अभी कुछ दिन पहले ही देश के गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल की धरती से एक ऐसी दहाड़ लगाई, जिसने TMC के पूरे इकोसिस्टम की चूलें हिला दीं। शाह ने अपनी रैली में साफ-साफ और दो टूक लहज़े में कहा की 5 तारीख के बाद (यानी चुनाव खत्म होने के बाद) अगर किसी भी गुंडे ने आम नागरिक को परेशान किया, तो उन्हें उल्टा लटकाकर सीधा कर दिया जाएगा।
एक देश के गृहमंत्री के मुंह से देशद्रोहियों, अपराधियों और दंगाइयों के लिए ऐसी कड़ी बात सुनकर तो हर सच्चे भारतीय का सीना चौड़ा होना चाहिए। आखिर इसमें गलत क्या है? अगर कोई सरकार गुंडों को उल्टा लटकाने की बात कर रही है, तो इसका स्वागत होना चाहिए।
लेकिन नहीं! इस बयान से सबसे ज़्यादा मिर्ची किसे लगी? टीएमसी की सबसे ‘एलीट’ और अंग्रेजीदां नेता महुआ मोइत्रा को। मोहतरमा ने तुरंत कैमरे के सामने आकर अमित शाह को ही “गुंडा” कह डाला। ज़रा लॉजिक देखिए इनका! जो आदमी आतंकियों और रेपिस्टों का सफाया करने की बात कर रहा है, वो इनकी नज़र में गुंडा है। और जो संदेशखाली में महिलाओं की इज़्ज़त लूटते हैं, जो मुर्शिदाबाद में बम बांधकर घूमते हैं, वो क्या हैं? शांतिदूत?
दरअसल, महुआ मोइत्रा का ये दर्द बेवजह नहीं है। अमित शाह का सीधा इशारा TMC के उन ‘खास’ मुस्लिम गुंडों की तरफ था जिन्हें ममता बनर्जी ने अपनी प्राइवेट आर्मी की तरह पाल रखा है। शाह का वो बयान सीधा उस वोटबैंक पर चोट था, जिसके दम पर TMC बंगाल में अपनी गुंडागर्दी चलाती है।
महुआ को अच्छी तरह पता है की अगर चुनाव के बाद बीजेपी की सरकार आ गई और शाह ने अपना वादा पूरा कर दिया, तो इन ‘तोलाबाज़ों’ (वसूली करने वालों) और जिहादियों को छिपने के लिए बंगाल में जगह नहीं मिलेगी। इसलिए वो अपने असली गुंडों को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ी हो गई हैं।
चोरी और सीनाज़ोरी की भी एक हद होती है। एक तरफ आप कैमरे पर बैठकर विदेशी एक्सेंट में लोकतंत्र और सेक्युलरिज्म का ज्ञान बांटती हैं, और दूसरी तरफ ज़मीन पर आपके ही पाले हुए गुंडे हिंदुओं के घर जला रहे होते हैं। कभी महुआ मोइत्रा या उनके किसी भी वामपंथी-लिबरल दोस्त ने संदेशखाली के दरिंदों को ‘गुंडा’ कहा? नहीं। क्योंकि वहां उनके वोटबैंक का सवाल आ जाता है।
महुआ का बंगाल के स्वर्णिम हिंदू इतिहास के खिलाफ सफ़ेद झूठ- “बंगाल तो कभी इंडस्ट्रियल हब था ही नहीं”
महुआ मोइत्रा का इतिहास ही झूठ और फरेब की बुनियाद पर टिका है। कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में मैडम ने बड़ी ही बेशर्मी से एक ऐसा सफ़ेद झूठ बोला, जिसे सुनकर कोई भी सच्चा बंगाली या इतिहासकार शर्म से अपना सिर पीट ले।
उन्होंने कैमरे के सामने कह दिया की “बंगाल तो कभी मैन्युफैक्चरिंग हब था ही नहीं।” मतलब, जिस राज्य ने पूरे भारत में औद्योगिक क्रांति की नींव रखी, जिस ज़मीन ने देश को मशीनें और कारखाने दिए, उसी के इतिहास पर महुआ मोहतरमा ने एक झटके में कालिख पोत दी!
ज़रा सोचिए, वाइन का ग्लास हाथ में लेकर फाइव-स्टार होटलों या दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में बैठकर राजनीति करने वाले इन TMC नेताओं को ज़मीनी हकीकत का क्या ही पता होगा?
अपनी सरकार और अपने वामपंथी आकाओं के काले कारनामे और नाकामी छुपाने के लिए इन्होंने पूरे बंगाल के गौरवशाली इतिहास को ही सिरे से नकार दिया। आज अगर आप गूगल पर सिर्फ दो मिनट ‘बंगाल इंडस्ट्रियल हिस्ट्री’ या ‘कलकत्ता हाउडा इंडस्ट्रियल बेल्ट’ टाइप करें, तो इनका सारा प्रोपेगैंडा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
ये कोई हवा-हवाई बातें नहीं हैं। इतिहास गवाह है की कलकत्ता-हावड़ा बेल्ट यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के समय से ही भारत का सबसे बड़ा और सबसे ताक़तवर इंडस्ट्रियल पावरहाउस था।
19वीं और 20वीं सदी में, जब देश के बाकी हिस्सों में लोग बैलगाड़ियों पर चल रहे थे और खेती पर निर्भर थे, तब बंगाल में हुगली नदी के दोनों किनारों पर मीलों तक कारखानों की चिमनियों से धुआं उठता था। वहां दिन-रात हेवी मशीनें बन रही थीं, सायरन बजते थे और लाखों मज़दूर शिफ्टों में काम करते थे।
ज़रा याद करिए वो 70 और 80 का दशक। पूरे भारत की सड़कों पर वीआईपी से लेकर आम आदमी तक, जिस गाड़ी का राज था- वो ‘एम्बेसडर कार’ कहां बनती थी? वो किसी और राज्य में नहीं, बल्कि इसी बंगाल के हुगली ज़िले में स्थित ‘हिंदुस्तान मोटर्स’ के विशाल उत्तरपाड़ा प्लांट में बनती थी। ये प्लांट उस समय एशिया के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल कारखानों में से एक था।
इसके अलावा, भारत की सबसे बड़ी और नामी टायर बनाने वाली कंपनी ‘डनलप इंडिया’ का मुख्य केंद्र कहां था? उसका साहागंज प्लांट इसी बंगाल की शान हुआ करता था। क्या महुआ मोइत्रा को ये सब नहीं पता? बिलकुल पता है, लेकिन सच बोलना इनके एजेंडे में फिट नहीं बैठता।
इतना ही नहीं, भारत के बुनियादी ढांचे को खड़ा करने वाली हेवी इंजीनियरिंग का मक्का भी बंगाल ही था। ‘जेसोप एंड कंपनी’, ‘ब्रेथवेट’ और ‘बर्न स्टैंडर्ड’ जैसी विशालकाय कंपनियां बंगाल की धरती से ही ऑपरेट करती थीं।
आपको जानकर हैरानी होगी की कलकत्ता की जिस पहचान ‘हावड़ा ब्रिज’ पर खड़े होकर ये TMC वाले आज सेल्फी लेते हैं, उसके एक-एक कल-पुर्ज़े और भारी-भरकम स्टील गर्डर्स का निर्माण इन्हीं कंपनियों ने बंगाल की ही वर्कशॉप्स में किया था। ये कंपनियां रेलवे के वैगन से लेकर भारी क्रेन तक बनाती थीं।
अब बात करते हैं दवाइयों और केमिकल्स की। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय जैसे महान वैज्ञानिक द्वारा स्थापित ‘बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स’ ने ही पहली बार भारत को दवा उद्योग में आत्मनिर्भर बनाया था।
एक ज़माना था जब पूरे एशिया में इस कंपनी का डंका बजता था। वहीं आसनसोल और बर्नपुर बेल्ट में जाइये, जहां IISCO (इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी) का राज चलता था। टाटा स्टील के बाद ये देश का सबसे बड़ा और सबसे पुराना स्टील प्लांट था, जो बंगाल की माटी से भारत की नींव मज़बूत कर रहा था।
और जूट इंडस्ट्री को तो कोई कैसे भूल सकता है? पूरे हुगली नदी के किनारे 100 से ज़्यादा जूट मिलों की लाइन लगी रहती थी, जिसे ‘पूर्व का डंडी’ कहा जाता था। कपड़ा मिलों से लेकर चाय बागान, हेवी इंजीनियरिंग, लेदर इंडस्ट्री और शिपबिल्डिंग (जहाज़ निर्माण) तक, हर सेक्टर में बंगाल पूरे देश में नंबर वन था।
आज़ादी के समय और उसके दशकों बाद तक, बंगाल अकेले पूरे भारत की जीडीपी (GDP) में लगभग 20% से 25% का भारी-भरकम योगदान देता था। बॉम्बे और कलकत्ता भारतीय अर्थव्यवस्था के दो सबसे बड़े इंजन माने जाते थे।
ये सब कोई झूठी कहानी नहीं है, बल्कि वो कड़वा सच है जिसे वामपंथियों और ममता बनर्जी ने मिलकर दफना दिया है। महुआ का ये बयान सिर्फ उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि ये एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा है। दीदी और उनकी पार्टी को अच्छी तरह पता है की उन्होंने बंगाल से सारे उद्योग-धंधे भगा दिए हैं।
अब उनके पास बंगाल के युवाओं को नौकरी देने की न तो नीयत है और न ही औकात। इसलिए सबसे आसान रास्ता यही है की इतिहास को ही झुठला दो! ये कह दो की “यहां तो कभी इंडस्ट्री थी ही नहीं”, ताकि कोई उनसे सवाल ही न पूछे की आखिर वो सारे कारखाने गए कहां?
सच्चाई ये है की जिस बंगाल में कभी दुनिया भर के निवेशक पैसा लगाने आते थे, आज वहां टीएमसी के पाले हुए जिहादी गुंडे बम और कट्टे बना रहे हैं। कारखानों की जगह अब ‘सिंडिकेट राज’ और अवैध घुसपैठियों की बस्तियों ने ले ली है। और यही कारण है की बीजेपी लगातार बंगाल के उस खोए हुए गौरव को वापस लाने की बात कर रही है, जो महुआ मोइत्रा जैसे नेताओं को बिल्कुल रास नहीं आ रहा है।
लाल झंडे की तबाही- कम्युनिस्टों ने कैसे काटी बंगाल की जड़ें
बंगाल की इस बर्बादी की कहानी सिर्फ ममता बनर्जी से शुरू नहीं होती। इस ज़हर का बीज बोया था वामपंथियों (CPI-M) ने। ज्योति बसु के 30 साल के उस मनहूस राज को कोई सच्चा बंगाली भूल नहीं सकता। इन लाल झंडे वालों का एक ही फॉर्मूला था- ग़रीबी बांटो और राज करो।
कम्युनिस्टों ने बंगाल में ‘हड़ताल’ और ‘घेराव’ की ऐसी घटिया संस्कृति पैदा की, जिसने हंसते-खेलते उद्योगों की कमर तोड़ दी। कारखानों में प्रोडक्शन से ज्यादा यूनियनबाज़ी होने लगी।
अगर कोई फैक्ट्री मालिक अपने कर्मचारियों से काम करने को कहता, तो लाल झंडे वाले गुंडे फैक्ट्री के गेट पर ताला जड़ देते थे। एक-एक करके बंगाल की तमाम जूट मिलें बंद होने लगीं। हिंदुस्तान मोटर्स जैसी शानदार कंपनी इन्हीं यूनियन की दादागिरी का शिकार होकर दम तोड़ गई। डनलप के कारखानों में जाले लग गए।
वामपंथियों ने जानबूझकर बंगाल के मिडिल क्लास और इंडस्ट्रियलिस्ट्स को दुश्मन बनाकर पेश किया। पूंजीपतियों को गालियां दी गईं। नतीजा क्या हुआ? जो मारवाड़ी और बंगाली व्यापारी पीढ़ियों से कलकत्ता में व्यापार कर रहे थे, वे अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली भागने लगे।
कम्युनिस्टों ने शिक्षा व्यवस्था में भी घुसपैठ की। स्कूलों और कॉलेजों में अंग्रेजी का विरोध किया गया, जिससे बंगाल का युवा आईटी सेक्टर की रेस में भी पिछड़ गया। वामपंथियों ने 30 साल में एक समृद्ध सूबे को आर्थिक और सामाजिक तौर पर पूरी तरह अपाहिज कर दिया।
ममता का ‘पोरिबोरतोन’ या ‘हिंदुओं का कब्रिस्तान’? 6688 कंपनियों को भगाकर TMC ने बंगाल अवैध रोहिंग्याओं को सौंप दिया
2011 में जब ममता बनर्जी ने वामपंथियों को उखाड़ फेंका, तो पूरे बंगाल ने सोचा था की अब ‘मा, माटी, मानुष’ के नाम पर कुछ अच्छा होगा। ‘पोरिबोरतोन’ (बदलाव) का नारा गूंज रहा था। लेकिन दीदी का ये बदलाव तो वामपंथियों से भी ज्यादा भयानक साबित हुआ। ये बदलाव श्मशान की शांति वाला बदलाव था।
ममता बनर्जी की राजनीति भी उसी नेगेटिविटी और गुंडागर्दी पर टिकी थी जो कम्युनिस्टों की पहचान थी। इसका सबसे बड़ा और शर्मनाक उदाहरण है ‘टाटा नैनो’ (Tata Nano) प्रोजेक्ट। रतन टाटा खुद बंगाल आए थे। उन्होंने सिंगूर में एशिया का सबसे आधुनिक कार प्लांट लगाने का सपना देखा था। इससे हज़ारों युवाओं को डायरेक्ट जॉब मिलती और लाखों लोगों का व्यापार चमकता। लेकिन दीदी को तो अपनी राजनीति चमकानी थी।
उन्होंने किसानों को भड़काया, हाईवे जाम किए, और टाटा के इंजीनियरों को पीटा गया। आखिर में तंग आकर रतन टाटा को भारी मन से बंगाल छोड़ना पड़ा। वो रात बंगाल के औद्योगिक इतिहास की सबसे काली रात थी। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक एसएमएस भेजकर टाटा का स्वागत किया और रातों-रात वो प्रोजेक्ट साणंद शिफ्ट हो गया।
सिंगूर से टाटा के जाने के बाद बंगाल के माथे पर ‘एंटी-बिजनेस’ (उद्योग-विरोधी) का जो कलंक लगा, वो आज तक नहीं धुला। आंकड़े झूठ नहीं बोलते। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ममता बनर्जी के शासनकाल में 2011 से 2025 के बीच 6,688 कंपनियों ने बंगाल छोड़कर दूसरे राज्यों में पनाह ली। जो राज्य कभी एंटरप्राइज का हब था, आज वो ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ और रंगदारी का अड्डा बन चुका है।
इंडस्ट्री तो दूर की बात है, आज बंगाल में कोई एक छोटी सी दुकान भी खोलता है तो लोकल TMC लीडर उससे ‘तोला’ (हफ्ता) वसूलने पहुंच जाता है। जब जॉब ही नहीं बचेगी, पैसा ही नहीं आएगा, तो राज्य तरक्की कैसे करेगा?
TMC का ‘तोलाबाज़ी’ मॉडल- आखिर क्यों बंगाल में हिंदू व्यापारी फैक्टरियां खोलने से डरता है
बंगाल की बर्बादी की चर्चा जब भी होती है, तो लोग अक्सर बड़ी फैक्ट्रियों के बंद होने की बात करते हैं। लेकिन जो कैंसर बंगाल की अर्थव्यवस्था को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है, वो है- TMC का ‘सिंडिकेट राज’ और ‘तोलाबाज़ी’।
ज़रा सोचिए, एक ऐसा राज्य जहाँ एक आम आदमी को अपने हक की ज़मीन पर घर बनाने के लिए भी पार्टी के लोकल गुंडों को ‘परमिशन मनी’ देनी पड़ती हो, वहाँ कोई बड़ा उद्योगपति निवेश करने की हिम्मत कैसे करेगा? ममता बनर्जी के राज में बंगाल ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में नहीं, बल्कि ‘इज ऑफ डूइंग रंगदारी’ में नंबर वन बन चुका है।
यहाँ ‘सिंडिकेट’ शब्द का मतलब कोई बिजनेस ग्रुप नहीं, बल्कि TMC के उन मुस्लिम लड़ाकों और अपराधियों का जमावड़ा है, जिन्होंने बंगाल के कंस्ट्रक्शन और सप्लाई चेन पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है। अगर कोई बिल्डर या आम हिंदू अपना घर बनवाना चाहता है, तो वो अपनी मर्जी से बाज़ार से ईंट, बालू (रेत) या सीमेंट नहीं खरीद सकता।
उसे वही घटिया क्वालिटी का सामान और वो भी बाज़ार से दोगुनी कीमत पर इन्हीं ‘सिंडिकेट’ वालों से ही खरीदना होगा। अगर मना किया, तो अगले ही दिन उसके घर के बाहर बम फूटेंगे या उसके परिवार को जान से मारने की धमकियां मिलने लगेंगी।
ये सिंडिकेट दरअसल TMC की वो ‘इकनॉमिक विंग’ है, जो बंगाल के हिंदुओं की जेब काटती है और उस पैसे से चुनाव के दौरान बम और गोलियां खरीदी जाती हैं।
हकीकत तो ये है की खुद ममता बनर्जी को भी सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार करना पड़ा था की उनकी पार्टी के नेता ‘कट मनी’ (वसूली का हिस्सा) ले रहे हैं। लेकिन क्या इससे कुछ बदला? बिल्कुल नहीं।
ये तो सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक नाटक था। बंगाल में आज ‘तोलाबाज़ी’ एक ऑर्गेनाइज्ड क्राइम बन चुका है। सड़कों पर चलने वाले ऑटो रिक्शा वाले से लेकर, फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले गरीब हिंदू रेहड़ी-पटरी वालों तक, हर किसी की कमाई का एक हिस्सा सीधे TMC के दफ्तर में जाता है।
सबसे खौफनाक पहलू ये है की इन सिंडिकेट्स का नेतृत्व ज़्यादातर वही लोग कर रहे हैं जो या तो अवैध घुसपैठिए हैं या फिर कट्टरपंथी जिहादी मानसिकता के पालतू गुंडे हैं। संदेशखाली का शाहजहां शेख इसका जीता-जागता सबूत है। उसने न सिर्फ हिंदुओं की ज़मीनें छीनीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के पैसे तक में ‘कट मनी’ वसूल की।
जब उद्योगों के नाम पर बंगाल के पास कुछ बचा नहीं, तो TMC ने लूट-खसोट को ही अपना मुख्य उद्योग बना लिया। यही कारण है की आज बंगाल का पढ़ा-लिखा युवा पलायन करने को मजबूर है। उसे पता है की अगर वो बंगाल में कोई स्टार्टअप शुरू करेगा, तो पहले ही महीने उसे TMC के ‘तोलाबाज़ों’ के सामने नाक रगड़नी होगी।
जब तक ये सिंडिकेट राज खत्म नहीं होता, बंगाल में विकास की एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती। ये नेक्सस इतना गहरा है की पुलिस और प्रशासन भी इनके सामने नतमस्तक हैं। लेकिन 2026 के चुनावों में बीजेपी का जो संकल्प है- ‘भ्रष्टाचार मुक्त बंगाल’- वो सीधा इसी सिंडिकेट की जड़ पर प्रहार है।
अमित शाह ने जब गुंडों को उल्टा लटकाने की बात की, तो सबसे ज़्यादा पेट में दर्द इन्हीं सिंडिकेट चलाने वालों के हुआ, क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी काली कमाई और गुंडागर्दी के दिन अब गिने-चुने ही रह गए हैं। बंगाल का हिंदू अब अपनी मेहनत की कमाई इन जिहादी सिंडिकेट्स को दान करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
ग़रीबी, जिहाद और TMC का ईकोसिस्टम- आखिर इनको बंगाल में कोई इंडस्ट्री क्यों नहीं चाहिए?
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है की आखिर TMC को बंगाल में इंडस्ट्री क्यों नहीं चाहिए? ममता बनर्जी क्यों नहीं चाहतीं की विदेशी निवेश आए, कारखाने खुलें और युवाओं को रोजगार मिले?
इसका जवाब बहुत सीधा और खौफनाक है। TMC का पूरा राजनीतिक ढांचा ही ग़रीबी और अशिक्षा पर टिका है। अगर राज्य में बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ आ गईं, युवा पढ़-लिख कर अच्छी नौकरियों में लग गए, उनके हाथ में पैसा आ गया, तो फिर TMC की रैलियों में भीड़ कौन बढ़ाएगा? फिर झंडे उठाने वाले, बम बांधने वाले और बूथ लूटने वाले दिहाड़ी गुंडे कहां से मिलेंगे?
एक पढ़ा-लिखा, आत्मनिर्भर इंसान कभी दंगों में शामिल नहीं होता। इसलिए TMC की सोची-समझी साज़िश है की युवाओं को बेरोजगार और गरीब ही रखा जाए, ताकि सिर्फ 500 रुपये और एक बोतल दारू के लालच में उनसे कुछ भी करवाया जा सके।
और इस पूरे ईकोसिस्टम की सबसे घिनौनी कड़ी है मुस्लिम तुष्टिकरण और अवैध घुसपैठ। जब इंडस्ट्री खत्म हो गई और अर्थव्यवस्था चरमरा गई, तो सत्ता में बने रहने के लिए ममता बनर्जी ने एक नया शॉर्टकट अपनाया- कट्टरपंथी जिहादियों की फौज तैयार करना।
आज बंगाल के सीमावर्ती ज़िलों का डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) पूरी तरह बदल चुका है। बांग्लादेश से आने वाले अवैध घुसपैठियों और रोहिंग्याओं के रातों-रात आधार कार्ड और वोटर आईडी बना दिए जाते हैं। इन्हें बसाया जाता है, और बदले में ये बन जाते हैं TMC के पक्के वोटर और प्राइवेट आर्मी। ये वही लोग हैं जो रामनवमी की शोभायात्राओं पर छतों से पत्थर बरसाते हैं। ये वही लोग हैं जो दुर्गा पूजा के विसर्जन पर रोक लगवा देते हैं।
ज़रा संदेशखाली की उस खौफनाक दास्तान को याद करिए। शाहजहां शेख कोई आम मुजरिम नहीं था, वो TMC का एक ‘कद्दावर’ नेता था। उसने और उसके गुर्गों ने पूरे इलाके को अपनी जागीर बना रखा था। हिंदुओं की ज़मीनें छीनी गईं, उन्हें रातों-रात पानी में डुबोकर मछलियों के तालाब (भेंड़ी) में बदल दिया गया।
और सबसे खौफनाक- TMC के ये मुस्लिम गुंडे बंगाली हिंदू महिलाओं को उनके घरों से रात में उठाकर पार्टी ऑफिस ले जाते थे और उनके साथ दरिंदगी करते थे। पुलिस मूकदर्शक बनी रहती थी, क्योंकि ऊपर से ‘दीदी’ का ऑर्डर था की शाहजहां शेख को कोई हाथ नहीं लगाएगा। जब ईडी (ED) की टीम वहां पहुंची, तो इन्हीं गुंडों ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया।
महुआ मोइत्रा को ये शाहजहां शेख गुंडा नज़र नहीं आता। उन्हें हुमायूं कबीर जैसे नेता गुंडे नज़र नहीं आते जो खुले मंच से धमकी देते हैं की “हम मुर्शिदाबाद में 70 प्रतिशत हैं, हम हिंदुओं को दरिया में फेंक देंगे” या फिर बंगाल में ही बाबरी मस्जिद दोबारा बनाने का संकल्प लेते हैं। ये असली ‘गुंडे’ हैं दीदी के! इन्होंने बंगाल को इस्लामी चरमपंथ का एक ऐसा बारूद का ढेर बना दिया है, जहां हर हिंदू आज अपने ही राज्य में डरा हुआ है।
2026 के विधानसभा चुनाव- छटपटाते TMC के मुस्लिम गुंडे और पहले फेज़ का तांडव
यही कारण है की 2026 का ये विधानसभा चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं है, ये बंगाल के अस्तित्व की, हिंदुओं के मान-सम्मान की और धर्म की लड़ाई है। TMC को साफ दिख रहा है की इस बार उनका ये ‘सिंडिकेट राज’ खत्म होने वाला है। इसलिए उन्होंने पहले ही दिन से हिंसा और गुंडागर्दी का अपना पुराना खेल शुरू कर दिया है।
अप्रैल 2026 में जब पहले फेज़ (Phase 1) की वोटिंग शुरू हुई, तो जो तस्वीरें सामने आईं वो लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली थीं। मुर्शिदाबाद के डोमकल, राणीनगर और कुमारगंज जैसे इलाकों में TMC के गुंडों ने खुलेआम बूथ कैप्चरिंग की कोशिश की।
जो सेंट्रल फोर्स (CRPF) शांतिपूर्ण चुनाव करवाने आई थी, उन जवानों तक को इन जिहादियों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। बमबाज़ी की गई, गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई ताकि आम हिंदू वोटर डर के मारे घर से बाहर ही ना निकले।
लेकिन इस बार हालात बदल चुके हैं। दीदी के गुंडों का खौफ अब काम नहीं कर रहा। बमबारी और धमकियों के बावजूद बंगाल के हिन्दू परिवार जोरों शोरों से मतदान करने पहुंच रहे हैं। लोग अपनी जान हथेली पर रखकर वोट डालने निकले। और इस पूरे प्रतिरोध के चेहरे बने हुए हैं बीजेपी के शेर, सुवेंदु अधिकारी।
सुवेंदु अधिकारी किसी एसी कमरे में बैठकर ट्वीट नहीं कर रहे, वो सड़क पर उतरे हुए हैं। वो हर उस पोलिंग बूथ पर पहुंच रहे हैं जहां ये गुंडे धांधली करने की कोशिश कर रहे हैं। वो सीधा पुलिस वालों और TMC के छर्रों की आंखों में आंखें डालकर उन्हें उनकी औकात याद दिला रहे हैं। बंगाल का हिंदू आज सुवेंदु अधिकारी और बीजेपी के रूप में अपना वो रक्षक देख रहा है, जिसका इंतज़ार वो दशकों से कर रहा था।
5 तारीख के बाद होगा असली ‘खेला’- बंगाल में खिलेगा भगवा कमल, और TMC के जिहादी गुंडे उल्टे लटकेंगे
तमाम वामपंथी-लिबरल मीडिया चाहे कितना भी चीख ले, महुआ मोइत्रा जैसे ‘सूट-बूट’ वाले नेता चाहे कितना भी विक्टिम कार्ड खेल लें, हकीकत ये है । बंगाल में अब TMC के दिन गिने-चुने बचे हैं। जो जनता 34 साल पुराने लाल किले को उखाड़ कर फेंक सकती है, वो ममता की इस खून-खराबे वाली सरकार को भी बंगाल की खाड़ी में डुबाने का माद्दा रखती है।
अमित शाह की वो चेतावनी खाली बयानबाज़ी नहीं थी, वो एक संकल्प था। पांच तारीख के बाद जैसे ही वोटों की गिनती होगी और कमल खिलेगा, बंगाल के अंदर सफाई अभियान शुरू होगा।
जिन गुंडों ने राम भक्तों पर गोलियां चलवाईं, जिन दरिंदों ने संदेशखाली में महिलाओं के सम्मान को रौंदा, और जिन्होंने सिंडिकेट बनाकर बंगाल के उद्योगों को खाक में मिलाया, उन सबको कानून के दायरे में ऐसा ‘उल्टा लटकाया’ जाएगा की उनकी आने वाली पुश्तें भी याद रखेंगी।
बंगाल कभी भी कायरों की भूमि नहीं रहा। ये स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती है। जिस बंगाल ने भारत को राष्ट्रवाद का मंत्र दिया, वो ज्यादा दिन तक इन जिहादियों और भ्रष्टाचार की दीमकों का गुलाम नहीं रह सकता। अब कोई झूठ काम नहीं आएगा। बंगाल के पुनर्जागरण का समय आ गया है, और इस बार का ‘खेला’ सिर्फ भगवा झंडे के साये में ही खत्म होगा। दीदी का खेल अब हमेशा के लिए खत्म है।
