भाजपा चली कांग्रेस की राह- हज यात्रा पर सरकारी खज़ाना खुला और चार धाम व कैलाश यात्रा भगवान भरोसे

18 अप्रैल 2026 को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एक ऐसा नज़ारा दिखा जो हमारे लिए कोई नया नहीं है। हज 2026 यात्रा के लिए 371 सफ़ेद टोपी और बुर्खा पहने मुसलमानों का पहला जत्था दिल्ली से सऊदी अरब के मक्का के लिए रवाना हुआ।

इस पहली फ्लाइट को हरी झंडी दिखाई अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सचिव डॉ. श्रीवत्स कृष्ण ने। सरकारी अफसरों ने जाने वाले यात्रियों को बाक़ायदा फूल-मालाएं पहनाईं। प्रेस रिलीज़ बांटी गईं। दिल्ली हज कमेटी की चेयरपर्सन कौसर जहां ने इन शानदार इंतज़ामों की अहमियत गिनाई और कहा की पूरे सफर में यात्रियों की मदद के लिए पूरा सरकारी महकमा लगा हुआ है।

ये भारतीय सत्ता का पूरा तमाशा था- हिंदू टैक्सपेयर्स के पैसे से चलने वाला, मंत्रियों के आशीर्वाद से सजा और मीडिया कवरेज से चमचमाता हुआ तमाशा। मुस्लिम समुदाय की धार्मिक यात्रा के लिए सरकार ने सचमुच रेड कार्पेट बिछा दिया था।

अब ज़रा खुद से एक सीधा सा सवाल पूछिए: क्या आपने कभी- भूल से भी- भारत सरकार के किसी केंद्रीय मंत्री को केदारनाथ जाने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों को माला पहनाते देखा है? क्या कभी किसी केंद्रीय मंत्रालय के सचिव ने बद्रीनाथ जा रही बसों को हरी झंडी दिखाई है?

क्या प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की किसी भी प्रेस रिलीज़ ने कभी चार धाम यात्रा की शुरुआत का ऐसा जश्न मनाया है? क्या वहां कभी ऐसी सरकारी गर्मजोशी या पूरा का पूरा सरकारी अमला ऐसे काम करते दिखा है?

इसका जवाब है- बिल्कुल नहीं। और यकीन मानिए, ये कोई इत्तेफाक नहीं है। ये दशकों की जानबूझकर की गई राजनीतिक चालबाजी का नतीजा है। पहले इसे कांग्रेस ने ईंट-दर-ईंट चुना और इस भेदभाव वाले सिस्टम को खड़ा किया।

और अब बात करें बीजेपी की, जिसने इस सिस्टम को उखाड़ फेंकने का वादा किया था- लेकिन किया क्या? चुपचाप इसे अपना लिया, इसे पाला-पोसा, और अब 2026 में तो वो इसे और भी ज़्यादा जोश के साथ चला रही है।

यहाँ जिस बात पर हम पूरे ज़ोर और बिना किसी माफ़ी के सवाल उठा रहे हैं, वो है भारतीय सत्ता का वो भयानक भेदभाव, जो हिंदू धर्म की तीर्थयात्रा को इस्लाम धर्म से बिल्कुल अलग चश्मे से देखता है। कठघरे में वो पूरी की पूरी राजनीतिक जमात खड़ी है- हर रंग की- जिसने हिंदू तीर्थयात्राओं को हमेशा ‘भगवान भरोसे’ छोड़ दिया, जबकि हज के लिए सरकारी खज़ाने से चलने वाली एक पूरी की पूरी संस्थागत मशीनरी खड़ी कर दी। 

सवाल तो बीजेपी से है, जो भारत की हिंदू सभ्यता की आवाज़ बनने के वादे पर सत्ता में आई थी, लेकिन अब वो भी उसी रास्ते पर चल पड़ी है जिस पर उससे पहले वाले चल रहे थे- मुस्लिम तुष्टिकरण, वोट बैंक और सोचे-समझे धार्मिक भेदभाव का रास्ता।

हज के नाम पर खड़ा किया गया वो भारी मुस्लिम इकोसिस्टम जिसका पूरा बोझ हिंदू टैक्सपेयर उठा रहा है  

परेशानी कितनी बड़ी है, ये समझने के लिए पहले ये समझना होगा की भारत सरकार ने हज की सुविधा के नाम पर आख़िर खड़ा क्या कर रखा है। भाई, ये सिर्फ फ्लाइट बुक करने जैसा सीधा-सादा काम नहीं है। ये दशकों पुरानी, पूरी तरह से फंडेड, परमानेंट स्टाफ वाली एक ऐसी विशाल सरकारी मशीनरी है, जो हर साल बस बड़ी ही होती जा रही है।

इसके बिल्कुल केंद्र में बैठी है ‘हज कमेटी ऑफ इंडिया’ (HCoI), जो 2002 के हज कमेटी एक्ट के तहत बनी एक वैधानिक संस्था है। ये अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के प्रशासनिक देखरेख में काम करती है- एक ऐसा मंत्रालय जो बनाया ही सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों (मतलब साफ है: मुसलमानों) की सेवा के लिए गया था।

इस कमेटी का अपना एक परमानेंट स्ट्रक्चर है, रेगुलर स्टाफ है, सालाना बजट है और पूरे देश में इसके दफ्तर फैले हैं। इसके साथ ही हर राज्य की अपनी अलग स्टेट-लेवल हज कमेटियां भी चलती हैं। कई शहरों में ‘हज हाउस’ बने हुए हैं, जो या तो सरकारी हैं या सरकार से फंड पाते हैं। ये तीर्थयात्रियों के लिए लॉजिस्टिक बेस का काम करते हैं।

हज 2026 के आंकड़े पूरी कहानी खुद बयां कर देते हैं। इस साल कुल 1,75,025 तीर्थयात्रियों के हज पर जाने की उम्मीद है। नोडल मिनिस्ट्री होने के नाते अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने भारतीय हज कमेटी, दूसरे केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और सऊदी अधिकारियों के साथ मिलकर पक्के इंतज़ाम किए हैं।

ज़रा इस लाइन को फिर से पढ़िए- ‘दूसरे केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों’। ये कोई एक अकेला डिपार्टमेंट नहीं है जो चुपचाप फाइलों पर साइन कर रहा हो। ये एक ऐसा कोऑर्डिनेटेड सिस्टम है जिसमें भारतीय सत्ता के कई अंग शामिल हैं, और ये सब के सब मुस्लिमों की तीर्थयात्रा की सेवा में दिन-रात लगे हुए हैं।

और 2026 में तो सरकार ने हद ही कर दी है, मतलब पहले से भी कहीं आगे निकल गई है। इस साल ‘हज सुविधा ऐप’ के ज़रिए डिजिटल फैसिलिटी बढ़ाई गई है, खोए हुए यात्रियों को ढूंढने के लिए ‘हज सुविधा स्मार्ट रिस्टबैंड्स’ दिए जा रहे हैं, और पहली बार 20 दिनों के शॉर्ट-ड्यूरेशन हज का भी ऑप्शन दिया गया है ताकि लोगों को ज़्यादा आसानी हो।

भारत सरकार ने हर मुस्लिम यात्री के लिए लगभग 6,25,000 रुपये का इंश्योरेंस कवर भी पक्का किया है, ताकि सफर के दौरान उनकी माली और स्वास्थ्य सुरक्षा एकदम सुनिश्चित रहे।

हर मुस्लिम यात्री पर सवा छह लाख रुपये का इंश्योरेंस। स्मार्ट रिस्टबैंड्स। एक डेडिकेटेड ऐप। शॉर्ट-ड्यूरेशन का नया ऑप्शन। होटल जैसी शानदार सुविधाएँ। मक्का और मदीना के बीच लगभग 60,000 यात्री हाई-स्पीड ट्रेन का लुत्फ उठाएंगे, ताकि उनका सफर तेज़, सुरक्षित और एकदम आरामदायक हो सके।

पूरे देश में 17 अलग-अलग जगहों से हज के ऑपरेशन्स चलाए जाएंगे ताकि हर किसी को आसानी हो। 17 जगहें! पूरे देश में फैले हुए। क्योंकि सरकार ने ये पक्का किया है की किसी भी मुस्लिम तीर्थयात्री को अपनी इस सब्सिडाइज़्ड यात्रा पर जाने के लिए ज़्यादा दूर न जाना पड़े।

हद तो तब हो गई जब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू- जो की एक बीजेपी मंत्री हैं, ज़रा इस बात को दिमाग में बिठाइए- ने खुलेआम कहा की सरकार एक स्मूथ, सुरक्षित और आरामदायक हज अनुभव देने के लिए पूरी तरह कमिटेड है, और इस साल कई नए कदम उठाए गए हैं।

अब सवाल ये है की भई, हमारा ‘चार धाम सुविधा ऐप’ कहाँ है? भारत का वो हिंदू जो हाड़ कंपा देने वाली हिमालयी ठंड में 16 किलोमीटर पैदल चलकर केदारनाथ पहुंचता है, उसके लिए 6,25,000 रुपये का इंश्योरेंस कवर कहाँ है?

गंगोत्री की बर्फ में खो जाने वाले यात्रियों के लिए स्मार्ट रिस्टबैंड कहाँ हैं? इन चीज़ों का न होना कोई बजट की कमी नहीं है। ये एक सीधा-सीधा सभ्यता का बयान है की भारतीय सत्ता की नज़र में किसकी धार्मिक आस्था तवज्जो के लायक है और किसकी नहीं।

BJP का हज सब्सिडी खत्म करने का वो सफेद झूठ जिसकी आड़ में आज भी मुस्लिम समुदाय पर फाइव-स्टार सुविधाएं लुटाई जा रही हैं

जब बीजेपी समर्थकों से इस नंगे भेदभाव पर सवाल पूछो, तो वे ढाल की तरह एक ही रटा-रटाया फैक्ट सामने रख देते हैं: की पार्टी ने 2018 में हज की एयरफेयर (हवाई किराए) सब्सिडी खत्म कर दी थी।

हाँ, ये ठीक है की बीजेपी ने ये डायरेक्ट सब्सिडी बंद कर दी। पर उसके बाद क्या? वो पूरा का पूरा सरकारी ढांचा- हज कमेटी, हज हाउस, नोडल एजेंसी के तौर पर अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, कई मंत्रालयों के कॉर्डिनेशन वाली मशीनरी- सब कुछ वैसा का वैसा ही खड़ा है।

इस ढांचे की एक ईंट भी नहीं हिलाई गई। सब्सिडी खत्म होने से जो पैसे बचे, उसमें से एक रुपया भी निकालकर कोई ‘केंद्रीय हिंदू तीर्थयात्रा प्राधिकरण’ नहीं बनाया गया। जो सरकारी अफसर पहले हज की व्यवस्था देखते थे, उनमें से एक को भी चार धाम के कल्याण के काम में नहीं लगाया गया।

सब्सिडी खत्म करने वाली बात तो बस अख़बारों की हेडलाइन थी। ज़मीन पर क्या हो रहा है, मायने तो वो रखता है न- और ज़मीन पर सच ये है की हज का सरकारी तामझाम सिर्फ बचा ही नहीं है, बल्कि और फैल गया है। 2026 में, केंद्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद, गर्व के साथ हज यात्रियों के लिए नए रिस्टबैंड, नए ऐप, नए इंश्योरेंस कवर और फ्लेक्सिबिलिटी के नए ऑप्शन घोषित किए जा रहे हैं।

हवाई किराए की छूट बंद करके उसके चारों ओर एक फाइव-स्टार सुविधा वाला सिस्टम खड़ा कर देना कोई सुधार नहीं है। ये तो बस आंखों में धूल झोंकना है।

हिमालय पर चार धाम यात्रा की कंपाती ठंड में भगवान भरोसे भटकता हिंदू यात्री और दिल्ली में बैठी सत्ता का बेशर्म सन्नाटा 

हर साल, लाखों-करोड़ों हिंदू तीर्थयात्री यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की चार धाम यात्रा पर जाते हैं। ये सनातन धर्म के सबसे पवित्र स्थानों में से एक हैं। ये कोई अनजान या छोटे-मोटे मंदिर नहीं हैं जहाँ बस कुछ सौ लोग जाते हों। यहाँ करोड़ों की भीड़ उमड़ती है। ये तो हमारी हिंदू सभ्यता की आध्यात्मिक रीढ़ हैं।

2026 की चार धाम यात्रा आधिकारिक तौर पर अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलने के साथ शुरू हुई, जो छह महीने की सर्दियों के बाद खुले थे। केदारनाथ धाम के कपाट भी खुलने वाले हैं, जहाँ भक्त हिंदू धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक में आशीर्वाद लेने पहुंचेंगे।

भारत की केंद्र सरकार ने इस इतने बड़े अवसर के लिए क्या सुविधाएँ दीं? हिमालय की ओर जा रहे करोड़ों हिंदुओं के लिए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू- या किसी भी अन्य केंद्रीय मंत्री- ने क्या घोषणा की? बीजेपी सरकार ने केदारनाथ जाने वालों के लिए कौन सा नया ऐप, कौन सा नया इंश्योरेंस कवर या कौन सी नई रिस्टबैंड तकनीक लॉन्च की?

इस यात्रा में केदारनाथ का रास्ता शरीर तोड़ देने वाला होता है। यात्रियों को गौरीकुंड तक गाड़ी से जाना होता है, और उसके बाद 16-18 किलोमीटर की बेहद खड़ी चढ़ाई शुरू होती है। ये कोई एयरपोर्ट के लाउंज में बैठने जैसा आरामदायक अनुभव नहीं है।

ये वो बुज़ुर्ग भक्त हैं, जिनमें से ज़्यादातर गरीब परिवारों से आते हैं, और जो खून जमा देने वाली ठंड में पहाड़ों की खतरनाक चढ़ाई करते हैं। वे इस बात के हक़दार हैं की पूरी की पूरी भारतीय सत्ता उनके पीछे खड़ी हो। लेकिन उन्हें मिलता क्या है? बस भगवान की प्रार्थना।

केंद्र की कोई ‘चार धाम यात्रा कमेटी’ नहीं है। हिंदुओं के लिए कोई ‘हिंदू मामलों का मंत्रालय’ नहीं है। केंद्र सरकार ने चार धाम यात्रियों के लिए कोई डेडिकेटेड ऐप नहीं बनाया है। केदारनाथ की चढ़ाई कर रही 70 साल की दादी के लिए कोई 6,25,000 रुपये का इंश्योरेंस कवर नहीं है। पूरे भारत में ऐसे 17 ‘एंबार्केशन पॉइंट’ नहीं हैं जहाँ केंद्र सरकार के अफसर विदा हो रहे यात्रियों को गेंदे के फूल की मालाएं पहना रहे हों।

कुछ भी नहीं है। क्योंकि भारतीय राजनीति के गणित में, हिंदू तीर्थयात्री की सुख-सुविधा, उसकी सुरक्षा और उसके सम्मान की कीमत, मुस्लिम वोटर की रज़ामंदी के सामने हमेशा से ही कौड़ी के भाव रही है।

शिव का पवित्र कैलाश मानसरोवर जिसे बीजेपी के इस सेक्युलर सिस्टम ने अपने ही देश में लावारिस छोड़ दिया है 

अगर चार धाम को सरकार ने नज़रअंदाज़ किया है, तो कैलाश मानसरोवर यात्रा का हाल तो इससे भी बदतर है- इसे आप ब्यूरोक्रेसी के जाल में उलझी पूरी तरह से एक ‘संस्थागत उदासीनता’ कह सकते हैं।

कैलाश मानसरोवर हिंदू धर्म का सबसे पवित्र स्थान है। ये स्वयं भगवान शिव का निवास है। किसी भी सच्चे हिंदू के लिए कैलाश पहुंचना महज़ एक यात्रा नहीं है- ये ज़िंदगी भर का सपना है, अध्यात्म का सबसे ऊंचा शिखर।

और फिर भी, इस यात्रा पर जाने की इच्छा रखने वाले एक हिंदू के सामने इतने सारे रोड़े अटकाए जाते हैं, इतने पेचीदा नियम-कानून थोपे जाते हैं की इंसान थक-हार जाए। ऐसा लगता है जैसे सिस्टम खुद कह रहा हो की भाई तुम मत ही जाओ।

नाथू-ला दर्रे वाले रास्ते के लिए, सरकार हर साल 60 यात्रियों के सिर्फ 18 ग्रुप्स को मंज़ूरी देती है। लिपुलेख पास वाले रास्ते के लिए हर साल 50 यात्रियों के 7 ग्रुप्स पास किए जाते हैं। कुल मिलाकर, विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा संभाले जाने वाले इस रास्ते से साल भर में बमुश्किल चंद हज़ार लोग ही जा पाते हैं। ज़रा इसकी तुलना उस आंकड़े से कीजिए जहाँ सिर्फ 2026 में 1,75,025 हज यात्रियों को सुविधाएं दी जा रही हैं।

महामारी और चीन के साथ सीमा पर चल रहे तनाव के चलते 2020 से 2024 तक इस यात्रा को पूरी तरह रोक दिया गया था। पांच साल के लंबे इंतज़ार के बाद जाकर, 14 जून 2025 को विदेश राज्य मंत्री ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के पहले जत्थे को हरी झंडी दिखाई। इस काम में पांच साल लग गए- और जब ये शुरू भी हुई, तो इसे बस एक डिप्लोमैटिक औपचारिकता की तरह निपटा दिया गया, किसी सभ्यता की प्राथमिकता की तरह नहीं।

इसी बीच, संसद में लगातार ये सवाल उठते रहे की क्या सरकार कैलाश मानसरोवर यात्रा को जल्दी दोबारा शुरू करने के लिए चीन के साथ गंभीरता से बात कर रही है? और क्या हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला पास से कोई नया, ज़्यादा आसान रास्ता खोलने पर विचार किया गया है? अब ये बात ही अपने आप में बहुत कुछ कह देती है की सांसदों को संसद में ऐसे सवाल बार-बार, हर साल पूछने पड़ रहे हैं। इससे साफ पता चलता है की सरकार को इस मामले में कोई जल्दी या परवाह नहीं है।

कैलाश जाने वाले एक हिंदू तीर्थयात्री को दिल्ली में मेडिकल टेस्ट से गुज़रना पड़ता है, सेलेक्शन के लिए लॉटरी में हिस्सा लेना पड़ता है, एक इंडेम्निटी बॉन्ड पर साइन करना होता है की वो अपने रिस्क पर जा रहा है, अपनी जेब से 1.74 से 2.5 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं, और सबसे भयानक बात- एक कंसेंट फॉर्म (सहमति पत्र) पर साइन करना पड़ता है जिसमें लिखा होता है की अगर वहां कुछ ऊंच-नीच हो गई और जान चली गई, तो चीन की तरफ ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा।

क्या कोई मुस्लिम हज यात्री ऐसा फॉर्म साइन करता है की अगर सऊदी अरब में उसकी मौत हो गई, तो उसे वहीं दफना दिया जाएगा? क्या कोई हज यात्री अपनी जेब से ढाई लाख रुपये भरता है और सरकार बस तमाशा देखती रहती है? ये जो फर्क है न, ये सिर्फ प्रशासन का फर्क नहीं है। ये दिल्ली की सत्ता में बैठी हर सरकार के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा है, एक नैतिक कलंक है।

भगवा चोले में लिपटी नई कांग्रेस- बीजेपी का वो ऐतिहासिक धोखा जिसने करोड़ों हिंदुओं की उम्मीदों का गला घोंट दिया 

असल मुद्दा यही है। और बिना पलक झपकाए, एकदम सीधी आंखों में आंखें डालकर ये सवाल पूछा जाना चाहिए: आख़िर बीजेपी ने असल में बदला क्या है?

राम मंदिर बन गया। बहुत बढ़िया। ये हमारी सभ्यता का वो करेक्शन था जिसका बहुत लंबे समय से इंतज़ार था, और पूरे हिंदू समाज ने पूरे हक़ के साथ इसका जश्न भी मनाया। लेकिन सिर्फ एक मंदिर बन जाने से पूरा इंसाफ तो नहीं हो जाता न? एक सिंबॉलिक (प्रतीकात्मक) जीत का मतलब ये नहीं की समाज में बराबरी आ गई।

और जो पार्टी चुनाव जीतने के लिए हिंदुओं की भावनाओं का इस्तेमाल करती है, लेकिन राजकाज बिल्कुल पुराने सेक्युलर तुष्टिकरण वाले अंदाज़ में चलाती है, तो भाई उसे हिंदू पार्टी नहीं कह सकते- वो तो बस भगवा रंग में रंगी हुई एक नई कांग्रेस है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC)- जिसका वादा बीजेपी ने दशकों से अपने हर मैनिफेस्टो में किया है- राष्ट्रीय स्तर पर आज भी अटका पड़ा है। वक्फ अमेंडमेंट एक्ट पास तो हुआ, लेकिन भारी राजनीतिक दबाव के चलते उसे इतना हल्का कर दिया गया की उसकी धार ही खत्म हो गई।

मंदिरों की कमाई और टैक्स का पैसा आज भी राज्य सरकारें हड़प रही हैं, जबकि मस्जिदों का खज़ाना एकदम सेफ है, उसे कोई छू भी नहीं सकता। और अप्रैल 2026 में, उसी बीजेपी सरकार का ‘अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय’ हज यात्रियों के लिए स्मार्ट रिस्टबैंड डिज़ाइन करने में बिज़ी है, जबकि किसी भी केंद्रीय मंत्रालय के पास इतना बजट नहीं है की केदारनाथ के खतरनाक रास्तों पर ढंग के मेडिकल स्टेशन ही बनवा दे।

“प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में सभी सुविधाओं का लगातार विस्तार हो रहा है, और सरकार हर संभव कोशिश कर रही है कि तीर्थयात्रियों का सफर एकदम आसान, सुखद और आरामदायक हो”- ये बात दिल्ली हज कमेटी की चेयरपर्सन ने एयरपोर्ट पर यात्रियों को विदा करते हुए कही। वो हज यात्रियों की बात कर रही थीं। अब ज़रा पूछिए, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केदारनाथ के यात्रियों के लिए क्या-क्या विस्तार हुआ? एक सड़क का प्रोजेक्ट। आधा-अधूरा रोपवे। बद्रीनाथ में एक 50-बेड का अस्पताल, जो 2026 आ जाने के बाद भी पूरा नहीं हो पाया था।

ज़रा संसाधनों के फर्क को देखिए: हज यात्रियों को बेहतर सेवा देने के लिए इस साल मक्का में होटल जैसी शानदार सुविधाएँ किराए पर ली गई हैं। भारत सरकार ने मुस्लिम हज यात्रियों के लिए सऊदी अरब में होटल के कमरे बुक करने में पैसे खर्च किए। दूसरी तरफ, बद्रीनाथ का वो 50-बेड वाला अस्पताल जून 2026 तक जाकर कहीं पूरा होगा। मतलब सरकार को मक्का में होटल के कमरों के लिए तो तुरंत पैसे मिल गए, लेकिन बद्रीनाथ में हिंदू यात्रियों के लिए एक अस्पताल बनाने में इन्हें पसीने आ रहे हैं।

बीजेपी को भी राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में पूरे ग्यारह साल हो चुके हैं। ग्यारह साल बहुत होते हैं एक ‘केंद्रीय हिंदू तीर्थयात्रा प्राधिकरण’ बनाने के लिए। ग्यारह साल बहुत होते हैं हज जैसी विशाल सुविधाओं की तर्ज़ पर एक ‘चार धाम सुविधा योजना’ लागू करने के लिए।

तीर्थयात्रा के रास्तों पर धर्मशालाएं बनाने, यात्रियों को स्टेट-लेवल का हेल्थ इंश्योरेंस देने, केदारनाथ के रास्ते में केंद्र सरकार की मेडिकल टीमें तैनात करने, और हरिद्वार-ऋषिकेश में केंद्र सरकार के नुमाइंदों को खड़ा करने के लिए ग्यारह साल काफी थे, ताकि वे वहां से निकलने वाले यात्रियों को भी उसी गर्मजोशी से माला पहना सकें जैसे दिल्ली एयरपोर्ट पर हज यात्रियों को पहनाई जाती है।

लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। इसलिए नहीं की ये नामुमकिन है। इसलिए भी नहीं कि संसाधनों या पैसों की कोई कमी है। बल्कि इसलिए क्योंकि बीजेपी ने बहुत ही शातिर तरीके से, सोच-समझकर ये तय कर लिया है की हिंदुओं को बस कुछ प्रतीकात्मक जीत थमा दो, क्योंकि राजनीतिक तौर पर ये सस्ता पड़ता है, और सत्ता की असली मलाई उसी मुस्लिम वोट-बैंक पॉलिटिक्स के लिए बचा कर रखो जिसने कांग्रेस को साठ सालों तक सत्ता में बिठाए रखा।

नारा दिया गया था “सबका साथ, सबका विकास।” लेकिन ज़मीनी हकीकत तो ये है: हज के लिए सरकार, केदारनाथ के लिए खुद करो।

हिंदू समाज अब भीख नहीं अपना हक छीनेगा और सत्ता में बैठे लोगों से ये रही हमारी सीधी और दो-टूक मांगें 

हिंदू समाज कोई खैरात या भीख नहीं मांग रहा है। वो बस संवैधानिक समानता (बराबर का हक) मांग रहा है। वो ये मांग कर रहा है की जिस सरकारी खज़ाने को वो अपने टैक्स से भरता है, वो सरकार उसकी धार्मिक आस्थाओं को भी वही सम्मान दे जो वो दूसरों को देती है। ये मांगें बिल्कुल साफ हैं, इन्हें पूरा किया जा सकता है, और सच कहूं तो इन्हें बहुत पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था।

पहली मांग: भारत की हज कमेटी की ही तर्ज़ पर तुरंत एक ‘केंद्रीय हिंदू तीर्थयात्रा प्राधिकरण’ बनाया जाए। ये संस्था या तो एक अलग मंत्रालय के तहत काम करे या फिर संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत, और इसका अपना एक फिक्स और सुरक्षित सालाना बजट हो। इस बॉडी का काम राष्ट्रीय स्तर पर चार धाम यात्रा, कैलाश मानसरोवर यात्रा, अमरनाथ यात्रा, कुंभ मेला और हिंदुओं की बाकी सभी प्रमुख तीर्थयात्राओं का पूरा कॉर्डिनेशन संभालना होना चाहिए।

दूसरी मांग: एक ‘हिंदू तीर्थयात्री बीमा योजना’ शुरू की जाए, जो बिल्कुल मुस्लिम हज यात्रियों को मिलने वाले 6,25,000 रुपये के इंश्योरेंस कवर जैसी हो। हर रजिस्टर्ड चार धाम यात्री का इंश्योरेंस होना चाहिए। हर कैलाश यात्री का इंश्योरेंस होना चाहिए। हिमालय में अपनी आस्था के लिए जान गंवाने वाले किसी किसान के परिवार पर कर्ज़ या मौत का बोझ नहीं पड़ना चाहिए।

तीसरी मांग: केदारनाथ के रास्ते, गंगोत्री के रूट और ऐसी सभी मुश्किल तीर्थयात्राओं के रास्तों पर सिर्फ स्टेट-लेवल की SDRF टीमें ही नहीं, बल्कि ‘केंद्र सरकार के स्तर की मेडिकल टीमें’ तैनात की जानी चाहिए। ये मेडिकल यूनिट्स पूरी तरह से केंद्र द्वारा फंडेड और सुसज्जित होनी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे विदेश जा रहे हज यात्रियों के लिए बेहतरीन हेल्थ सपोर्ट का इंतज़ाम किया जाता है।

चौथी मांग: बराबरी सरेआम दिखनी चाहिए- संबंधित केंद्रीय मंत्रालय का मंत्री चार धाम यात्रा की शुरुआत के समय वहां मौजूद होना चाहिए। उसे हरिद्वार से पहली बसों को बिल्कुल उसी गर्मजोशी और सम्मान के साथ हरी झंडी दिखानी चाहिए, जैसे दिल्ली एयरपोर्ट पर हज यात्रियों को दिखाई जाती है। ये काम सिर्फ दिखावे (के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक बराबरी को हकीकत में दिखाने के लिए होना चाहिए।

पांचवीं मांग: भारत सरकार हज की सुविधाओं पर सालाना जितना भी खर्च करती है- जिसमें हज हाउस का मेंटेनेंस, कमेटियों की सैलरी, ऐप डेवलपमेंट, इंश्योरेंस और सभी छिपे हुए खर्च शामिल हैं- उसका पूरा ऑडिट करके उसे पब्लिक किया जाए। ताकि भारत की जनता भी आखिर साफ-साफ देख सके कि उनके टैक्स का पैसा असल में कहाँ बहाया जा रहा है।

छठी मांग: कैलाश मानसरोवर यात्रा को दोबारा शुरू करने और उसे बढ़ाने के लिए आक्रामक तरीके से कदम उठाए जाएं। शिपकी ला वाला रास्ता खोला जाए। भगवान शिव के घर को एक लॉटरी का खेल बनाने वाले इस घटिया सिस्टम को तुरंत बंद किया जाए। एक ‘कैलाश मानसरोवर कॉरिडोर’ के लिए कूटनीतिक ढांचा तैयार किया जाए, और इसे ठीक उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितनी गंभीरता से सरकारें चीन के साथ बाकी के द्विपक्षीय मुद्दों को लेती हैं।

भारत का हिंदू वोटर कोई मूर्ख या बेवकूफ नहीं है। उसने सब देखा है। उसने इंतज़ार किया है। उसने 2014 में बीजेपी को एक ऐतिहासिक जनादेश दिया, 2019 में उससे भी बड़ा बहुमत दिया, और 2024 में भी अपना भरोसा कायम रखा- इस विश्वास के साथ की ये पार्टी, किसी भी दूसरी पार्टी से कहीं ज़्यादा, उसके धर्म और उसकी तीर्थयात्राओं को वो संवैधानिक बराबरी, सभ्यता का सम्मान और संस्थागत हक दिलाएगी जिसका वो हक़दार है।

लेकिन बदले में उसे मिला क्या? बस एक मंदिर, कुछ सड़कें और एक अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय जो आज भी सिर्फ मुस्लिम समुदाय के कल्याण विभाग की तरह काम कर रहा है- बिना किसी बदलाव के, बिना किसी सवाल के, और अब तो मक्का में नए रिस्टबैंड और होटल के कमरों के साथ।

कैसे बीजेपी नई कांग्रेस बनती जा रही है? इसका जवाब हज पर जाते हर मुसलमान को पहनाई जा रही हर माला में साफ दिखता है। और हिमालय के उन ठंडे, अनजान रास्तों पर अकेले, बिना किसी इंश्योरेंस के, बिना किसी सरकारी सम्मान के, और अपने ही टैक्स के पैसों पर पलने वाली सरकार की नज़रों से ओझल होकर चलते हर हिंदू तीर्थयात्री के हर कदम में दिखता है।

अब बस, बहुत हो गया। हिंदू तीर्थयात्री इससे कहीं बेहतर डिज़र्व करता है। भारत का संविधान भी यही मांग करता है। और कोई भी राजनीतिक पार्टी- न कांग्रेस, न बीजेपी, और न ही कोई और- अगर वो इससे कुछ भी कम देती है, तो उसे खुद को इस देश के हिंदू की आवाज़ बनने का कोई हक़ नहीं है।

हर हर महादेव।

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