Anti-Hindu politics reaches a dangerous peak, with 80 percent of MLAs Muslim, and Congress now India's "new Muslim League."

हिंदू विरोधी राजनीति का खतरनाक चरम, 80 प्रतिशत विधायक मुस्लिम, कांग्रेस ही अब भारत की ‘नई मुस्लिम लीग’

भारत का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, साल 1947 का वो खून खराबा कभी नहीं भुलाया जा सकेगा जब ‘मुस्लिम लीग’ की कट्टरपंथी जिहादी और अलगाववादी मानसिकता ने इस पवित्र भारत भूमि के दो टुकड़े कर दिए थे। मोहम्मद अली जिन्ना की उस ‘मुस्लिम लीग’ का एक ही मकसद था- इस्लाम के नाम पर हिन्दू समाज के खिलाफ घृणा फैलाना और ब्लैकमेल की राजनीति के जरिए अपने जिहादी एजेंडे को थोपना। 

‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का वो खौफनाक मंजर आज भी बंगाल और देश के अन्य हिस्सों के हिंदुओं की रूह कँपा देता है। उस समय देश ने सोचा था की बंटवारे के बाद कम से कम इस जिहादी मानसिकता का हमेशा के लिए खात्मा हो जाएगा। 

लेकिन विडंबना देखिए, आज 75 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद, उस जिन्नावादी मानसिकता ने पाकिस्तान के अंदर नहीं, बल्कि भारत की ही सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के अंदर अपना घर बना लिया है।

आज की कांग्रेस को देखकर यह सवाल केवल राजनीतिक गलियारों में ही नहीं, बल्कि हर एक राष्ट्रवादी और जागरूक हिंदू नागरिक के मन में उठ रहा है की क्या कांग्रेस अब एक धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रीय पार्टी रह गई है? या फिर वो पूरी तरह से मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण और इस्लामिक कट्टरपंथ की राजनीति करने वाला एक नया ‘मुस्लिम लीग 2.0’ बन चुकी है? 

हालिया विधानसभा चुनावों के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा, जनसांख्यिकी और हिन्दू समाज के अस्तित्व के लिए एक सीधा और बहुत बड़ा खतरा हैं।

कांग्रेस का जनाधार अब पूरे देश से, खासकर हिंदू बहुल क्षेत्रों से, पूरी तरह से सिकुड़ चुका है। अब ये पार्टी केवल और केवल मुस्लिम क्षेत्रों में ही अपनी राजनीतिक सांसें गिन रही है। ये कोई सामान्य राजनीतिक हार-जीत का मामला नहीं है, बल्कि ये एक खतरनाक खेल है जहाँ वोटबैंक के लिए राष्ट्रवाद की बलि चढ़ाई जा रही है। 

आज कांग्रेस केवल मुसलमानों के फतवों, उनके मौलवियों के फरमानों और उनके चरमपंथी विचारों के आगे नतमस्तक है। ये लेख उन तमाम आंकड़ों, तथ्यों और उन खौफनाक सच्चाइयों का पर्दाफाश करेगा जो ये साबित करते हैं की कांग्रेस अब एक राष्ट्रीय दल नहीं, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथियों का एक राजनीतिक मोहरा मात्र बनकर रह गई है.. यानी आज के भारत की ‘मुस्लिम लीग’।

80 प्रतिशत मुस्लिम विधायक कांग्रेस के ‘मुस्लिम लीग’ बनने और हिन्दू सफाए का जीता जागता सबूत 

राजनीति में बयानबाजी झूठ बोल सकती है, लेकिन आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। हालिया पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे कांग्रेस के भयंकर इस्लामीकरण की एक खौफनाक तस्वीर पेश करते हैं। 

असम और केरल में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का ‘स्ट्राइक रेट’ लगभग 80 प्रतिशत रहा है। इसका मतलब है की उसके 80% मुस्लिम उम्मीदवार जीत गए! 

जरा सोचिए, एक ऐसी पार्टी जो खुद को सभी धर्मों का नुमाइंदा बताती है, उसका स्ट्राइक रेट केवल मुस्लिम उम्मीदवारों के मामले में आसमान छू रहा है। इसका सीधा मतलब यह है की कांग्रेस का पूरा का पूरा ढांचा, उनकी चुनावी मशीनरी और उनकी नीतियां अब केवल मुस्लिम समुदाय की सेवा में लगी हुई हैं। ये कोई संयोग नहीं है, ये एक ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसी साजिश का राजनीतिक रूप है।

सबसे डरावना हाल तो असम का है। असम जो कभी अपनी महान अहोम संस्कृति, माँ कामाख्या के आशीर्वाद और वीर लचित बोरफुकन की वीरता के लिए जाना जाता था, आज वहां कांग्रेस ने अपनी पूरी राजनीतिक जमीन अवैध घुसपैठियों और जिहादी तत्वों के हवाले कर दी है।

आंकड़ों पर गौर करें: असम में कांग्रेस ने 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से 18 ने शानदार जीत दर्ज की। यानी आज की तारीख में असम में कांग्रेस के कुल 19 विधायकों में से 18 विधायक मुस्लिम हैं! 

यह आंकड़ा किसी भी राष्ट्रभक्त की नींद उड़ाने के लिए काफी है। क्या असम में हिंदू नहीं रहते? क्या वहां मूल निवासी असमिया समाज का कोई अस्तित्व नहीं है? जब एक पार्टी के 80% जीतने वाले विधायक केवल एक मुस्लिम समुदाय से आते हों, तो क्या उसे ‘मुस्लिम लीग’ कहना गलत होगा?

इससे भी बड़ा प्रहार हिन्दू समाज पर तब होता है जब हम दूसरे पक्ष के आंकड़े देखते हैं। असम में ही कांग्रेस ने 79 गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों (जिसमें हिंदू, आदिवासी शामिल हैं) को मैदान में उतारा था। और नतीजा क्या रहा? उन 79 में से केवल और केवल 1 उम्मीदवार जीत सका! 79 में से सिर्फ 1! 

यह कोई सामान्य हार नहीं है। ये साफ़-साफ़ दिखाता है की कांग्रेस पार्टी में अब हिंदुओं और गैर-मुस्लिमों के लिए कोई जगह नहीं बची है। कांग्रेस केवल उन क्षेत्रों में जीत रही है जहां जनसांख्यिकीय बदलाव हो चुका है, जहाँ मुस्लिम घुसपैठियों ने अपनी संख्या बढ़ा ली है।

यही हाल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का भी है। बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) जो खुद मुस्लिम तुष्टिकरण में किसी से पीछे नहीं है, उसने 47 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। 

लेकिन उससे भी दो कदम आगे निकलते हुए कांग्रेस ने बंगाल में 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दे दिया। कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत केवल इस बात पर लगा दी की वह खुद को मुस्लिमों का सबसे बड़ा साथी साबित कर सके। 

लेकिन बंगाल में कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली, लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है की ये दोनों ही सीटें मुस्लिम बाहुल्य थीं और दोनों जीतने वाले उम्मीदवार भी मुस्लिम ही थे। तमिलनाडु में भी पार्टी ने 2 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से 1 ने जीत दर्ज की। 

ये आंकड़े साफ़ कह रहे हैं की कांग्रेस का गैर-मुस्लिम और हिंदू आधार पूरी तरह से ढह चुका है। ये पार्टी अब केवल मस्जिदों से निकलने वाले फतवों और जुमे की नमाज के बाद होने वाले ध्रुवीकरण के सहारे जिंदा है। ये एक राष्ट्रीय पार्टी का एक क्षेत्रीय और कट्टरपंथी गुट में बदल जाने का जीता-जागता प्रमाण है।

केरल में जिहादी ताकतों के आगे नतमस्तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग का वो ज़हरीला गठजोड़ 

अब ज़रा दक्षिण की तरफ चलते हैं, उस केरल में जिसे ‘गॉड्स ओन कंट्री’ कहा जाता था, लेकिन जिसे वामपंथियों और कांग्रेस ने मिलकर ‘जिहादियों का सेफ हेवन’ बना दिया है। 

ये वही राज्य है जहाँ ‘लव जिहाद’ का सबसे घिनौना खेल पहली बार खेला गया और बाकायदा कोर्ट ने इसे माना। ये वही जगह है जहाँ PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) जैसे खूंखार और देशद्रोही संगठनों ने सालों-साल अपनी जड़ें जमाईं और जहाँ संघ और बीजेपी के बेगुनाह कार्यकर्ताओं को दिन-दहाड़े सड़क पर काट दिया जाता है।

यहाँ कांग्रेस का जो गठबंधन है, जिसे ये लोग बड़े शान से ‘यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ (UDF) कहते हैं, वो किसके सहारे टिका है, पता है? ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) के सहारे! 

इनके तो नाम में ही ‘मुस्लिम लीग’ चिपका हुआ है, किसी को कोई दूरबीन लगाकर थोड़ी खोजना है! ये वही लीग है जिसकी पैदाइश उसी जिन्नावादी सोच से हुई है जिसने इस देश के टुकड़े किए थे। और हमारी सेक्युलर-वेकुलर कांग्रेस उनके साथ गले मिलकर सरकारें बना रही है।

चुनाव के आंकड़े इस गठजोड़ की वो भयानक सच्चाई बताते हैं जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया वाले अक्सर दबा जाते हैं। केरल विधानसभा में कुल 140 सीटें हैं। इन 140 में से 35 सीटों पर इस बार मुस्लिम प्रत्याशियों ने कब्ज़ा जमाया है। और इसमें से 30 विधायक तो सीधे-सीधे कांग्रेस वाले गठबंधन के ही हैं! कांग्रेस के अपने 8 मुस्लिम विधायक जीते, और उनकी प्यारी सहेली ‘मुस्लिम लीग’ के 22 विधायक जीतकर आए।

ज़रा एक मिनट रुक कर इस पूरे गणित को समझिए। कांग्रेस का अपना खुद का वजूद केरल में कुछ बचा ही नहीं है। हिंदुओं और ईसाइयों ने तो इनसे बहुत पहले ही तौबा कर ली थी। 

ये पूरी तरह से मुस्लिम लीग की उन 22 सीटों वाली बैसाखी पर टिके हुए हैं। अगर आज शाम को मुस्लिम लीग वाले कह दें की हम समर्थन खींच रहे हैं, तो सुबह होते-होते केरल में कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। इनका कोई नामलेवा तक नहीं बचेगा वहां।

यही सबसे बड़ी वजह है की जब भी देश की आंतरिक सुरक्षा की बात आती है, आतंकवाद की बात आती है, राम मंदिर की बात आती है या फिर इस्लामिक कट्टरपंथ पर लगाम कसने की बात होती है, तो केरल से लेकर दिल्ली तक बैठे कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं के मुंह में एकदम से दही जम जाता है। एक शब्द नहीं निकलता इनके मुंह से! बोलेंगे भी कैसे यार? 

जिस ‘लीग’ के सहारे इनकी सियासी रोटियां सिक रही हैं, जिनकी उंगलियों पर ये नाच रहे हैं, उसी के खिलाफ कैसे बोल दें? ये तो सीधा-सीधा पॉलिटिकल ब्लैकमेल है, जिसके आगे पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी ने खुशी-खुशी अपने घुटने टेक दिए हैं।

और तो और, इस ‘लीग-मोह’ का सबसे भद्दा नज़ारा तो किसी और ने नहीं, खुद इनके सबसे बड़े नेता राहुल गांधी ने दिखाया था। याद है ना 2019 का वो वक्त? 

जब उत्तर प्रदेश के अमेठी में स्मृति ईरानी ने उनको ऐसा पछाड़ा की वो अपनी पुश्तैनी सीट छोड़कर भाग खड़े हुए। अब भागकर वो किसी और राज्य में भी जा सकते थे, पर वो गए कहाँ? सीधे केरल के वायनाड! क्यों भाई? पूरे देश में क्या और जगह नहीं थी?

वायनाड ही इसलिए गए क्योंकि वायनाड एक ऐसा इलाका है जहाँ डेमोग्राफी पूरी तरह से बदल चुकी है। वहां हिंदू अल्पसंख्यक बन चुके हैं और वहां चुनाव जीतने के लिए आपको किसी काम-वाम या विज़न की ज़रूरत नहीं होती। 

वहां सिर्फ ‘मुस्लिम लीग’ के हरे झंडों, मस्जिदों से निकलने वाले फतवों और मुस्लिम समुदाय के वोटबैंक की ज़रूरत होती है। राहुल गांधी को पता था की वहां बस मुस्लिम लीग का दामन थाम लो, जीत तो पक्की है।

जब देश की सबसे पुरानी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा ही अपनी लोकसभा सीट बचाने के लिए सारे राष्ट्रवादी उसूलों को ताक पर रखकर, कट्टरपंथियों की गोद में जाकर बैठ जाए, तो फिर आम जनता इनसे देश की सुरक्षा और अखंडता की क्या ही उम्मीद रखेगी? 

पिक्चर तो एकदम क्लीयर है भाई, इन्होंने तो कसम खा ली है की चाहे पूरा देश भाड़ में चला जाए, हिंदुओं का चाहे जो हश्र हो, लेकिन इस मुस्लिम वोटबैंक को खिसकने नहीं देना है।

एंटनी समिति की रिपोर्ट- जिसे कांग्रेस ने हिन्दू विरोध में अनसुना कर दिया

2014 का वो चुनाव तो आपको याद ही होगा ना? जब पूरे देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज ने सदियों की अपनी राजनीतिक तंद्रा को तोड़ा था। हिंदुओं ने दिखा दिया था की वो सिर्फ जातियों में बंटा हुआ एक बेवकूफ समाज नहीं है जिसे तुम हमेशा इग्नोर कर सको। 

उस साल देश ने नरेंद्र मोदी को प्रचंड बहुमत देकर दिल्ली की गद्दी पर बैठाया और कांग्रेस को इतनी बुरी तरह पीटा की वो महज़ 44 सीटों पर सिमट कर रह गए। उस वक्त कांग्रेस के भीतर हाहाकार मच गया था। सबको लगा कि अब तो पार्टी खत्म हो जाएगी।

तब कांग्रेस आलाकमान ने अपने ही एक बहुत पुराने, कद्दावर और सबसे वफादार नेता ए.के. एंटनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। उन्हें काम सौंपा गया की भाई, पता लगाओ की आखिर ऐसा क्या हो गया की देश की जनता ने हमें ऐसे उठाकर बाहर फेंक दिया।

एंटनी साहब ने पूरे देश का दौरा किया, नेताओं से बात की और फिर अपनी रिपोर्ट में बड़े ही साफ शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के लिख कर दिया की “कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण वाली छवि उसे भारी पड़ी है।”

उन्होंने आलाकमान को साफ-साफ आईना दिखाते हुए बताया था की देश के हिंदुओं को अब ये पक्का यकीन हो गया है की कांग्रेस सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों की पार्टी है। 

हिंदुओं को लगने लगा है की ये पार्टी बहुसंख्यक समाज की आस्था का मज़ाक उड़ाती है, उनके हकों को मारती है और सिर्फ एक ही समुदाय की जी-हुज़ूरी में लगी रहती है। और ज़रा ध्यान दीजिए, ये बात कोई RSS या बीजेपी का आदमी नहीं बोल रहा था, ये खुद कांग्रेस के ही एक सबसे बड़े नेता की रिसर्च का नतीजा था।

लेकिन हुआ क्या? उसके 12 साल बाद भी कुछ नहीं बदला। वो कुत्ते की दुम वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी, जो कभी सीधी नहीं होती। कांग्रेस का अहंकार, उनकी धृष्टता और उनकी हिंदू-विरोधी मानसिकता इतनी गहरी हो चुकी है की इन्होंने उस एंटनी रिपोर्ट को सीधा कूड़ेदान में फेंक दिया। 

2014 से लेकर आज 2026 तक पूरे 12 साल बीत चुके हैं। इन 12 सालों में कांग्रेस ने अनगिनत चुनाव हारे, कई राज्यों से इनकी सत्ता उखड़ गई, पूरे के पूरे संगठन में जंग लग गया, लेकिन क्या इन्होंने अपनी उस ‘मुस्लिम लीग’ वाली मानसिकता को छोड़ा? बिल्कुल नहीं! उल्टा इन्होंने तो उसे और ज़्यादा उग्र कर दिया।

इनके दिमाग में एक बात बहुत गहराई तक बैठ गई है की हिंदुओं को तो हम कभी जातियों में, कभी भाषा में, कभी उत्तर-दक्षिण के नाम पर बांट ही देंगे। कोई खुद को दलित समझेगा, कोई ठाकुर, कोई ब्राह्मण, तो कोई यादव… वो कभी एक होकर वोट नहीं डालेंगे। 

लेकिन मुसलमानों का वोट हम थोक के भाव में, पूरे के पूरे ब्लॉक में ‘मुस्लिम लीग 2.0’ बनकर ले लेंगे। इसी घिनौने कैलकुलेशन के चक्कर में इन्होंने तुष्टिकरण का ‘ओवरडोज़’ देना शुरू कर दिया।

इसी चक्कर में इन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के उस पावन प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का सीधा-सीधा बहिष्कार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में पहले ही हलफनामा देकर इन्होंने भगवान राम को काल्पनिक बता दिया था। 

और जब इनके ‘I.N.D.I.A’ गठबंधन वाले नेता खड़े होकर सरेआम सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू-मलेरिया’ और ‘कुष्ठ रोग’ से करते हैं, तो ये लोग बगलें झांकने लगते हैं। 

किसी के मुंह से विरोध का एक शब्द नहीं निकलता। इनकी सेकुलरिज्म की परिभाषा बस इतनी रह गई है की रोज़ा-इफ्तार की पार्टियों में जालीदार टोपी पहनकर बिरयानी खाओ, और जब हिंदुओं के त्योहार आएं- दीवाली या होली- तो पर्यावरण और पानी बचाने का झूठा ज्ञान बांटना शुरू कर दो।

एंटनी रिपोर्ट तो बस एक दिखावा था, असलियत में तो ये लोग कभी बदलना ही नहीं चाहते थे। ये इनकी हठधर्मिता है की चाहे पार्टी रसातल में चली जाए, पर ये ‘जिन्ना वाली राह’ नहीं छोड़ेंगे।

कट्टरपंथी मुस्लिम वोटबैंक पर डाका डालती कांग्रेस अब अखिलेश और ममता के लिए भस्मासुर बन चुकी है 

अब इस पूरे मुद्दे के एक और बहुत ही मज़ेदार और सियासी एंगल पर आते हैं, जो 2024 और आने वाले 2027 के यूपी इलेक्शन के हिसाब से बहुत बड़ा धमाका है।

आप खुद ठंडे दिमाग से सोचो, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) आज तक किस बेसिस पर चुनाव लड़ती और जीतती आई है? उनका वो इकलौता ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण। सालों-सालों से मुलायम सिंह यादव से लेकर आज अखिलेश यादव तक, सबने इसी एक वोटबैंक के लालच में क्या-क्या नहीं किया। 

अयोध्या में रामभक्त कारसेवकों के सीने पर गोलियां चलवा दीं, मुजफ्फरनगर दंगों में एकतरफा कार्रवाई की, आतंकवादियों के मुकदमे वापस लेने की कोशिशें कीं और तुष्टिकरण की वो सारी हदें पार कर दीं जो कोई सोच भी नहीं सकता था।

लेकिन अब अखिलेश भैया की टेंशन बहुत बुरी तरह बढ़ गई है। वो साफ देख रहे हैं की मुसलमानों को अब सपा, बसपा या आरजेडी जैसे क्षेत्रीय दलों की उतनी ज़रूरत नहीं रही है। क्यों? क्योंकि कांग्रेस खुद एक बहुत बड़ी ‘मुस्लिम पार्टी’ बनकर उभर रही है। कांग्रेस अब सीधे-सीधे सपा के उसी पके-पकाए मुस्लिम वोटबैंक में सेंध मार रही है।

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर बहुत बड़ा घमासान मचने वाला है। और इसकी वजह भी एकदम क्लीयर है। 

समाजवादी पार्टी वाले कोई पागल थोड़ी हैं जो ये चाहेंगे की जो फसल उन्होंने सालों की मेहनत और तुष्टिकरण से बोई है, जिसके लिए उन्होंने हिंदुओं की इतनी गालियां खाईं, उसे कोई राहुल गांधी या प्रियंका वाड्रा आकर यूं ही काट ले जाएं। कोई भी क्यों चाहेगा यार!

ये जो ‘I.N.D.I.A’ नाम का गठबंधन इन्होंने बनाया है, ये तो बस बाहर-बाहर से दिखाने के लिए है। असल में तो इनके बीच अंदर ही अंदर एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंपने का गेम चल रहा है।

 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर दावेदारी को लेकर इनके बीच खूब जूतम-पैजार हुई थी। हर कोई खुद को मुसलमानों का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने में लगा हुआ है।

सच पूछो तो कांग्रेस आज के वक्त में इन क्षेत्रीय दलों के लिए एकदम ‘भस्मासुर’ बन चुकी है। जिस दिन कांग्रेस का इस मुस्लिम वोटबैंक पर पूरे देश में पूरी तरह से कब्ज़ा हो गया, यकीन मानिए, उसी दिन वो अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के सिर पर हाथ रखकर उनका पॉलिटिकल करियर राख कर देगी। 

और मजे की बात ये है कि ये सारे क्षेत्रीय क्षत्रप ये बात बहुत अच्छे से समझते हैं। इसीलिए अब इनकी रातों की नींद उड़ी हुई है।

कांग्रेस में ‘हिंदुओं का पूर्ण सफाया’ और हिन्दू समाज का मोहभंग

भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज ने अब कांग्रेस के असली चेहरे को पूरी तरह से पहचान लिया है।

हिंदुओं का यह मोहभंग कोई एक दिन की घटना नहीं है। यह कांग्रेस के उन अनगिनत पापों का परिणाम है जो उसने पिछले कई दशकों में हिंदू आस्था और सनातन संस्कृति के खिलाफ किए हैं। 

यह वह पार्टी है जिसने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। यह वह पार्टी है जिसके नेता ‘भगवा आतंकवाद’ जैसा झूठा और घृणित शब्द गढ़ते हैं ताकि दुनिया भर में शांतिप्रिय हिंदू समाज को बदनाम किया जा सके। 

जब इनके सहयोगी दलों के नेता सनातन धर्म की तुलना ‘मलेरिया और डेंगू’ से करते हैं, तो कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मौन धारण करके उसका मौन समर्थन करता है। इनके लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल रोजा इफ्तार की पार्टियों में जालीदार टोपी पहनना और हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध लगाना या ज्ञान देना भर रह गया है।

जब हिन्दू अपने फोन पर देखता है की असम में कांग्रेस के टिकट पर लड़े 79 गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में से सिर्फ 1 जीता है, जब वो देखता है की कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक सिर्फ एक खास टोपी पहनने वाले समुदाय के हैं, तो उसका खून खौलता है। उसे समझ आ जाता है की अगर आज उसने कांग्रेस को एक भी वोट दिया, तो उसका वो वोट उसके बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए नहीं जाएगा। 

बल्कि उसका वो वोट सीधे तौर पर देश में वक्फ बोर्डों को और ताकतवर बनाने, रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाने, और उन ताकतों को मजबूत करने में इस्तेमाल होगा जो इस देश को ‘गजवा-ए-हिंद’ बनाना चाहती हैं।

हिंदी बेल्ट का यही हिंदुत्व का उभार कांग्रेस के लिए काल बन रहा है। कांग्रेस जितना ज्यादा ध्रुवीकरण करेगी, बहुसंख्यक समाज उतना ही ज्यादा संगठित होकर राष्ट्रवाद के पक्ष में मतदान करेगा। और जिस दिन हिंदी बेल्ट में पूरी तरह से ‘काउंटर-पोलराइजेशन’ हो गया, उस दिन इस ‘मुस्लिम लीग 2.0’ का भारत के राजनीतिक नक्शे से हमेशा के लिए सफाया हो जाएगा।

‘मुस्लिम लीग 2.0’ का खात्मा तय, और हिन्दू विरोधियों के अंत का शंखनाद

वैसे बातें तो बहुत हैं करने को, पर लंबी बात हो गई है। बस चलते-चलते इतना ही कहूँगा की ये जो पूरी की पूरी तस्वीर आज हमारे सामने आई है, इसे देखकर एक बात तो एकदम शीशे की तरह साफ हो जाती है। जो लोग आज भी 2024 में कांग्रेस के भीतर महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, सरदार पटेल या लाल बहादुर शास्त्री को खोजने की बेवकूफी कर रहे हैं, वो बहुत बड़े धोखे में जी रहे हैं।

ये आज की वो पुरानी वाली कांग्रेस नहीं है। ये एक नया अवतार है, जिसे लेफ्टिस्टों, टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सलियों और जिहादी सोच रखने वालों ने पूरी तरह से हाईजैक कर लिया है। ये बस एक मुखौटा है जिसके पीछे जिन्ना की आत्मा काम कर रही है।

इन लोगों को सिर्फ और सिर्फ सत्ता चाहिए, और उस सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए ये लोग इस देश को, इसके संसाधनों को बेचने से भी पीछे नहीं हटेंगे। असम से लेकर केरल तक और बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक, जो ये ‘मुस्लिम लीग’ वाला खौफनाक गेम प्लान चल रहा है, वो आने वाले वक्त में हमारी जनसांख्यिकी और हमारे वजूद के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

लेकिन, हर अंधेरी रात के बाद एक सुबह तो होती ही है। सबसे बड़ी राहत की बात यही है की इस देश का बहुसंख्यक समाज, हमारा हिंदू समाज अब कुंभकरण की नींद नहीं सो रहा है। वो जाग गया है, उसने अपने हक और अपने धर्म के लिए खड़ा होना सीख लिया है।

इतिहास गवाह है की जो पार्टी इस देश की मूल संस्कृति से टकराई है, जिसने सनातन धर्म का अपमान किया है और जिसने बहुसंख्यकों की भावनाओं को अपने जूतों तले कुचलने की कोशिश की है, उसका इतिहास के पन्नों से मिट जाना एकदम तय है। 

ये जो ‘मुस्लिम लीग 2.0’ का नया रूप हम देख रहे हैं, ये अपने ही बुने हुए तुष्टिकरण के जाल में एक दिन ऐसा फँसेगा की फिर कभी उठ नहीं पाएगा। याद रखिए, लड़ाई बड़ी है, लेकिन अंत में सत्य, धर्म और राष्ट्रवाद की ही जीत होगी। 

वंदे मातरम! भारत माता की जय!

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