'बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी' में शांतिदूतों को 'ताजिया' जुलूस की पूरी आजादी, लेकिन 'AMU' और 'जामिया' में 'रामनवमी शोभायात्रा' पर 'नो-एंट्री', भाईचारे के नाम पर अपने ही संस्थानों का 'इस्लामीकरण' करता मूर्ख हिंदू समाज

‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ में शांतिदूतों को ‘ताजिया’ जुलूस की पूरी आजादी, लेकिन ‘AMU’ और ‘जामिया’ में ‘रामनवमी शोभायात्रा’ पर ‘नो-एंट्री’, भाईचारे के नाम पर अपने ही संस्थानों का ‘इस्लामीकरण’ करता मूर्ख हिंदू समाज

दुनिया का कोई भी समाज इतना मूर्ख और आत्मघाती नहीं हो सकता जितना आज का हमारा ये सोया हुआ हिंदू समाज बन चुका है।

हमने ‘सर्वधर्म समभाव’ और भाईचारे की ऐसी ज़हरीली अफीम खा रखी है की हमें अपनी ही बर्बादी का जश्न मनाने की आदत पड़ गई है।

आज़ाद भारत का इससे भयानक और खौफनाक दोगलापन क्या होगा की जिन संस्थानों को हमारे हिंदू पूर्वजों ने अपने खून-पसीने और चंदे के पैसों से बनाया था, आज उन्हीं के अंदर सरेआम सनातन का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

एक तरफ हमारी अपनी ‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ (BHU) है, जहाँ ‘हिंदू’ शब्द सिर्फ एक मज़ाक बनकर रह गया है। वहाँ सेक्युलरिज्म के नाम पर इस्लामिक उपद्रव मनाया जा रहा है।

वहां सड़कों पर मुसलमान अपने मुहर्रम के ‘ताजिया’ जुलूस निकाल रहे हैं और ‘या हुसैन’ के नारे लगा रहे हैं।

और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ वही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) और जामिया मिलिया इस्लामिया है जहाँ पढ़ने वाले हमारे हिंदू बच्चों को राम का नाम लेने तक की आज़ादी नहीं है। वहां का सेक्युलरिज्म कहाँ मर जाता है भाई?

हम हिंदू इतने कायर और सहिष्णु हो गए हैं की हमने अपनी ही ज़मीन, अपने ही टैक्स के पैसे और अपनी ही संस्थाओं को इन ‘शांतिदूतों’ की जागीर बना दिया है।

ये कैसा एकतरफा भाईचारा है जहाँ झुकना, अपनी जगह छोड़ना और अपनी परंपराओं को कुचलवाना सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं के हिस्से में आता है?

अगर हिंदू समाज आज भी इस नंगे सच को देखकर नहीं जागा, तो वो दिन दूर नहीं जब ये शांतिदूत हमारी यूनिवर्सिटी से निकलकर हमारे घरों में ताजिया निकालेंगे और हम ताली बजाते रह जाएंगे।

मालवीय जी की सनातनी तपोभूमि BHU में पुलिस और ड्रोन की सुरक्षा में शांतिदूतों के मुहर्रम का VIP ‘ताजिया’

अब ज़रा इस ताज़ा घटना पर नज़र डालिए जिसे देखकर किसी भी सच्चे सनातनी का खून खौल उठेगा। अभी हाल ही में जून 2026 में मुहर्रम निकला है।

जगह कौन सी थी? महामना मदन मोहन मालवीय जी की पवित्र तपोभूमि- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)।

वो मालवीय जी जिन्होंने दर-दर भटककर, झोली फैलाकर हिंदुओं से चंदा मांगा था ताकि सनातन धर्म के बच्चे अपने वेदों और अपनी संस्कृति पर गर्व कर सकें।

आज उसी बीएचयू के अंदर प्रशासन ने जो नंगा नाच होने दिया है, वो मालवीय जी की आत्मा को छलनी करने के लिए काफी है।

मुहर्रम के दिन इस पवित्र कैंपस को एक इस्लामिक छावनी में बदल दिया गया। चप्पे-चप्पे पर भारी पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई।

आसमान से बाकायदा ड्रोन कैमरे उड़ रहे थे। क्यों? ताकि इन शांतिदूतों के ताजिया जुलूस को ‘वीआईपी सुरक्षा’ दी जा सके!

ज़रा इस बेशर्मी का रूट सुनिए। ये ताजिया बीएचयू के छित्तूपुर गेट से अंदर घुसता है। फिर ये पूरी भीड़ छाती पीटते हुए, मातम मनाते हुए और अपने मजहबी नारे लगाते हुए लॉ फैकल्टी (कानून विभाग) और महिला महाविद्यालय के ठीक सामने से गुज़रती है। और अंत में ये पूरी भीड़ लंका वाले मेन गेट से बाहर निकलती है।

ज़रा दिमाग पर ज़ोर डालिए! हिंदुओं की यूनिवर्सिटी, जगह हमारी, प्रशासन हमारा, पैसा हमारा, लेकिन जुलूस इन शांतिदूतों का निकल रहा है।

लड़कों के हॉस्टल और महिला महाविद्यालय के सामने से ये भीड़ नारे लगाते हुए निकलती है और हमारी पुलिस मूक दर्शक बनकर उन्हें एस्कॉर्ट (Escort) करती है, जैसे वो कोई बहुत बड़ा देश का काम कर रहे हों।

ये सिर्फ एक जुलूस नहीं था भाई, ये सनातन धर्म और मालवीय जी के विजन के मुंह पर एक करारा तमाचा था।

ये इस बात का खुला ऐलान था की तुम हिंदू चाहे अपनी यूनिवर्सिटी के नाम में ‘हिंदू’ लगा लो, लेकिन हमारी हैसियत इतनी है की हम तुम्हारे घर में घुसकर अपना शरिया और अपना मातम मनाएंगे।

मुसलमानो के आगे प्रशासन का बेशर्म सरेंडर, फर्जी परंपरा की आड़ में हिंदुओं के ही सीने पर शरिया का खंजर घोंपते कायर अधिकारी

अब आप सोचेंगे की बीएचयू का प्रशासन क्या कर रहा था? वहां का वाइस चांसलर और चीफ प्रॉक्टर क्या भांग खाकर सो रहे थे?

तो इसका जवाब है- हाँ! ये पूरा का पूरा प्रशासन सेक्युलरिज्म की भांग के नशे में इस कदर धुत है की इनमें इन जिहादियों को रोकने की कोई औकात ही नहीं बची है।

साल 2019 में जब बीएचयू के निडर हिंदू छात्रों ने इस ताजिया जुलूस के खिलाफ भयंकर धरना दिया था, बवाल काटा था और प्रशासन की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछे थे, तब जानते हैं प्रशासन ने क्या बेशर्म बहाना बनाया था?

चीफ प्रॉक्टर और पुलिस ने हाथ खड़े करते हुए कहा था, “अरे भाई, हम क्या करें? ये तो 30-40 साल पुरानी परंपरा है। ये रूट थाने के त्योहार रजिस्टर में 1972 से पहले से दर्ज़ है, इसलिए हम इस ताजिया को नहीं रोक सकते।”

ये कैसा वाहियात और कायरतापूर्ण तर्क है भाई? अगर 1972 में किसी गद्दार या डरपोक अधिकारी ने मुल्लों के दबाव में आकर उनके जुलूस को हिंदू यूनिवर्सिटी के अंदर से निकालने की परमिशन दे दी थी, तो क्या आज का हिंदू समाज जिंदगी भर इस जिहादी परंपरा का बोझ अपनी छाती पर ढोएगा?

कल को ये रजिस्टर में लिखवा देंगे की बीएचयू के अंदर नमाज़ पढ़ी जाएगी, तो क्या प्रशासन पूरा कैंपस उनके हवाले कर देगा?

सच तो ये है की ये कोई परंपरा नहीं, बल्कि प्रशासन की बुज़दिली है। जब हिंदू छात्र हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं या कोई डीजे बजा लेते हैं, तो यही बीएचयू प्रशासन पुलिस बुलाकर उन पर लाठियां चलवाता है, उन्हें सस्पेंड करने की धमकियां देता है।

लेकिन जब हजारों की भीड़ बिना किसी डर के हिंदू यूनिवर्सिटी को कर्बला बना देती है, तो प्रशासन अपने बिल में छुप जाता है।

यह प्रशासन सिर्फ और सिर्फ शांतिदूतों के आगे मुजरा करना जानता है और अपने ही छात्रों की छाती पर मूंग दलता है।

AMU और जामिया का वो खौफनाक इस्लामी सच जहाँ रामलला का नाम लेने पर ही आ जाता सर तन से जुदा का फरमान

चलिए, एक पल के लिए मान लेते हैं की बीएचयू बहुत महान है, बहुत सेक्युलर है और वहां सबको अपने त्योहार मनाने की छूट है। तो फिर ज़रा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) और जामिया मिलिया इस्लामिया का भी रुख कर लेते हैं।

बीएचयू के छात्रों ने प्रशासन का कॉलर पकड़कर यही सबसे बड़ा सवाल पूछा था की अगर बीएचयू में ताजिया निकल सकता है, तो क्या एएमयू या जामिया के कैंपस के अंदर हम हिंदू रामनवमी का जुलूस निकाल सकते हैं?

इसका जवाब इतना खौफनाक है की सुनकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। एएमयू में रामनवमी का जुलूस निकालना तो छोड़िए, वहां अगर कोई हिंदू छात्र अपने कमरे में ज़ोर से हनुमान चालीसा भी पढ़ ले, तो उसे कट्टरपंथियों की भीड़ घेर लेती है।

क्या कभी एएमयू के मशहूर ‘बाबे-सैयद गेट’ से भगवा झंडे लहराते हुए राम दल या भरत मिलाप का कोई जुलूस निकला है? क्या कभी जामिया की सड़कों पर मां दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन पुलिस की निगरानी में हुआ है?

वहां तो होली के दिन अगर हिंदू बच्चे थोड़ा सा रंग भी खेल लें, तो उन्हें लाठियों और सरियों से बेरहमी से पीटा जाता है। उन्हें साफ-साफ धमकियां दी जाती हैं की “ये मुस्लिम यूनिवर्सिटी है, यहाँ तुम्हारे काफिरों वाले त्योहार नहीं चलेंगे।”

जब एएमयू और जामिया का प्रशासन सीना ठोककर कहता है की हमारी यूनिवर्सिटी का ‘माइनॉरिटी कैरेक्टर’ है और यहाँ इस्लामिक तौर-तरीके ही चलेंगे, तो फिर बीएचयू का कैरेक्टर ‘हिंदू’ क्यों नहीं हो सकता?

जामिया और एएमयू में हिंदू बच्चे डरे-सहमे हुए अपने हॉस्टल के कमरों में छुपकर भगवान की पूजा करते हैं। वहां कोई पुलिस, कोई ड्रोन उन्हें सुरक्षा देने नहीं आता। वहां सेक्युलरिज्म नाम का कोई कीड़ा नहीं रेंगता।

लेकिन जब बात बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की आती है, तो सारा का सारा भाईचारा, सारा का सारा ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का ढोंग हमारे ही सिर पर थोप दिया जाता है।

ये कोई समानता नहीं है दोस्त, ये हमारी आंखों के सामने हो रहा हमारे ही धर्म का सरेआम चीरहरण है और हम मूर्खों की तरह इसे ‘विविधता’ (Diversity) का नाम देकर खुद को ही धोखा दे रहे हैं।

मालवीय जी के सनातन विजन की हत्या और सर सैयद के इस्लामी एजेंडे के आगे रेंगता हमारा सिस्टम

अगर हम इस पूरी बीमारी की जड़ में जाएं, तो हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा जहाँ से इन दोनों यूनिवर्सिटीज़ की शुरुआत हुई थी।

महामना मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) की नींव क्यों रखी थी? उन्होंने गांव-गांव जाकर, राजाओं और आम हिंदुओं के सामने अपनी झोली क्यों फैलाई थी?

मालवीय जी का विजन एकदम साफ था- वो चाहते थे की एक ऐसी तपोभूमि बने जहाँ सनातन धर्म का डंका बजे, जहाँ हिंदू युवा अपने वेदों, उपनिषदों और अपनी महान संस्कृति पर गर्व करना सीखें।

दूसरी तरफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) को सर सैयद अहमद खान ने बनाया था। सर सैयद का एजेंडा बिल्कुल क्लीयर था- उन्हें मुसलमानों की कट्टरता को बचाए रखना था और उनके अंदर इस्लामी वर्चस्व का ज़हर भरना था।

आज इतने साल बीत जाने के बाद ज़रा दोनों का हाल देखिए। मुसलमानों ने सर सैयद अहमद खान के कट्टरपंथी विजन को अपने सीने से लगा कर रखा है।

एएमयू आज भी पूरी तरह से एक इस्लामी किला है जहाँ किसी दूसरे धर्म को घुसने या सांस लेने की कोई जगह नहीं है।

लेकिन हमारे सेक्युलर प्रशासनों ने मालवीय जी के विजन के साथ क्या किया? उन्होंने मालवीय जी के सपनों की हत्या करके उसे गंगा में बहा दिया।

जिस यूनिवर्सिटी को हिंदुओं के चंदे से, सनातन के उत्थान के लिए बनाया गया था, आज वहां का प्रशासन उसी हिंदू अस्मिता को पैरों तले रौंदकर वहां मुहर्रम के जुलूस निकलवा रहा है।

मालवीय जी का वो पवित्र प्रांगण आज इन कायर हुक्मरानों की वजह से सर सैयद के एजेंडे के आगे घुटने टेक चुका है।

एकतरफा भाईचारे का जानलेवा जहर जिसने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के साथ देश के सभी पवित्र संस्थानों को बना दिया मिनी पाकिस्तान

ये जो ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ और भाईचारे का चूर्ण हमें बचपन से चटाया जा रहा है ना, असल में ये एक बहुत बड़ा और जानलेवा ज़हर है। ज़रा देश की बाकी हिंदू और सरकारी यूनिवर्सिटीज़ का हाल देख लीजिए।

दिल्ली यूनिवर्सिटी हो, जेएनयू हो या कोई और बड़ा संस्थान- वहां रमज़ान में बड़ी-बड़ी इफ्तार पार्टियां दी जाती हैं। वहां के हिंदू छात्र खुद अपने हाथों से खजूर और शरबत बांटते हैं। मुहर्रम पर जुलूस निकालने के लिए पूरा कैंपस खोल दिया जाता है।

लेकिन जब यही भाईचारा निभाने की बारी मुल्लों की आती है, तो क्या होता है? आप एएमयू या जामिया में जाकर बस एक छोटी सी सरस्वती पूजा आयोजित करने की कोशिश तो कीजिए!

आप वहां होली के दिन रंग खेलकर तो देखिए! वहां के कट्टरपंथी छात्र और खुद प्रशासन आपको बेरहमी से पीट-पीट कर बाहर फेंक देगा। वहां उनका भाईचारा और सेक्युलरिज्म दोनों मर जाते हैं।

ये कैसा भाईचारा है भाई? जहाँ अपना त्योहार मनाना हो तो तुम पूरे शहर और हिंदू यूनिवर्सिटी को कर्बला बना दो, लेकिन जहाँ हमारी आस्था की बात आए तो तुम सीधे फतवे जारी कर दो? ये

एकतरफा भाईचारा हमारे शिक्षण संस्थानों को धीरे-धीरे ‘मिनी पाकिस्तान’ में बदल रहा है, और हमारा सिस्टम अपनी आंखें मूंदकर इस तमाशे पर तालियां बजा रहा है।

या तो बीएचयू में हमेशा के लिए दफन होगा ताजिया, या फिर अलीगढ़ और जामिया की सड़कों पर निकाली जाएगी रामलला की शोभायात्रा

तो अब सवाल ये उठता है की इसका इलाज क्या है? बहुत हो गया ये रोना-धोना। बहुत हो गया ये ट्विटर और सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालना।

अब वक्त आर-पार की लड़ाई का आ गया है। इस देश के सेक्युलर प्रशासन को उसी की भाषा में जवाब देने का वक्त आ गया है।

हिंदू छात्रों को अब बीएचयू के उस प्रॉक्टर और प्रशासन का घेराव करके डंके की चोट पर कहना होगा की ये जो 1972 के रजिस्टर का तुम कायरतापूर्ण बहाना दे रहे हो, उस रजिस्टर को फाड़कर आग लगा दो।

अगर हिंदू यूनिवर्सिटी के अंदर से कोई भी मजहबी इस्लामिक जुलूस निकलेगा, तो उसी दिन उसी कैंपस में ऐसा आंदोलन होगा की प्रशासन की रातों की नींद उड़ जाएगी।

और बात सिर्फ बीएचयू की नहीं है। अब हमें एएमयू और जामिया के उस घमंडी प्रशासन की आंखों में भी उंगली डालनी होगी।

अगर बीएचयू में शांतिदूतों का मातम निकल सकता है, तो फिर AMU के बाबे-सैयद गेट से रामनवमी और दुर्गा पूजा का जुलूस भी पूरी शान से निकलना चाहिए।

अब बराबरी का सौदा होगा। या तो पूरे देश की यूनिवर्सिटीज़ में सारे जिहादी जुलूस बैन करो, या फिर अगर मुहर्रम को छूट मिलेगी, तो रामनवमी का शंखनाद भी जामिया की सड़कों पर गूंजेगा।

अब ये ईंट का जवाब पत्थर से देने का वक्त है। अपने हकों के लिए लड़ना सीखो, वरना ये सेक्युलरिज्म नाम की बीमारी तुम्हें तुम्हारे ही घर में अछूत बनाकर छोड़ देगी मूर्ख हिंदुओं!

जय श्री राम!

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