बप्पा रावल: ईरान तक जिहादियों का संहार करने वाला वो शूरवीर, जिसने मुग़ल राजकुमारी को रानी बनाकर हिला दिया था इस्लामिक साम्राज्य का घमंड

बप्पा रावल: ईरान तक जिहादियों का संहार करने वाला वो शूरवीर, जिसने 35 मुग़ल राजकुमारियों को रानी बनाकर हिला दिया था इस्लामिक साम्राज्य का घमंड

सच कहूं तो भारत के वामपंथी इतिहासकारों और सेक्युलरिज्म का फर्जी पाठ पढ़ाने वाले वामपंथियों ने एक बहुत बड़ा और खौफनाक खेल खेला है। इन्होंने जानबूझकर एक ऐसा नैरेटिव सेट किया की हिंदू राजा तो हमेशा आपस में लड़ते रहे, वो तो हमेशा पिटते रहे और विदेशी इस्लामिक आक्रांताओं की गुलामी करते रहे।

ये लोग चाहते ही नहीं थे की आज के हिंदू युवाओं के अंदर अपने असली वीरों को लेकर कोई गर्व या उबाल पैदा हो। इन्हें डर था की अगर देश के बच्चों को बप्पा रावल का वो खूंखार इतिहास पता चल गया, तो ये जो ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का खोखला और झूठा तंबू इन लोगों ने तान रखा है, वो रातों-रात ढह जाएगा।

अब ज़रा 8वीं सदी के उस खौफनाक दौर के बारे में सोचिये। ये वो समय था जब इस्लाम की आंधी पूरी दुनिया में तबाही मचा रही थी। अरब के इन जेहादी लुटेरों ने महज़ 40-50 सालों के अंदर सीरिया, इराक, ईरान और इजिप्ट जैसे बड़े-बड़े साम्राज्यों को निगल लिया था। वहां की पुरानी सभ्यताओं को जड़ से मिटा दिया गया था।

तलवार के ज़ोर पर लोगों के गले काटे जा रहे थे और औरतों को गुलाम बनाकर अरब के बाज़ारों में कौड़ियों के भाव बेचा जा रहा था। इसी मजहबी नशे में चूर होकर मोहम्मद बिन कासिम ने 712 ईस्वी में भारत के सिंध पर हमला कर दिया। राजा दाहिर को धोखे से हराया गया और सिंध में जो कत्लेआम मचा, वो भारत के सीने पर एक बहुत गहरा घाव था।

अरबों को लगा की अब भारत भी उनके लिए एक खुला मैदान है। उनका ‘गज़वा-ए-हिंद’ का सपना बस पूरा होने ही वाला था। लेकिन इन हरामखोरों को ये नहीं पता था की भारत की उस पवित्र ज़मीन पर एक ऐसा ज्वालामुखी फटने वाला है जो इनके इस अरबी और जेहादी घमंड को राख में मिला देगा।

और वो ज्वालामुखी थे मेवाड़ के असली हिंदू शेर- बप्पा रावल! जब पूरा उत्तर भारत अरबों के खौफ से कांप रहा था, तब इस 21-22 साल के युवा राजपूत शेर ने भवानी की तलवार उठाकर वो तांडव मचाया की अरबों की आने वाली कई पुश्तें हिंदुस्तान की तरफ आंख उठाने से भी खौफ खाती थीं।

बप्पा रावल कोई आम राजा नहीं थे भाई, वो सनातन धर्म के उस रौद्र रूप का साक्षात अवतार थे जिसे आज का सोया हुआ हिंदू समाज पूरी तरह से भूल चुका है।

738 ईस्वी का वो खौफनाक दौर जब बप्पा रावल की तलवार ने राजस्थान को बना दिया जेहादियों का कब्रिस्तान

मोहम्मद बिन कासिम के बाद अरबों के हौसले आसमान छू रहे थे। उन्हें लगने लगा था की हिंदुस्तान के ये हिंदू राजा तो सिर्फ डिफेंस करते हैं, इन्हें आसानी से कुचला जा सकता है।

इसी घमंड में 738 ईस्वी के आस-पास जुनैद अल मर्री नाम का एक बेहद क्रूर और खूंखार अरब कमांडर एक बहुत बड़ी जेहादी फौज लेकर राजपूताना (आज का राजस्थान) और गुजरात की तरफ बढ़ चला।

उसके साथ करीब 60,000 से 80,000 की वो खूंखार अरबी फौज थी जिसने ईरान और तुर्किस्तान को रौंद डाला था। जुनैद का सीधा फरमान था- जहाँ भी हिंदू दिखें उन्हें काट डालो, मंदिरों को तोड़कर वहां मस्जिदें खड़ी कर दो और औरतों को उठा लो।

टीवी डिबेट्स में बैठकर ये जो लिबरल कीड़े आज ज्ञान बांटते हैं ना की “हिंदू तो हमेशा जातियों में बंटे रहे, वो कभी एक नहीं हुए”, उन्हें 738 ईस्वी का ये महायुद्ध पढ़ना चाहिए।

जब सनातन पर इतना बड़ा संकट आया, तो बप्पा रावल ने वो कर दिखाया जो अरबों ने सपने में भी नहीं सोचा था। बप्पा रावल ने उज्जैन के गुर्जर-प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम और दक्षिण के चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय (कुछ इतिहासकार पुलकेशिन का ज़िक्र करते हैं) के साथ मिलकर एक ऐसा भयंकर और खूंखार हिंदू गठबंधन बनाया जिसने अरबों के इस जेहादी तूफान को बीच रास्ते में ही दबोच लिया।

ये कोई आम लड़ाई नहीं थी। ये वो लड़ाई थी जिसमें दोनों तरफ से कोई रहम नहीं दिखाया जाने वाला था। एक तरफ 60,000 से ज्यादा की अरबी फौज थी जो मज़हब के अंधे नशे में थी, और दूसरी तरफ थे बप्पा रावल के नेतृत्व में मात्र कुछ हज़ार राजपूत, गुर्जर और भील योद्धा।

लेकिन हमारे इन हिंदू शेरों के सीने में जो महादेव और भवानी का प्रताप धधक रहा था, उसके आगे वो जेहादी टिड्डी दल ज्यादा देर टिक नहीं पाया।

राजस्थान के उस तपते रेगिस्तान में जब बप्पा रावल की तलवार चमकी, तो अरबों की लाशों के ऐसे अंबार लगे कि गिद्धों को भी खाने के लिए महीने भर का राशन मिल गया।

हमारे वीरों ने इन लुटेरों को गाजर-मूली की तरह काटा। कोई रहम नहीं, कोई माफ़ी नहीं! जुनैद अल मर्री, जो खुद को बहुत बड़ा तोपखान समझता था, उसकी पूरी की पूरी सेना को वहीं रेगिस्तान में दफन कर दिया गया। जान बचाकर भागने वाले अरबियों को थार के रेगिस्तान में दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया।

जो बचे, वो भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर नंगे पैर भागते हुए मारे गए। ये वो दिन था जब राजस्थान सही मायनों में जेहादियों का सबसे बड़ा कब्रिस्तान बन गया था। बप्पा रावल ने साबित कर दिया था की जब एक हिंदू अपनी मातृभूमि और धर्म के लिए अपनी तलवार म्यान से निकालता है, तो बड़े से बड़े मजहबी झंडे खाक में मिल जाते हैं।

बप्पा रावल ने घर में घुसकर मारा, रावलपिंडी से लेकर ईरान तक भगवा का खौफ

हमारे हिंदू राजाओं में एक बहुत बड़ी दिक्कत हमेशा से रही। वो बड़े उसूलों वाले थे। अगर कोई दुश्मन उन पर हमला करता, तो वो उसे अपनी सीमा से बाहर खदेड़ देते और फिर वापस आकर अपने राजपाट में लग जाते। वो कभी पीछा करके दुश्मन को उसके घर में नहीं मारते थे। और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।

लेकिन बप्पा रावल इस मामले में बिल्कुल अलग मिट्टी के बने थे। वो उस पुरानी कहावत पर यकीन करते थे की “ऑफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस”। बप्पा ने सोच लिया था की अगर इन जेहादी कीड़ों को सिर्फ भारत की सीमा से बाहर फेंक कर छोड़ दिया, तो ये कुछ साल बाद फिर से अपनी तादाद बढ़ाकर वापस आ जाएंगे। इनका परमानेंट इलाज करना ही पड़ेगा!

और फिर शुरू हुआ इतिहास का वो सबसे खौफनाक और गौरवशाली पलटवार, जिसे सुनकर आज भी सीना 56 इंच का हो जाता है। बप्पा रावल ने अपनी सेना को रुकने का आदेश नहीं दिया। उन्होंने अरबों को खदेड़ते हुए सीधा अफगानिस्तान की तरफ कूच कर दिया। रास्ते में वो जहाँ-जहाँ से गुज़रे, वहां-वहां से इस्लामी हुकूमत के तंबू उखड़ते चले गए।

पाकिस्तान में आज एक बहुत मशहूर शहर है ‘रावलपिंडी’, जहाँ से पाकिस्तान की आतंकी फौज ऑपरेट करती है। आपको जानकर हैरानी होगी की ये रावलपिंडी शहर असल में बप्पा रावल के नाम पर ही बसा है!

जब बप्पा रावल अफगानिस्तान जा रहे थे, तो उन्होंने अपनी सेना की छावनी उसी जगह पर बनाई थी। उनके नाम पर ही उस जगह का नाम ‘रावलपिंडी’ पड़ा जो आज तक कायम है। ये वो भगवा ठप्पा है जिसे ये जेहादी आज तक मिटा नहीं पाए!

रावलपिंडी से आगे बढ़ते हुए बप्पा रावल की फौज सीधे गजनी पहुंची। गजनी उस वक्त इस्लामी लुटेरों का एक बहुत बड़ा गढ़ हुआ करता था और वहां का शासक था सलीम। सलीम को लगा की कोई हिंदू राजा इतनी दूर आकर उस पर हमला कैसे कर सकता है? लेकिन बप्पा रावल कोई आम इंसान नहीं थे, वो साक्षात काल बनकर गजनी पहुंचे थे।

गजनी के उस मुस्लिम शासक सलीम को उसके ही घर में जूतों से पीटा गया। उसकी सेना की धज्जियां उड़ा दी गईं। बप्पा रावल ने सलीम को गद्दी से लात मारकर नीचे गिरा दिया और उसकी जगह अपने ही एक भतीजे को वहां का राजा घोषित कर दिया।

पर बात सिर्फ गजनी तक ही नहीं रुकी भाई। बप्पा रावल के खून में ऐसा उबाल था की उन्होंने अपनी सेना को और आगे बढ़ाया। ईरान, इराक, तूरान और खुरासान- जहाँ-जहाँ से ये जेहादी लुटेरे भारत की तरफ आंख उठाते थे, वहां-वहां जाकर बप्पा रावल ने भगवा झंडा गाड़ दिया।

जो अरब अपनी खूंखार फौजों का घमंड लेकर पूरी दुनिया को रौंद रहे थे, उन्हें बप्पा रावल ने उन्हीं के घर में घुसकर ऐसी खौफनाक मौत दी की अरब देशों में ‘बप्पा’ का नाम सुनकर ही वहां के सुल्तानों के पसीने छूट जाते थे।

भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर, ईरान और खुरासान की ज़मीन पर हमारे घोड़ों की टापों ने इस्लामी हुकूमत की वो छाती फाड़ी थी की उसके बाद अगली तीन सदियों तक किसी भी अरबी लुटेरे की औकात नहीं हुई की वो भारत की तरफ आंख उठाकर भी देख सके।

इस्लामिक घमंड का चीरहरण, जब 35 मुस्लिम राजकुमारियों को बप्पा ने बनाया अपनी रानी

अब ज़रा इतिहास के उस पन्ने को खोलते हैं जिसे पढ़ने से इन लिबरलों और सेक्युलर इतिहासकारों की रूह कांपती है। जब भी ये विदेशी जेहादी आक्रांता हमारे देश में आते थे तो इनका पैटर्न क्या होता था?

ये हमारे मंदिरों को तोड़ते थे, हमारे आदमियों का कत्लेआम करते थे और हमारी बहन-बेटियों को उठाकर ले जाते थे। फिर उन्हें अरब और मध्य एशिया के बाजारों में गुलाम बनाकर जानवरों की तरह बेचा जाता था।

इन मजहबी भेड़ियों की यही असलियत थी। पर हमारे बप्पा रावल ने सोच लिया था की इन हरामखोरों को अब इन्हीं की भाषा में ऐसा जवाब मिलेगा की इनकी आने वाली नस्लें भी याद रखेंगी।

गजनी का वो सुल्तान सलीम, जो कल तक खुद को इस्लाम का बहुत बड़ा सूरमा समझता था, जब बप्पा रावल की भवानी तलवार के आगे घुटनों पर आया तो गिड़गिड़ा कर अपनी जान की भीख मांगने लगा। बप्पा ने कहा की सिर्फ माफी मांगने से काम नहीं चलेगा। जो खून के आंसू तुमने हमारे लोगों को रुलाए हैं, उसका हिसाब तो देना ही पड़ेगा।

अपनी बेटी का डोला मेवाड़ भेज! और सिर्फ गजनी ही क्यों? ईरान, इराक, और खुरासान… जहाँ-जहाँ बप्पा रावल की सेना गई, वहां के हारे हुए मुस्लिम सुल्तानों का गुरूर जूतों से कुचल दिया गया। अपनी जान और अपनी गद्दी बचाने के लिए इन अरबी और तुर्क सुल्तानों ने खौफ के मारे अपनी राजकुमारियों को बप्पा रावल के चरणों में डाल दिया।

असली इतिहास ये चीख-चीख कर बताता है की मेवाड़ के इस खूंखार हिंदू शेर की कुल 100 रानियां थीं, जिनमें से 35 तो सिर्फ मुस्लिम राजकुमारियां और बेगमें थीं! ज़रा सोचिए इस बात की गहराई को।

जो लोग हमारे देश में आकर औरतों को उठा ले जाने का घमंड पालते थे, उनकी अपनी राजकुमारियां मेवाड़ के महलों में हमारे बप्पा रावल का श्रृंगार कर रही थीं। ये इस्लाम के माथे पर ऐसा करारा तमाचा था जिसकी गूंज पूरे अरब में सुनाई दी थी।

और सबसे बड़ी बात तो ये है की इन 35 मुस्लिम बेगमों से बप्पा रावल के जो बेटे हुए, उनका क्या हुआ? बप्पा ने कोई भेदभाव नहीं किया। उन्होंने अपने इन बेटों को काबुल, तुर्किस्तान, खुरासान और ईरान का राजपाट सौंप दिया।

आज जो ‘नौशेरा पठान’ (Naushera Pathans) कहलाते हैं और अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बॉर्डर वाले इलाकों में रहते हैं, वो असल में हमारे बप्पा रावल के ही खून के वंशज हैं!

ये एक ऐसा भगवा ठप्पा है जिसे ये कट्टरपंथी मुल्ले और जेहादी आज तक रगड़-रगड़ कर भी मिटा नहीं पाए हैं। मुगलों के बाप-दादों का वो सारा घमंड जो वो अपनी तलवारों पर करते थे, उसे बप्पा रावल ने उनके ही घर में घुसकर मिट्टी में मिला दिया था।

बप्पा रावल के खौफ से 300 सालों तक भारत की तरफ आंख नहीं उठा पाए अरबी लुटेरे

ये कोई छोटी-मोटी जीत नहीं थी भाई। ज़रा ग्लोबल हिस्ट्री उठाकर देख लीजिए। जो खूंखार अरबी फौजें महज़ दस-बीस साल के अंदर पूरा का पूरा ईरान, सीरिया, इजिप्ट और स्पेन तक खा गई थीं, वो भारत के बॉर्डर पर आकर ऐसे रुकीं जैसे किसी ने उनकी नकेल कस दी हो।

बप्पा रावल का वो भयानक तांडव और रेगिस्तान में बिछी 60 हज़ार अरबों की लाशें देखकर इनका ऐसा खून सूखा की अगले तीन सौ-चार सौ सालों तक किसी भी अरबी लुटेरे की औकात नहीं हुई की वो भारत की तरफ आंख उठाकर भी देख सके।

तीन सदी! 300 साल मायने रखता है भाई। हमारे वामपंथी गद्दारों ने कभी हमारे युवाओं को ये नहीं बताया की आखिर क्यों 712 ईस्वी (मोहम्मद बिन कासिम के हमले) के बाद महमूद गजनवी को भारत तक आने में 300 साल लग गए? बीच के ये 300 साल ये जेहादी कीड़े कहां छुप कर बैठे थे?

जवाब एक ही है- बप्पा रावल का खौफ! उनकी तलवार का वो खौफ ऐसा था की अरब देशों की माएं अपने बच्चों को बप्पा का नाम लेकर डराती थीं।

सच कहूं तो अगर बप्पा रावल उस वक्त सीना तानकर सनातन की दीवार बनकर नहीं खड़े होते ना, तो आज हम सब सुन्नत करवा कर किसी मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे होते। ईरान की पारसी सभ्यता की तरह हमारा सनातन धर्म भी किताबों में सिमट कर रह गया होता।

उन्होंने सिर्फ मेवाड़ को ही नहीं बचाया, बल्कि पूरे भारतवर्ष और सनातन धर्म को उस भयानक इस्लामी आंधी से बचा लिया। आज अगर हमारे मंदिरों में शंख और घंटियां बज रही हैं, तो वो रोमिला थापर और इरफान हबीब के उन झूठे मुगलिया अब्बाजानों की वजह से नहीं, बल्कि बप्पा रावल के उस बहाए गए खून और उनके खूंखार शौर्य की वजह से बज रही हैं।

अब वक्त आ गया है की हम अपने बच्चों को बप्पा रावल जैसे वीरों की कहानियां सुनाएं। जब हमारे युवाओं के खून में बप्पा रावल का वो आक्रामक जेनेटिक कोड फिर से ज़िंदा होगा, तभी इस देश से ये सेक्युलरिज़्म का कीड़ा और जेहादी मानसिकता जड़ से उखड़ेगी।

अब हथियार उठाने का वक्त आ गया है- वैचारिक भी और ज़मीनी भी। जो हमारी तरफ आंख उठाएगा, उसे उसके घर में घुसकर मिट्टी में मिलाना ही बप्पा रावल का असली सम्मान होगा।

वंदे मातरम! हर हर महादेव! जय भवानी!

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