जिसने नक्सलियों से लड़ते हुए दी अपने सगे बेटे की कुर्बानी, स्कूलों और सड़क नेटवर्क से एक नए राज्य का विकास करने और ‘डोमिसाइल पॉलिसी’ से कुर्सी गवाने वाले झारखंड के पहले CM ‘बाबूलाल मरांडी’

जब भी हम आज के टाइम में ‘झारखंड’ का नाम सुनते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? ज़ाहिर सी बात है- कोयले की खदानें, मधु कोड़ा के वो हज़ारों करोड़ के घोटाले, और नेताओं के करीबियों के घर से निकलने वाले नोटों के वो बड़े-बड़े पहाड़।

पिछले दो-ढाई दशकों में इस राज्य ने पॉलिटिक्स का इतना गंदा और भ्रष्ट चेहरा देखा है की आम आदमी का सियासत से ही भरोसा उठ जाए।

लेकिन क्या आपको पता है की इसी घोटालों वाले राज्य की जब नींव रखी गई थी, तो इसका पहला मुख्यमंत्री एक ऐसा इंसान था जिसके दामन पर आज इतने सालों बाद भी भ्रष्टाचार का कोई बड़ा दाग नहीं लगा।

एक सीधा-साधा मास्टर जी और आरएसएस (RSS) का वो स्वयंसेवक, जिसने एक नए-नवेले राज्य की कमान तो संभाली, नक्सलियों की आंखों में आंखें डालकर उनसे सीधी दुश्मनी भी मोल ली, लेकिन राजनीति के दांव-पेंच में वो इतना कच्चा निकला की खुद अपने ही बुने हुए चक्रव्यूह में ऐसा फंसा की सीधे 14 सालों के लिए सत्ता से बाहर फेंक दिया गया।

ये कहानी है बाबूलाल मरांडी की, जो अपनी ज़िद, अपने बेदाग काम और अपनी ही सियासी पलटी के लिए जाने जाते हैं।

मधु कोड़ा और सोरेन के घोटालों वाले राज्य में एक बेदाग आदिवासी नेता की कहानी जो खुद अपने ही बुने चक्रव्यूह में उलझ गया

पॉलिटिक्स में बेदाग रहना उतना ही मुश्किल है जितना कीचड़ में उतरकर सफ़ेद कपड़ों को साफ़ बचा लेना। झारखंड में तो ये काम और भी नामुमकिन सा लगता है।

यहां सत्ता में हमेशा करप्शन और ज़मीन घोटालों की बदबू आती रही है। लेकिन बाबूलाल मरांडी इस पूरी मंडी में एकदम अलग ही मिट्टी के बने नेता रहे।

11 जनवरी 1958 को गिरिडीह के एक बेहद पिछड़े गांव (कोदवा बैंक) के एक गरीब संथाल आदिवासी परिवार में बाबूलाल का जन्म हुआ था।

शुरुआत में गांव के ही एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाते थे। लोग प्यार से इन्हें ‘मास्टर जी’ कहते थे। लेकिन मास्टर जी को तो कुछ और ही मंज़ूर था।

उन्होंने नौकरी छोड़ी और सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ गए। वनवासी कल्याण आश्रम के जरिए जंगलों की खाक छानी और ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खिलाफ आदिवासियों के बीच ज़बरदस्त पैठ बनाई।

सियासत में इनका असली जलवा दिखा 1998 के लोकसभा चुनाव में। दुमका सीट पर जेएमएम (JMM) के सबसे बड़े भगवान और ‘गुरुजी’ माने जाने वाले शिबू सोरेन को उसी के गढ़ में इस साधारण से मास्टर ने धूल चटा दी!

इस ‘जायंट किलर’ वाले कारनामे से अटल बिहारी वाजपेयी जी इतना इम्प्रेस हुए की उन्हें सीधे केंद्र में मंत्री बना दिया।

यही वजह थी की नवंबर 2000 में जब नया राज्य बना, तो सीएम की कुर्सी के लिए वाजपेयी जी की इकलौती पसंद बाबूलाल ही थे।

2000 में उनकी इमेज एक बेहद कड़क, ईमानदार और उसूलों वाले नेता की थी। लेकिन कहते हैं ना की सियासत में सिर्फ ईमानदारी से काम नहीं चलता, आपको चाणक्य वाली वो जोड़-तोड़ भी आनी चाहिए।

जब जंगल और खदानों वाले नए नवेले राज्य में बाबूलाल ने बिछाया था स्कूलों और सड़कों का जाल

तारीख थी 15 नवंबर 2000। दशकों के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार बिहार से कटकर एक नया राज्य बना झारखंड।

अब कहने को तो ये एक नया राज्य था, लेकिन विरासत में क्या मिला था? लालू के बिहार से इन्हें मिला था सिर्फ ज़ीरो इंफ्रास्ट्रक्चर और चारों तरफ फैले हुए घनघोर जंगल। न पक्की सड़कें थीं, न पीने का पानी और न ही बच्चों के लिए ढंग के स्कूल।

जब बाबूलाल मरांडी ने सीएम की कुर्सी संभाली, तो उनके सामने खुरदुरी ज़मीन पर एक नया स्ट्रक्चर खड़ा करने की चुनौती थी।

और सच कहूं तो, शुरुआती दौर में इस आदमी ने काम एकदम धुआंधार किया। उन्होंने सबसे पहले गांवों पर फोकस किया।

‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ (PMGSY) को हथियार बनाकर उन्होंने सुदूर आदिवासी गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ने का जो जाल बिछाया, उसकी तारीफ आज भी वहां के पुराने लोग करते हैं।

शिक्षा के मामले में भी मास्टर जी का दिमाग खूब चला। उन्होंने देखा की आदिवासी बच्चों के लिए मास्टर ही नहीं हैं।

तो उन्होंने रातों-रात पंचायत स्तर पर हज़ारों प्राइमरी स्कूल खुलवा दिए और वहां पारा-टीचर्स (Para-teachers) की बंपर भर्ती कर दी।

लेकिन पॉलिटिक्स में काम से ज्यादा अहमियत ‘सियासी माइलेज’ की होती है, और बाबूलाल ने एक ऐसा दांव खेला जो सीधा उनके ही गले की फांस बन गया।

1932 के खतियान वाली वो डोमिसाइल पॉलिसी जिसने रातों-रात मास्टरस्ट्रोक को सेल्फ गोल में बदल दिया

ये बाबूलाल मरांडी के करियर का वो पॉइंट था जहां से उनकी पूरी सियासी गाड़ी पटरी से ही उतर गई।

साल था 2002। बाबूलाल को लगा की यार, कुछ ऐसा किया जाए जिससे पूरा आदिवासी वोटर हमेशा-हमेशा के लिए मेरी मुट्ठी में आ जाए।

इसी चक्कर में उन्होंने एक बम फोड़ दिया, जिसका नाम था- ‘डोमिसाइल पॉलिसी’ (स्थानीयता नीति)।

अब ये बला क्या थी? बाबूलाल ने नियम निकाल दिया की झारखंड का असली निवासी (Domicile) सिर्फ उसी को माना जाएगा जिसके पूर्वजों का नाम 1932 के ज़मीन रिकॉर्ड (जिसे वहां ‘खतियान’ कहते हैं) में दर्ज़ होगा।

और सबसे बड़ा पेंच ये था की अब से सरकारी नौकरी भी सिर्फ उन्हीं लोगों को मिलेगी जो इस 1932 के खतियान वाले पैमाने पर खरे उतरेंगे।

मरांडी को लगा की ये उनका पॉलिटिकल ‘मास्टरस्ट्रोक’ है। उन्हें लगा आदिवासी समाज उन्हें कंधों पर उठा लेगा। लेकिन भाईसाहब, असलियत में ये एक ऐसा भयंकर ‘सेल्फ गोल’ साबित हुआ जिसने पूरे राज्य को आग में झोंक दिया।

अरे भाई, झारखंड में सिर्फ आदिवासी तो रहते नहीं थे। दशकों से बिहार, यूपी और बंगाल से आकर लाखों गैर-आदिवासी लोग भी वहां बसे हुए थे, जो वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे। इस नीति का सीधा मतलब था की उनका और उनके बच्चों का हक मारा जा रहा है।

बस फिर क्या था! पूरे राज्य में ऐसी भयंकर आग लगी की सड़कों पर खून बहने लगा। आदिवासी और गैर-आदिवासी सड़कों पर आमने-सामने आ गए।

खूनी दंगे हुए, आगजनी हुई, बस्तियां जलाई गईं। जो शांत राज्य विकास की पटरी पर दौड़ रहा था, मरांडी की इस एक ज़िद ने उसे ज्वालामुखी बना दिया।

बाबूलाल को लगा था की वो आग से खेलकर हीरो बन जाएंगे, लेकिन इस आग की लपटें सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गईं।

अपनों की बगावत का वो दौर जब अपने ही मंत्रियों ने पैर खींचकर कुर्सी से उतार फेंका

अब डोमिसाइल पॉलिसी की आग सड़कों पर तो भड़क ही रही थी, लेकिन बाबूलाल को ये अंदाज़ा नहीं था की उनके अपने ही घर (सरकार) में उनके खिलाफ खंजर तेज़ किए जा रहे हैं।

गठबंधन की सरकारों का एक सीधा सा उसूल होता है- ‘तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी पीठ खुजाऊंगा।’ लेकिन मास्टर जी राजनीति के इस गंदे खेल में बिल्कुल फिट नहीं बैठते थे।

उस वक्त मरांडी की सरकार टिकी हुई थी जेडीयू (JDU – तब समता पार्टी) के विधायकों के समर्थन पर। लालचंद महतो और रमेश सिंह मुंडा जैसे JDU कोटे के मंत्री मरांडी के काम करने के तरीके से पहले ही बुरी तरह चिढ़े बैठे थे।

डोमिसाइल वाले बवाल ने इन बागियों को वो हथियार दे दिया जिसका वो लंबे समय से इंतज़ार कर रहे थे। इन लोगों ने सीधा बगावत का बिगुल फूंक दिया और ऐलान कर दिया की या तो बाबूलाल मरांडी को कुर्सी से हटाओ, या फिर हम सरकार गिरा देंगे।

अब यहीं पर बाबूलाल के स्वभाव की वो कमी सामने आई जो अक्सर अच्छे नेताओं को ले डूबती है- उनका भयंकर अड़ियलपन!

राजनीति में सबको साध कर चलना पड़ता है, रूठों को मनाना पड़ता है, कभी-कभी दो कदम पीछे भी हटना पड़ता है। लेकिन मरांडी अड़ गए।

उन्होंने अपनी कॉलर टाइट करते हुए साफ कह दिया, “मैं किसी भी ब्लैकमेलर मंत्री के आगे नहीं झुकूंगा!”

उनका ये ईगो और ज़िद बीजेपी आलाकमान के लिए सिरदर्द बन गया। दिल्ली में बैठे बीजेपी के बड़े नेताओं को भी समझ आ गया की ये आदमी ना तो खुद बचेगा और ना पार्टी को राज्य में बचने देगा।

जब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा, तो आखिरकार मार्च 2003 में बीजेपी आलाकमान ने ही उनके हाथ से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली। उनसे जबरन इस्तीफा मांग लिया गया और उनकी जगह अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया गया।

यह मरांडी के लिए ऐसा राजनीतिक घाव था जो कभी भरा नहीं। इसी घाव ने उनके अंदर बीजेपी नेतृत्व के प्रति एक ऐसी कड़वाहट भर दी, जिसका नतीजा पार्टी को आगे चलकर बहुत बुरी तरह भुगतना पड़ा।

नक्सलियों की आंखों की किरकिरी और चिलखारी नरसंहार में सगे बेटे को खोने वाले एक पिता का खौफनाक दर्द

चलिए सियासत की इस लड़ाई से थोड़ा बाहर आते हैं और बाबूलाल मरांडी की ज़िन्दगी के उस पन्ने को पलटते हैं, जिसे पढ़ते हुए शायद सबसे पत्थर दिल इंसान का भी कलेजा कांप उठे।

सीएम की कुर्सी रहे या ना रहे, बाबूलाल मरांडी ने एक मामले में कभी कोई समझौता नहीं किया, और वो था- नक्सलियों (Maoists) का खात्मा।

जिस दौर में नेता नक्सलियों के नाम से ही कांपते थे और उन्हें ‘चंदा’ देकर अपनी जान बचाते थे, उस दौर में मरांडी ने नक्सलियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ दी थी।

मुख्यमंत्री रहते हुए और उसके बाद भी, उन्होंने पुलिस को एकदम ‘फ्री हैंड’ दे रखा था। उनका सीधा फंडा था की जहां बंदूक धारी नक्सली दिखें, वहां ठोक दो, कोई रहम नहीं!

उनके इसी फौलादी और कड़क रवैये ने नक्सलियों की रातों की नींद हराम कर दी थी। नतीजतन, वो माओवादियों की हिट लिस्ट में नंबर वन टारगेट बन गए।

लेकिन नक्सलियों ने मरांडी से अपनी दुश्मनी का जो बदला लिया, वो बहुत खौफनाक था। तारीख थी 26 अक्टूबर 2007। गिरिडीह जिले का चिलखारी गांव।

रात का वक्त था और गांव में एक फुटबॉल मैच के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था। वहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की भारी भीड़ थी।

तभी अचानक रात के अंधेरे को चीरते हुए माओवादियों का एक भारी हथियारबंद दस्ता वहां पहुंचा। उन्होंने बिना कोई चेतावनी दिए उस निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियों की बारिश शुरू कर दी।

मौत का ऐसा भयंकर तांडव मचा की वहां भगदड़ मच गई और देखते ही देखते 20 बेगुनाह लोगों की लाशें ज़मीन पर बिछ गईं। खून से लथपथ उन 20 लाशों में से एक लाश थी- अनूप मरांडी की। जी हाँ, बाबूलाल मरांडी के अपने सगे बेटे की!

एक बाप के लिए दुनिया में इससे बड़ा दर्द क्या हो सकता है की उसे अपने ही जवान बेटे के जनाज़े को कंधा देना पड़े? सियासत और देश सेवा की इससे बड़ी और खौफनाक कीमत शायद ही किसी राजनेता ने चुकाई होगी।

इस चिलखारी नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। लोगों को लगा की अब तो बाबूलाल टूट जाएंगे, राजनीति छोड़ देंगे या नक्सलियों के खौफ से समझौता कर लेंगे।

लेकिन यहीं पर मरांडी का वो फौलादी चरित्र सामने आया जिसने सबको हैरान कर दिया। अपने कलेजे के टुकड़े को खोने के बाद भी इस आदमी के अंदर का हौसला नहीं टूटा।

उन्होंने नक्सलियों के आगे घुटने टेकने से साफ इंकार कर दिया। आंसुओं को पीकर वो इंसान फिर खड़ा हुआ और आज तक नक्सलियों के खिलाफ उनकी आवाज़ उसी तरह बुलंद है।

14 साल का सियासी वनवास और वो जेवीएम पार्टी का प्रयोग जो फुस्स बम साबित हुआ

बेटे की शहादत और मुख्यमंत्री की कुर्सी छिनने के बाद बाबूलाल मरांडी अंदर से बहुत आहत थे। उन्हें लगने लगा था की जिस पार्टी (बीजेपी) को उन्होंने झारखंड में खून-पसीने से सींचा, उसी ने उनके साथ दगा किया है।

इसी कड़वाहट और ईगो की टक्कर में 2006 में उन्होंने बीजेपी से बगावत कर दी।

बीजेपी छोड़कर उन्होंने अपनी खुद की एक नई पार्टी खड़ी कर दी- ‘झारखंड विकास मोर्चा’ यानी जेवीएम (JVM)।

अगले 14 सालों तक उन्होंने ऐसा कोई दिन नहीं छोड़ा जब उन्होंने बीजेपी को पानी पी-पीकर गालियां न दी हों।

अपनी नई पार्टी को खड़ा करने के लिए उन्होंने कभी कांग्रेस से भी हाथ मिलाया, तो कभी क्षेत्रीय दलों के साथ मंच साझा किया।

लेकिन उनकी पार्टी का प्रयोग धीरे-धीरे एक फुस्स बम साबित होने लगा। सबसे बड़ी फजीहत तो 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई।

मरांडी ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर जेवीएम (JVM) के 8 विधायक जितवाए। लेकिन हुआ क्या? कुछ ही महीनों के अंदर बीजेपी ने उनके 8 में से 6 विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लिया!

राजनीति में कोई परमानेंट दुश्मन नहीं होता साहब और फिर हुई उसी बीजेपी में बाबूलाल की घर वापसी

समय का पहिया कैसे घूमता है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल मरांडी जी का सियासी सफर है। 2019 के विधानसभा चुनाव आते-आते मरांडी को हकीकत का आइना दिख गया था।

उनकी पार्टी जेवीएम (JVM) महज़ 3 सीटों पर सिमट कर रह गई। उनका सियासी वजूद खतरे में था और उन्हें समझ आ गया था की अकेले दम पर अब वो झारखंड की सियासत में सर्वाइव नहीं कर सकते।

जिस बीजेपी को बाबूलाल 14 साल तक कोसते रहे… उसी पार्टी के दरवाज़े पर उन्हें 2020 में वापस जाना पड़ा। फरवरी 2020 में रांची के जगन्नाथपुर मैदान में अमित शाह की मौजूदगी में एक बहुत बड़ा ड्रामा हुआ।

बाबूलाल मरांडी ने अपनी पूरी पार्टी (जेवीएम) का विलय उसी बीजेपी में कर दिया!

उन्होंने इस यू-टर्न को बड़ा ही मीठा सा नाम दिया- ‘घर वापसी’। आज आलम ये है की वो उसी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बनकर बैठे हैं।

झारखंड की सियासत आज भी बाबूलाल मरांडी के इर्द-गिर्द ही घूमती है। उनकी खूबियां और उनकी कमियां, दोनों ही इतनी बड़ी हैं की वो इस राज्य के इतिहास का एक बड़ा पन्ना बन चुके हैं!

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