जब भी आज़ादी की लड़ाई का ज़िक्र आता है, तो कुछ गिने-चुने चेहरों की तस्वीरें ही हमारी आँखों के सामने तैरती हैं।
लेकिन इस आज़ादी की नींव में कई ऐसे पत्थर भी दबे हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन, अपनी पूरी जवानी और अपना सब कुछ देश के लिए चुपचाप लुटा दिया।
आज 4 नवंबर 2026 है, और आज भारत माँ के एक ऐसे ही सच्चे सपूत, एक प्रखर सनातनी क्रांतिवीर की 150वीं जयंती है। हम बात कर रहे हैं अमर बलिदानी ‘भाई परमानंद’ जी की।
पूरे 150 साल पहले, 4 नवंबर 1876 को झेलम ज़िले (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक छोटे से गांव करियाला में इस महान आत्मा ने जन्म लिया था।
ये वो दौर था जब पूरा देश अंग्रेज़ों की ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और हर तरफ हताशा का माहौल था।
ऐसे समय में एक नौजवान उठता है, महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों से जुड़ता है, सात समंदर पार जाकर ‘गदर’ का नायक बन जाता है और जब उसे सेलुलर जेल की कालकोठरी में धकेला जाता है, तब भी उसकी सनातनी रीढ़ नहीं झुकती।
उनकी ये जीवन यात्रा कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि त्याग और अखंड भारत के सपने एक जीती-जागती मिसाल है।

रगों में दौड़ता था बलिदानियों का खून और आर्य समाज से मिली थी राष्ट्रभक्ति की प्रचंड ज्वाला
ज़रा सोचिए, कोई इंसान इतनी भयंकर यातनाएं सहकर भी अपने रास्ते से क्यों नहीं डिगता? इसका जवाब भाई परमानंद जी की रगों में दौड़ने वाले खून में छिपा था।
उनके खून में ही शहादत और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा थी। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आपको पता चलेगा की भाई परमानंद जी महान सिख शूरवीर और अमर बलिदानी ‘भाई मतिदास’ जी के सीधे वंशज थे।
जी हाँ, वही भाई मतिदास जी, जिन्हें मुग़ल आक्रांता औरंगज़ेब ने इस्लाम न कबूलने पर चांदनी चौक में बीच चौराहे पर आरे से चीरवा दिया था!
बचपन से ही उनके अंदर देश के लिए कुछ कर गुज़रने की आग धधक रही थी। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से अपनी M.A. की पढ़ाई पूरी की।
उन दिनों पंजाब में ‘आर्य समाज’ का बड़ा ज़ोर था। भाई परमानंद जी महात्मा हंसराज और पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के संपर्क में आए और उनके विचारों से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने खुद को पूरी तरह से आर्य समाज के वैदिक और सनातनी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।
उन्होंने डी.ए.वी. (D.A.V.) कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया, लेकिन वो भी बिना किसी वेतन के! यही वो दौर था जब उनके अंदर की राष्ट्रभक्ति ने एक प्रचंड ज्वाला का रूप ले लिया था।

सात समंदर पार अमेरिका की धरती पर रची सशस्त्र क्रांति की रूपरेखा और गदर पार्टी का हुआ शंखनाद
भाई परमानंद जी की सोच बहुत दूरदर्शी थी। उन्हें बहुत जल्दी ये एहसास हो गया था की सिर्फ देश के अंदर रहकर या अंग्रेज़ों के सामने हाथ जोड़कर आज़ादी की भीख मांगने से कुछ नहीं होने वाला।
अंग्रेज़ लातों के भूत हैं और वो बातों से नहीं मानेंगे। सनातन धर्म का परचम लहराने और आज़ादी की अलख जगाने के लिए उन्होंने 1905 में दक्षिण अफ्रीका का रुख़ किया।
वहां उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से भी हुई। इसके बाद वो रुके नहीं.. उन्होंने लंदन, ब्रिटिश गुयाना और दक्षिण अमेरिका के कई देशों की यात्राएं कीं और वहां बसे भारतीयों के अंदर वैदिक धर्म और देशभक्ति का ज़बरदस्त प्रचार किया।
लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब वे अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को (San Francisco) पहुंचे।
वहां जाकर उन्होंने देखा की विदेशों में बैठे भारतीयों के अंदर भी देश की आज़ादी को लेकर एक बड़ी तड़प है। बस, यहीं से उन्होंने सशस्त्र क्रांति (Armed Rebellion) का वो मास्टरप्लान तैयार किया जिसने अंग्रेज़ों की जड़ें हिला कर रख दीं।
साल 1913 का वो ऐतिहासिक समय था, जब भाई परमानंद जी ने लाला हरदयाल और सोहन सिंह भकना जैसे शूरवीरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मशहूर ‘गदर पार्टी’ की स्थापना की।
इसका एक ही मक़सद था- अंग्रेज़ों के खिलाफ हथियारों के बल पर एक भयंकर बगावत खड़ी करना।
सैन फ्रांसिस्को में एक जगह चुनी गई जिसे ‘युगांतर आश्रम’ नाम दिया गया। यहीं से गदर पार्टी का पूरा काम चलने लगा।
भाई परमानंद जी वहां से ‘गदर’ नाम का अखबार निकालते थे, साहित्य लिखते थे और उसे दुनिया भर में फैले भारतीयों तक पहुंचाते थे।
उनका प्लान एकदम साफ था की विदेशों में बैठे भारतीयों और देश के अंदर मौजूद सैनिकों को एक साथ मिलाकर अंग्रेज़ों पर ऐसा धावा बोला जाए की उन्हें बोरिया-बिस्तर समेट कर भागना पड़े।
उन्होंने विदेशों से हथियार और पैसा भारत भेजना शुरू कर दिया। ये वो दौर था जब भाई परमानंद जी का नाम सुनकर ही ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों के पसीने छूटने लगे थे।

लाहौर षड्यंत्र केस में मिली फांसी की सजा और फिर शुरू हुआ अंडमान की सेलुलर जेल का वो खौफनाक सफर
जब गदर पार्टी की इस बगावत और मास्टर प्लान की भनक ब्रिटिश हुकूमत को लगी, तो उनको समझ आ गया था की अगर इस सशस्त्र क्रांति को तुरंत नहीं कुचला गया, तो 1857 से भी बड़ा गदर मच जाएगा।
1915 में जैसे ही भाई परमानंद जी भारत लौटे, अंग्रेज़ों ने उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया। इतिहास में इस घटना को ‘प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस’ (First Lahore Conspiracy Case) के नाम से जाना जाता है।
अंग्रेज़ों के दिलों में भाई परमानंद जी का इतना खौफ बैठ चुका था की उन्होंने बिना कोई रहम दिखाए सीधे उन्हें फांसी (Death Sentence) की सज़ा सुना दी।
पूरा देश इस खबर से सन्न रह गया। लेकिन इस वीर सनातनी के चेहरे पर मौत का कोई खौफ नहीं था। बाद में, जनता के भारी दबाव और कुछ अपीलों के बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग (Lord Hardinge) ने उनकी फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया।
लेकिन ये उम्रकैद मौत से भी बदतर थी! अंग्रेज़ों ने उन्हें अंडमान-निकोबार की उस खौफनाक ‘सेलुलर जेल’ में भेज दिया, जिसे दुनिया ‘काला पानी’ के नाम से जानती थी। वहां से लौटकर आना लगभग नामुमकिन माना जाता था।
कोल्हू में बैल की तरह जुतकर भी नहीं टूटा हिंदू शेर का गुरूर और जेल की सलाखों के पीछे रची गई मेरी आपबीती
सेलुलर जेल में परमानंद जी को महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर जी के साथ रखा गया।
यहाँ कैदियों के साथ जानवरों से भी बदतर सुलूक होता था। उनसे दिन-रात सरसों और नारियल का तेल निकलवाया जाता था।
पीठ पर कोड़े पड़ते थे, हाथ-पैरों में भारी बेड़ियां होती थीं, और खाने के नाम पर सड़ा हुआ दलिया मिलता था।
लेकिन इतने भयंकर टॉर्चर के बाद भी अंग्रेज़ इस हिंदू शेर का गुरूर नहीं तोड़ पाए। उनके मुंह से कभी उफ़ तक नहीं निकली और ना ही उन्होंने कभी अंग्रेज़ों के सामने घुटने टेके।
और सबसे कमाल की बात तो ये है की इतनी शारीरिक यातनाओं के बावजूद उन्होंने अपनी बौद्धिक क्रांति को रुकने नहीं दिया।
अपनी याददाश्त और अदम्य साहस के बल पर, जेल की उन्हीं सलाखों के पीछे उन्होंने अपनी अमर आत्मकथा “The Story of My Deportation” (मेरी आपबीती) लिख डाली।
आज भी अगर कोई देशभक्त उनकी ये किताब पढ़ ले, तो काला पानी के उस खौफनाक सच को जानकर उसकी आँखें भर आएंगी।
काला पानी से लौटकर हिंदू एकता का उठाया बीड़ा और अखंड भारत की रक्षा के लिए बन गए सनातन का सबसे प्रखर स्वर
सेलुलर जेल में पांच साल की भयंकर यातनाएं सहने के बाद, सी.एफ. एंड्रयूज (C.F. Andrews) जैसे कई लोगों के दखल और भारी दबाव के चलते आख़िरकार 1920 में भाई परमानंद जी को रिहा कर दिया गया।
बाहर आते ही उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में मोर्चा संभाला और ‘कौमी विद्यापीठ’ के चांसलर बन गए।
लेकिन इसी दौरान देश में एक अलग ही राजनीतिक माहौल बन रहा था। 1920 के दशक में देश के कई बड़े नेता ‘खिलाफत आंदोलन’ का समर्थन कर रहे थे।
ये आंदोलन भारत की आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि तुर्की के खलीफा की सत्ता बचाने के लिए मुसलमानों का एक आंदोलन था।
भाई परमानंद जी की दूरदृष्टि बहुत गज़ब की थी। उन्होंने तुरंत इसका तार्किक विरोध किया। उनका साफ मानना था की विदेशी और मज़हबी मुद्दों के लिए इस तरह की तुष्टिकरण की नीति देश के भविष्य के लिए बहुत खतरनाक साबित होगी।
उन्होंने भांप लिया था की धर्म के आधार पर किया जा रहा ये तुष्टिकरण एक दिन देश के भीतर अलगाववाद का बहुत बड़ा बीज बो देगा।
हिंदू हितों की रक्षा और सनातनी एकता के लिए उन्होंने ‘हिन्दू महासभा’ का दामन थामा और देखते ही देखते वो इसके एक बहुत बड़े कद्दावर नेता बन गए।
साल 1933 में जब हिन्दू महासभा का ऐतिहासिक ‘अजमेर अधिवेशन’ हुआ, तो उन्हें सर्वसम्मति से इसका अध्यक्ष चुना गया।
उन्होंने उस दौर में ही देश को चेतावनी दे दी थी की अगर हमने अभी अखंड भारत की रक्षा के लिए कड़े कदम नहीं उठाए, तो ये देश बंट जाएगा।
देश की आज़ादी और विभाजन के दर्द के बीच एक महान सनातनी योद्धा की अंतिम सांस और उनकी अमर विरासत
वक़्त बीतता गया और आख़िरकार 1947 में वो दिन आ ही गया जिसका भाई परमानंद जी ने सालों तक इंतज़ार किया था- भारत को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ादी मिल गई।
लेकिन ये आज़ादी अपने साथ बंटवारे (Partition) का एक ऐसा नासूर लेकर आई, जिसने इस बूढ़े शेर का दिल भीतर तक तोड़ कर रख दिया।
जिस अखंड भारत के लिए उसने अपनी पूरी जवानी गदर पार्टी और काला पानी की कालकोठरियों में गला दी, आज़ादी के वक्त उसी भारत माता को दो टुकड़ों में बंटता हुआ उसे अपनी आँखों से देखना पड़ा।
उनका अपना गृह राज्य पंजाब, जहाँ उन्होंने जन्म लिया था, रातों-रात पराया हो गया और खून की नदियों में डूब गया।
इस विभाजन के दर्द और सदमे को वो बर्दाश्त नहीं कर पाए। आज़ादी मिलने के कुछ ही महीनों बाद, 8 दिसंबर 1947 को इस महान सनातनी योद्धा ने हमेशा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं।
