दिल्ली के AC कमरों में बैठकर देश में इस्लामिक नैरेटिव सेट करने वाले वामपंथी पत्रकारों और कांग्रेसी दरबारियों की तो रातों की नींद ही उड़ गई है। सदमे में हैं बेचारे। और सदमे में हों भी क्यों ना? आखिर जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को गालियां देकर, जिसपर झूठे आरोप मढ़कर इन लोगों ने अपनी दशकों की राजनीतिक रोटियां सेंकी हैं, अब उसी RSS के 100 साल के गौरवशाली और बेदाग इतिहास को बॉलीवुड के बड़े पर्दे पर पूरी ठसक के साथ दिखाया जाने वाला है।
तारीख नोट कर लीजिए- 8 मई 2026। यही वो दिन है जब सिनेमाघरों में रिलीज होगी ‘आखिरी सवाल’। और सबसे बड़ा ज़लज़ला तो इस बात का है की इस फिल्म में वामपंथियों के झूठ की धज्जियां उड़ाने वाला कोई और नहीं, बल्कि बॉलीवुड के ‘बाबा’ यानी संजय दत्त हैं।
संजय दत्त का इस फिल्म में होना और एक कट्टर राष्ट्रवादी मेंटर का किरदार निभाना, लिबरल इकोसिस्टम की छाती पर मूंग दलने जैसा है। हनुमान जयंती पर जबसे इस फिल्म का टीज़र आया है, वामपंथी पोर्टलों और सोशल मीडिया के इकोसिस्टम में एक अलग ही लेवल का रोना-धोना मच गया है। इन्हें समझ ही नहीं आ रहा है की अब इस तूफ़ान को रोकें तो रोकें कैसे!
यह फिल्म उन तमाम ऐतिहासिक अन्यायों, साज़िशों और वामपंथी मक्कारियों का कच्चा चिट्ठा है, जिसे पिछले 70-75 सालों से सेक्युलरिज्म की चादर ओढ़ाकर इस देश की जनता से छुपाया गया था। ‘आखिरी सवाल’ सीधे तौर पर RSS के खिलाफ उस एजेंडा को चुनौती दे रही है जिसे कांग्रेस और उसके पालतू वामपंथी इतिहासकारों ने स्कूल की किताबों से लेकर न्यूज़ रूम्स तक में स्थापित किया था।
कांग्रेस के ही घर में सबसे बड़ा बाघी! कट्टर कांग्रेसी कुनबे से निकलकर संजय दत्त ने पहना RSS का भगवा चोला
इस पूरी फिल्म का सबसे दिलचस्प और ‘हार्ड-हिटिंग’ पहलू अगर कुछ है, तो वो है संजय दत्त का इस प्रोजेक्ट से जुड़ना। ज़रा सोचिए! जिस परिवार का रग-रग कांग्रेस के रंग में रंगा हो, उसी परिवार का चश्मो-चिराग आज कांग्रेस के सबसे बड़े झूठ को बेनकाब करने जा रहा है।
सुनील दत्त साहब की इज्जत सब करते हैं, लेकिन यह कोई छुपी हुई बात नहीं है की वे ताउम्र गांधी-नेहरू परिवार के सबसे वफादार सिपाहियों में से एक रहे। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें सांसद बनाया, मंत्री बनाया। जब सुनील दत्त दुनिया से गए, तो उनकी राजनीतिक विरासत को उनकी बेटी प्रिया दत्त ने आगे बढ़ाया। प्रिया दत्त भी कांग्रेस के टिकट पर सांसद रहीं और पार्टी का झंडा उठाए रखा।
लेकिन आज? आज उसी घर का बेटा, संजय दत्त, ‘आखिरी सवाल’ में प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी का किरदार निभा रहा है- एक ऐसा किरदार जो RSS के आदर्शों को, उसके 100 साल के सफर को और राष्ट्र-निर्माण में उसके योगदान को डंके की चोट पर डिफेंड करता है। ये तो कांग्रेस के लिए वो वाली बात हो गई की ‘घर का भेदी लंका ढाए’। कांग्रेसी इकोसिस्टम के लिए इससे बड़ा वैचारिक तमाचा और क्या हो सकता है?
दरबारी पत्रकारों ने तो अभी से ही संजय दत्त पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया होगा। कोई कह रहा होगा की “संजय दत्त दबाव में आ गए”, तो कोई कहेगा की “उन्हें डराया गया है।” लेकिन सच्चाई तो यही है की आज का बॉलीवुड बदल रहा है।
संजय दत्त ने इस स्क्रिप्ट को चुना, खुद को इस किरदार में ढाला, क्योंकि अब इस देश में वो दौर खत्म हो गया है जहाँ आपको फिल्म बनाने के लिए 10 जनपथ के सामने माथा टेकना पड़ता था। संजय दत्त का यह ‘संघी’ अवतार असल में वामपंथियों के उस घमंड को चूर-चूर कर रहा है, जिसके तहत उन्हें लगता था की बॉलीवुड के बड़े सितारे तो हमेशा उनके ही पाले में रहेंगे।
अब संजय दत्त ही वो इंसान बन गए हैं जो परदे पर खड़े होकर कांग्रेस के हर उस प्रोपेगेंडा की बखिया उधेड़ेंगे, जिसे उनकी अपनी पार्टी ने दशकों तक पाला-पोसा था।
वामपंथियों के मुस्लिम-तुष्टिकरण वाले नैरेटिव पर फिल्म का हथौड़ा- वो ‘थीसिस’ जो JNU के हिंदू-विरोधी कामरेडों की नींदें हराम कर देगी
अब ज़रा बात करते हैं फिल्म के प्लॉट की। ‘आखिरी सवाल’ का पूरा ढांचा एक डिबेट फॉर्मेट पर टिका है। कहानी एक यंग और तेज़-तर्रार रिसर्च स्कॉलर (जिसका किरदार नमाशी चक्रवर्ती निभा रहे हैं) और उसके मेंटर (संजय दत्त) के इर्द-गिर्द घूमती है। ये लड़का RSS के 100 सालों के इतिहास पर अपनी थीसिस लिख रहा है।
अब आप तो जानते ही हैं की हमारे देश की यूनिवर्सिटीज- खासकर जेएनयू (JNU) और दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ खास विभागों में- अगर कोई छात्र संघ या हिंदू इतिहास पर कोई सकारात्मक रिसर्च करना चाहे, तो उसे कैसे प्रताड़ित किया जाता है।
वामपंथी प्रोफेसर्स का पूरा एक सिंडिकेट बैठा है जो तय करता है की रिसर्च में क्या लिखा जाएगा और क्या नहीं। अगर आपने गलती से भी मुगलों की सच्चाई लिख दी या RSS के देशप्रेम को उजागर कर दिया, तो आपकी थीसिस पास नहीं होने दी जाएगी।
फिल्म इसी वामपंथी अकैडमिक माफिया पर सीधा प्रहार करती है। संजय दत्त का किरदार, प्रोफेसर नाडकर्णी, इस युवा स्कॉलर के साथ इंटेंस डिस्कशन करता है। ये डिस्कशन्स सिर्फ बंद कमरे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि नेशनल टेलीविजन पर एक महा-बहस का रूप ले लेते हैं।
ये बहस उन सवालों को उठाती है जो आज तक मेनस्ट्रीम मीडिया या सिनेमा में पूछने पर अघोषित बैन लगा हुआ था। कैसे वामपंथियों ने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के नाम पर सिर्फ एक खास परिवार की चाटुकारिता का इतिहास लिखा?
कैसे संघ के निस्वार्थ समाज सेवा के कामों को इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया? फिल्म का कोर कांसेप्ट ही यही है कि जब आप लॉजिक और फैक्ट्स के साथ बात करते हैं, तो वामपंथियों का खोखला इकोसिस्टम ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है।
गांधी हत्या का नैरेटिव और RSS पर लगा बेबुनियाद बैन होगा एक्सपोज़
कांग्रेस ने दशकों से एक ही कैसेट बजाई है- “RSS ने गांधी को मारा।” जब भी चुनाव आते हैं, कांग्रेस का युवराज रटा-रटाया डायलॉग मार देता है की संघ वालों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी। और तो और, इस झूठ को इतनी बार बोला गया की आम जनता के एक बड़े हिस्से को भी लगने लगा था की शायद यही सच हो। ‘आखिरी सवाल’ इस सबसे बड़े झूठ को फैक्ट्स के हथौड़े से तोड़ने आ रही है।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद, जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने आनन-फानन में RSS पर बैन लगा दिया था। लेकिन क्या ये बैन न्याय के आधार पर था? बिल्कुल नहीं! ये नेहरू की राजनीतिक असुरक्षा और उनकी कुंठा का नतीजा था। विभाजन के वक्त जब पूरे देश में कत्लेआम मचा था, कांग्रेस सरकार और उसका पूरा तंत्र असहाय और पंगु हो चुका था।
उस वक्त आरएसएस के स्वयंसेवकों ने अपनी जान पर खेलकर लाखों हिंदुओं और सिखों को पाकिस्तान से सुरक्षित निकाला था। संघ के सेवा कार्य से उसकी लोकप्रियता आसमान छू रही थी और यही बात नेहरू को खटक रही थी।
गांधी जी की हत्या तो बस एक बहाना थी। नेहरू को RSS को कुचलने का मौका मिल गया। हज़ारों स्वयंसेवकों को बिना किसी सबूत के जेलों में ठूंस दिया गया। लेकिन बाद में क्या हुआ? कपूर कमीशन की रिपोर्ट हो या खुद अदालत का फैसला- सबने ये साफ कर दिया की गांधी जी की हत्या से RSS का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। सरकार को मुंह की खानी पड़ी और संघ से बैन हटाना पड़ा।
लेकिन क्या कांग्रेस ने कभी इसके लिए माफी मांगी? नहीं! उन्होंने इस झूठ को ज़िंदा रखा ताकि मुसलमानों को डराया जा सके और अपना वोट बैंक सुरक्षित रखा जा सके। फिल्म ‘आखिरी सवाल’ में संजय दत्त का किरदार इसी काले पन्ने को खोलेगा।
जब परदे पर ये दिखाया जाएगा की कैसे नेहरू सरकार ने सत्ता का दुरुपयोग करके एक देशभक्त संगठन को कुचलने की साज़िश रची थी, तो लिबरलों के चेहरों की हवाइयां उड़ना तय है। उन्हें समझ आ जाएगा कि अब उनका ये फर्जी कार्ड एक्सपायर हो चुका है।
नेहरू का घमंड टूटना- ‘आखिरी सवाल’ दिखाएगी जब 1962 के युद्ध में RSS बना संकटमोचक, और वामपंथी इतिहासकारों की बोलती हुई बंद
वैसे, इतिहास के पन्नों को पलटें तो कांग्रेस के दोहरे मापदंड का एक और ऐसा किस्सा है जिस पर ये लिबरल हमेशा मिट्टी डाल देते हैं। बात 1962 के भारत-चीन युद्ध की है। चाचा नेहरू के ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ वाले गुब्बारे की जब हवा निकली और चीन ने हमारी पीठ में छुरा घोंपा, तब दिल्ली में बैठी सरकार के हाथ-पांव फूल गए थे।
सेना के पास ना तो ढंग के जूते थे और ना ही ऊंचे पहाड़ों पर लड़ने लायक हथियार। नेहरू की नीतियां पूरी तरह फेल हो चुकी थीं और देश एक गहरे संकट में था।
ऐसे वक्त में, जब बॉर्डर पर हमारे जवान अपनी जान की बाज़ी लगा रहे थे, देश के भीतर व्यवस्था संभालने के लिए कौन आगे आया? वही RSS, जिसे नेहरू ने कभी बैन करके कुचलने की कोशिश की थी!
जब दरबारी पत्रकार और वामपंथी नेता चीन के गुणगान कर रहे थे (और ये कोई छुपी बात नहीं है कि कम्युनिस्टों ने उस वक्त चीन का ही साथ दिया था), तब संघ के स्वयंसेवक सड़कों पर उतर आए थे। दिल्ली से लेकर असम तक, मिलिट्री का सामान ढोना हो, छावनियों तक रसद पहुंचानी हो, या फिर ब्लड डोनेशन कैंप लगाकर खून देना हो- ये सारे काम बिना किसी स्वार्थ के आरएसएस के लोगों ने किए।
ये वो हकीकत है जिसे वामपंथी इतिहासकार बिल्कुल हज़म नहीं कर पाते। ‘आखिरी सवाल’ की डिबेट में संजय दत्त का किरदार जब इस वाकये को कोट करेगा, तो सोचिए स्क्रीन पर क्या माहौल बनेगा! और सबसे बड़ा तमाचा तो तब पड़ेगा जब फिल्म में 1963 की गणतंत्र दिवस परेड का ज़िक्र आएगा। 1962 में संघ के इसी निस्वार्थ काम को देखकर खुद नेहरू का घमंड टूट गया था।
उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ (या यूं कह लें की जनता का दबाव ही इतना था) की उन्हें अगले ही साल 1963 की राजपथ परेड में आरएसएस को आधिकारिक न्योता देना पड़ा। उस दिन 3000 स्वयंसेवक अपनी फुल यूनिफॉर्म (गणवेश) में राजपथ पर मार्च करते नज़र आए थे।
ज़रा सोचिए, जो कांग्रेस आज सुबह-शाम संघ को ‘देशद्रोही’ और ‘तिरंगा न फहराने वाला’ बताती है, उसी पार्टी के सबसे बड़े नेता को संघ के राष्ट्रवाद के आगे नतमस्तक होना पड़ा था।
जब फिल्म में संजय दत्त लुटियंस के इन सो-कॉल्ड इंटेलेक्चुअल्स से पूछेंगे कि “जिस संघ को नेहरू ने खुद राजपथ पर बुलाया था, वो अचानक से अछूत कैसे हो गया?” तब कांग्रेसियों के पास मुंह छुपाने की भी जगह नहीं बचेगी। ये सीन थिएटर में ऐसी तालियां बटोरने वाला है की लिबरलों के कानों के पर्दे फट जाएंगे।
तानाशाह इंदिरा का घमंड और कांग्रेस का काला अध्याय- सिनेमाघरों में दिखेगा कैसे इमरजेंसी में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल बना था RSS
आजकल कांग्रेस वाले बहुत ‘लोकतंत्र बचाओ’ और ‘संविधान खतरे में है’ का नारा लगाते घूमते हैं। लेकिन जब भारत के इतिहास में सच में लोकतंत्र की हत्या हुई थी, तब इन्होंने क्या किया था? 1975 की इमरजेंसी (आपातकाल)- स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय।
जब इंदिरा गांधी की कुर्सी खतरे में पड़ी, तो उन्होंने पूरे देश को जेलखाना बना दिया। मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई, विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं को मीसा (MISA) के तहत रातों-रात गिरफ्तार कर लिया गया और आम जनता के मौलिक अधिकार छीन लिए गए।
उस भयानक दौर में जब कांग्रेस का आतंक चरम पर था, तब तानाशाही के खिलाफ सबसे बड़ी और सबसे मजबूत लड़ाई किसने लड़ी थी? जवाब है- RSS ने! ज़ाहिर है, वामपंथी इतिहासकार इस बात को कभी अपनी किताबों में नहीं लिखते, लेकिन ‘आखिरी सवाल’ इस सच्चाई को देश के सामने पूरे गर्व के साथ रखेगी।
जब सारे नेता जेल में थे, तब RSS के लाखों स्वयंसेवकों ने अंडरग्राउंड होकर ‘सत्याग्रह’ का नेतृत्व किया। पुलिस की लाठियां खाईं, अमानवीय यातनाएं सहीं, लेकिन झुके नहीं। छुप-छुपाकर लोकतंत्र के समर्थन में पर्चे छापे गए, आम जनता को जागरूक किया गया और इंदिरा गांधी की तानाशाही की जड़ें खोदने का काम किया गया। कांग्रेस ने उस वक्त भी संघ पर बैन लगा दिया था।
फिल्म में उस दौर के जुल्मों को बेबाकी से दिखाया जाएगा। ज़रा सोचिए, जब सिनेमाघरों में दर्शक देखेंगे की कैसे कांग्रेस ने सत्ता के नशे में चूर होकर देश को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, और कैसे सामान्य स्वयंसेवकों ने भारत माता की खातिर अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था, तो कांग्रेस का यह ‘लोकतंत्र रक्षक’ होने का ढोंग हमेशा-हमेशा के लिए बेनकाब हो जाएगा।
संजय दत्त के भारी-भरकम डायलॉग्स जब उस कालखंड की गवाही देंगे, तो थिएटर में बैठे हर सच्चे भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा और कांग्रेसियों को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी।
6 दिसंबर 1992- फिल्म में दिखेगा जब जागे हुए हिन्दू स्वाभिमान ने ढहाया मुस्लिम आक्रांताओं का बाबरी कलंक, और लिबरल छाती पीटकर रोए
अब बात करते हैं उस मुद्दे की जिसे वामपंथियों ने भारत के इतिहास का ‘ब्लैक डे’ बनाकर पेश करने की पूरी कोशिश की- 6 दिसंबर 1992। बाबरी ढांचे का विध्वंस। ‘आखिरी सवाल’ इस मुद्दे पर भी बिल्कुल डिफेंसिव नहीं है, बल्कि यह पूरी आक्रामकता के साथ उस नैरेटिव को चुनौती देती है।
लुटियंस गैंग ने हमेशा राम जन्मभूमि आंदोलन को एक ‘दंगा’ या ‘सांप्रदायिक घटना’ के तौर पर पेश किया। उन्होंने कभी ये नहीं बताया कि ये 500 सालों के उस दर्द और संघर्ष का नतीजा था जो हिंदू समाज ने अपने ही भगवान के जन्मस्थान को वापस पाने के लिए सहा था।
1990 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां चलवा दीं, सरयू नदी का पानी खून से लाल हो गया, लेकिन किसी भी सेक्युलर पत्रकार की आंखों से एक बूंद आंसू नहीं टपका। क्यों? क्योंकि मरने वाले सिर्फ हिंदू थे!
फिल्म इस बात को डंके की चोट पर उठाएगी। संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती के बीच होने वाली डिबेट में ये साफ कर दिया जाएगा की 6 दिसंबर 1992 कोई अपराध का दिन नहीं था, बल्कि वह हिंदू सभ्यता के पुनर्जागरण का दिन था। वह वो दिन था जब सदियों से दबाया गया हिंदू स्वाभिमान एक झटके में उठ खड़ा हुआ था और उसने गुलामी के उस कलंक को उखाड़ फेंका था।
वामपंथियों को सबसे ज़्यादा मिर्ची इसी बात से लगती है की अब नया भारत बाबरी गिरने पर शर्मिंदा नहीं होता, बल्कि उसे एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में देखता है। फिल्म में जब इस ‘कंट्रोवर्शियल’ विषय पर बिना किसी लीपा-पोती के, सीधे-सीधे बात होगी, तो लिबरलों के छाती पीटने की आवाज़ें जेएनयू के हॉस्टलों से लेकर वाशिंगटन पोस्ट के दफ्तरों तक सुनाई देंगी।
उनका इकोसिस्टम पूरी ताकत लगा देगा इस फिल्म को ‘सांप्रदायिक’ साबित करने में, लेकिन अब जनता जाग चुकी है। जनता को पता है की असली सांप्रदायिक वो लोग हैं जिन्होंने भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था।
केरल और बंगाल में वामपंथियों और मुस्लिम गुंडों का खूनी खेल- फिल्म दुनिया को दिखाएगी हिन्दू स्वयंसेवकों के उन बलिदानों का सच जिन्हें दरबारी मीडिया डकार गया
अब बात करते हैं उस खूनी सच की, जिसे ये ‘सेक्युलर’ मीडिया और इनकी मोमबत्ती ब्रिगेड बड़े ही आराम से पी जाती है। टीवी स्टूडियो में बैठकर मानवाधिकार, फ्रीडम ऑफ स्पीच और असहिष्णुता पर लंबा-चौड़ा ज्ञान बघारने वाले इन वामपंथियों का असली चेहरा अगर देखना हो, तो केरल और पश्चिम बंगाल का रुख कर लीजिए।
वहाँ जो ‘लाल आतंक’ बरपा है, वो किसी से छिपा नहीं है, बस दिल्ली के लुटियंस मीडिया ने कभी उसे न्यूज़ नहीं बनने दिया।
‘आखिरी सवाल’ सिर्फ पुराने इतिहास को ही नहीं कुरेदेगी, बल्कि आज के इस नंगे सच को भी पूरी बेबाकी से स्क्रीन पर उतारेगी। दशकों से केरल के कन्नूर जैसे इलाकों में और बंगाल के गांव-गांव में वामपंथी और टीएमसी के गुंडों ने संघ के कार्यकर्ताओं का किस बेरहमी से खून बहाया है, ये बात जब मेनस्ट्रीम सिनेमा में आएगी, तो इन लिबरलों के होश उड़ जाएंगे।
जब किसी लेफ्टिस्ट या सो-कॉल्ड एक्टिविस्ट की उंगली में खरोंच भी आ जाती है, तो इनका पूरा इकोसिस्टम एक्टिव हो जाता है- इंटरनेशनल अख़बारों में लेख-वेख छपने लगते हैं, अवार्ड वापस होने लगते हैं।
लेकिन जब एक युवा स्वयंसेवक को सिर्फ इसलिए सरेआम काट दिया जाता है क्योंकि वो शाखा जाता था या वंदे मातरम बोलता था, तब इन मानवाधिकार वालों की ज़ुबान पर ताला लग जाता है। तब कोई छाती नहीं पीटता, कोई कैंडल मार्च-मार्च नहीं निकलता।
फिल्म के अंदर होने वाली उस महा-बहस में जब नमाशी चक्रवर्ती का किरदार संजय दत्त के सामने ये तथ्य रखेगा, और बदले में संजय दत्त इन लिबरल वामपंथियों का मुखौटा नोचेंगे, तो थिएटर में सन्नाटा छा जाएगा। एक-एक स्वयंसेवक का बहा खून, उनके परिवारों का दर्द और उनके छोटे-छोटे बच्चों की चीखें- जब ये सब बड़े पर्दे पर फ्लैश होगा, तो ये ‘अमन-पसंद’ होने का नाटक करने वाले कामरेड कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।
दाऊद के मुस्लिम अंडरवर्ल्ड और वामपंथियों का नापाक गठजोड़- हिन्दू को विलेन बताने वाले उर्दूवुड में अब गूंजेगा RSS का शंखनाद
‘आखिरी सवाल’ सिर्फ राजनीति को ही एक्सपोज़ नहीं कर रही, बल्कि यह खुद बॉलीवुड के उस पुराने काले इतिहास पर भी एक साइलेंट तमाचा है। एक वक्त था- खासकर 80 और 90 के दशक में- जब बॉलीवुड पूरी तरह से अंडरवर्ल्ड और दाऊद इब्राहिम के पैसों पर पलता था।
उस समय की फिल्मों का नैरेटिव क्या होता था? एक भ्रष्ट और बलात्कारी नेता हमेशा माथे पर तिलक लगाए, रुद्राक्ष पहने और संस्कृत के श्लोक पढ़ता हुआ एक हिंदू ही होता था। आतंकवादियों को ‘भटका हुआ नौजवान’ दिखाकर उनके लिए सहानुभूति पैदा की जाती थी और पुलिस या सिस्टम को विलेन बनाया जाता था।
इस पूरी साज़िश के पीछे वामपंथी लेखकों और अंडरवर्ल्ड के गठजोड़ का बहुत बड़ा हाथ था। उर्दू और वामपंथी सोच ने मिलकर हिंदी सिनेमा को ‘उर्दूवुड’ बना दिया था। हर वो चीज़ जो हिंदू या भारतीय संस्कृति से जुड़ी थी, उसे पिछड़ा, दकियानूसी या खतरनाक बताया जाता था।
लेकिन 2014 के बाद से देश की आबोहवा बदलने लगी और इसके साथ ही सिनेमा का नैरेटिव भी बदलने लगा। ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’ और ‘आर्टिकल 370’ जैसी फिल्मों ने बॉलीवुड के उस पुराने सिंडिकेट की कमर तोड़ कर रख दी। और अब ‘आखिरी सवाल’ उसी कड़ी में सबसे बड़ा और सबसे कड़ा प्रहार है।
मज़े की बात तो ये है की संजय दत्त, जिनका खुद का अतीत 1993 के मुंबई ब्लास्ट केस और अंडरवर्ल्ड के सायों से घिरा रहा है, आज वो एक ऐसी फिल्म का चेहरा हैं जो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की बात कर रही है। ये इस बात का सबसे बड़ा सबूत है की भारत में नैरेटिव की हवा किस दिशा में बह रही है।
लिबरलों को दर्द इस बात का नहीं है कि फिल्म बन रही है; असली दर्द ये है की उनका बनाया हुआ बॉलीवुड का किला अब ढह चुका है। अब फिल्म मेकर्स को उनकी परवाह नहीं है। अब राष्ट्रवाद कोई गाली नहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी और देश की आवाज़ बन चुका है।
8 मई 2026- कांग्रेस और लिबरलों के ताबूत में आखिरी कील, अब बस रोना-धोना शुरू कर दें ‘एंटी-हिंदू’ गैंग!
खैर, अब बस इंतज़ार है 8 मई 2026 का। जैसे-जैसे रिलीज़ की तारीख पास आएगी, आप देखेंगे की वामपंथी इकोसिस्टम अपने बिलों से बाहर निकलेगा। कोई विदेशी अखबारों में लेख लिखवाएगा, कोई सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) डालकर फिल्म पर बैन लगाने की मांग करेगा, तो कोई टीवी पर बैठकर फासीवाद का राग अलापेगा।
इनको करने दीजिए जो करना है। इनका ये तिलमिलाना, ये छटपटाहट ही इस बात का सुबूत है की फिल्म ने सही नस पर वार किया है। दशकों से जिन लोगों ने इतिहास के नाम पर सिर्फ कूड़ा-कचरा परोसा, जिन्होंने इस देश के युवाओं को अपनी ही जड़ों से नफरत करना सिखाया, आज उनकी दुकान हमेशा के लिए बंद होने की कगार पर है।
संजय दत्त ने जो हिम्मत दिखाई है, वो काबिले-तारीफ है। उन्होंने अपने ही पिता की पार्टी के पाखंड को दुनिया के सामने रखने का जो बीड़ा उठाया है, उसके लिए उन्हें देश के हर राष्ट्रवादी का समर्थन मिलना चाहिए। फिल्म में दिखाई गई हर डिबेट, हर तर्क, कांग्रेस के उन खोखले दावों की धज्जियां उड़ा देगा जो वो आज तक टीवी डिबेट्स में बड़ी बेशर्मी से करते आए हैं।
तो भाइयो-बहनो, अभी से तैयारी कर लीजिए। दिल्ली और जेएनयू के कामरेडों को हम यही सलाह देंगे की मार्केट से बर्नोल का स्टॉक इकट्ठा कर लें, क्योंकि 8 मई को थिएटर्स में जो आग लगने वाली है, उसकी तपिश सीधे उनके दिल और दिमाग को झुलसाने वाली है।
कांग्रेस और वामपंथियों ने मिलकर इस देश की सभ्यता, संस्कृति और संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठनों पर जो भी कीचड़ उछाला था, ‘आखिरी सवाल’ उस पूरे कीचड़ को साफ करके सच को आईने की तरह चमका देगी। अब ये उनके ऊपर है की वो उस सच को देखकर शर्मिंदा होते हैं या फिर अपनी पुरानी आदत के मुताबिक फिर से वही वामपंथी विलाप शुरू करते हैं। एक बात तो तय है- पिक्चर अभी बाकी है, और असली तांडव तो सिनेमाघरों में ही होगा!
