एकतरफा नियमों से कैसे होगा समाज में न्याय, कमेटी में सिर्फ आरक्षित वर्ग को शामिल करने वाले UGC के जनवरी विनियम को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बताया पूरी तरह असंतुलित

कभी-कभी दिल्ली में बैठे सिस्टम के इन ‘विद्वान बाबुओं’ की सोच देखकर सच में सिर चकरा जाता है। मखमली कुर्सियों पर बैठकर फाइलें पलटते-पलटते इन्हें अचानक याद आता है की देश के विश्वविद्यालयों में ‘समानता’ लानी है।

फिर क्या, बिना ज़मीनी हकीकत समझे ये एक ऐसा कागज़ी फरमान ठोक देते हैं जिसका ज़मीन पर असर सिर्फ और सिर्फ भयंकर रायता फैलाने वाला होता है।

हम बात कर रहे हैं यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के उस अजीबोगरीब फरमान की, जिसका नाम तो बड़ा भारी-भरकम रखा गया- ‘समानता विनियम’।

लेकिन जब आप इस नियम को अंदर से पढ़ेंगे, तो पता चलेगा की इसमें समानता के अलावा बाकी सब कुछ है।

क्या गज़ब का न्याय ईजाद किया है हमारे सिस्टम ने, जहां समानता लाने के नाम पर सिर्फ आरक्षित वर्ग को सारे अधिकार दे दिए, और सामान्य वर्ग को पूरी तरह से गायब कर दिया गया।

मतलब, अगर आपको तराजू बराबर करना है, तो आपने एक पलड़े को ही उठाकर बाहर फेंक दिया और कह दिया की देखो, अब सब बराबर है!

ये इस देश के लाखों सवर्ण छात्रों के भविष्य के साथ खेला गया एक बेहद भद्दा और एकतरफा खेल है, जिसे संघ (RSS) ने भी पूरी तरह से असंतुलित बताकर सिस्टम को तगड़ा आईना दिखाया है।

आइए ज़रा इस पूरे ‘समानता के मॉडल’ की परतें उधेड़ते हैं।

प्रशासन द्वारा गढ़ा गया समानता का ऐसा अनोखा न्याय जिसमें से आधे समाज को ही कर दिया गया बाहर

किसी भी समझदार इंसान से अगर आप पूछेंगे की ‘समानता’ का मतलब क्या होता है, तो वो यही कहेगा की सबको एक साथ लेकर चलना।

सबके अधिकारों की बात करना। लेकिन लगता है हमारे यूजीसी के नीति-निर्माताओं ने वो डिक्शनरी ही अलग पढ़ी है।

जब आप देश के उच्च शिक्षण संस्थानों (Higher Educational Institutions – HEIs) के लिए कोई नियम बनाते हैं, तो आपको ये समझना चाहिए की कैंपस में हर जाति, हर वर्ग और हर तबके का छात्र पढ़ने आता है।

वे वहां डिग्रियां लेने आते हैं, जातियों की कुश्ती लड़ने नहीं। लेकिन यूजीसी के बाबुओं ने ‘समानता को बढ़ावा देने’ के नाम पर जो ड्राफ्ट तैयार किया, उसने पूरे कैंपस को ही दो फाड़ कर दिया।

एक ऐसा नियम लाद दिया गया जिसने सामान्य वर्ग के छात्रों को ये महसूस करा दिया की सिस्टम की नज़र में उनकी कोई अहमियत ही नहीं है। मानो वो इस देश के नागरिक ही ना हों।

ये वो दौर है जहां हम समाज को जोड़ने की बात करते हैं, और हमारा ही सिस्टम ऐसे नियम बना रहा है जो छात्रों को आपस में ही लड़ा दे।

जब आप किसी एक वर्ग को ‘पैदाइशी शोषक’ मान लेते हैं और बाकी वर्गों को हमेशा ‘पीड़ित’, तो वहां न्याय नहीं होता, वहां सिर्फ और सिर्फ तुष्टिकरण की बदबू आती है।

जनवरी का वो सरकारी फरमान और इक्विटी कमेटी का सच जहां न्याय के तराजू का एक पलड़ा ही गायब है

अब ज़रा असल कहानी समझिए की जनवरी 2026 में आख़िर हुआ क्या था, जिसने पूरे देश के सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों की नींद उड़ा दी।

जनवरी के महीने में यूजीसी ने एक सर्कुलर जारी किया। नाम दिया गया- ‘Promotion of Equity Regulations 2026’ (समानता विनियम-2026)।

इस नियम के तहत देश के हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी पर एक आदेश थोपा गया की उन्हें अपने कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए एक ‘इक्विटी कमेटी’ (Equity Committee) बनानी ही पड़ेगी।

यहां तक तो बात ठीक थी। विवाद होने पर कोई कमेटी होनी चाहिए, इसमें किसी को क्या ही ऐतराज़ हो सकता है? लेकिन असली झोल तो इस कमेटी की बनावट (Structure) में था।

यूजीसी ने बाकायदा नियम लिख कर दिया की इस कमेटी के अंदर सिर्फ और सिर्फ OBC, SC, ST, दिव्यांग और महिलाओं के प्रतिनिधि ही शामिल किए जाएंगे।

मतलब सोचिए ज़रा इस बात की गहराई को! जब यूनिवर्सिटी कैंपस में कोई विवाद होगा, कोई शिकायत आएगी, तो उस पर सुनवाई करने और फैसला लेने वाली कमेटी में General Category छात्रों या प्रोफेसरों का एक भी प्रतिनिधि नहीं होगा!

क्यों भाई? क्या जनरल कैटेगरी का छात्र कोई एलियन है जो किसी दूसरे ग्रह से कैंपस में पढ़ने आया है?

न्याय का सबसे बेसिक उसूल होता है की विवाद में शामिल हर पक्ष का नुमाइंदा वहां मौजूद हो। अगर किसी सवर्ण छात्र पर कोई आरोप लगता है, तो उसकी बात सुनने वाला या उसका पक्ष रखने वाला वहां कोई तो होना चाहिए ना?

लेकिन नहीं, यूजीसी ने अपनी तरफ से ही मान लिया की सवर्ण तो बस अपराधी हो सकता है, जज नहीं। बिना सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व के कैंपस में कैसे न्याय आएगा, यह बात शायद नियम बनाने वालों के पल्ले ही नहीं पड़ी।

इंदौर महामंथन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हुंकार और यूजीसी के असंतुलित फरमान पर सीधा प्रहार

समाज में UGC के जरिये जो खाई पैदा करने की कोशिश की गई है, उस पर किसी बड़ी और ज़िम्मेदार संस्था का बोलना बहुत ज़रूरी था। और यही काम किया है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने।

अभी मध्य प्रदेश के इंदौर में 31 अक्टूबर से 2 नवंबर 2026 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल’ की बेहद अहम तीन दिवसीय बैठक चल रही है।

इस बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी सहित देश भर से संघ के तमाम बड़े पदाधिकारी जुटे हुए हैं।

इस महामंथन के शुरू होने से ठीक पहले, 31 अक्टूबर को संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने मीडिया के सामने आकर जो दो-टूक बातें कहीं, उसने यूजीसी के इस समानता विनियम की पूरी हवा निकाल कर रख दी है।

सुनील आंबेकर जी ने सीधे और स्पष्ट शब्दों में इस सर्कुलर को ‘असंतुलित’ (Unbalanced) करार दिया।

ज़रा उनके शब्दों की गहराई को समझिए। उन्होंने कहा, “हमने पहले भी कहा था की यह सर्कुलर असंतुलित है। न्यायालय ने इस पर रोक लगाई है और सरकार इसकी समीक्षा कर रही है।”

उनका ये बयान इस बात की पक्की मुहर है कि यूजीसी का ये ड्राफ्ट वास्तव में भेदभावपूर्ण था।

लेकिन संघ ने सिर्फ कमी नहीं निकाली, बल्कि समाज को एक बहुत बड़ा और कड़ा संदेश भी दिया।

आंबेकर जी ने डंके की चोट पर कहा, “समाज इतना कमज़ोर नहीं है कि किसी एक सर्कुलर से हिल जाए। समाज को एकजुट रहना चाहिए। आगे जो भी निर्णय हो, वह संतुलित होना चाहिए और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए।”

क्या बात है! यही तो वो आवाज़ थी जिसकी इस समय सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। यह संदेश समाज के लिए एक आइना है। यूजीसी के एक कागज़ी फरमान के ज़रिए हिन्दू समाज को अगड़े और पिछड़े की लड़ाई में उलझाना सही नहीं है।

संघ ने साफ कर दिया की नियम जो भी बनेगा, वो सबके हकों की बात करेगा, किसी एक को लावारिस छोड़कर नहीं।

झूठी शिकायतों का खौफ और लावारिस छोड़े गए जनरल छात्र, क्या इसी को कहते हैं उच्च शिक्षा में समानता

अब आते हैं उस पहलू पर, जिसकी वजह से पूरे देश में बवाल खड़ा हो गया। सामान्य वर्ग के संगठनों को सिर्फ इस बात से दिक्कत नहीं थी की उन्हें कमेटी से बाहर रखा गया।

उनका असली दर्द और खौफ कुछ और था- और वो था ‘झूठे मुकदमों’ (Fake Complaints) का डर।

ज़रा प्रैक्टिकल होकर सोचिए। यूनिवर्सिटी कैंपस की राजनीति कितनी गंदी हो सकती है, ये हम सब जानते हैं।

छात्रों के बीच आपसी रंजिशें होती हैं, प्रोफेसरों के बीच पॉलिटिक्स चलती है, नंबरों को लेकर झगड़े होते हैं।

ऐसे माहौल में अगर कोई भी छात्र किसी सामान्य वर्ग के विद्यार्थी या प्रोफेसर पर रंजिश निकालने के लिए ‘जातिगत भेदभाव’ की झूठी शिकायत ठोक दे, तो क्या होगा?

यहीं पर यूजीसी के इस नियम का सबसे बड़ा लूपहोल (Loophole) सामने आया। इस पूरे विनियम में आरक्षित वर्गों के अधिकारों की तो लंबी-चौड़ी लिस्ट थी, लेकिन ‘सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के संरक्षण’ (Protection) को लेकर एक लाइन तक नहीं लिखी गई।

सबसे डरावनी बात तो ये थी की अगर किसी ने जनरल छात्र पर झूठा केस किया, और बाद में वो शिकायत फर्जी पाई गई, तो उस झूठी शिकायत करने वाले पर क्या सख्त कार्रवाई होगी… इसका कोई स्पष्ट और कड़ा प्रावधान इस ड्राफ्ट में था ही नहीं!

मतलब आपने एक जनरल छात्र को बिना किसी सुरक्षा कवच के ऐसे रिंग में उतार दिया, जहां कोई भी आकर उस पर झूठा इल्जाम लगा दे और उसका पूरा करियर, उसकी डिग्रियां और उसकी इज़्ज़त पल भर में खाक हो जाए।

झूठी शिकायत करने वाले को कोई डर नहीं, क्योंकि उस पर तो कोई खास एक्शन होना नहीं है। इसे समानता कहते हैं? इसे तो टारगेट करना कहते हैं।

सामान्य वर्ग के छात्रों को सिस्टम के ही भरोसे लावारिस छोड़ दिया गया, ताकि कोई भी उन्हें आसानी से फंसा सके।

जब बवाल बढ़ा तो सुप्रीम कोर्ट ने लगाई लगाम और सिस्टम को लौटना पड़ा 2012 वाले पुराने ट्रैक पर

अब आप ही बताइए, जब सिस्टम खुद ही न्याय की आंखों पर पट्टी बांधकर एकतरफा खेल खेलने लगेगा, तो क्या देश का युवा चुप बैठेगा?

जैसे ही यूजीसी के इस तथाकथित ‘समानता विनियम-2026’ की भनक बाहर आई, पूरे देश के विश्वविद्यालयों में भूचाल आ गया।

सामान्य वर्ग के छात्र और उनके संगठन सड़कों पर उतर आए। आखिर उतरते भी क्यों ना? उनके सिर पर झूठे मुकदमों की तलवार जो लटकाई जा रही थी।

ये बात किसी से छिपी नहीं है की हमारे देश के कई बड़े कैंपसों में एक ख़ास तरह का इकोसिस्टम काम करता है।

ये इकोसिस्टम हमेशा मौके की ताक में रहता है की सामान्य वर्ग के छात्रों को फर्जी मुकदमों में फंसा सकें और उनसे पैसे ऐंठ सकें, और फिर उनका करियर बर्बाद कर सकें।

यूजीसी का ये सर्कुलर तो उनके लिए किसी लॉटरी से कम नहीं था।

जब मामला हद से ज्यादा गरमा गया और देशव्यापी विरोध शुरू हुआ, तो बात देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गई।

और यहां आकर यूजीसी के इन ‘विद्वान बाबुओं’ की सारी होशियारी धरी की धरी रह गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस असंतुलित और एकतरफा नियम की गंभीरता को तुरंत भांप लिया।

जनवरी 2026 के अंत में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित सर्कुलर पर तगड़ा ब्रेक (Stay) लगा दिया। कोर्ट ने साफ कह दिया की जब तक इस मामले की पूरी समीक्षा नहीं हो जाती और कोई अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक यूजीसी के वो पुराने 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे, जिनमें कम से कम थोड़ी बहुत तो तार्किकता थी।

सरकार को भी बैकफुट पर आना पड़ा और इसकी समीक्षा (Review) शुरू करनी पड़ी।

कागज के एक टुकड़े से नहीं टूटेगी समाज की एकता लेकिन प्रशासन को भी बदलना होगा अपना चश्मा

यूनिवर्सिटी और कॉलेज वो जगहें हैं जहां देश का भविष्य गढ़ा जाता है। वहां छात्र इतिहास पढ़ने जाते हैं, साइंस और टेक्नोलॉजी सीखने जाते हैं। वहां का माहौल समरसता (Harmony) वाला होना चाहिए।

अगर कोई नियम बनाने वाली संस्था ऐसे फरमान जारी करेगी जो कैंपस के छात्रों को एक-दूसरे का दुश्मन बना दे, तो वहां कभी पढ़ाई नहीं हो सकती।

समानता का मतलब ये बिल्कुल नहीं होता की आप पुरानी कमियों को दूर करने के चक्कर में एक नए वर्ग के साथ भेदभाव शुरू कर दें।

अगर किसी छात्र को सिर्फ इसलिए फंसाने की छूट दे दी जाए क्योंकि सिस्टम ने आरक्षित वर्ग को ‘पैदाइशी शोषक’ मान लिया है, तो ये पूरे देश के भविष्य के साथ गद्दारी है।

झूठी शिकायतों का जो खौफ छात्रों के मन में बैठाया गया था, वो पूरी तरह से जायज़ था। कोई भी निर्दोष छात्र महज़ किसी की रंजिश का शिकार होकर अपना करियर तबाह क्यों होने दे?

यूजीसी के बाबुओं को अपनी उस औपनिवेशिक और किताबी सोच से बाहर आना होगा जिसमें वे मानते हैं की समाज का एक हिस्सा हमेशा गलत ही होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने जो ब्रेक लगाया है और संघ ने इंदौर के महामंथन से जो ‘संतुलन’ की नसीहत दी है, वो सिस्टम के लिए एक बहुत बड़ा अल्टीमेटम है।

सरकार अब इस विवादित नियम की समीक्षा कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए की जब यूजीसी का नया ड्राफ्ट बनकर बाहर आएगा, तो उसमें असली और ज़मीनी ‘समानता’ की झलक होगी।

एक ऐसी समानता जहां आरक्षित वर्ग के छात्रों को भेदभाव से सुरक्षा मिले, तो साथ ही सामान्य वर्ग के छात्रों को भी झूठे मुकदमों और फंसाए जाने के खौफ से आज़ादी मिले।

क्योंकि याद रखिए, कोई भी देश या समाज अपने युवाओं को आपस में लड़ाकर कभी विश्वगुरु नहीं बन सकता। समाज एक था, एक है और एक ही रहेगा… बस सिस्टम को अपने चश्मे का नंबर बदलने की सख्त ज़रूरत है।

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