हॉलीवुड की फिल्मों में जो जेम्स बॉन्ड सूट-बूट पहनकर, हाथ में गन लेकर और महंगी गाड़ियों में घूमते हुए जासूसी करता है ना, सच कहूं तो असली दुनिया में जासूसी वैसी बिल्कुल नहीं होती दोस्तों।
असल ज़िंदगी के जासूस कोई ग्लैमरस लाइफ नहीं जीते और ना ही उनके पीछे कोई स्लो-मोशन वाला म्यूज़िक बजता है।
असली जासूस वो होते हैं जो खामोशी से दुश्मन की मांद में घुसते हैं, उन्हीं के बीच अपना घर बसाते हैं, उनकी रग-रग से वाकिफ होते हैं और फिर दुश्मन के खात्मे की स्क्रिप्ट उन्हीं के बीच रह कर लिख डालते हैं।
आज हम भारत के एक ऐसे ही असली शूरवीर की बात करने जा रहे हैं, जिसकी कहानी किसी भी थ्रिलर फिल्म से दस गुना ज्यादा खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली है।
एक ऐसा जासूस जिसने पाकिस्तान में उसी के सिस्टम में घुसकर ऐसी तबाही मचाई की आज भी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का बच्चा-बच्चा उसका नाम सुनकर थर-थर कांपता है।
भारत के उस ‘ब्लैक टाइगर’ का नाम है- रविंद्र कौशिक।
श्रीगंगानगर का वो मामूली सा लड़का जिसके ‘शौक’ ने उसे इतिहास लिखने के लिए चुना
बात 11 अप्रैल 1952 की है। राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक पंजाबी परिवार में एक लड़के का जन्म हुआ। नाम रखा गया रविंद्र कौशिक।
श्रीगंगानगर बिल्कुल पंजाब और पाकिस्तान के बॉर्डर से सटा हुआ इलाका है। जो लोग बॉर्डर के इतने करीब रहते हैं ना, उनके खून में देश के लिए मरने-मिटने का जज़्बा पैदाइशी होता है।
बचपन से ही रविंद्र ने आस-पास फौजियों का वो रौला और बॉर्डर की वो सरगर्मियां देखी थीं, जिसने उनके अंदर देशभक्ति का एक ऐसा बीज बो दिया था जो आगे चलकर एक बहुत बड़े तूफ़ान में बदलने वाला था।
रविंद्र कोई पैदाइशी फौजी या लड़ाकू किस्म के इंसान नहीं थे। वो एकदम मस्तमौला लड़के थे जिन्हें बचपन से ही एक्टिंग और मिमिक्री का भयंकर शौक था।
जब वो श्रीगंगानगर के एस.डी. बिहानी कॉलेज (S.D. Bihani College) में पहुंचे, तो वहां के थिएटर ग्रुप की जान बन गए।
उनकी एक्टिंग में ऐसा जादू था की जब वो स्टेज पर खड़े होकर डायलॉग बोलते थे, तो सामने बैठी पब्लिक पलकें झपकाना भूल जाती थी।
वो किसी की भी आवाज़, किसी का भी लहज़ा और किसी भी इंसान का चाल-चलन चुटकियों में कॉपी कर लेते थे।
लेकिन उस वक्त इस 22-23 साल के लड़के को भी अंदाज़ा नहीं था की उसकी यही खूबी, उसका यही मिमिक्री और एक्टिंग का टैलेंट, उसे भारत की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी रॉ (RAW – Research and Analysis Wing) के रडार पर ला खड़ा करेगा।
रविंद्र का ये टैलेंट एक जासूस का वो सबसे बड़ा हथियार था जिससे वो पूरी दुनिया की आंखों में धूल झोंक सकता था।
थिएटर की दुनिया से निकलकर RAW का सबसे खूंखार जासूस बनने का रविंद्र कौशिक का वो अकल्पनीय सफर
किस्मत का खेल देखिए! 1975 के आस-पास उत्तर प्रदेश के लखनऊ में एक नेशनल लेवल का ड्रामा फेस्टिवल चल रहा था। देश भर से थिएटर आर्टिस्ट वहां आए हुए थे और रविंद्र कौशिक भी वहां अपनी परफॉरमेंस दे रहे थे।
उसी भीड़ में छुपकर भारत की खुफिया एजेंसी RAW के कुछ बड़े अधिकारी भी बैठे थे, जो असल में देश के लिए एक ‘परफेक्ट जासूस’ की तलाश में वहां आए थे।
जब उन्होंने स्टेज पर रविंद्र कौशिक को देखा, तो उनका दिमाग सुन्न रह गया। अधिकारियों ने तुरंत भांप लिया की जो लड़का स्टेज पर इतनी सफाई से अपनी पहचान बदल सकता है, जो हजारों लोगों की भीड़ को अपनी एक्टिंग से बेवकूफ बना सकता है…
अगर इसे सही ट्रेनिंग दी जाए, तो ये दुश्मन के देश में जाकर भी बिल्कुल वैसी ही एक्टिंग कर सकता है और कोई उसे पकड़ भी नहीं पाएगा।
बस फिर क्या था, रॉ ने सीधे इस 23 साल के नौजवान को अप्रोच किया और उसके सामने देश के लिए जासूसी करने का ऑफर रख दिया।
एक आम लड़का शायद डर कर मना कर देता की यार पाकिस्तान जाना है, पकड़े गए तो बोटी-बोटी काट दी जाएगी। लेकिन इस हिंदुस्तानी शेर ने एक सेकंड की भी देरी नहीं की और सीधा सीना ठोक कर हां बोल दिया।
अब शुरू हुआ एक आम थिएटर आर्टिस्ट से ‘द ब्लैक टाइगर’ बनने का वो खौफनाक सफर, जिसके बारे में सोचकर ही रूह कांप जाए।
दिल्ली में उन्हें अंडरकवर रखा गया और करीब 2 साल तक ऐसी भयंकर ट्रेनिंग दी गई जो इंसान को अंदर से पूरी तरह तोड़कर रख देती है।
उन्हें उर्दू लिखनी और बोलनी सिखाई गई। उन्हें इस्लाम मज़हब की गहरी तालीम दी गई। उन्हें नमाज़ पढ़ना, कुरान की आयतें याद करना और बिल्कुल उसी लहज़े में पंजाबी बोलना सिखाया गया जैसी पंजाबी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बोली जाती है।
लेकिन एक जासूस बनने की सबसे बड़ी कीमत क्या होती है पता है? अपनी खुद की पहचान को अपने ही हाथों से ज़िंदा जला देना। देश के लिए रविंद्र कौशिक ने अपनी पूरी पुरानी ज़िंदगी मिटा दी।
उनके सारे स्कूल, कॉलेज के सर्टिफिकेट्स और पुरानी तस्वीरें नष्ट कर दी गईं। भारत के सरकारी रिकॉर्ड्स से ‘रविंद्र कौशिक’ नाम का वजूद ही खत्म कर दिया गया।
यहाँ तक की मेडिकल जांच में भी उन पर कोई शक न कर सके, इसके लिए उनका बाकायदा खतना (Circumcision) करवाया गया।
ज़रा सोचिए दोस्त! उस 23-24 साल के लड़के का जिगरा देखिए जिसने अपनी मिट्टी के लिए अपना नाम, अपना धर्म, अपना परिवार… सब कुछ एक झटके में कुर्बान कर दिया।
अब वो राजस्थानी लड़का रविंद्र कौशिक नहीं रहा था, अब जन्म हो चुका था भारत के उस खूंखार और घातक हथियार का, जो पाकिस्तान के सीने में खंजर घोंपने के लिए पूरी तरह से तैयार था।
मौत की आंखों में आंखें डालकर पाकिस्तान पहुंचा हिंदुस्तानी शेर और बन गया पाकिस्तानी आर्मी का ‘मेजर नबी अहमद शाकिर’
साल था 1975… देश में इमरजेंसी का माहौल था और उधर भारत का एक नौजवान मौत की आंखों में आंखें डालने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा था।
रॉ (RAW) ने रविंद्र कौशिक को एक नया नाम, एक नई पहचान और फर्जी दस्तावेज़ देकर बॉर्डर के उस पार भेज दिया। अब वो रविंद्र नहीं थे, वो बन चुके थे पाकिस्तान के नागरिक ‘नबी अहमद शाकिर’।
ज़रा सोचिए, आप एक ऐसे दुश्मन देश में कदम रख रहे हैं जहां अगर आपकी ज़बान भी थोड़ी सी फिसली, तो अगले ही पल आपको गोलियों से भून दिया जाएगा या किसी टॉर्चर सेल में उल्टा लटका दिया जाएगा।
लेकिन इस बंदे के जिगरे को दाद देनी पड़ेगी! नबी अहमद शाकिर बनकर जब वो पाकिस्तान पहुंचे, तो उन्होंने कोई छोटा-मोटा काम नहीं पकड़ा।
उन्हें पता था की अगर असली और पुख्ता खुफिया जानकारी चाहिए, तो सीधा सिस्टम की रगों में घुसना पड़ेगा।
उन्होंने सबसे पहले कराची यूनिवर्सिटी में लॉ (LLB) की पढ़ाई के लिए एडमिशन ले लिया। एक हिंदुस्तानी लड़का पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी में बैठकर वहां के कानून की पढ़ाई कर रहा था और मजाल है जो किसी प्रोफेसर या स्टूडेंट को रत्ती भर भी शक हुआ हो!
लेकिन असली धमाका तो अभी बाकी था।
ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद उन्होंने जो किया, वो जासूसी की दुनिया का सबसे बड़ा और खौफनाक मास्टरस्ट्रोक था। नबी अहमद शाकिर ने सीधा पाकिस्तानी आर्मी के लिए अप्लाई कर दिया!
भाई साहब, ये कोई फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है, ये असली हकीकत है जिसे पढ़कर आज भी दिमाग सुन्न हो जाता है। एक हिंदुस्तानी लड़के ने पाकिस्तान के सारे कड़े टेस्ट और मेडिकल पास कर लिए और उसे पाकिस्तानी सेना में बकायदा कमीशन मिल गया।
अपनी गज़ब की दिमागी काबिलीयत के दम पर वो पाकिस्तानी सेना के ‘मिलिट्री अकाउंट्स डिपार्टमेंट’ में तैनात हो गए और देखते ही देखते उनका प्रमोशन भी होता गया।
वो एक आम फौजी से सीधे ‘मेजर’ (Major) की रैंक तक पहुँच गए। अब वो पाकिस्तानी फौज के एक बड़े अफसर थे, जिनके एक इशारे पर सिपाही सैल्यूट मारते थे।
अपने इस कवर (Cover) को और भी ज्यादा मजबूत और अभेद्य बनाने के लिए उन्होंने एक और बड़ा कदम उठाया। उन्होंने पाकिस्तानी फौज के ही एक दर्जी (जो सेना की यूनिट के साथ जुड़ा था) की बेटी अमानत से शादी कर ली।
उनका एक बेटा भी हुआ। अमानत को तो छोड़िए, पाकिस्तानी फौज के बड़े-बड़े जनरलों को भी आखिरी सांस तक भनक नहीं लगी की जिस इंसान के साथ वो उठ-बैठ रहे हैं, दावतें खा रहे हैं, वो असल में भारत का सबसे खूंखार जासूस है जो उनकी जड़ें खोद रहा है।
जब इंदिरा गांधी ने दिया ‘द ब्लैक टाइगर’ का नाम और पाकिस्तान के ही सिस्टम में बैठकर भारत के इस शेर ने उधेड़ दी उनकी बखिया
1979 से लेकर 1983 तक का जो दौर था, वो रविंद्र कौशिक का गोल्डन एरा (Golden Era) था। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तानी फौज के अंदर बैठकर जो तबाही मचाई, उसने पाकिस्तान की पूरी खटिया खड़ी कर दी थी।
पाकिस्तानी सेना के अंदर क्या चल रहा है? उनकी ट्रूप मूवमेंट (Troop movement) कहां हो रही है? राजस्थान बॉर्डर को लेकर उनके क्या नए नापाक प्लान हैं? और यहां तक की उनके गुप्त न्यूक्लियर प्रोग्राम में क्या खिचड़ी पक रही है?
ये सारी टॉप सीक्रेट और खुफ़िया फाइलें रविंद्र कौशिक सीधा रॉ (RAW) के हेडक्वार्टर दिल्ली भेज रहे थे।
कहा जाता है की उन्होंने कई बार ऐसी सटीक और एडवांस जानकारी भेजी, जिससे भारत ने राजस्थान बॉर्डर पर पाकिस्तान के कई खतरनाक हमलों और साजिशों को पहले ही नाकाम कर दिया।
ज़रा सोचिए, उस एक अकेले हिंदुस्तानी शेर ने दुश्मन के घर में बैठकर हमारे हज़ारों फौजी भाइयों की जान बचाई थी! उनके द्वारा भेजे गए इनपुट्स इतने सॉलिड होते थे की भारत सरकार हमेशा पाकिस्तान से एक कदम आगे रहती थी।
जब ये टॉप सीक्रेट फाइलें उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की टेबल पर पहुँचती थीं, तो वो भी इस जासूस की हिम्मत और सटीकता देखकर हैरान रह जाती थीं।
इंदिरा गांधी इस बंदे के काम से इतनी ज्यादा इम्प्रेस हुईं की उन्होंने खुद रविंद्र कौशिक को एक नाम दिया- ‘द ब्लैक टाइगर’ (The Black Tiger)।
ये सिर्फ एक नाम नहीं था, ये भारत की वो दहाड़ थी जो पाकिस्तान के सीने में बैठकर गूंज रही थी।
‘द ब्लैक टाइगर’ ने पाकिस्तानी मिलिट्री और उनकी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के पूरे सिस्टम को उनके ही घर में घुसकर ऐसा नचाया था की आज भी पाकिस्तान के मिलिट्री अफसर इस नाम को सुनकर खौफ से कांपने लगते हैं।
दुश्मन को उसी के घर में, उसी की वर्दी पहनकर, उसी के हथियारों से मात देने का ये कारनामा भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो चुका था।
अपनों की एक छोटी सी चूक से दुश्मन के हत्थे चढ़ गया शेर, लेकिन ISI के सबसे खौफनाक टॉर्चर के आगे भी नहीं झुका ये ब्लैक टाइगर
कहते हैं ना, की जब आप आग से खेलते हैं, तो कभी-कभी चिंगारी अपने ही घर से भड़क जाती है। 1979 से लेकर 1983 तक सब कुछ एकदम परफेक्ट चल रहा था।
‘द ब्लैक टाइगर’ दुश्मन के सिस्टम को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था और आईएसआई (ISI) को भनक तक नहीं थी।
लेकिन 1983 में किस्मत ने एक बहुत ही दर्दनाक पलटी खाई। और सच कहूं तो, ये चूक रविंद्र कौशिक की नहीं थी, बल्कि हमारे ही सिस्टम यानी रॉ (RAW) की थी।
हुआ ये की रॉ ने रविंद्र कौशिक से संपर्क करने के लिए इनायत मसीह नाम के एक निचले स्तर के जासूस को पाकिस्तान भेजा। ये सबसे बड़ी गलती साबित हुई।
इनायत मसीह जैसे ही पाकिस्तान पहुंचा, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने उसे धर दबोचा। इनायत मसीह कोई रविंद्र कौशिक जैसा फौलादी शेर नहीं था।
जब आईएसआई ने उसे टॉर्चर सेल में ले जाकर थर्ड डिग्री दी, तो वो टूट गया और उसने दर्द के मारे ‘द ब्लैक टाइगर’ यानी मेजर नबी अहमद शाकिर का नाम उगल दिया।
सितम्बर 1983 का वो दिन था, जब पाकिस्तानी आर्मी के मेजर नबी अहमद शाकिर को गिरफ्तार कर लिया गया।
जब पाकिस्तानियों को पता चला की जो आदमी उनके साथ उठ-बैठ रहा था, जो उनके सीक्रेट्स जान रहा था, वो असल में एक हिंदुस्तानी जासूस है… तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
गिरफ्तारी के बाद कौशिक को सियालकोट के इंटेरोगेशन सेंटर (FIU) ले जाया गया। भाई साहब, 2 साल तक उन्हें वहां ऐसे-ऐसे अमानवीय और खौफनाक टॉर्चर दिए गए, जिनके बारे में सुनकर किसी भी आम इंसान की रूह कांप जाए।
लेकिन इस राजस्थानी शेर का जिगरा देखिए! आईएसआई ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया, उनके शरीर को बुरी तरह तोड़ दिया, लेकिन वो रविंद्र कौशिक के मुंह से हिंदुस्तान का एक भी सीक्रेट नहीं उगलवा पाए।
दुश्मन भी अंदर ही अंदर इस बंदे की दिमागी और शारीरिक ताकत का लोहा मान चुका था।
पाकिस्तान की जेल में 16 साल तक मौत से लड़ने वाला वो वीर जासूस जिसे भारत सरकार को ठुकराना पड़ा
1985 में पाकिस्तान की कोर्ट ने उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया।
जेल की उन अंधेरी कोठरियों से कौशिक ने छुप-छुप कर अपनी मां और परिवार को कुछ खत भेजे थे। उन खतों में कोई रोना-धोना नहीं था, बल्कि सिस्टम की उस कड़वी हकीकत का दर्द था जो किसी भी देशभक्त को चुभ सकता है।
अपने एक खत में उन्होंने बहुत ही बेबाकी से सवाल पूछा था- “क्या भारत जैसे बड़े देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?”
और मौत से कुछ समय पहले लिखे गए उनके एक खत की लाइन तो ऐसी है जो आज भी सिस्टम पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान छोड़ जाती है।
उन्होंने लिखा था- “अगर मैं अमेरिकन होता, तो 3 दिन में इस जेल से बाहर निकाल लिया जाता।”
अब यहां हमें जासूसी की दुनिया का एक बहुत कड़वा सच समझना होगा। ग्लोबल इंटेलिजेंस का एक अलिखित नियम है- “अगर तुम पकड़े गए, तो हम तुम्हें नहीं जानते।”
जब रविंद्र कौशिक पकड़े गए, तो भारत सरकार और सिस्टम ने वही किया जो दुनिया के हर देश की खुफिया एजेंसी करती है।
भारत ने आधिकारिक तौर पर उन्हें पहचानने से पूरी तरह इंकार (Disown) कर दिया। कागज़ों पर रविंद्र कौशिक नाम का भारत से कोई वास्ता नहीं था।
इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के अपने नियम होते हैं, जहाँ कभी-कभी देश के लिए अपने ही सबसे बेहतरीन प्यादों की कुर्बानी देनी पड़ती है।
आखिरकार, 16 साल तक जेल के नर्क, टीबी (TB) और दिल की बीमारी से लड़ते हुए… 21 नवम्बर 2001 को मियांवाली जेल में भारत के इस सबसे महान जासूस ने अपनी आखिरी सांस ली। उन्हें उसी जेल के पीछे एक बिना नाम वाली कब्र में दफना दिया गया।
लेकिन याद रखिए, रविंद्र कौशिक की कहानी कोई दुखभरी दास्तान नहीं है! वो कोई बेचारे या लाचार इंसान नहीं थे।
वो भारत माता के वो खूंखार शूरवीर थे, जिन्होंने दुश्मन को उसी के घर में जाकर ऐसा रुलाया था की आज भी पाकिस्तान का मिलिट्री सिस्टम उनकी कहानी सुनकर थर-थर कांपता है।
उन्होंने जो किया, वो कोई आम इंसान सौ जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। बिना नाम की कब्र में दफ्न होने के बावजूद, ‘द ब्लैक टाइगर’ का नाम आज हर उस हिंदुस्तानी के दिल पर राज करता है जो अपनी मिट्टी से प्यार करता है।
