जब एक दीये की रौशनी से यमराज की भी आँखें चौंधिया जाएं.. धनतेरस की वो ‘यम दीपम’ परंपरा जो परिवार को साक्षात काल से भी रखती सुरक्षित

हमारे सनातन धर्म में त्योहार ज़िंदगी को जश्न से भर देने वाले मौके होते हैं।

अब दीपावली के इस पांच दिनों के महापर्व को ही ले लीजिए। इसकी शुरुआत ही धनतेरस की उस जगमगाहट से होती है, जिसका इंतज़ार हम सब पूरे साल करते हैं।

बाज़ारों की वो रौनक, सुनार की दुकानों पर भीड़ और हाथों में नए चमकते बर्तन… ये सब हमारी वो बहुत ही शुभ और प्राचीन परंपरा है, जिससे घर में साक्षात माता लक्ष्मी का स्वागत होता है।

सोना-चांदी खरीदना, नए बर्तन घर लाना, ये सब हमारी समृद्धि की निशानियां हैं, जो परिवार को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाती हैं।

लेकिन दोस्त, धनतेरस के इस पावन दिन का एक और बहुत गहरा रहस्य है। एक ऐसा रहस्य जो सीधे तौर पर हमारे परिवार की सुरक्षा और ज़िंदगी से जुड़ा है।

क्या आपने कभी सोचा है की समृद्धि के इस दिन, घर के मेन गेट के बाहर एक खास दीया जलाया जाता है? यह दीया साक्षात यमराज (मृत्यु के देवता) के लिए जलता है, जिसे ‘यम दीपम’ कहते हैं।

इसे जलाने के पीछे एक ऐसी दिल को छू लेने वाली कहानी छुपी है, जो बताती है की कैसे एक मनुस्य साक्षात काल को भी चख्मा दे सकता है।

शादी की चौथी रात और वो भविष्यवाणी जिसने ‘राजा हिम’ के पूरे महल में मातम बिछा दिया था

इस ‘यम दीपम’ की कहानी प्राचीन काल के ‘राजा हिम’ से शुरू होती है, जिसका ज़िक्र हमारे पुराणों में बहुत विस्तार से मिलता है।

राजा हिम के पास दौलत, शोहरत, राज-पाट सब कुछ था, लेकिन कोई संतान नहीं थी। बहुत पूजा-पाठ और मन्नतें मांग-मांग कर उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ।

पूरे राज्य में जश्न मनाया गया। लेकिन ये खुशियां बहुत दिनों तक टिक नहीं पाईं।

जब राज ज्योतिषियों को बुलाकर उस छोटे से राजकुमार की कुंडली दिखाई गई, तो पंडितों के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने एक ऐसी दिल दहला देने वाली भविष्यवाणी कर दी जिसने पूरे महल में मातम बिछा दिया।

ज्योतिषियों ने बताया की ये राजकुमार लंबी उम्र लेकर नहीं आया है; यह सिर्फ 16 साल की उम्र तक ही जिएगा।

और सबसे खौफनाक बात तो ये थी की उन्होंने अकाल मृत्यु की एकदम सटीक टाइमिंग भी बता दी थी।

उन्होंने राजा से कहा- “महाराज, जिस दिन भी इस राजकुमार की शादी होगी, ठीक उसके चौथे दिन एक सांप के डसने से इसकी मौत हो जाएगी।”

राजा हिम ने अपने बेटे को मौत से बचाने के लिए उसे दुनिया की नज़रों से दूर एक बेहद सुरक्षित जगह पर भेज दिया। लेकिन किस्मत के लिखे को भला कौन टाल सकता है!

राजकुमार जवान हुआ, 16वें साल में कदम रखा और उसे एक लड़की से प्रेम हो गया। दोनों की शादी भी हो गई।

और देखते ही देखते वो खौफनाक ‘चौथी रात’ आ ही गई, जब यमदूतों को राजकुमार की जान लेने आना था। पूरे महल में सन्नाटा पसरा था, हर कोई बस राजकुमार की मौत का इंतज़ार कर रहा था।

जब एक नई-नवेली दुल्हन ने ठान लिया की वो किसी भी कीमत पर यमराज के जबड़ों से अपना सुहाग छीन कर लाएगी

लेकिन कहते हैं ना की जब एक स्त्री अपने सुहाग की रक्षा पर उतर आए, तो वो साक्षात काल से भी भिड़ जाती है।

वो 16 साल के राजकुमार की नई-नवेली पत्नी कोई रोने-धोने वाली या किस्मत के भरोसे बैठने वाली कमज़ोर लड़की नहीं थी।

उसे जब इस भविष्यवाणी का पता चला, तो उसने हार मानने के बजाय मौत से सीधा पंगा लेने की ठान ली। उसने अपने दिमाग और सनातनी परंपरा का एक ऐसा गज़ब का मास्टरप्लान बनाया की यमराज भी चकरा जाएं।

सबसे पहले तो उस दुल्हन ने अपने पति (राजकुमार) को कसम दे दी कि चाहे जो हो जाए, तुम आज पूरी रात पलक नहीं झपकाओगे। “तुम्हें सोना नहीं है!”

इसके बाद उसने महल के सारे नौकरों को बुलाया और राजकोष का सारा खज़ाना मंगवा लिया।

जितने भी सोने-चांदी के सिक्के थे, हीरे-जवाहरात थे, और खुद उसके अपने जो कीमती गहने थे… वो सब उसने राजकुमार के कमरे के दरवाज़े के ठीक बाहर एक बड़े से पहाड़ (ढेर) की तरह लगा दिए।

और फिर उसने रचा रौशनी का एक चक्रव्यूह! उस लड़की ने पूरे कमरे में, दरवाज़े पर, चौखट के पास और खिड़कियों पर अनगिनत तेल के दीये जला दिए।

उसने इतने दीये जलाए की अमावस की उस घनी काली रात में भी दिन जैसा भयंकर उजाला हो गया। अब सब कुछ तैयार था। मौत को आना था और ये निडर दुल्हन अपने सुहाग को बचाने के लिए दरवाज़े पर पहरा देकर बैठ गई।

भयंकर रौशनी से अँधा हुआ काल और पत्नी के मीठे गीतों में खो गए साक्षात यमराज

आधी रात का वक़्त हुआ और बिल्कुल भविष्यवाणी के फिक्स टाइम पर साक्षात मृत्यु के देवता यमराज वहां पहुंच गए।

राजकुमार की जान लेने के लिए यमराज ने एक भयानक, काले और बेहद ज़हरीले सांप का रूप धारण किया हुआ था ताकि वो चुपचाप कमरे में घुसकर उसे डस सकें।

लेकिन जैसे ही वो सांप रूपी यमराज उस कमरे के मेन गेट पर पहुंचे, उनका सामना उस नई-नवेली दुल्हन के चक्रव्यूह से हो गया।

दरवाज़े पर रखे सोने-चांदी के पहाड़ की चमक और वहां जल रहे सैकड़ों दीयों की भयंकर रौशनी ने यमराज की आँखें पूरी तरह चौंधिया दीं। उस सांप के लिए उस चकाचौंध वाली रौशनी को पार करके कमरे के अंदर जाना नामुमकिन सा हो गया।

अब सांप अंदर तो जा नहीं सका, तो वो उसी सोने-चांदी के ढेर पर जाकर कुंडली मारकर बैठ गया। वो इंतज़ार करने लगा की कब ये दीये बुझें, कब राजकुमार की आँख लगे और मैं अपना काम करूँ।

लेकिन अंदर बैठी वो चालाक और निडर दुल्हन सब समझ रही थी। उसने अपने पति को जगाए रखने के लिए पूरी रात उसे मीठे-मीठे लोकगीत, भजन और पुरानी कहानियां सुनानी शुरू कर दीं।

और यहीं पर हुआ सबसे बड़ा चमत्कार! बाहर बैठा वो सांप (यमराज) उस लड़की की मीठी आवाज़ और भजनों में ऐसा खो गया की वो अपना मकसद ही भूल गया।

यमराज पूरी रात बस वहीं बैठे-बैठे उस लड़की के गीत सुनते रहे। समय बीतता गया और देखते ही देखते सुबह हो गई।

सूरज निकल आया और अकाल मृत्यु का जो ‘मुहूर्त’ था, वो हमेशा के लिए टल गया।

यमराज को उस लड़की की बुद्धिमानी, उसकी हिम्मत और उसके सच्चे प्यार के आगे हार माननी पड़ी। बिना राजकुमार की जान लिए, मौत को उस दरवाज़े से खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।

‘यम दीपम’ जलाने का वो सनातनी विधान जिसे अपनाकर आप भी अपने परिवार को अकाल मृत्यु से बचा सकते हैं

बस उसी दिन से धनतेरस की शाम को ‘यम दीपम’ (यमराज का दीया) जलाने की ये पावन परंपरा शुरू हुई।

ये सिर्फ एक कहानी नहीं है दोस्त, बल्कि ये हमारे शास्त्रों का वो अचूक उपाय है जो हमारे परिवार को किसी भी तरह की अकाल मृत्यु, दुर्घटना या भयंकर बीमारी से बचाता है।

लेकिन इसे जलाने का एक बहुत ही सटीक नियम और विधान है, जो हर सनातनी को पता होना चाहिए।

पहली बात, यम दीपम के लिए कभी भी कोई नया या फैंसी दीया इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके लिए घर का कोई पुराना मिट्टी का दीया ही लेना चाहिए।

यह एक ‘चौमुखी दीया’ होना चाहिए, यानी जिसमें रुई की दो लंबी बत्तियां क्रॉस (X) करके लगाई जाती हैं ताकि बत्ती के चार मुंह बन जाएं। ये चार मुंह चारों दिशाओं के प्रतीक होते हैं।

इसमें हमेशा सरसों का तेल (Mustard oil) या फिर तिल का तेल ही डालना चाहिए। अब सबसे अहम बात आती है इसकी दिशा।

वास्तु और शास्त्रों के अनुसार, यम दीपम का मुंह हमेशा ‘दक्षिण दिशा’ (South) की तरफ होना चाहिए, क्योंकि दक्षिण दिशा ही यमराज और पितरों की दिशा मानी जाती है।

इसे जलाना कब है? इसे धनतेरस की शाम यानी ‘प्रदोष काल’ में जलाया जाता है। जब घर के सभी सदस्य बाहर से (शॉपिंग या काम से) वापस घर आ जाएं और सब लोग घर के अंदर हों, तभी यह दीया जलाना चाहिए।

इसे घर के मेन गेट (मुख्य द्वार) के बाहर नाली या कूड़ेदान के पास (थोड़ा साफ़-सफाई करके) रखा जाता है।

इसे जलाते वक्त पूरे मन से हाथ जोड़कर प्रार्थना करनी चाहिए की “हे मृत्यु के देवता यमराज, हमारे परिवार को अकाल मृत्यु, दुर्घटना और बीमारियों से कोसों दूर रखना।”

इस धनतेरस, बर्तन और सोना ज़रूर खरीदिये, लेकिन शाम ढलते ही अपने परिवार की सुरक्षा के लिए यमराज का वो दीया जलाना मत भूलिएगा।

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