बुर्के को खुली छूट और कलावा पर पाबंदी, दिल्ली में BJP की नाक के नीचे CUET परीक्षा केंद्रों में पनप रहा हिंदू-विरोधी तुष्टीकरण का नंगा खेल

सच कहूं तो अब घुटन होने लगी है इस ‘सेक्युलर’ सिस्टम से। जिस दिल्ली की गद्दी पर हमने अपने ‘हिंदू हृदय सम्राटों’- BJP, को पूरे गाजे-बाजे के साथ बिठाया था, आज उसी दिल्ली में, उसी सरकार की नाक के नीचे हमारी ही बच्चियों की कलाइयों से उनके भगवान का आशीर्वाद सरेआम नोच कर फेंका जा रहा है। और हमारे नेता? वो कहीं बैठकर ‘सबका साथ, सबका विकास’ का रट्टा मार रहे हैं।

हाल ही में दिल्ली के एक सीयूईटी (CUET) परीक्षा केंद्र पर जो कुछ भी हुआ, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है की इस देश में हिंदू होना, और अपनी हिंदू पहचान को सीने से लगाकर चलना आज के दौर का सबसे बड़ा अपराध बन गया है। मामला रोहतक रोड, हिरण कुदना स्थित ‘गंगा इंटरनेशनल स्कूल’ का है। वहां जो तमाशा हुआ, वो सिर्फ एक एग्जाम सेंटर की चेकिंग का मामला नहीं है, वो एक सीधा-सीधा तमाचा है हर उस हिंदू के गाल पर जो सोचता है की केंद्र में उसकी अपनी सरकार बैठी है और अब उसका धर्म सुरक्षित है।

हिंदू बेटियों का कलावा कटा और मुस्लिम छात्रा बुर्के में शान से अंदर घुसी 

एग्जाम की टेंशन वैसे ही कम नहीं होती। ऊपर से जब 18-19 साल की बच्चियां सेंटर पर पहुंचती हैं तो उनके दिमाग में हज़ार चीज़ें चल रही होती हैं। वहां गेट पर चेकिंग के नाम पर जो नंगा नाच शुरू हुआ, वो किसी भी स्वाभिमानी हिन्दू का खून खौलाने के लिए काफी है। सिक्योरिटी वालों ने नियम-वियम का हवाला देकर हिंदू लड़कियों को लाइन में खड़ा कर दिया।

एक-एक करके उनके हाथों में बंधे पवित्र रक्षासूत्र- यानी हमारा कलावा- कैंची से काट दिए गए। बच्चियों के कानों की बालियां उतरवा ली गईं। गले की चेन निकाल दी गई। लड़कियां बेचारी घबराई हुईं, अपने हाथों से अपनी ही आस्था के धागे खोलकर वहां कूड़ेदान में फेंकने को मजबूर थीं। कहा गया की ‘सिस्टम’ का रूल है, इसके बिना अंदर जाने नहीं मिलेगा।

चलो ठीक है यार, मान लिया की नकल रोकने के लिए बहुत कड़े नियम हैं। मान लिया की एक पतले से लाल-पीले धागे में शायद कोई ‘माइक्रो-ब्लूटूथ’ या 5G की चिप छिपी हो सकती है जिससे पूरा का पूरा एग्जाम हैक हो जाएगा! हम हिंदू तो वैसे भी कानून मानने वाले लोग हैं। हमने चुपचाप सह लिया।

लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तो तब आता है जब उसी गेट से, उन्हीं सिक्योरिटी वालों के सामने से एक मुस्लिम छात्रा सिर से पैर तक बुर्के में पूरी तरह पैक होकर धड़ल्ले से अंदर जाती है। उसे कोई नहीं रोकता! उसका कोई ‘धागा’ या कोई कपड़ा नहीं उतारा जाता। किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि की टोक भी दे।

मतलब, हमारी बच्चियों के हाथों का एक पतला सा कलावा इस देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन एक काला लबादा, जिसके अंदर इंसान से लेकर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, किताब या कुछ भी छिपाया जा सकता है, वो एकदम ‘पवित्र’ और ‘सुरक्षित’ है?

ये पूरा दृश्य एक हिन्दू युवक ने अपने फ़ोन से रिकॉर्ड किया हुआ है, उसने सीधा कैमरा ऑन किया और उन अधिकारियों की क्लास लगा दी जो वहां मौजूद थे। उसने सीधा पूछा की, जब इन हिंदू लड़कियों के कलावा और बालियां उतरवा रहे हो, तो इस बुर्के वाली को वीआईपी एंट्री क्यों दे रहे हो? क्या बुर्का पहनकर एग्जाम देने की अलग से कोई छूट दे रखी है सरकार ने?

लेकिन अधिकारियों के पास कोई जवाब ही नहीं था। उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। बस नज़रें चुरा रहे थे। ये जो उनकी खामोशी थी ना, ये चीख-चीख कर बता रही थी की भारत का जो ये सड़ा हुआ सिस्टम है, वो सिर्फ और सिर्फ शांतिप्रिय और सहिष्णु हिंदुओं को दबाने के लिए बना है। इस्लामी कट्टरपंथ के सामने आते ही इस पूरे सिस्टम की हवा निकल जाती है और ये दुम हिलाकर ज़मीन पर रेंगने लगता है।

सेक्युलर सिस्टम के नियम सिर्फ हिंदुओं के लिए और मुसलमानों को शरिया वाली छूट 

अगर हम एनटीए (NTA) या किसी भी एजुकेशन बोर्ड के नियमों की बात करें, तो साफ लिखा होता है की कोई भी ज्वेलरी, मोटे सोल के जूते या बड़े बटन वाले कपड़े पहनकर अंदर जाना मना है। चलिए, बहुत अच्छी बात है। ट्रांसपेरेंसी होनी चाहिए।

लेकिन ये नियम सिर्फ बहुसंख्यक समाज पर ही हथौड़े की तरह क्यों गिरते हैं? ‘सेक्युलरिज्म’ का मतलब क्या अब ये हो गया है की हिंदुओं की हर परंपरा को अंधविश्वास बताकर कचरे के डिब्बे में डाल दो, और इस्लामी कट्टरपंथ को ‘धार्मिक आज़ादी’ का नाम देकर सिर पर बिठा लो?

ये कोई पहली बार नहीं हो रहा। याद कीजिए नीट (NEET) एग्जाम के टाइम क्या-क्या तमाशे हुए थे। हिंदू औरतों के मंगलसूत्र तक उतरवा लिए गए थे। मंगलसूत्र! जो एक सुहागिन के लिए उसकी जान से भी प्यारा होता है।

यूपी के मुरादाबाद से लेकर कर्नाटक के स्कूलों तक में हमने देखा है की कैसे हिंदू बच्चों के माथे से चंदन और तिलक पोंछ दिए गए। लेकिन जब बात हिजाब या बुर्के की आती है, तो पूरा का पूरा वामपंथी और इस्लामी इकोसिस्टम छाती पीटने लगता है।

अरे, फ्रांस जैसे क्रिश्चियन देश ने, जो दुनिया भर में अपनी लिबरल पॉलिसी के लिए जाना जाता है, अपने स्कूलों में सुरक्षा के नाम पर बुर्के और अबाया पर बैन लगा रखा है। उन्हें समझ आ गया है की पब्लिक स्पेस में ये सब नहीं चलेगा।

लेकिन हमारे भारत में? यहाँ का मुसलमान अपनी शरिया को संविधान से ऊपर मानता है। और सबसे बड़ी शर्म की बात तो ये है की हमारा प्रशासन उनके आगे नतमस्तक है।

इस्लामिक कट्टरपंथ के खौफ से कांपता सिस्टम सिर्फ हिंदू बच्चों को दबा रहा है 

आपको क्या लगता है, उन सिक्योरिटी वालों ने बुर्के वाली लड़की को इसलिए जाने दिया क्योंकि वो बहुत ‘टॉलरेंट’ या सेक्युलर हैं? जी नहीं! सच तो ये है की उनकी पैंट गीली हो रही थी। वो डरे हुए हैं।

उन्हें पता है की अगर उन्होंने बुर्के को हाथ भी लगा दिया, तो अगले आधे घंटे में पूरा रोहतक रोड जाम हो जाएगा। ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगने शुरू हो जाएंगे। जुम्मे की नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी शुरू हो जाएगी।

और तो और, अगले दिन अखबारों और टीवी चैनलों पर रवीश कुमार जैसे लोग ‘माइनॉरिटी खतरे में है’ का रोना लेकर बैठ जाएंगे। अल्ट न्यूज़ वाले तुरंत उस गार्ड को ‘इस्लामोफोबिक’ घोषित करके उसकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर देंगे।

लेकिन हम हिंदू? हम तो ‘सॉफ्ट टारगेट’ हैं ना। गार्ड को पता है की हिंदू बच्ची का कलावा काटेंगे तो बेचारी थोड़ा रोएगी, आंखें पोछेगी और एग्जाम देने चली जाएगी। घर जाकर उसके मां-बाप भी कहेंगे की “कोई बात नहीं बेटा, एग्जाम ज़्यादा ज़रूरी है, कलावा फिर बांध लेंगे।”

हमारी यही जो सो-कॉल्ड ‘टॉलरेंस’ या सहिष्णुता है ना, इसी ने हमारा बेड़ा गर्क कर रखा है। हमने अपनी आस्था को इतना सस्ता बना दिया है की राह चलता कोई भी दो कौड़ी का गार्ड आकर उसे कैंची से काट जाता है और हम उफ तक नहीं करते।

कलावा कटना हिंदू पहचान मिटाने की उस जिहादी साजिश का हिस्सा है जिसे भाजपा रोक नहीं पा रही 

कलावा या रक्षासूत्र कोई आज के ज़माने का फैशन-वैशन नहीं है। ये हमारे वेदों से निकला हुआ हमारी आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। जब एक बच्ची एग्जाम हॉल के बाहर अपना रक्षासूत्र कटवाती है, तो उसके दिमाग पर क्या असर पड़ता है?

सिस्टम उसे ये महसूस करवा रहा है की अगर तुम्हें इस मॉर्डन दुनिया में आगे बढ़ना है, एजुकेशन लेनी है, तो तुम्हें अपनी ‘पिछड़ी’ हिंदू पहचान को गेट के बाहर छोड़कर आना होगा। उसे हीन भावना से भर दिया जाता है।

वहीं दूसरी तरफ, उसी बच्ची के सामने से जब कोई बुर्का पहनकर शान से अंदर जाती है, तो उसे क्या मैसेज मिलता है? उसे ये बताया जाता है की ‘देख लो, हम चाहे जहाँ जाएं, हमारा मज़हब इस सिस्टम से बड़ा है। हमें अपने धर्म से कोई समझौता नहीं करना, ये सिस्टम खुद हमारे हिसाब से एडजस्ट होगा।’

ये पूरी तरह से एक साइकोलॉजिकल वॉरफेयर चल रहा है। ये एक सांस्कृतिक जिहादी आतंकवाद है जो बड़ी चालाकी से हमारी युवा पीढ़ी के दिमाग में ज़हर घोल रहा है। चींटी की तरह हमें धीरे-धीरे खाया जा रहा है और हमें पता भी नहीं चल रहा।

सत्ता में बैठी भाजपा के राज में हिंदू लावारिस और मुसलमानों का हो रहा VIP ट्रीटमेंट 

अब बात करते हैं उस हाथी की जो कमरे में बैठा है, लेकिन कोई उसकी बात नहीं करना चाहता। भारतीय जनता पार्टी! आज की डेट में सबसे बड़ा सवाल तो यही है की ये सब हो किसके राज में रहा है?

गंगा इंटरनेशनल स्कूल कहां है? दिल्ली में। दिल्ली की पुलिस किसके अंडर आती है? सीधे-सीधे गृह मंत्रालय के, यानी मोटा भाई (अमित शाह) के अंडर। और ये NTA जो CUET कराती है, वो किसकी एजेंसी है? वो भी केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय की। मतलब ऊपर से लेकर नीचे तक सरकार तुम्हारी, सिस्टम तुम्हारा, और फिर भी जूतियां कौन खा रहा है? हिंदू!

ये देखकर सच में हंसी आती है, लेकिन ये बहुत कड़वी हंसी है। जब इलेक्शन का टाइम आता है, तो इन्हीं बीजेपी वालों को श्मशान-कब्रिस्तान याद आने लगते हैं। तब इन्हें राम मंदिर की याद आती है, 80 बनाम 20 का नैरेटिव सेट किया जाता है।

हिंदू अस्मिता के नाम पर हम लोग भी पागलों की तरह चिलचिलाती धूप में लाइन में लगकर इन्हें वोट देते हैं। हमें लगता है की चलो, कम से कम कोई तो है जो हमारी बात करेगा। लेकिन सत्ता में आते ही इनका गियर बदल जाता है।

अचानक से इन्हें ‘पसमांदा मुसलमानों’ की फिक्र सताने लगती है। अचानक से प्रधानमंत्री जी सूफियों की दरगाहों पर चादर चढ़ाने लगते हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के चक्कर में ये लोग अपने ही कोर वोटर को सड़क पर अनाथ छोड़कर आगे बढ़ गए हैं।

अरे, आप मुसलमानों का कितना भी तुष्टिकरण कर लो, वो आपको वोट नहीं देने वाले! ये बात किसी अंधे को भी समझ आ जाएगी, लेकिन हमारे इन मास्टर स्ट्रोक वाले नेताओं को समझ नहीं आ रही।

बीजेपी ने शायद ये मान लिया है की हिंदू तो उनके बाप की जागीर है। ‘कहाँ जाएंगे ये? वोट तो हमें ही देंगे।’ बस इसी ओवर-कॉन्फिडेंस में वो आज उन अधिकारियों पर कोई एक्शन नहीं ले रहे हैं जो हमारी बच्चियों का कलावा काट रहे हैं।

आज अगर यही घटना किसी मुस्लिम लड़की के साथ हुई होती, उसका हिजाब उतरवा लिया गया होता, तो अब तक दिल्ली पुलिस के कमिश्नर से लेकर शिक्षा मंत्री तक के पसीने छूट गए होते। न्यूज़ चैनलों पर स्पेशल डिबेट चल रही होती। लेकिन चूँकि कटी हुई चीज़ सिर्फ एक हिंदू का कलावा है, तो सब जगह शांति है।

ये जो बीजेपी की आपराधिक चुप्पी है ना, ये हमें सबसे ज़्यादा चुभ रही है। वामपंथियों और कांग्रेस से तो हमें वैसे भी कोई उम्मीद कभी नहीं थी। उनका तो एजेंडा ही क्लियर है की वो हिंदू-विरोधी हैं। लेकिन जब तुम्हारा अपना ही तुम्हें पीठ में छुरा घोंपे, तो दर्द दोगुना होता है।

भाजपा को ये नहीं भूलना चाहिए की जिस दिन हिंदू समाज के सब्र का बांध टूटा, उस दिन ये इनका ‘छद्म-हिंदुत्व’ ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा। जिन हिंदुओं ने तुम्हें अर्श पर बिठाया है, वो तुम्हें फर्श पर पटकने में एक सेकेंड भी नहीं लगाएंगे।

मुस्लिम हिजाब के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले आज हिंदू बच्चियों के अपमान पर गूंगे क्यों हैं 

ज़रा पीछे मुड़कर कर्नाटक के हिजाब विवाद को देखिए। वहां क्या हुआ था? स्कूलों ने एक यूनिफॉर्म ड्रेस कोड लागू किया था ताकि सारे बच्चे एक जैसे दिखें, उनमें कोई भेदभाव न हो। लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों ने क्या किया? उन्होंने अपनी बच्चियों को टूल बनाकर आगे कर दिया और पूरे राज्य को बंधक बना लिया।

“हम तो हिजाब पहनकर ही क्लास में बैठेंगे, भले ही पढ़ाई छूट जाए।” ये जिद्द थी उनकी। और मजे की बात देखिए, सुप्रीम कोर्ट तक में ये मामला महीनों तक खिंचा। बड़े-बड़े वकील, करोड़ों रुपये की फीस लेकर, उन हिजाब वाली लड़कियों के लिए कोर्ट में खड़े हुए।

लेकिन यहाँ? यहाँ एक कलावा काटने पर कोई एक वकील, कोई एक नेता सामने नहीं आया। क्यों? क्योंकि हमारे अंदर वो आग ही नहीं बची है। हम ‘चलता है’ वाले एटीट्यूड में जी रहे हैं। “अरे छोड़ो यार, छोटी सी बात है, क्यों फालतू का विवाद करना।” इसी एटीट्यूड ने हमें आज इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है की हमारे ही देश में, हमारी ही धरती पर, हमें दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।

अगर हिजाब पहनना ‘राइट टू रिलिजन’ है, तो कलावा पहनना क्या ‘राइट टू रबिश’ है? ये कैसा संविधान है भाई जो सिर्फ एक कम्युनिटी के लिए काम करता है? अगर एग्जाम हॉल में चीटिंग रोकने के लिए नियम हैं, तो वो सब पर लागू होने चाहिए।

एक यूनिफॉर्म सिविल कोड की तरह, एग्जाम सेंटर्स के लिए एक ‘यूनिफॉर्म ड्रेस कोड’ क्यों नहीं हो सकता? अगर सिक्योरिटी के नाम पर मेरी बेटी की चूड़ियां टूट रही हैं, तो सामने वाली की बुर्के की लेयर्स भी उतरनी चाहिए। सीधी सी बात है। कोई ‘धार्मिक छूट’ नहीं होनी चाहिए।

भाजपा के भरोसे मत रहो अब हर हिंदू को इस्लामिक चरमपंथ से सड़क पर खुद लड़ना होगा 

ये बात तो अब पत्थर की लकीर हो चुकी है की कोई भी सरकार या कोई भी नेता हमें बचाने नहीं आने वाला। जो करना है, हमें खुद करना पड़ेगा। अगर आज हमने इस कलावे के कटने पर सिर्फ सोशल मीडिया पर दो-चार पोस्ट लिखकर भड़ास निकाल ली और कल फिर से अपनी उसी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त हो गए, तो यकीन मानिए, कल ये हमारे माथे का तिलक मिटाएंगे।

परसों ये हमारे घरों के बाहर से ‘ॐ’ का झंडा हटवाएंगे, और एक दिन ऐसा आएगा जब ये हमें इस देश से ही निकाल बाहर करेंगे। कश्मीर में क्या हुआ था? रातों-रात तो कश्मीरी पंडितों को नहीं निकाला गया था ना? पहले उनकी पहचान पर हमले हुए थे। पहले उनके मंदिरों को निशाना बनाया गया था। ये सब उसी बड़ी साज़िश का शुरुआती हिस्सा है।

पहली चीज़- बायकॉट करना सीखिए। जो स्कूल, जो एग्जाम सेंटर, जो मॉल हमारी धार्मिक भावनाओं का अपमान करता है, उसका पूरी तरह से आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार कर दो।

उन अधिकारियों के चेहरे याद रखो और उनके खिलाफ धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को आहत करना) के तहत पुलिस स्टेशन में जाकर एफआईआर (FIR) दर्ज करवाओ। जब तक इन सो-कॉल्ड सेक्युलर अफसरों को कोर्ट-कचहरी के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे, तब तक इनका ये नशा नहीं उतरेगा।

दूसरी चीज़- अपने नेताओं का कॉलर पकड़ना सीखो। जो तुम्हारा लोकल विधायक या सांसद है, चाहे वो बीजेपी का ही क्यों न हो, उसके घर के बाहर जाकर प्रदर्शन करो। उससे पूछो की भाई, जब वोट मांगने आए थे तब तो बड़े हिंदू बन रहे थे, अब मेरी बच्ची का कलावा कट गया तो तुम्हारे मुंह में दही क्यों जमा हुआ है? उन्हें एहसास दिलाओ की हम हिंदू कोई तुम्हारी ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ वाली प्रॉपर्टी नहीं हैं।

और सबसे अहम बात- अपने बच्चों को बताओ की ये कलावा, ये तिलक, ये बालियां सिर्फ श्रृंगार का सामान नहीं हैं। ये हमारी आईडेंटिटी हैं। हमारे पूर्वजों ने इन चीज़ों को बचाने के लिए अपनी गर्दनें कटवा दी थीं, और तुम एक एग्जाम के डर से इसे उतार कर फेंक रहे हो?

अपने बच्चों को इतना मज़बूत बनाओ की अगर कोई एग्जामिनर उन्हें कलावा उतारने को कहे, तो वो सीधा उसकी आंखों में आंखें डालकर कह सकें- “एग्जाम गया भाड़ में, मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूंगा/छोड़ूंगी।” जिस दिन हमारे बच्चों के अंदर ये ‘गट्स’ आ गए, उस दिन ये पूरा का पूरा सिस्टम हमारे सामने घुटनों के बल बैठा नज़र आएगा।

आख़िर में बस इतना ही कहूंगा की ये जो ‘सॉफ्ट हिंदू’ बनने का कीड़ा हमारे अंदर घुसा है ना, उसे अब मारना पड़ेगा। शिव के डमरू से सिर्फ संगीत नहीं निकलता, तांडव भी होता है। अब वो तांडव करने का वक्त आ गया है। अपनी पहचान के लिए लड़ना सीखो यार, वरना इतिहास की किताबों में भी हमारा ज़िक्र सिर्फ एक ‘कायर’ कौम के रूप में होगा जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकी। 

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