जब गांव-देहात का कोई OBC युवा रात-दिन एक करके कोई सरकारी एग्जाम निकालता है, तो उसके पूरे परिवार में जश्न मनता है।
उस लड़के को लगता है की चलो, अब ज़िंदगी सेट हो गई। अब वो भी तरक्की करेगा, सीढ़ियां चढ़ेगा और एक दिन बड़ा साहब बनेगा।
लेकिन जैसे ही वो लड़का उस सरकारी दफ्तर की चौखट पार करता है, इस सिस्टम का एक क्रूर सच उसको सन्न कर देता है।
हकीकत ये है की दफ्तर के अंदर जाते ही उस OBC युवा को पता चलता है की आरक्षण के नाम पर देश में कैसा गंदा ‘डबल स्टैंडर्ड’ चल रहा है।
आज इसी डबल स्टैंडर्ड और सिस्टम के सौतेलेपन की पूरी कानूनी और ज़मीनी हक़ीक़त आपको बताएँगे।

दफ्तर में 15 साल घिसने वाला OBC क्लर्क रह जाता है और कल का आया SC/ST जूनियर उसका साहब बन जाता है
अगर आप किसी भी सरकारी दफ्तर, बैंक या मंत्रालय में जाकर वहां का ज़मीनी सच देखेंगे, तो आपको यकीन नहीं होगा।
एक OBC कर्मचारी अपनी पोस्ट पर 15-15 साल तक घिसता रहता है। वो दिन-रात फाइलें ढोता है, ईमानदारी से काम करता है, उसके बाल सफेद हो जाते हैं, लेकिन उसकी कुर्सी वही की वही रहती है।
लेकिन ज़रा उसी दफ्तर का दूसरा नज़ारा देखिए। उसी OBC कर्मचारी के कई साल बाद, एक SC/ST का लड़का जूनियर पोस्ट पर नौकरी जॉइन करता है।
उसे काम का कोई खास तजुर्बा भी नहीं होता। लेकिन फिर सिस्टम का जादू चलता है।
वो जूनियर लड़का ‘प्रमोशन कोटे’ की लिफ्ट में बैठता है और महज़ 4-5 साल के अंदर ही सीधा प्रमोट होकर उस 15 साल पुराने सीनियर OBC कर्मचारी का बॉस बन जाता है!
ज़रा उस पल की कल्पना कीजिए। जो सीनियर OBC कर्मचारी कल तक उस नए लड़के को काम सिखा रहा था, आज मजबूरन उसे उसी लड़के के सामने हाथ बांधकर खड़ा होना पड़ता है और उसे ‘यस सर’, ‘जी साहब’ बोलना पड़ता है।
ये कोई छोटी बात नहीं है भाई! एक स्वाभिमानी इंसान के लिए रोज़ अपने दफ्तर में अपने जूनियर को अपना बॉस बनते देखना, घुट-घुट कर मरने जैसा है।
आप टैलेंट, तजुर्बा और सीनियरिटी सब कुछ ताक पर रखकर सिर्फ एक खास SC/ST वर्ग को रातों-रात साहब बना रहे हैं और असली पिछड़े OBC को ज़िंदगी भर बाबूगिरी करने के लिए मज़बूर कर रहे हैं।
ये न्याय नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटकर SC/ST के लिए रातों-रात बदल दिया गया संविधान और OBC को छोड़ दिया लावारिस
अब सवाल उठता है की आख़िर दफ्तर के अंदर ये नाइंसाफी हो कैसे रही है? कानून तो सबके लिए बराबर होना चाहिए ना?
इसका जवाब जानने के लिए आपको 1990 के दशक की राजनीति में जाना होगा, जब वोटबैंक के लिए संविधान के साथ सरेआम छेड़छाड़ की गई थी।
साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने ‘इंदिरा साहनी केस’ (जिसे हम मंडल जजमेंट कहते हैं) में एक बहुत ही कड़क और ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की “नौकरी में घुसने के टाइम (Initial recruitment) आरक्षण देना ठीक है, लेकिन नौकरी के अंदर ‘प्रमोशन में आरक्षण’ देना पूरी तरह से असंवैधानिक है।”
कोर्ट ने साफ कर दिया था की दफ्तर के अंदर कोई कोटा नहीं चलेगा, वहां सिर्फ मेरिट और तजुर्बा चलेगा।
अब जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आया, देश के SC/ST नेताओं की कुर्सियां हिलने लगीं। उन्हें लगा की अगर प्रमोशन में आरक्षण खत्म हो गया, तो उनका वोटबैंक खिसक जाएगा।
तब उस वक़्त की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और रातों-रात संसद में 77वां संविधान संशोधन (1995) पास करवा लिया!
इस संशोधन के ज़रिए नेताओं ने संविधान में एक नया Article 16(4A) जोड़ दिया। और जानते हैं इस आर्टिकल में क्या लिखा गया? इसमें लिखा गया की प्रमोशन में आरक्षण का कानूनी हक़ सिर्फ और सिर्फ SC और ST को मिलेगा।
भाईसाहब, यहीं पर देश के करोड़ों OBC के साथ आज़ाद भारत की सबसे बड़ी गद्दारी हुई।
सरकार ने SC/ST का प्रमोशन बचाने के लिए तो रातों-रात संविधान बदल दिया, लेकिन OBC का क्या? सरकार ने OBC को उसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के भरोसे सड़कों पर लावारिस छोड़ दिया।
किसी भी नेता ने, किसी भी सरकार ने OBC के लिए संविधान में कोई लाइन नहीं जोड़ी!
नतीजा ये हुआ की SC/ST प्रमोशन लेकर धड़ाधड़ साहब बनते गए और OBC कर्मचारी बेचारा ज़िंदगी भर क्लर्क बनकर फाइलें चाटता रह गया।
दफ्तर के दरवाज़े पर ही OBC से छीन लिया जाता है आरक्षण का हक़, और नौकरी के अंदर उसे सबसे पीछे लाइन में खड़ा कर देता है सिस्टम
चलिए अब आपको थोड़ा टेक्निकल खेल समझाते हैं की दफ्तर के अंदर ये बाबूशाही काम कैसे करती है और कैसे एक OBC के गले में फंदा डाला जाता है।
जब गांव का कोई OBC लड़का मेहनत करके 27% कोटे से नौकरी में एंट्री मारता है, तो सिस्टम दफ्तर के दरवाज़े पर ही उसका ‘OBC टैग’ फाड़कर फेंक देता है।
नौकरी के अंदर जाते ही प्रमोशन के मामले में उसे 100% ‘अनारक्षित’ मान लिया जाता है।
अगर उस OBC कर्मचारी को एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट पर प्रमोट होना है, तो उसे अपनी सीनियरिटी (Seniority), अपनी मेरिट और अपनी ACR (एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट) साबित करनी पड़ती है।
उसे लंबी लाइन में धक्के खाने पड़ते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, SC/ST कर्मचारियों के लिए दफ्तरों में बाकायदा ‘रिज़र्वेशन रोस्टर पॉइंट्स’ (Roster system) चलते हैं।
ये सिस्टम एक फास्ट-ट्रैक एक्सप्रेसवे की तरह है। मान लीजिए की ऊपर वाली कुर्सी पर एक SC या ST की सीट खाली हो गई।
अब भले ही उस दफ्तर में उस खाली सीट के नीचे 50 OBC कर्मचारी इंतज़ार कर रहे हों, जो उस SC/ST कर्मचारी से सालों सीनियर हों…
लेकिन ये रोस्टर सिस्टम उन 50 सीनियर लोगों को लांघकर, उन्हें रौंदकर, उस जूनियर SC/ST को उठाएगा और सीधा बॉस की कुर्सी पर बैठा देगा।
मतलब सोचिए, नौकरी मिलने तक आप OBC हैं, और दफ्तर के अंदर जाते ही आपको सिस्टम कहता है की “अब तू अनारक्षित है, लाइन में लग जा!”
ये कैसा सरेआम धोखा है यार? जिस 27 परसेंट का आप बाहर ढिंढोरा पीटते हैं, दफ्तर के अंदर जाते ही उसकी कोई हैसियत ही नहीं बचती।
सिस्टम ने बहुत ही चालाकी से पिछड़ा वर्ग को अफसर बनने से रोकने का ऐसा जाल बुना है, जिसमें आज तक लाखों OBC कर्मचारी तड़प रहे हैं।
संसदीय समिति के वो आंकड़े जो बता रहे हैं की बिना प्रमोशन के OBC को ज़िंदगी भर चपरासी और क्लर्क बनाकर रखने का है पूरा खेल
अगर किसी को लग रहा है की प्रमोशन में आरक्षण ना मिलने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, तो ज़रा अपनी आंखें खोलिए और ‘संसदीय समिति’ (Parliamentary Committee on Welfare of OBCs) के उन आंकड़ों को देखिए।
ये आंकड़े बता रहे हैं की केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में OBC का असली हाल क्या है।
कागज़ों पर तो सिस्टम ढिंढोरा पीटता है की हमने पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दे रखा है। लेकिन हकीकत क्या है?
लेटेस्ट संसदीय समिति की रिपोर्ट उठा कर देख लीजिए। केंद्र सरकार की ‘ग्रुप ए’ (Class I Officers) और ‘ग्रुप बी’ जैसी सबसे बड़ी, सबसे पावरफुल और नीति बनाने वाली (Policy-making) पोस्ट्स पर OBC का प्रतिनिधित्व आज भी महज़ 7% से 13% के बीच रेंग रहा है!
ज़रा सोचिए, 35 साल होने को आए मंडल कमीशन को लागू हुए, लेकिन आज तक बड़े पदों पर 27% का कोटा आधा भी नहीं भर पाया! ऐसा क्यों है भाई?
इसका सीधा सा टेक्निकल कारण है। दरअसल, सरकार के मंत्रालयों में ग्रुप A और ग्रुप B के जो टॉप लेवल के पद होते हैं (जैसे अंडर सेक्रेटरी, डायरेक्टर, जॉइंट सेक्रेटरी), वहां ‘सीधी भर्ती’ (Direct Recruitment) बहुत कम होती है।
वहां की 70 से 80 फीसदी कुर्सियां नीचे वाले कर्मचारियों को ‘प्रमोट’ (Promotion) करके भरी जाती हैं। अब ज़रा क्रोनोलॉजी समझिए!
जब सिस्टम ने OBC कर्मचारी को ग्रुप C (क्लर्क या चपरासी) से ऊपर प्रमोट होने का रास्ता ही बंद कर दिया है, जब उसे दफ्तर के अंदर लाइन में धक्के खाने के लिए छोड़ दिया है, तो वो बेचारा कभी डायरेक्टर या सेक्रेटरी बन ही नहीं पाएगा!
प्रतिनिधित्व के नाम पर SC/ST को मलाई परोसने वाली सरकारें जवाब दें की बड़े पदों पर आज तक OBC का कोटा पूरा क्यों नहीं हुआ
जब भी आप सिस्टम से या कोर्ट में इस नाइंसाफी पर सवाल पूछेंगे, तो सरकार के वकील एक बहुत ही रटा-रटाया तर्क देते हैं।
सरकार कहती है की “बड़े पदों पर SC और ST वर्ग का ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ (Adequate Representation) नहीं है, इसीलिए उन्हें प्रमोशन में आरक्षण देकर ऊपर लाना हमारी संवैधानिक मजबूरी है।”
वाह रे मेरे देश के सिस्टम! अगर ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ ही इकलौता पैमाना है, तो डेटा तो चीख-चीख कर कह रहा है की आज की तारीख में ग्रुप A और B में सबसे बुरा हाल और सबसे कम प्रतिनिधित्व OBC का है (महज़ 7-13%)।
तो फिर इसी तर्क के आधार पर OBC को प्रमोशन में आरक्षण का हक़ क्यों नहीं दिया जा रहा? जब SC/ST का प्रतिनिधित्व कम होता है तो रातों-रात संविधान बदल दिया जाता है, लेकिन जब OBC का कोटा खाली पड़ा है, तो नेताओं और बाबूशाही के मुंह में दही क्यों जम जाता है?
बात एकदम साफ है। ये प्रतिनिधित्व वाला तर्क सिर्फ एक ढोंग है। असलियत ये है की इस देश की ब्यूरोक्रेसी और वोटबैंक के लालची नेता चाहते ही नहीं की पिछड़ा OBC वर्ग कभी अपनी गरीबी से ऊपर उठे।
वो चाहते हैं की OBC हमेशा ‘फॉलोअर’ (Follower) बना रहे, कभी ‘लीडर’ या ‘बॉस’ (Boss) ना बने।
SC/ST का वोटबैंक आक्रामक है, वो सड़क पर उतरकर चक्का जाम कर देते हैं, इसलिए सरकारें उनसे डरती हैं और उन्हें प्रमोशन की मलाई परोसती हैं।
और OBC चुपचाप दफ्तर में बैठकर अपनी किस्मत को रोता रहता है, इसीलिए उसे एकदम लावारिस छोड़ दिया गया है।
