इस लेख में क्या है
यह लेख बीजेपी की मौजूदा आरक्षण रणनीति का विस्तार से विश्लेषण करता है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे पार्टी नए वोटबैंक साधने के चक्कर में अपने सबसे पुराने और वफादार कोर वोटर (सवर्ण) को हाशिए पर धकेल रही है, सुप्रीम कोर्ट की 50% सीमा को कैसे तोड़ा जा रहा है, और यूपी, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में मेरिट पर क्या असर पड़ रहा है।
लेख में आधिकारिक आंकड़े, भर्ती परिणाम, राजनीतिक दांव और 2024 के चुनावी संकेत शामिल हैं। अंत में यह चेतावनी दी गई है कि यह रणनीति पार्टी के लिए भस्मासुर साबित हो सकती है।
विषय-सूची (क्लिक करके सीधे पहुँचें)
- 1 · कोर वोटर — सबका साथ के मायाजाल में सवर्ण वोटर कैसे बेगाना हुआ
- 2 · 50% सीमा — सुप्रीम कोर्ट की लक्ष्मण रेखा को लांघने की होड़ और संविधान की चुप्पी
- 3 · यूपी भर्ती — डबल बेनिफिट का गणित और अनारक्षित सीटों पर नो एंट्री
- 4 · मध्य प्रदेश — 83 में से 77 सीटें आरक्षित — मेरिट के खात्मे का आधिकारिक दस्तावेज
- 5 · महाराष्ट्र — सत्ता बचाने की अंधी दौड़ में 72% आरक्षण
- 6 · मेरिट और आक्रोश — सोशल इंजीनियरिंग के नशे में मौन आक्रोश और ब्रेन ड्रेन
- 7 · 2024 और NOTA — लोकसभा चुनाव में घर बैठकर और NOTA दबाकर दी गई चेतावनी
- 8 · निष्कर्ष — नए वोटबैंक के लालच में घर की नींव खोदने वाला सेल्फ-गोल
राजनीति भी एक बहुत ही निर्मम खेल है। जब कोई पार्टी लगातार जीतती है, तो उसके रणनीतिकारों को लगने लगता है की उन्होंने सत्ता का कोई ऐसा ‘चीट कोड’ हैक कर लिया है जो कभी फेल नहीं हो सकता।
इस अति-आत्मविश्वास में अक्सर वो एक ऐसी राजनीतिक भूल कर बैठते हैं, जो किसी भी सत्ताधारी पार्टी के लिए एक भस्मासुर साबित हो जाती है।
वो भूल है- अपने ही उस ‘कोर वोटर’ (Core Voter) को टेकन फॉर ग्रांटेड (Taken for granted) लेना, जिसने बुरे से बुरे वक्त में हमेशा पार्टी का साथ दिया हो।
आजकल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अंदर बिल्कुल यही ‘सेल्फ-गोल’ वाला खेल चल रहा है।
‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा सुनने में तो बहुत शानदार लगता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत पर नज़र डालें तो समझ आता है की यह ‘सबका साथ’ अब एकतरफा हो चुका है।
पार्टी एक ऐसा ‘पैन-वोटबैंक’ छाता बनाने की ज़िद में है, जिसमें नए SC/ST वोटबैंक को जोड़ने के लिए अपने ही घर की नींव खोदी जा रही है।
हम बात कर रहे हैं उन सरकारी फैसलों और नीतियों की, जो सीधे तौर पर मेरिट (Merit) और जनरल कैटेगरी (सवर्ण) के युवाओं के गले का फंदा बन रही हैं।
बीजेपी शासित राज्यों में आरक्षण के नाम पर एक ऐसा खतरनाक खेल चल रहा है जिसने सवर्णों को हाशिए पर धकेल दिया है।
राजनीति के इन ‘चाणक्यों’ को लगता है की “सवर्ण वोटर जाएगा कहाँ? उसके पास तो हमारे अलावा कोई विकल्प ही नहीं है।”
लेकिन राजनीति का इतिहास गवाह है की जब भी किसी सत्ता ने अपने सबसे वफादार वोटर को ‘बंधुआ मज़दूर’ समझने की भूल की है, तो उस सत्ता का गुरूर टूटने में ज़्यादा वक्त नहीं लगा।
चलिए इस ‘पॉलिटिकल ब्लंडर’ की पूरी पोलखोल करते हैं।

| मुख्य मुद्दा (बीजेपी का सेल्फ-गोल) | ज़मीनी हकीकत क्या है? |
|---|---|
| सुप्रीम कोर्ट की लिमिट पार | बीजेपी शासित राज्यों में 50% की संवैधानिक आरक्षण लिमिट को खुलेआम तोड़ा जा रहा है। |
| ‘डबल बेनिफिट’ का खेल | आरक्षित वर्ग को उम्र/फीस में छूट देकर भी ‘ओपन सीटों’ पर माइग्रेट कराया जा रहा है। |
| मेरिट की सरेआम हत्या | एमपी जैसे राज्यों में 90%+ सीटें रिज़र्व करके सवर्ण युवाओं को हाशिए पर धकेला गया। |
| कोर वोटर का ‘मौन विद्रोह’ | 2024 में सवर्ण वोटर ने घर बैठकर और NOTA दबाकर बड़ा डैमेज कर दिया। |
1. ‘सबका साथ’ के मायाजाल में वो सवर्ण वोटर कैसे बेगाना हो गया जिसने बुरे वक्त में पार्टी को अर्श तक पहुंचाया था
ज़रा पीछे मुड़कर देखिए। जब 1984 में पार्टी के पास लोकसभा में महज़ 2 सीटें हुआ करती थीं, तब इनके साथ कौन खड़ा था?
राम जन्मभूमि आंदोलन की तपिश हो या 90 के दशक का वो दौर जब बीजेपी को ‘अछूत’ माना जाता था, तब ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और अन्य सवर्ण जातियों ने ही इस पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचा।
ये वो वर्ग है जो पार्टी के लिए सिर्फ बटन नहीं दबाता, बल्कि ज़मीन पर माहौल बनाता है, नैरेटिव सेट करता है और बिना किसी लालच के दशकों तक दरी बिछाने का काम करता आया है।
आंकड़े गवाह हैं की 2014 हो, 2019 हो या राज्यों के चुनाव, सवर्णों का लगभग 70 से 80 प्रतिशत वोट एकमुश्त बीजेपी की झोली में गिरता रहा है। इसे कहते हैं अंधभक्ति और 100 टका वफादारी!
लेकिन इस वफादारी का इनाम क्या मिल रहा है?
जैसे ही पार्टी सत्ता के शिखर पर पहुंची, सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) का ऐसा नशा चढ़ा की पार्टी को लगने लगा की सवर्ण तो हमारे पक्के हैं ही, अब बस किसी तरह आरक्षित दलित वर्ग के वोटबैंक को अपनी तरफ खींच लो।
नए दोस्त बनाने की इस अंधी दौड़ में पार्टी ये भूल गई की जिस थाली में वो खा रही है, उसी में छेद भी कर रही है।
आज स्थिति ये हो गई है की पार्टी के हर बड़े फैसले, हर नई योजना और हर नई भर्ती में फोकस सिर्फ आरक्षित वर्गों पर होता है।
सवर्ण वोटर खुद को उस घर के बड़े बेटे की तरह महसूस कर रहा है, जो सारी ज़िम्मेदारियां तो उठाता है, लेकिन जब कुछ देने की बारी आती है, तो उसे ये कहकर दरकिनार कर दिया जाता है की “तुम तो समझदार हो, एडजस्ट कर लो!”
एडजस्टमेंट की भी एक सीमा होती है यार! आज जनरल कैटेगरी का एक आम युवा जब नौकरी या शिक्षा के लिए फॉर्म भरता है, तो उसे साफ दिखता है की उसके लिए दरवाज़े बंद किए जा रहे हैं।
‘सबका साथ’ के इस मायाजाल में आरक्षित वर्ग के पास तो सारी दावत आ जाती है और सवर्णों के हिस्से सिर्फ हताशा, बेरोज़गारी और सिस्टम की बेरुखी आ रही है।
एक तरफ आप मंच से ‘मेरिट’ और ‘नया भारत’ बनाने की बात करते हैं, और दूसरी तरफ आप अपने ही कोर वोटर की डिग्रियों को कागज़ के रद्दी टुकड़ों में बदल रहे हैं।
जब सत्ता अपने ही लोगों की पीठ पर वार करने लगे, तो समझ लीजिए कि चाणक्य-नीति में कहीं बहुत बड़ा झोल आ चुका है।
पढ़ें और सोचें | पुराने साथ की कीमत
लेख में बताए गए पुराने समर्थकों की भूमिका और नए वोटबैंक की तलाश के बीच राजनीतिक संतुलन किस तरह साधा जा सकता है?
2. सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण वाली लक्ष्मण रेखा को लांघने की मची है होड़
और संविधान की दुहाई देने वालों की रहस्यमयी चुप्पी

अब ज़रा इस दोहरे चेहरे को समझिए, जो सीधे तौर पर संवैधानिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा रहा है।
आपको 1992 का ऐतिहासिक ‘इंदिरा साहनी केस’ (Indra Sawhney Judgement) तो याद ही होगा।
उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने बिल्कुल डंके की चोट पर एक लक्ष्मण रेखा खींच दी थी की किसी भी सूरत में, कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, आरक्षण 50 प्रतिशत (50%) की सीमा को पार नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने ये कैप (Cap) इसलिए लगाया था ताकि देश में टैलेंट और मेरिट की हत्या न हो। मतलब कम से कम आधी सीटें तो ओपन (अनारक्षित) रहनी ही चाहिए जहाँ सिर्फ काबिलियत (Merit) के आधार पर चुनाव हो, चाहे वो किसी भी जाति या वर्ग का हो।
अब मज़ाक देखिए! जब विपक्ष का कोई नेता रैलियों में कहता है की “हम सत्ता में आए तो 50% का बैरियर तोड़ देंगे,” तो दिल्ली में बैठे बीजेपी के बड़े-बड़े नेता तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेते हैं।
वे कैमरे के सामने संविधान, मेरिट और बाबा साहब अंबेडकर की दुहाई देने लगते हैं। वे बताते हैं की कैसे विपक्ष देश को बांटने पर तुला है।
लेकिन पर्दे के पीछे इनके खुद के राज्यों (BJP-ruled states) में क्या खेल चल रहा है? भाई साहब, बीजेपी के मुख्यमंत्री खुद ही इस 50 प्रतिशत वाली लक्ष्मण रेखा को बूटों से रौंद रहे हैं!
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश… हर जगह आरक्षण की लिमिट को खींच-खींच कर इतना लंबा कर दिया गया है की सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस एक भद्दा मज़ाक बनकर रह गई हैं।
एक तरफ आप नेशनल टीवी पर मेरिट के रक्षक बनते हैं, और दूसरी तरफ अपनी ही राज्य सरकारों के ज़रि ए 70-75% तक आरक्षण थोप देते हैं।
ये रहस्यमयी चुप्पी बहुत चुभती है। जब आपके खुद के मुख्यमंत्री वोटबैंक के लालच में खुलेआम संविधान की इस मूल भावना की धज्जियां उड़ा रहे हों, तब आपके ‘थिंक टैंक’ और आलाकमान की ज़बान पर ताला क्यों लग जाता है?
सवर्ण युवा अंधा नहीं है। वो देख रहा है की ये जो ‘डबल स्टैंडर्ड’ (दोगलापन) चल रहा है, ये महज़ अगले 5 साल की सत्ता बचाने का एक सस्ता जुगाड़ है।
आप सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताकर सिर्फ एक वर्ग को खुश करना चाहते हैं, और इसके लिए आपने जनरल कैटेगरी के युवाओं को राजनीतिक बलि का बकरा बना दिया है।
| राज्य | कुल आरक्षण का आंकड़ा | मुख्य कारण / सियासी दांव |
|---|---|---|
| मध्य प्रदेश | 73% | ओबीसी (OBC) को 14% से बढ़ाकर 27% करना। |
| महाराष्ट्र | 72% | चुनाव से ठीक पहले मराठा समुदाय को 10% अलग से SEBC कोटा। |
| उत्तर प्रदेश | ‘माइग्रेशन’ का जाल | कोटा फिक्स है, लेकिन आरक्षित छात्रों को जनरल (UR) सीटों पर भी कब्ज़ा देना। |
पढ़ें और सोचें | संविधान और जवाबदेही
50% की सीमा और असाधारण परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए लेख संवैधानिक मर्यादा और राजनीतिक जवाबदेही के बीच कौन-सा सवाल उठाता है?
3. यूपी की भर्तियों में डबल बेनिफिट का वो गणित जिसने अनारक्षित सीटों पर भी सवर्णों के लिए लगा दिया है नो एंट्री का बोर्ड

चलिए ज़रा ज़मीनी हकीकत का पर्दा उठाते हैं और भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की बात करते हैं।
राजनीति में कहा जाता है की दिल्ली की गद्दी का रास्ता यूपी से होकर गुज़रता है, और इसी यूपी में बीजेपी की सरकार अपने ही सवर्ण युवाओं के साथ एक ऐसा ‘सिस्टेमैटिक’ (प्रणालीगत) खेल खेल रही है, जिसे अगर कोई आम आदमी समझ ले, तो उसका खून खौल जाए।
इस खेल का नाम है- ‘डबल बेनिफिट’ (Double Benefit) या माइग्रेशन रूल।
ज़रा इस नियम के पीछे की चालाकी को समझिए। नियम कायदे से ये होना चाहिए की अगर आपने आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के कोटे से फॉर्म भरा है और आपने उम्र (Age limit), प्रयासों की संख्या (Number of attempts) या फीस में कोई भी छूट (Relaxation) ले ली है, तो आपको अपनी ही कैटेगरी की मेरिट लिस्ट में गिना जाएगा।
यानी अगर आपने रेस शुरू होने से पहले ही ‘हेड स्टार्ट’ (Head start) या कोई रियायत ले ली, तो आप जनरल रेस का हिस्सा नहीं हो सकते। यह एक सामान्य और तार्किक न्याय है।
लेकिन यूपी की भर्तियों में क्या हो रहा है? यहाँ नियम को कुछ इस तरह मोड़ दिया गया है की अगर आरक्षित वर्ग का कोई छात्र उम्र या किसी और चीज़ में छूट का फायदा उठा भी लेता है, और बाद में परीक्षा में अच्छे नंबर ले आता है, तो उसे उठाकर ‘अनारक्षित’ (UR – Unreserved) सीटों पर डाल दिया जाता है।
मतलब, पहले आपने अपनी कैटेगरी का फायदा उठाया (डबल बेनिफिट लिया) और फिर आकर ओपन सीटों पर भी कब्ज़ा जमा लिया!
अब इसका ज़मीनी नतीजा क्या निकल रहा है? इसे समझने के लिए किसी रॉकेट साइंस की ज़रूरत नहीं है, बस हाल ही के सरकारी नतीजे देख लीजिए।
यूपी में असिस्टेंट टीचर (Assistant Teacher) भर्ती का एक रिज़ल्ट आया, जिसने पूरे सवर्ण समाज की नींदें उड़ा दीं।
वहाँ अनारक्षित (UR) कैटेगरी में कुल 114 सीटें थीं। कायदे से देखा जाए तो ‘जनरल कैटेगरी’ के पास लड़ने के लिए पूरे सिस्टम में सिर्फ यही 114 ओपन सीटें बचती हैं, क्योंकि बाकी तो पहले से ही रिज़र्व हैं।
लेकिन जब रिज़ल्ट आया, तो इन 114 ओपन सीटों में से जनरल कैटेगरी के हिस्से में कितनी सीटें आईं? महज़ 29 सीटें!
बाकी सीटों का क्या हुआ? बाकी सीटों पर माइग्रेशन के तहत ओबीसी (59 सीटें), एससी (15 सीटें) और ईडब्ल्यूएस (11 सीटें) वाले आ गए।
ज़रा सोचिए इस गणित को! ओपन सीटों का सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्सा जनरल को मिला। यानी जो सवर्ण युवा रात-दिन एक करके पढ़ाई कर रहा है, उसके लिए अब अनारक्षित (UR) सीटों पर भी ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा दिया गया है।
यही खेल अब यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती (2024-25) में भी खेला जा रहा है। लाखों युवा इस भर्ती का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन जब उन्हें इस ‘डबल बेनिफिट’ वाले रूल का पता चला, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
आज यूपी का युवा सड़कों पर है, इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है। वह सरकार से सिर्फ इतना पूछ रहा है की “साहब, जब आपने हमारे लिए कोई कोटा नहीं रखा, तो जो बची-खुची ओपन सीटें हैं, उन पर भी हमें दोयम दर्जे का नागरिक क्यों बना दिया गया?”
लेकिन सत्ता के नशे में चूर चाणक्यों के पास इस दर्द का कोई जवाब नहीं है। उन्हें बस अपना नया आरक्षित वाले वोटबैंक साधना है, और इसके लिए सवर्णों के करियर की बलि चढ़ाना उन्हें सबसे आसान और सस्ता सौदा लग रहा है।
पढ़ें और सोचें | नियम बनाम निष्पक्षता
जब किसी उम्मीदवार को उम्र या फीस में छूट मिली हो, तब ओपन सीट पर उसके चयन की निष्पक्षता किन नियमों और सिद्धांतों के आधार पर परखी जानी चाहिए?
4. मध्य प्रदेश में मेरिट के खात्मे का आधिकारिक दस्तावेज
जहां 83 में से 77 सीटें आरक्षित करके जनरल कैटेगरी को सीधा ठेंगा दिखा दिया गया

अगर आपको लग रहा है की यूपी का हाल बुरा है, तो ज़रा मध्य प्रदेश का आधिकारिक डेटा देख लीजिए, आपकी आंखें फटी की फटी रह जाएंगी।
मध्य प्रदेश तो दशकों से बीजेपी की सबसे पक्की प्रयोगशाला (Laboratory) रहा है। यहाँ तो सवर्णों ने कभी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। लेकिन इसी राज्य में सत्ता ने मेरिट (Merit) की जो सरेआम हत्या की है, वो किसी भी सभ्य समाज के लिए बहुत निराशाजनक है।
हाल ही में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) ने असिस्टेंट प्रोफेसर (समाजशास्त्र) की भर्ती के लिए एक आधिकारिक नोटिफिकेशन निकाला।
जब युवाओं ने उस नोटिफिकेशन में सीटों का बंटवारा देखा, तो उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। पूरे सूबे में इस पद के लिए कुल 83 सीटें निकली थीं।
अब आप सोचेंगे की इसमें से कम से कम 40-42 सीटें तो जनरल (ओपन) के लिए होंगी। लेकिन सरकार के रोस्टर (Roster) और ‘बैकलॉग’ (Backlog) के ऐसे मायाजाल बुने गए की 83 में से पूरे 77 पद सीधे आरक्षित (Reserved) कर दिए गए!
जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। 83 में से 77 सीटें रिज़र्व! जनरल (UR) कैटेगरी के लिए पूरे राज्य में सिर्फ 6 सीटें बचीं। अगर प्रतिशत में निकालें, तो यह 92 प्रतिशत से अधिक का आरक्षण हो गया!
अब आप खुद एक एनालिस्ट की तरह सोचिए। जो जनरल कैटेगरी का युवा पिछले 5 साल से एक कमरे में बंद होकर किताबें चाट रहा है, जिसने अपनी जवानी के सबसे कीमती साल इस तैयारी में झोंक दिए, वो जब यह नोटिफिकेशन देखेगा तो क्या करेगा?
क्या वो 6 सीटों के लिए पूरे राज्य से लड़ेगा? अगर कोई सवर्ण युवा 90 प्रतिशत नंबर भी ले आए, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है की उसे वो 6 में से एक सीट मिलेगी।
यह सिस्टम की बेबसी नहीं है, यह सरकार द्वारा जानबूझकर रचा गया एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें सवर्ण युवाओं का करियर घुट-घुट कर दम तोड़ रहा है।
और मध्य प्रदेश का यह खेल यहीं नहीं रुकता। शिवराज सिंह चौहान की सरकार से लेकर अब मोहन यादव की सरकार तक, पार्टी ने ‘आरक्षण के तुष्टिकरण’ की एक ऐसी अंधी दौड़ शुरू कर दी है, जिसका कोई अंत नहीं है।
14 प्रतिशत वाले ओबीसी आरक्षण को रातों-रात बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया गया। और इसके साथ ही मध्य प्रदेश में कुल आरक्षण का आंकड़ा 73 प्रतिशत (73%) की खतरनाक सीमा तक जा पहुँचा!
भले ही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इस 27 प्रतिशत वाले मामले पर बार-बार रोक (Stay) लगाता रहा हो, कोर्ट ने कई बार सरकार को फटकार लगाई हो की आप 50% की संवैधानिक लिमिट को कैसे पार कर सकते हैं, लेकिन सरकार को इससे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता।
सरकार को कोर्ट के झमेलों से कोई लेना-देना नहीं है; उनका मकसद सिर्फ इतना है की चुनाव से पहले जनता में यह मैसेज चला जाए की “देखो भाई, हमने तो तुम्हें 27% आरक्षण दे दिया, वो तो कोर्ट रोक रहा है।”
| कैटेगरी | आवंटित सीटें (कुल 83 पद) | प्रतिशत (लगभग) |
|---|---|---|
| आरक्षित पद (SC/ST/OBC) | 77 सीटें | 92.7% |
| अनारक्षित (General/Open) | 6 सीटें | 7.3% |
इस घटिया राजनीति का सीधा नुकसान किसको हो रहा है? भर्तियां कोर्ट में लटक जाती हैं। रिज़ल्ट सालों-साल नहीं आते।
और सबसे बड़ा धोखा उस सवर्ण वोटर के साथ हो रहा है, जिसे यह मैसेज दिया जा रहा है की “सरकार की प्राथमिकताओं में तुम कहीं एग्ज़िस्ट ही नहीं करते।”
आप सोचिए, जिस राज्य में सरकार 73 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की ज़िद पर अड़ी हो और जहाँ 83 में से 77 सीटें आरक्षित कर दी जाती हों, वहाँ ‘मेरिट’ नाम का शब्द ही एक भद्दी गाली बन जाता है।
बीजेपी के रणनीतिकार यह भूल रहे हैं की जब आप एक वर्ग को बेइंतहा खुश करने के लिए दूसरे वर्ग (जिसने आपको सत्ता सौंपी है) का सरेआम गला घोंटते हैं, तो वह वर्ग चुपचाप खड़ा तमाशा नहीं देखता।
आज मध्य प्रदेश के सवर्ण युवाओं में जो मौन आक्रोश सुलग रहा है, उसे भाँपने में दिल्ली में बैठे ‘थिंक टैंक’ पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहे हैं। यह एक ऐसा सेल्फ-गोल है, जिसकी कीमत पार्टी को बहुत जल्द और बहुत भारी रूप में चुकानी पड़ेगी।
पढ़ें और सोचें | रोस्टर के आंकड़े का असर
83 पदों में 77 आरक्षित पदों के उदाहरण को पढ़ते हुए सोचें—रोस्टर और बैकलॉग की जानकारी को सार्वजनिक व स्पष्ट रखना क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?
5. सत्ता बचाने की अंधी दौड़ में महाराष्ट्र के अंदर 72 प्रतिशत तक जा पहुंचा आरक्षण
और सवर्ण युवाओं का भविष्य कर दिया गया चुनाव की भेंट

यूपी और एमपी का हाल तो आपने देख लिया, लेकिन अगर आपको लगता है की यह सिर्फ उत्तर भारत (North India) के मुख्यमंत्रियों की खुराफात है, तो थोड़ा दक्षिण-पश्चिम की तरफ चलिए।
हम बात कर रहे हैं देश की आर्थिक राजधानी वाले राज्य महाराष्ट्र की। यहाँ जो राजनीतिक सर्कस चल रहा है, उसने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (Social Engineering) के नाम पर एक ऐसा भद्दा मज़ाक खड़ा कर दिया है जो किसी भी पढ़े-लिखे समाज को शर्मसार कर दे।
महाराष्ट्र में बीजेपी, एकनाथ शिंदे और अजित पवार की ‘महायुति’ सरकार सत्ता बचाने की ऐसी अंधी दौड़ में शामिल है, जहाँ उन्हें सुप्रीम कोर्ट, संविधान और मेरिट… किसी की कोई परवाह नहीं है।
बात फरवरी 2024 की है। चुनाव सिर पर थे और मराठा आंदोलन (मनोज जरांगे पाटिल वाला) ने सरकार के पसीने छुड़ा रखे थे। ऐसे में सत्ताधारी गठबंधन के रणनीतिकारों ने वही सबसे पुराना और घिसा-पिटा दांव चला- “वोट के बदले आरक्षण ले लो।”
ज़रा महाराष्ट्र का पूरा गणित समझिए। राज्य में पहले से ही एससी, एसटी और ओबीसी को मिलाकर 52 प्रतिशत आरक्षण चला आ रहा था।
इसके ऊपर से केंद्र सरकार वाला 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण भी लागू था। यानी आंकड़ा 62 प्रतिशत पर पहले ही पहुंच चुका था।
लेकिन चुनाव जीतने की भूख में सरकार ने मराठा समुदाय को अलग से 10 प्रतिशत का ‘SEBC’ (Socially and Educationally Backward Classes) आरक्षण और पकड़ा दिया।
अब ज़रा कैलकुलेटर उठाइए! 52 प्लस 10 प्लस 10… यानी महाराष्ट्र के अंदर कुल आरक्षण का आंकड़ा 72 प्रतिशत (72%) की उस भयानक ऊंचाई पर जा पहुंचा, जहाँ से मेरिट का सिर्फ खात्मा ही हो सकता है।
| Social Category | % | Description of Reservation |
|---|---|---|
| SC | 13% | Group of 59 castes |
| ST | 7% | Group of 47 tribes |
| OBC | 19% | Maratha Kunbi and other 346 castes |
| SBC | 2% | Group of 7 castes |
| VJ-A | 3% | Group of 14 castes |
| OBC Nomad group B | 2.5% | Group of 37 castes |
| OBC Nomad group C | 3.5% | Dhangar community and 14 sub-castes |
| OBC Nomad group D | 2% | Vanjari community and 3 sub-castes |
| EWS | 10% | Brahmin, Marwari, Jain, Muslim, Maratha |
| SEBC | 10% | Only Maratha community |
| Total | 72% |
अब आप खुद सोचिए। जब 100 में से 72 सीटें पहले ही अलग-अलग जातियों और वर्गों के नाम पर फिक्स कर दी जाएंगी, तो ओपन मेरिट (General Category) के लिए क्या बचा? महज़ 28 सीटें!
और उन 28 सीटों पर भी पूरा राज्य लड़ेगा, क्योंकि जैसा यूपी में होता है, वैसे ही आरक्षित वर्ग का कोई भी टॉपर इन 28 ओपन सीटों में भी आसानी से घुस सकता है।
मतलब, जनरल कैटेगरी के सवर्ण युवाओं के पास लड़ने के लिए 10 प्रतिशत सीटें भी शुद्ध रूप से नहीं बचतीं।
दिल्ली से लेकर मुंबई तक बैठे इन पॉलिटिकल चाणक्यों को बहुत अच्छी तरह पता है की 72 प्रतिशत का यह आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर शायद एक मिनट भी न टिक पाए।
वे जानते हैं की इंदिरा साहनी जजमेंट की 50 प्रतिशत वाली लक्ष्मण रेखा पार करने पर कोर्ट इस बिल की धज्जियां उड़ा देगा।
लेकिन इन्हें इससे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। इनका असली खेल तो ‘ऑप्टिक्स’ यानी नैरेटिव का है।
ये बस मराठा वोटर को यह मैसेज देना चाहते हैं की “भाई, हमने तो तुम्हें आरक्षण दे दिया, अब अगर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट उसे रद्द करता है, तो वो उनकी सिरदर्दी है। हमारा वोट पक्का हो गया।”
इस पूरी नौटंकी में उस बेचारे ब्राह्मण, वैश्य और अन्य अनारक्षित जातियों के युवा का क्या दोष है, जिसकी पूरी जवानी इन कोर्ट-कचहरियों की तारीखों और रद्द होती हुई भर्तियों के इंतज़ार में स्वाहा हो रही है?
बीजेपी का कोर वोटर होने की सज़ा आज महाराष्ट्र का सवर्ण भुगत रहा है।
पढ़ें और सोचें | चुनावी वादा या टिकाऊ नीति
महाराष्ट्र के 72% के आंकड़े को चुनावी संदर्भ में रखकर देखें—तात्कालिक राजनीतिक लाभ और लंबे समय तक टिकने वाली नीति में क्या फर्क है?
6. सोशल इंजीनियरिंग के नशे में चूर रणनीतिकारों को नहीं दिख रहा मेरिट वाले युवाओं का मौन आक्रोश

जब सियासत में सिर्फ जातियों के गुणा-भाग को ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ मान लिया जाता है, तब सत्ता के गलियारों में बैठे नेताओं को ज़मीन की कड़वी हकीकत दिखनी बंद हो जाती है।
आप मंचों से खड़े होकर ‘विश्वगुरु’ बनने के बड़े-बड़े भाषण देते हैं। आप 5 ट्रिलियन इकॉनमी और सुपरपावर बनने का सपना बेचते हैं।
लेकिन कोई इन नेताओं से पूछे की भाई साहब, जब आप अपने सिस्टम का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा ओपन कॉम्पिटिशन (Open Competition) से ही बाहर कर देंगे, तो आप कैसा विश्वगुरु बना रहे हैं?
ज़रा उस सवर्ण छात्र की मानसिक स्थिति के बारे में सोचिए जो अपने बोर्ड एग्ज़ाम या यूनिवर्सिटी में 95 प्रतिशत नंबर लेकर आता है।
वो रात-दिन एक करके पढ़ाई करता है, लेकिन जब वो नौकरी या किसी अच्छे सरकारी संस्थान में एडमिशन के लिए जाता है, तो उसे पता चलता है की उसकी इस 95 प्रतिशत वाली मेरिट की औकात सिस्टम की नज़र में ज़ीरो है।
वो सीट किसी ऐसे व्यक्ति को दे दी जाती है जिसके नंबर उससे आधे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि सत्ता को उसका वोट चाहिए।
आज देश के सवर्ण और मिडिल क्लास परिवारों में क्या चल रहा है? बाप अपनी पुश्तैनी ज़मीनें बेच रहा है। लोग बैंक से भारी-भरकम एजुकेशन लोन उठा रहे हैं।
क्यों? ताकि वो अपने बच्चों को इस ‘आरक्षण की घुटन’ से निकालकर अमेरिका, कनाडा, यूरोप या ऑस्ट्रेलिया भेज सकें।
सवर्ण परिवारों को यह बात बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो चुकी है की चाहे सरकार बीजेपी की हो या कांग्रेस की, इस देश में उनके बच्चों के लिए कोई भविष्य नहीं बचा है।
और बात सिर्फ सरकारी नौकरियों तक ही सीमित नहीं रह गई है। इन वोटबैंक के भूखे नेताओं ने प्राइवेट सेक्टर में भी घुसपैठ शुरू कर दी है।
आपको याद होगा की कैसे हरियाणा में (जब खट्टर सरकार थी) प्राइवेट नौकरियों में भी 75 प्रतिशत ‘लोकल कोटा’ थोपने का कानून लाया गया था।
भले ही बाद में हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया, लेकिन इससे नेताओं की वो खतरनाक सोच तो बेनकाब हो गई ना की वो प्राइवेट कंपनियों की मेरिट को भी चुनाव जीतने के लिए दांव पर लगा सकते हैं।
बीजेपी का यह ‘सेल्फ-गोल’ कोई छोटी-मोटी भूल नहीं है। आप उस वर्ग को देश छोड़ने पर मजबूर कर रहे हैं जो इस देश का बौद्धिक (Intellectual) और आर्थिक (Economic) इंजन है।
जो लोग टैक्स का सबसे बड़ा हिस्सा भरते हैं, जो नीतियां बनाते हैं, जो सिस्टम को चलाते हैं… जब वही लोग इस देश से और इस पार्टी से पूरी तरह कट जाएंगे, तो फिर आपके पास बचेगा क्या?
सोशल इंजीनियरिंग के इस नशे में रणनीतिकारों को यह बात समझ ही नहीं आ रही है की जिस कोर वोटर को वे यह कहकर डराते थे कि “हमें वोट नहीं दिया तो फलां पार्टी आ जाएगी,” अब वो वोटर इस डर से ऊपर उठ चुका है।
अब उसे किसी के आने या जाने से फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उसे पता चल चुका है की सिस्टम उसके खिलाफ ही काम कर रहा है।
| कौन सा वर्ग | यूपी असिस्टेंट टीचर भर्ती में ओपन (UR) में मिली सीटें | हुआ क्या? |
|---|---|---|
| सवर्ण (General) | 29 सीटें | ओपन कोटे का महज़ 25% हिस्सा ही जनरल को मिला। |
| ओबीसी (OBC) | 59 सीटें | डबल बेनिफिट लेकर ओपन (UR) सीटों पर सबसे बड़ा कब्ज़ा। |
| एससी (SC) | 15 सीटें | अपनी रिज़र्व सीटों के अलावा ओपन मेरिट में भी एंट्री। |
| ईडब्ल्यूएस (EWS) | 11 सीटें | अनारक्षित कोटे में माइग्रेट हुए। |
| कुल (Total) | 114 सीटें (UR) | 75% ओपन (UR) सीटें आरक्षित वर्ग के पास चली गईं। |
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7. लोकसभा चुनाव में नोटा दबाकर और घर बैठकर सवर्णों ने दे दी थी चेतावनी
लेकिन दिल्ली के दरबार में बैठे चाणक्य अब भी ज़मीनी हकीकत से बेखबर हैं

राजनीति में अक्सर कहा जाता है की जनता बोलती कम है, लेकिन जब वो अपना फैसला सुनाती है तो बड़े-बड़ों के सिंहासन डोल जाते हैं।
अगर दिल्ली में बैठे बीजेपी के रणनीतिकार अब भी इस मुगालते में जी रहे हैं की सवर्ण वोटर उनका ‘बंधुआ मज़दूर’ है और वो कहीं नहीं जाएगा, तो उन्हें ज़रा 2024 के लोकसभा चुनावों के पन्नों को एक बार फिर से पलट कर देख लेना चाहिए।
2024 के उन नतीजों ने साफ कर दिया था की यह ‘कोर वोटर’ अब टेकन फॉर ग्रांटेड (Taken for granted) लिए जाने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
ज़रा उन राज्यों के ज़मीनी आंकड़ों पर गौर कीजिए जहाँ पार्टी को सबसे बड़ा झटका लगा था। उत्तर प्रदेश, जहाँ से दिल्ली का पूरा नैरेटिव सेट होता है, वहां बीजेपी 62 सीटों से लुढ़क कर 33 सीटों पर आ गिरी।
राजस्थान में, जहाँ पार्टी पिछले दो बार से क्लीन स्वीप (25 की 25 सीटें) कर रही थी, वहाँ उसे 11 सीटों का नुकसान हुआ। महाराष्ट्र में ‘महायुति’ का जो हाल हुआ, वो किसी से छिपा नहीं है।
सवर्ण वोटर ने किसी विपक्ष को जाकर खुल कर वोट नहीं दिया। उसने ऐसा कोई हंगामा नहीं किया जो मीडिया की सुर्खियों में आए।
उसने बस एक बहुत ही साइलेंट (Silent) लेकिन खतरनाक काम किया- वह वोटिंग के दिन या तो अपने घर से बाहर ही नहीं निकला या फिर उसने हताशा में ‘नोटा’ (NOTA) का बटन दबा दिया। यह एक मौन विद्रोह था।
यह सवर्णों की तरफ से दिल्ली के दरबार को दिया गया एक साफ संदेश था की “हम तुम्हारे बंधुआ मज़दूर नहीं हैं। तुम हमारे बच्चों की मेरिट का खात्मा करोगे, हमारे हिस्से की नौकरियां आरक्षण में बांटोगे और बदले में हमसे उम्मीद करोगे की हम तुम्हारा समर्थन करते रहें? अब ऐसा नहीं होगा।”
लेकिन विडंबना देखिए! 2024 के उस झटके के बाद भी बीजेपी के आलाकमान की नींद नहीं टूटी है। आज (नवंबर 2024) भी ज़मीनी हकीकत जस की तस है।
यूपी में भर्तियों का वही डबल बेनिफिट वाला खेल चल रहा है, महाराष्ट्र में 72 प्रतिशत आरक्षण थोपा जा रहा है और मध्य प्रदेश में 83 में से 77 सीटें अभी भी आरक्षित की जा रही हैं।
पार्टी के चाणक्य अब भी इसी भ्रम में जी रहे हैं की चुनाव आने पर वो फिर से राष्ट्रवाद या ‘पैन-हिन्दू’ कार्ड खेलेंगे और यह सवर्ण वोटर डर के मारे फिर से उनके पाले में आ गिरेगा।
लेकिन वे यह भूल रहे हैं की जब इंसान की अपनी थाली ही खाली हो, तो उसे राष्ट्रवाद के बड़े-बड़े भाषण हजम नहीं होते।
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8. नए वोटबैंक के लालच में अपने ही घर की नींव खोदने का ये राजनीतिक सेल्फ गोल बीजेपी के लिए साबित होगा भस्मासुर
अगर हम इस पूरी राजनीतिक रणनीति का एक तटस्थ विश्लेषण करें, तो यह एक क्लासिक ‘भस्मासुर’ वाली स्थिति है।
आप आरक्षण का इस्तेमाल करके नए वोटबैंक को लुभाने के लिए जिस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को अपना मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं, असल में वही आपके राजनीतिक वजूद को भस्म करने की तैयारी कर रहा है।
बीजेपी को एक बहुत ही बुनियादी राजनीतिक सत्य समझना होगा। आरक्षित दलित (Dalit) वोटबैंक के अपने खुद के मज़बूत क्षत्रप (Regional Leaders) पहले से मौजूद हैं।
यूपी में समाजवादी पार्टी (सपा) है, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है, आज़ाद समाज पार्टी है। बिहार में राजद (RJD) और जेडीयू (JDU) हैं।
महाराष्ट्र में शरद पवार और अन्य गुट हैं। आप चाहे उन्हें कितना भी आरक्षण दे दें, आप उनके लिए कितनी भी योजनाएं ले आएं, वे वर्ग अंततः अपने उन ‘नेचुरल नेताओं’ (Natural Leaders) की तरफ ही लौटेंगे।
वे कभी भी पूरी तरह से आपके 100 प्रतिशत वफादार (Core) वोटर नहीं बन सकते। उनका वोट हमेशा ‘कंडीशनल’ (शर्तों वाला) रहेगा।
लेकिन इस नए और ‘कंडीशनल’ वोटबैंक को साधने के चक्कर में बीजेपी उस सवर्ण वोटर को खो रही है, जिसका अपना कोई क्षत्रप नहीं है।
सवर्णों ने हमेशा बीजेपी को ही अपना स्वाभाविक (Natural) घर माना है। लेकिन जब घर का ही मुखिया उस बेटे को घर से बाहर निकालने लगे, तो वो बेटा भी आखिर कब तक दरवाज़े पर बैठा रहेगा?
राजनीति में ‘चाणक्य-नीति’ का मतलब सिर्फ जोड़-तोड़ करना या जातियों का गुणा-भाग बिठाना नहीं होता। असली चाणक्य-नीति वो होती है जहाँ आप अपने पुराने और वफादार सैनिकों का हौसला बनाए रखें, जबकि नए क्षेत्रों पर कब्ज़ा करें।
लेकिन यहाँ तो रणनीति बिल्कुल उल्टी चल रही है। यहाँ तो किले के अंदर बैठे वफादार सैनिकों को ही भूखा मारा जा रहा है ताकि बाहर खड़े दुश्मनों को दावत पर बुलाया जा सके।
यह कोई छोटी-मोटी भूल नहीं है। यह एक ऐसा राजनीतिक ‘सेल्फ-गोल’ है जिसका खामियाज़ा पार्टी को आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बहुत बुरी तरह भुगतना पड़ सकता है।
अगर यूपी, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सरकारों ने आरक्षण के नाम पर चल रहे इस ‘सिस्टेमैटिक भेदभाव’ (Systematic Apartheid) को तुरंत नहीं रोका, और सुप्रीम कोर्ट की 50 प्रतिशत वाली लिमिट का सम्मान नहीं किया, तो सवर्ण युवाओं का यह आक्रोश अब सिर्फ ‘घर बैठने’ तक सीमित नहीं रहेगा।
अंततः, सत्ता के अहंकार में चूर दिल्ली के रणनीतिकारों को यह कड़वा सच जितनी जल्दी समझ आ जाए उतना अच्छा है- की आप नए दोस्त बनाने के चक्कर में अपने सबसे वफादार और पुराने दोस्त को दुश्मन बना रहे हैं।
और जब सवर्ण वोटर पूरी तरह से छिटक गया, तो ना आप ‘पैन-हिन्दू’ छाता तान पाएंगे और ना ही सत्ता के उस चक्रव्यूह से कभी बाहर निकल पाएंगे, जो आपने खुद अपने हाथों से बुना है।
पढ़ें और सोचें | रणनीति का दीर्घकालिक हिसाब
पुराने समर्थकों और नए वोटबैंक के बीच संतुलन की दलील से क्या सीख मिलती है—राजनीतिक रणनीति का मूल्यांकन केवल अगले चुनाव से आगे कैसे किया जा सकता है?
