अपना खौफ कायम रखने के लिए गरीब किसानों को मुर्गा बनाकर उनपे ईंटें लदवाता था आजम खान, आज जेल में सड़कर रामपुर का तानाशाह चुका रहा गरीबों की आह का हिसाब

जब इंसान के पास बेहिसाब सत्ता और ताकत आ जाती है, तो उसे लगने लगता है की वही खुदा बन गया है। उसे लगता है की अब वो जो चाहेगा वही होगा, और उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

लेकिन वो एक बात भूल जाता है की ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती, और जब वो लाठी पड़ती है, तो बड़े-बड़े तानाशाहों का गुरूर खाक में मिल जाता है।

उत्तर प्रदेश के रामपुर में ऐसा ही एक अघोषित ‘नवाब’ हुआ करता था, जिसका नाम था आज़म खान।

आज जब आप टीवी पर आज़म खान और उनके परिवार को अपनी सज़ा पर घड़ियाली आंसू बहाते देखते हैं, तो शायद आपको उन पर तरस आ जाए।

लेकिन रामपुर की गलियों में जाकर पूछिए, वहां की हवाओं में आज भी उस तानाशाही और खौफ की गूंज सुनाई देती है, जिसने न जाने कितने ही गरीब और बेगुनाह परिवारों को ज़िंदा दफन कर दिया था।

खुद को रामपुर का खुदा समझने वाला आज़म खान आज जेल में मांग रहा आज़ादी की भीख

ज़रा उस दौर को याद कीजिए जब यूपी में आज़म खान की तूती बोलती थी। सूबे में मुख्यमंत्री कोई भी हो, सरकार किसी की भी हो, लेकिन रामपुर में पत्ता भी आज़म खान की मर्ज़ी के बिना नहीं हिल सकता था।

रामपुर पुलिस हो, प्रशासन हो या कानून… सब के सब नवाब साहब की जेब में रखे रहते थे।

जब उनका काफिला निकलता था, तो पूरे शहर का ट्रैफिक रोक दिया जाता था। उनके एक इशारे पर किसी का भी घर उजाड़ दिया जाता था और किसी को भी रातों-रातों जेल में ठूंस दिया जाता था।

लेकिन आज का सच क्या है? आज हम 2026 में बैठे हैं और वो आदमी, जिसके नाम से कभी रामपुर का प्रशासन कांपता था, आज सलाखों के पीछे अपनी आज़ादी की भीख मांग रहा है।

जिस रामपुर को उन्होंने अपनी ‘जागीर’ समझ लिया था, आज उसी रामपुर में उनके परिवार का राजनीतिक वजूद मिट्टी में मिल चुका है।

ये उन हज़ारों मज़लूमों की बद्दुआएं हैं जिनका घर इस तानाशाह ने उजाड़ दिया था।

जौहर यूनिवर्सिटी की आड़ में चलता था खौफ का वो लैंड जिहाद जिसने उजाड़ दिए कई गरीब परिवार

जब भी आज़म खान मंच पर आते थे, तो सबसे ज़्यादा भाषण ‘शिक्षा’ पर देते थे। वो दुनिया भर को बताते थे की उन्होंने रामपुर में ‘मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी’ बनाकर एक महान काम किया है।

बाहर वालों को लगता था की वाह! क्या ऑक्सफ़ोर्ड जैसी कोई यूनिवर्सिटी बन रही है। लेकिन ग्राउंड रियलिटी बिल्कुल अलग थी।

सच तो ये है की जौहर यूनिवर्सिटी कोई शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि रामपुर के दलितों, गरीब किसानों और मज़लूमों की ज़मीनें हड़पने का एक बहुत बड़ा ‘वसूली सिंडिकेट’ था।

सत्ता का ऐसा नंगा नाच शायद ही देश में कहीं और देखा गया हो। जिसको डराया जा सकता था उसे पुलिस से डराया गया, और जो नहीं डरा उसे गुंडों से पिटवाकर उसकी ज़मीन की रजिस्ट्री करवा ली गई।

दलितों की ज़मीनें हों, बेसहारा किसानों के खेत हों, या फिर यतीमखाने की वो ज़मीनें जो बेवाओं और अनाथों के लिए छोड़ी गई थीं… आज़म खान ने किसी को नहीं बख्शा। सब कुछ निगल गए।

इन बातों में कोई हवा-हवाई झूठ नहीं है। जब योगी सरकार में फाइलों की धूल झड़ी और कोर्ट ने दखल दिया, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया।

आज़म खान के इसी शिक्षा के मंदिर से यूपी सरकार ने 70 हेक्टेयर (हज़ारों बीघा) से ज़्यादा कब्ज़ा की गई ज़मीन वापस ज़ब्त की है। सोचिए, एक इंसान ने गरीबों को रौंदकर कितनी बड़ी रियासत खड़ी कर ली थी!

जब एक मजबूर किसान को मुर्गा बनाकर उसकी पीठ पर रखवाई गई 10 ईंटें और लगवाई गई कुकड़ू-कू की आवाज़

अब आपको रामपुर की एक ऐसी रूह कंपा देने वाली कहानी बताते हैं, जिसे सुनकर आपको पता चल जायेगा की आजम खान किस तरह का हैवान था।

जौहर यूनिवर्सिटी से बिल्कुल सटा हुआ एक गांव है- आलियागंज। इस गांव के एक गरीब और बुजुर्ग किसान की दो-ढाई बीघा ज़मीन यूनिवर्सिटी के बिल्कुल बीचों-बीच फंस गई थी, क्योंकि आज़म खान ने चारों तरफ की ज़मीनें हथिया ली थीं।

आज़म खान चाहता था की वो किसान भी कौड़ियों के भाव अपनी पुश्तैनी ज़मीन उसे सौंप दे, लेकिन उस बेचारे किसान ने अपनी ज़मीन देने से मना कर दिया।

एक दिन वो किसान यूं ही टहलता हुआ अपनी उसी ज़मीन को देखने चला गया की कहीं नवाब साहब ने वहां कोई बिल्डिंग तो खड़ी नहीं कर दी।

बस, यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। यूनिवर्सिटी के अहाते में बैठे आज़म खान की नज़र उस किसान पर पड़ गई। उसने तुरंत अपने गार्ड्स को दौड़ाया और उस किसान को पकड़वा कर अपने सामने पेश करवाया।

जब किसान ने सहमते हुए बताया की वो अपनी ज़मीन देखने आया है और कम पैसे मिलने की वजह से उसने ज़मीन नहीं बेची, तो सत्ता के नशे में चूर आज़म खान का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

उसने सरेआम, दर्जनों लोगों के सामने उस बुजुर्ग किसान को ‘मुर्गा’ बनने का फरमान सुना दिया। जब वो बेबस किसान हिचकिचाया और अपनी इज़्ज़त की भीख मांगने लगा, तो इस शिक्षा के मसीहा ने पास पड़ा एक डंडा उठा लिया और उसे बुरी तरह डराया।

बात सिर्फ मुर्गा बनाने तक नहीं रुकी भाईसाहब। ज़ुल्म की इंतहा तो तब हुई जब आज़म खान ने उस बुजुर्ग किसान से मुर्गे की आवाज़ ‘कुकड़ू-कू’ तक लगवाई।

और इतने पर भी इस तानाशाह का कलेजा ठंडा नहीं हुआ। उसने पास पड़े ईंटों के ढेर से गिनकर 10 भारी ईंटें मंगवाईं और उस मुर्गा बने किसान की पीठ पर लदवा दीं।

दस ईंटों के उस भयंकर वज़न से उस किसान का सीना ज़मीन से सट गया। वो तड़पने लगा, उसकी सांसें उखड़ने लगीं और वो लगभग मरने की हालत में आ गया।

एक निहत्थे, गरीब और बेसहारा इंसान पर सत्ता का इससे वीभत्स और घटिया प्रहार क्या हो सकता है?

“ये जाकर पूरे गांव को मेरा खौफ बताएगा…” गरीबों को कीड़े-मकोड़े समझने वाले उस तानाशाह का डायलॉग

उस वक़्त वहां मौजूद एक शख्स की रूह तक कांप गई। उसने घबराकर आज़म खान से कहा, “साहब! आप ये क्या कर रहे हैं? ईंटें हटवा लीजिए, ये आदमी तो मर जाएगा!”

इसके बाद आज़म खान ने जो जवाब दिया, वो सुनिए। वो डायलॉग उसके उस खौफनाक गुरूर और तानाशाही का सबसे बड़ा सबूत है जिसे वो रामपुर में कायम रखना चाहता था।

आज़म खान ने सीना चौड़ा करते हुए कहा-

“तुम नहीं जानते, ये आलियागंज का किसान है। इनको सबक ऐसे ही सिखाया जाएगा! अब ये जाकर पूरे गांव को बताएगा की आज़म खान ने मेरे साथ क्या सुलूक किया। ये मेरा खौफ बताएगा, तब जाकर ये लोग मेरी जौहर यूनिवर्सिटी की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखेंगे… वरना ये लोग हमारी यूनिवर्सिटी को भी बेचकर खा जाएंगे।”

जो आदमी खुद उस गरीब किसान की ज़मीन निगल रहा था, जो यतीमों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करके बैठा था, वो अपनी चोरी छुपाने के लिए उल्टे उन गरीबों को ही ‘चोर’ बता रहा था।

वो चाहता था की रामपुर का हर आम आदमी आज़म खान के नाम से ऐसे कांपे, जैसे कोई गुलाम अपने जालिम आका से कांपता है।

आज़म खान ने कैसे एक इंटर के छात्र को बिना कपड़े घसीटवा कर उसका करियर निगल लिया था

रामपुर के स्थानीय मुसलमानों के दिलों में आज भी आज़म खान के उस ज़ुल्म के गहरे ज़ख्म ताज़ा हैं। ऐसी ही एक कहानी रामपुर के एक पिता की है।

रामपुर में जब भी कोई शख्स आज़म खान के खिलाफ आवाज़ उठाता था या उनकी मर्ज़ी के आगे झुकने से मना कर देता था, तो उसे रास्ते से हटाने के लिए उस पर डकैती और धारा 307 (हत्या का प्रयास) जैसे संगीन और बिल्कुल फर्जी मुकदमे लाद दिए जाते थे।

इस पिता पर भी यही फर्जी मुकदमे थोप दिए गए।

लेकिन आज़म खान और उनकी पुलिस का ज़ुल्म यहीं नहीं रुका। जब बाप पुलिस के हाथ नहीं लगा, तो सत्ता की हनक ने अपना कहर उनके मासूम बच्चे पर बरपाया।

उस वक़्त उस शख्स का बेटा 12वीं (इंटरमीडिएट) कक्षा का छात्र था और अपने बोर्ड के एग्जाम दे रहा था। आज़म खान की पुलिस अचानक उनके घर में घुसती है।

वो बच्चा उस वक़्त बाथरूम में नहा रहा था। आप आज़म के खौफ का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं की उस बच्चे को नहाते हुए बाथरूम से बाहर खींच लिया गया।

उसे एक शर्ट तक नहीं पहनने दी गई! सिर्फ एक बनियान में और नंगे पैर, पुलिस उसे घसीटते हुए थाने ले गई।

उस बेगुनाह बच्चे को पूरे दो दिन तक कोतवाली की काल कोठरी में जानवरों की तरह बंद रखा गया। नतीजा क्या हुआ? इंटर बोर्ड के उसके दो अहम पेपर छूट गए।

थाने की उस प्रताड़ना और सरेआम हुई बेइज़्ज़ती ने उस बच्चे के बाल-मन को ऐसा तोड़ दिया की उस दिन के बाद उस बच्चे ने कभी किताबों की तरफ पलट कर नहीं देखा।

उसकी पढ़ाई, उसका करियर, उसका भविष्य… सब कुछ आज़म खान की उस तानाशाही की भेंट चढ़ गया।

एक तरफ आज़म खान दुनिया भर में खुद को ‘शिक्षा का मसीहा’ बताते थे, जौहर यूनिवर्सिटी बनाकर एजुकेशन के नाम पर वाहवाही लूटते थे।

और दूसरी तरफ, उसी शिक्षा के मसीहा ने अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए एक गरीब छात्र के हाथ से कलम छीनकर उसकी ज़िंदगी तबाह कर दी थी।

आज जब कुदरत का इंसाफ हो रहा है और आज़म खान के अपने ही बेटे (अब्दुल्लाह) सलाखों के पीछे अपने मुकद्दर को कोस रहे हैं, तो रामपुर का हर वो पीड़ित पिता आसमान की तरफ देखकर यही कहता है की “अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती, आज आज़म खान को हमारे ही बच्चों की आह लगी है।”

जिसने भी उठाई आवाज़ उसकी मार्केट पर चला दिया बुलडोज़र और छीन लिया निवाला

यह तानाशाही सिर्फ किसी एक परिवार तक सीमित नहीं थी। रामपुर के उन तमाम व्यापारियों, चाहे वो मुसलमान हों या हिन्दू, जिन्होंने आज़म खान के ज़ुल्मों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करने की हिम्मत की, उनकी आवाज़ को कुचल दिया गया।

रामपुर के स्थानीय फल व्यापारी बताते हैं की कैसे आज़म खान ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके लोगों की ज़िंदगियां नर्क बना दी थीं।

अगर आप आज़म खान की किसी बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते, तो आपके व्यापार के लाइसेंस रातों-रात कैंसल कर दिए जाते थे। कई लोगों को फर्जी मुकदमों में फंसाकर कई-कई बार जेलों में सड़ाया गया।

सिर्फ इतना ही नहीं, उन व्यापारियों की बरसों की कमाई से बनाई गई मार्केट और दुकानों पर बेरहमी से बुलडोज़र चलवा दिया गया।

उन्हें बर्बाद कर दिया गया। ज़ुल्म की इंतहा तो देखिए, ऐसे परिवारों के घरों की बिजली और पानी तक के कनेक्शन काट दिए गए ताकि वो अंधेरे में घुट-घुट कर मरें।

रामपुर का वो खौफनाक दौर ऐसा था की अगर उस समय कोर्ट-कचहरी का सहारा न होता, तो शायद ये पीड़ित परिवार कब के खुदकुशी कर चुके होते।

40 मिनट की आज़ादी और फिर जेल की सलाखें! आज कुदरत ऐसे वसूल रही है गरीबों की आह का हिसाब

आज हम नवंबर 2026 में हैं, और कुदरत ने रामपुर के इस अघोषित नवाब के साथ इंसाफ का जो खेल खेला है, वो दुनिया के हर तानाशाह के लिए एक बहुत बड़ा सबक है।

अक्टूबर 2023 में जब बेटे अब्दुल्लाह के ‘फर्जी जन्म प्रमाण पत्र’ (Fake Birth Certificate) मामले में कोर्ट ने आज़म, उनकी पत्नी तज़ीन फातिमा और बेटे को 7-7 साल की सज़ा सुनाई, तो उनकी पूरी सल्तनत ढह गई।

डूंगरपुर केस में भी गरीबों के घर तोड़ने पर उन्हें 7 साल की सज़ा हुई। पिछले लगभग 11 महीनों से आज़म खान सीतापुर और रामपुर की जेलों की धूल फांक रहे थे।

लेकिन कुदरत का सबसे तगड़ा हथौड़ा तो अभी कुछ ही दिन पहले पड़ा है। 29 अक्टूबर 2026 को हाई कोर्ट ने आज़म खान को फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मामले में ज़मानत दे दी। उनके समर्थकों में जश्न का माहौल था की नवाब साहब अब आज़ाद हो जाएंगे।

लेकिन याद रखिए दोस्त, जब गरीबों की आह लगती है, तो इंसान को चैन की सांस लेना भी नसीब नहीं होता।

31 अक्टूबर 2026 की उस सुबह को जैसे ही आज़म खान 11 महीने बाद रामपुर जेल के गेट से बाहर निकले, आज़ादी की खुली हवा में सांस लेने के महज़ 40 मिनट के अंदर ही उनका रास्ता रोक लिया गया।

जेल के गेट पर ही प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम खड़ी थी। जिस जौहर यूनिवर्सिटी को बनाने के लिए उन्होंने गरीबों की पीठ पर ईंटें लदवाई थीं, उसी जौहर यूनिवर्सिटी के ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ (Money Laundering) केस में ED ने उन्हें तुरंत धर दबोचा!

आज़ादी महज़ 40 मिनट की मेहमान थी। ज़मानत मिलने के बावजूद आज़म खान घर नहीं जा पाए और आज (नवंबर 2026 में) वो 80 साल का तानाशाह गाज़ियाबाद की डासना जेल में 14 दिन की कस्टडी में अपनी किस्मत को रो रहा है।

आप सत्ता के दम पर कुछ दिन तो गरीबों को मुर्गा बना सकते हैं, उनकी ज़मीनें लूट सकते हैं और उनके बच्चों का भविष्य बर्बाद कर सकते हैं।

लेकिन जब उस ऊपर वाले का इंसाफ शुरू होता है, तो अच्छे-अच्छे तानाशाह घुटनों पर आ जाते हैं।

आज़म खान का वो गुरूर आज मिट्टी में मिल चुका है। रामपुर की उन उजड़ी हुई बस्तियों से जो आह निकली थी, वो आज सीतापुर से लेकर डासना जेल की काल कोठरियों में गूंज रही है।

जो बोया था, आज रामपुर का नवाब वही काट रहा है!

Scroll to Top