उसके पिता या दादा किसी ऊंचे पद पर नहीं रहे, तो उसका या उसके परिवार का मज़ाक उड़ाना एकदम नॉर्मल बात है।
और बस, इसी अहंकार में आकर विपक्ष के नेता कैमरे के सामने कुछ ऐसा बोल जाते हैं जो सीधे भारत के आम आदमी के दिल को चीर देता है।
आप ही बताइए, जब कोई बड़ा नेता मंच से किसी के गुज़र चुके माता-पिता पर तंज कसता है, तो क्या गांव-देहात में बैठा एक आम वोटर उसे सिर्फ एक राजनीतिक बयान मानता है? बिल्कुल नहीं।
उसे लगता है की ये मेरी संस्कृति, मेरे संस्कारों और मेरे खुद के माता-पिता का अपमान है। कांग्रेस के इसी रवैये ने हर बार बीजेपी को बैठे-बिठाए एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा थमा दिया, जिसे बीजेपी ने पूरी शिद्दत से भुनाया और अपनी जीत पक्की कर ली।
और हैरानी इस बात की है की पुरानी गलतियों से सबक लेना तो दूर, ये सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
जब कोई टिप्पणी मतदाता को अपने परिवार और संस्कारों पर चोट जैसी लगती है, तो उसका असर सामान्य नीतिगत आलोचना से किस तरह अलग हो जाता है?
2. पटना में मल्लिकार्जुन खड़गे की वो भयंकर बदज़ुबानी

अब ज़रा एकदम ताज़ा घटना की बात कर लेते हैं। बहुत दूर जाने की ज़रूरत ही नहीं है। अभी 25 अक्टूबर 2026 की ही बात है।
बिहार की राजधानी पटना में राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह जी की जयंती का एक बहुत बड़ा कार्यक्रम चल रहा था।
वहां कांग्रेसी नेताओं का जमावड़ा था और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे मंच से दहाड़ रहे थे।
खड़गे साहब राजनीति के बहुत पुराने और तपे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं। उम्र भी 80 के पार है, इसलिए उनसे हमेशा एक शालीनता की उम्मीद की जाती है।
वो मंच से भाषण दे ही रहे थे की तभी भीड़ में से किसी कार्यकर्ता ने जोश में कह दिया की “मोदी कहीं नहीं जाने वाले।” बस, इतनी सी बात पर खड़गे साहब अपना आपा खो बैठे।
उन्होंने माइक पर जो कहा, उसने पूरे देश को सन्न कर दिया। उन्होंने भरे मंच से चिल्लाकर कहा- “मोदी का बाप भी जाएगा!”
ज़रा सोचिए इस बात पर। देश की इतनी बड़ी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष एक ऐसे व्यक्ति (स्वर्गीय दामोदरदास मूलचंद मोदी जी) के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है, जो दशकों पहले यह दुनिया छोड़ चुके हैं।
मोदी जी के पिता का राजनीति से क्या लेना-देना था? वो एक बेहद साधारण इंसान थे जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी स्टेशन पर चाय बेचकर और मेहनत-मज़दूरी करके अपने परिवार को पाला। ऐसे मृत व्यक्ति के लिए इतनी असंवेदनशील भाषा का इस्तेमाल करना, क्या यह किसी भी सभ्य राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हो सकता है?
इस एक लाइन ने पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ा दी। बीजेपी को जैसे ही ये मौका मिला, उन्होंने पूरे देश में प्रदर्शन शुरू कर दिए।
किसी निर्वाचित नेता की आलोचना करते समय उसके दिवंगत माता-पिता को बीच में लाना क्या लोकतांत्रिक असहमति की सीमा बदल देता है?
3. राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम में मोदी की स्वर्गीय माँ का मज़ाक


खड़गे वाले मामले से महज़ एक-डेढ़ महीने पहले (सितंबर 2026) भी कांग्रेस के युवराज ने एक ऐसा ही भयंकर ‘सेल्फ-गोल’ किया था, जिसकी गूंज पूरे देश ने सुनी।
जगह थी मध्य प्रदेश का इंदौर शहर। वहाँ कांग्रेस ने छात्रों को लुभाने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ नाम का एक बड़ा यूथ कार्यक्रम रखा था।
राहुल गांधी खुद उस मंच पर मौजूद थे और उनके ठीक सामने पुलकित मणि नाम का एक स्टैंड-अप कॉमेडियन परफॉर्म कर रहा था। कॉमेडियन का काम हंसाना होता है, लेकिन मिमिक्री के नाम पर वहां जो हुआ, वो कॉमेडी नहीं बल्कि एक बहुत ही भद्दा और स्तरहीन तमाशा था।
उस कॉमेडियन ने मिमिक्री करते-करते सीधे मोदी जी की स्वर्गीय माताजी (हीराबेन जी) को बीच में घसीट लिया। उसने बहुत ही बेहूदा अंदाज़ में “माँ को कुर्सी दो” जैसे तंज कसे और 100 साल की उम्र पूरी करके दुनिया से जा चुकी उस बुज़ुर्ग माँ का सरेआम मज़ाक उड़ाया।

हीराबेन जी ने अपना पूरा जीवन 10×10 के एक छोटे से कमरे में गुज़ारा। जब उनका बेटा देश का प्रधानमंत्री बना, तब भी उन्होंने कभी दिल्ली के सुख-सुविधाओं की तरफ मुड़कर नहीं देखा। ऐसी तपस्विनी माँ का मज़ाक एक भरे हुए ऑडिटोरियम में उड़ाया जा रहा था।
लेकिन बात सिर्फ उस कॉमेडियन की नहीं थी। सबसे ज़्यादा चुभने वाली बात तो ये थी की जो राहुल गांधी दिन-रात देश भर में घूम-घूमकर ‘मोहब्बत की दुकान’ खोलने का दावा करते हैं, वो उस मंच पर बिल्कुल सामने खड़े थे। वो उस कॉमेडियन को टोक नहीं रहे थे, बल्कि उसके इस स्तरहीन तंज पर तालियां बजा रहे थे और ठहाके लगाकर हंस रहे थे।
किसी सार्वजनिक मंच पर कही गई बात जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण उस मंच पर मौजूद नेतृत्व की प्रतिक्रिया भी क्यों हो सकती है?
4. विलासराव मुत्तेमवार का राजशाही घमंड
ये जो वीआईपी कल्चर और ‘एलीट’ मानसिकता होती है ना, ये किसी भी राजनेता की आंखों पर ऐसा पर्दा डाल देती है की उसे ज़मीन की सच्चाई दिखनी ही बंद हो जाती है।
बात नवंबर 2018 की है। राजस्थान में विधानसभा चुनाव का माहौल पूरी तरह से गरमाया हुआ था। उन्होंने कैमरे के सामने डंके की चोट पर कहा- “दुनिया जानती है की राहुल गांधी के पिता कौन थे, उनकी दादी कौन थीं, उनके परदादा कौन थे… लेकिन नरेंद्र मोदी के पिता का नाम कौन जानता है? कोई नहीं!”
ये बयान सिर्फ देश के प्रधानमंत्री या उनके पिता का अपमान नहीं था। मुत्तेमवार के इस बयान ने सीधे तौर पर भारत के हर उस मज़दूर, किसान, रिक्शा चलाने वाले और उस आम नौकरीपेशा इंसान को सरेआम बेइज़्ज़त कर दिया।
लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की योग्यता उसके परिवार की प्रसिद्धि से आँकी जानी चाहिए या उसके अपने काम और क्षमता से?
5. राज बब्बर का 97 साल की माँ पर तंज

मुत्तेमवार का बवाल अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था की कांग्रेस के एक और दिग्गज नेता ने ‘सेल्फ-गोल’ की एक नई मिसाल कायम कर दी।
नवंबर 2018 का ही महीना था और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव चरम पर थे। राज बब्बर चुनाव प्रचार में उतरे हुए थे। राज बब्बर ने अर्थव्यवस्था पर तंज कसने के चक्कर में मोदी की वयोवृद्ध माताजी हीराबेन जी को बीच में खींच लिया।
उस समय हीराबेन जी की उम्र लगभग 97 वर्ष के आस-पास थी। राज बब्बर ने मंच से चुटकी लेते हुए कहा- “आज रुपया इतना गिर गया है की उसकी कीमत प्रधानमंत्री की पूज्य माताजी की उम्र के करीब पहुंच गई है।”
सच कहूं तो राजनीति के स्तर की इतनी भयंकर गिरावट शायद ही किसी ने देखी हो।
सरकार की आर्थिक नीति पर सवाल उठाना और किसी बुज़ुर्ग की उम्र को तंज बनाना—इन दोनों में मूल फर्क कहाँ है?
6. पवन खेड़ा का गौतमदास वाला भद्दा तंज


जब कोई पार्टी लगातार चुनाव हारती है, तो उसके पास दो ही रास्ते होते हैं। पहला- वो ज़मीन पर जाए, अपनी नीतियां सुधारे और जनता का भरोसा जीते। दूसरा- वो पूरी तरह से फ्रस्ट्रेशन (हताशा) में डूब जाए और ज़ुबानी कब्ज़ का शिकार होकर गालियां बकना शुरू कर दे।
कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। खेड़ा ने कैमरों के ठीक सामने जानबूझकर मोदी जी के पिता के नाम का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया।
उन्होंने कहा- “नरेंद्र गौतमदास मोदी… सॉरी, नरेंद्र दामोदरदास मोदी।” फिर ठहाका लगाते हुए बोले- “नाम दामोदरदास है लेकिन काम गौतमदास के करते हैं।”
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में एक बहुत ही स्पष्ट नियम है- जो इंसान दुनिया छोड़कर जा चुका है, उसके नाम का मज़ाक उड़ाना या उसे विकृत करना सबसे बड़ा पाप माना जाता है।
जब बहस का केंद्र नीति से हटकर किसी दिवंगत व्यक्ति के नाम पर आ जाता है, तो मूल मुद्दा किस तरह पीछे छूट सकता है?
7. आपदा को अवसर में कैसे बदलें – मोदी की रणनीति
अगर राजनीति के किसी मैनेजमेंट स्कूल में यह पढ़ाया जाए की अपने दुश्मन की गलती को अपने सबसे बड़े हथियार में कैसे बदलना है, तो उसका इकलौता सिलेबस नरेंद्र मोदी और बीजेपी की रणनीति होगी।
जब भी कांग्रेस या विपक्ष का कोई नेता मोदी जी के स्वर्गीय पिता या 100 साल की बूढ़ी माँ को गाली देता है, तो मोदी जी इस पूरे रायते को बहुत ही शांति से समेटते हैं और उसे सीधे जनता के ‘इमोशन’ से जोड़ देते हैं।
मंच से वो बहुत ही भावुक होकर कहते हैं- “भाइयों और बहनों, ये लोग मुझे गाली दें, मैं हँस कर सह लूँगा। लेकिन आज इन्होंने मेरी उस 100 साल की बूढ़ी माँ को भी नहीं बख्शा… आज इन्होंने मेरे उस स्वर्गीय पिता को भी गालियां दी हैं।”
बस! इतना कहना होता है, और सामने बैठी लाखों की भीड़ के भीतर एक सुनामी सी उठ जाती है।
विरोधी की गलती को केवल दोहराने के बजाय उसे एक बड़े जन-संदेश में बदलना राजनीतिक संचार की दिशा कैसे बदल देता है?
8. माता-पिता का अपमान राजनीतिक आत्महत्या है

अंत में, अगर हम इस पूरे एपिसोड का निचोड़ निकालें, तो बात बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो जाती है।
आप मोदी जी की आर्थिक नीतियों का विरोध कीजिए, आप उनकी विदेश नीति पर सवाल उठाइए, आप उनके प्रशासन की कमियां गिनाइए- लोकतंत्र इसी का नाम है।
लेकिन जब आप इस नीतिगत लड़ाई में हारने लगते हैं और हताशा में आकर उनके परिवार, उनकी गुज़र चुकी माँ और उनके स्वर्गीय पिता को बीच में घसीटते हैं, तो आप दरअसल राजनीति नहीं कर रहे होते, आप अपनी ‘राजनीतिक आत्महत्या’ की स्क्रिप्ट लिख रहे होते हैं।
विपक्ष आज तक यह नहीं समझ पाया की श्रवण कुमार की इस धरती पर, जहाँ राम ने पिता के एक वचन के लिए राजपाट छोड़ दिया था, वहाँ आप किसी के पिता का सरेआम मज़ाक उड़ाकर चुनाव नहीं जीत सकते।
बीजेपी कोई सुपर-ह्यूमन पार्टी नहीं है। वो बस विपक्ष की मूर्खताओं का इंतज़ार करती है। विपक्ष जब तक अपने इस अहंकार से बाहर नहीं निकलेगा, जब तक वो भारत की ज़मीनी संस्कृति और संस्कारों का सम्मान करना नहीं सीखेगा, तब तक बीजेपी को अपनी जीत के लिए कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
क्या नीतियों पर बेहद तीखी बहस करते हुए भी परिवार और निजी गरिमा का सम्मान बनाए रखना लोकतंत्र को अधिक मजबूत बना सकता है?
