आज के टाइम में ज़रा सोचिए, 21 साल का लड़का क्या करता है? कोई कॉलेज की कैंटीन में चाय पी रहा होता है, कोई इंस्टाग्राम चलाने में बिज़ी है, तो कोई करियर की टेंशन में घुला जा रहा है।
लेकिन इसी 21 साल की उम्र में हिंदुस्तान का एक ऐसा शेर था, जो मौत की आँखों में आँखें डालकर लड़ना जानता था! नाम था- कैप्टन अरुण खेत्रपाल।
अरुण के खून में ही देश के लिए मर-मिटने का बारूद उबल रहा था!
NDA और IMA से ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, अरुण को सीधे भारतीय सेना की सबसे खूंखार और नामी ’17 पूना हॉर्स’ (17 Poona Horse) रेजिमेंट में तैनाती मिल गई।
ये वही वक्त था जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव बिल्कुल चरम पर था, और इस 21 साल के लड़के को बस जंग के मैदान में उतरने का इंतज़ार था।
1971 के युद्ध का वो खौफनाक दिन जब बसंतर में पाकिस्तानी टैंको का काल बन गए अरुण खेत्रपाल
तारीख थी 16 दिसंबर 1971। पाकिस्तान के शकरगढ़ सेक्टर में ‘बैटल ऑफ़ बसंतर’ (Battle of Basantar) चल रही थी।
ये 1971 की जंग की सबसे भयंकर और खूनी टैंक लड़ाइयों में से एक थी। हिंदुस्तानी फौज पाकिस्तानी इलाके में आगे बढ़ रही थी।
तभी अचानक पाकिस्तान की 13 लांसर्स (13 Lancers) ने अपने उन खूंखार और अजेय माने जाने वाले ‘पैटन टैंकों’ (Patton Tanks) के साथ हमारी फौज पर बहुत ज़ोरदार काउंटर-अटैक कर दिया।
उस वक्त हमारे पास टैंकों की भारी कमी पड़ गई थी। हालात ऐसे बन गए थे की अगर उन्हें वहीं नहीं रोका जाता, तो हिंदुस्तानी फौज को भारी नुकसान उठाना पड़ता।
ऐसे नाज़ुक मौके पर अरुण को ऑर्डर मिला की वो अपनी टुकड़ी के साथ वहां पहुंचें। अरुण बिना एक सेकंड सोचे अपने फेवरेट ‘सेंचुरियन टैंक’ को लेकर निकल पड़े, जिसका नाम उन्होंने बड़े प्यार से ‘फैमागुस्टा’ (Famagusta) रखा था।
उस दिन जो खौफनाक मंज़र बसंतर के मैदान में दिखा, उसे पाकिस्तानी फौज आज तक नहीं भूल पाई है।
मैदान में पहुंचते ही गोलाबारी इतनी भयंकर शुरू हो गई की अरुण के कमांडर का टैंक सीधे हिट हो गया। बाकी साथी धुएं और आग के कारण पीछे छूट गए।
अब सामने पाकिस्तान के 10-12 भारी पैटन टैंक थे और इधर अपना 21 साल का अकेला शेर! कोई आम इंसान होता तो शायद पीछे हट जाता, लेकिन अरुण ने अपना टैंक सीधा उन पाकिस्तानी टैंकों के झुंड में घुसा दिया।
एक-एक करके… बूम! बूम! अरुण ने अकेले ही पाकिस्तान के 10 पैटन टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए। दुश्मन की फौज में ऐसा हाहाकार मचा की उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था की ये हो क्या रहा है।
एक अकेला हिंदुस्तानी लड़का उनकी पूरी आर्मर्ड ब्रिगेड की धज्जियां उड़ा रहा था। लेकिन इसी भयंकर गोलाबारी में दुश्मन का एक गोला सीधे अरुण के टैंक पर आ लगा। टैंक में भयंकर आग लग गई।
तभी रेडियो पर उनके कमांडर की चीखती हुई आवाज़ आई, “अरुण, तुरंत अपना टैंक छोड़कर पीछे हट जाओ! टैंक जल रहा है!”
लेकिन आग की लपटों में घिरे उस वीर सपूत ने रेडियो पर जो जवाब दिया ना, वो आज भी हर फौजी के खून में आग लगा देता है।
अरुण ने दहाड़ते हुए कहा- “नहीं सर! मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूंगा, मेरी तोप अभी भी काम कर रही है और मैं इन हरामखोरों को ज़िंदा नहीं छोडूंगा!”
आग में बुरी तरह जलते हुए भी इस शेर ने हार नहीं मानी और एक और पाकिस्तानी टैंक को नेस्तनाबूद कर दिया, जो बिल्कुल उनके करीब आ चुका था।
लेकिन तभी दुश्मन का एक आखिरी गोला उनके टैंक पर लगा। मात्र 21 साल की उम्र में भारत माँ के इस लाल ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।
उनकी इसी अदम्य और रोंगटे खड़े कर देने वाली बहादुरी के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सेना के सबसे बड़े सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से नवाज़ा।
दुश्मन देश का पाकिस्तानी कमांडर भी फूट-फूट कर रोया जब 30 साल बाद खुला उस दिन का चौंकाने वाला सच
इस कहानी का एक ऐसा रुला देने वाला सच है, जो बहुत कम लोग जानते हैं। साल 2001 की बात है।
अरुण के 81 साल के बूढ़े पिता (ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल) अपने जन्मस्थान लाहौर (पाकिस्तान) को देखने गए थे।
वहां उनकी खातिरदारी के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपने एक ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नासिर को लगाया था।
नासिर ने तीन दिन तक अरुण के पिता की बहुत इज़्ज़त और सेवा की। जब वापस लौटने का आखिरी दिन आया, तो नासिर अपने आंसू नहीं रोक पाया। उसने रोते हुए अरुण के पिता का हाथ पकड़ा और कहा-
“सर, 16 दिसंबर 1971 को बसंतर के मैदान में जो पाकिस्तानी कमांडर अरुण के सामने था और जिसने अरुण के टैंक पर वो आख़िरी गोला दागा था… वो मैं ही था! आपके 21 साल के बेटे ने अकेले ही हमारी पूरी आर्मर्ड ब्रिगेड की बखिया उधेड़ कर रख दी थी। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में उस जैसा बहादुर और खौफनाक लड़का नहीं देखा!”
ज़रा सोचिए! एक 21 साल के हिंदुस्तानी की बहादुरी का आलम ये था की दुश्मन देश का वो कमांडर 30 साल बाद भी उस शूरवीर के पिता के सामने नतमस्तक होकर फूट-फूट कर रो रहा था।
