86%नकदी एक रात में बाहर |
15.41लाख करोड़ रुपये रद्द |
99.3%नोट बैंक में वापस आए |
15 लाखनौकरियाँ, CMIE |
आंकड़े लेख के अंदर दिए गए दावों और नतीजों से लिए गए हैं.
राजनीति में एक बड़ा ही दिलचस्प शब्द है- ‘मास्टरस्ट्रोक’। जब सत्ता में किसी सरकार या नेता को प्रचंड बहुमत का नशा चढ़ने लगता है, तो अक्सर उसे लगने लगता है की उसका लिया गया हर एक फैसला इतिहास के पन्नों में मास्टरस्ट्रोक ही कहलाएगा।
लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह है की जब ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर कोई ‘चाणक्य-नीति’ बनाई जाती है, तो वो मास्टरस्ट्रोक कब एक भयंकर ‘सेल्फ-गोल’ बन जाता है, इसका अंदाज़ा खुद हुक्मरानों को भी नहीं लग पाता।
BJP सरकार के कार्यकाल का अगर कोई सबसे बड़ा और सबसे विवादित आर्थिक फैसला रहा है, तो वो है 2016 की नोटबंदी (Demonetisation)।
एक ऐसा दांव जिसे बिना किसी ठोस होमवर्क के, महज़ एक ‘पॉलिटिकल शॉक वैल्यू’ (Political Shock Value) क्रिएट करने के लिए खेला गया।
आइए ज़रा उन पन्नों को पलटते हैं और आंकड़ों की कसौटी पर कसकर देखते हैं की कैसे अति-आत्मविश्वास में लिया गया यह फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐसा नासूर बन गया, जिसकी टीस आज सालों बाद भी बाज़ार महसूस करता है।
1. 8 नवंबर की वो रात जब एक झटके में रद्दी हो गई देश की 86 प्रतिशत नकदी
और खड़ा हुआ आज़ाद भारत का सबसे बड़ा आर्थिक बवंडर

8 नवंबर 2016 की वो शाम। सर्दियां दस्तक दे रही थीं। कोई ऑफिस से घर लौट रहा था, कोई बाज़ार में सब्ज़ी-भाजी मोलभाव कर रहा था, तो कोई चाय-वाय पीकर न्यूज़ चैनलों के सामने बैठा था।
तभी अचानक रात 8 बजे टीवी स्क्रीन पर एक फ्लैश चमकता है की प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं।
उस वक़्त देश का माहौल ऐसा बना की लोगों को लगा शायद सीमा पर कोई बड़ी हलचल हुई है या कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय संकट आ गया है।
लेकिन रात 8 बजे टीवी स्क्रीन से जो घोषणा हुई, उसने सचमुच पूरे देश के पैरों तले ज़मीन खिसका कर रख दी।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने घोषणा करी की रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट अब ‘लीगल टेंडर’ (Legal Tender) नहीं रहेंगे।
आसान भाषा में कहें तो, आपकी जेब, तिजोरी या गुल्लक में पड़ा जो लाल और पीला नोट कुछ देर पहले तक आपकी गाढ़ी कमाई का हिस्सा था, वो रात 12 बजे के बाद महज़ कागज़ का एक बेईमान टुकड़ा बन जाएगा।
ये कोई छोटा-मोटा फैसला नहीं था! ज़रा इस फैसले की गंभीरता और डेटा पर गौर करिए। उस रात देश की अर्थव्यवस्था में जितना भी कैश (नकद) मौजूद था, उसका सीधा-सीधा 86 प्रतिशत हिस्सा एक ही झटके में सिस्टम से बाहर कर दिया गया।
ये रकम कोई सौ-पचास करोड़ नहीं थी, ये थे पूरे 15.41 लाख करोड़ रुपये! ज़रा सोचिए, एक ऐसा देश जिसकी 80 प्रतिशत से ज़्यादा अर्थव्यवस्था नकद लेन-देन पर सांस लेती हो, उससे अचानक 86 प्रतिशत ख़त्म कर दिया जाये, तो उसका क्या हश्र होगा?
आज़ाद भारत के इतिहास में इससे बड़ा आर्थिक बवंडर कभी नहीं आया था।
जिन परिवारों में अगले हफ्ते शादियां थीं और एडवांस पेमेंट देना था, जिनके घरों में अगले दिन कोई मेडिकल इमरजेंसी आने वाली थी, या जो किसान अगली सुबह बीज-खाद खरीदने बाज़ार जाने वाले थे, वो अचानक खुद को सड़क पर खड़ा महसूस करने लगे।
ऐसा लगा जैसे किसी 100 की स्पीड से दौड़ती हुई बुलेट ट्रेन के सामने अचानक से कंक्रीट की एक विशाल दीवार खड़ी कर दी गई हो। सब कुछ सुन्न पड़ गया।
2. काले धन से लेकर आतंकवाद को ख़त्म करने का दिखाया वो जादुई सपना
पब्लिक को लगा की करप्शन सच में मिट जाएगा

अब सवाल ये उठता है की इतने बड़े फैसले को जनता के गले कैसे उतारा गया? कोई भी बड़ा राजनीतिक दांव बिना किसी भारी-भरकम इमोशनल नैरेटिव के तो खेला नहीं जाता।
उस रात टीवी स्क्रीन के सामने बने बैठे करोड़ों हिंदुस्तानियों को एक बहुत ही जादुई, सम्मोहक और देशभक्ति से लबरेज़ बात बोली गयी।
देश को बताया गया की ये कोई सामान्य आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि भारत को दीमक की तरह चाट रहे ‘काले धन’ (Black Money) पर एक ऐतिहासिक सर्जिकल स्ट्राइक है।
इस मास्टरस्ट्रोक के तीन बड़े टारगेट सेट किए गए थे। पहला और सबसे बड़ा दावा था काले धन का खात्मा।
कहा गया की देश के बड़े-बड़े भ्रष्ट नेताओं, सेठों, जमाखोरों और टैक्स चोरों ने जो बोरियों और तहखानों में भरकर 500 और 1000 के नोट छिपा रखे हैं, वो सब आज रातों-रात रद्दी हो जाएंगे।
आम आदमी, जो वैसे भी रोज़मर्रा की महंगाई और सिस्टम के करप्शन से त्रस्त था, उसे लगा की यार चलो, मेरे पास तो वैसे भी काला धन नहीं है, लेकिन कम से कम उन अमीरों की नींद तो हराम होगी जो टैक्स चुराकर मर्सिडीज़ में घूमते हैं।
यही वो साइकोलॉजिकल ट्रिगर था जिसने पूरे देश को उस रात एक अजीब से जश्न और खौफ के मिक्सचर में डाल दिया। इसके अलावा दो और बड़े दावे किए गए।
बताया गया की पाकिस्तान बॉर्डर से जो जाली नोटों (Fake Currency) की खेप आ रही है, उसका पूरा नेटवर्क बर्बाद हो जाएगा।
और तीसरा दावा ये था की कश्मीर से लेकर बस्तर तक, आतंकवादियों और नक्सलियों की फंडिंग की रीढ़ टूट जाएगी क्योंकि उनके पास जो भी कैश डंप है, वो अब किसी काम का नहीं रहेगा।
पब्लिक को लगा की बस, कल सुबह सूरज निकलेगा और भारत से करप्शन का नामोनिशान मिट जाएगा। लेकिन यहीं पर सत्ता का वो ओवरकॉन्फिडेंस और ‘पॉलिसी ब्लंडर’ सामने आता है।
सत्ता में बैठे रणनीतिकार शायद इकोनॉमिक्स का वो बेसिक रूल भूल गए की काला धन सूटकेसों में कैश के रूप में नहीं, बल्कि ज़मीन, सोने (Gold), विदेशी खातों और बेनामी संपत्तियों में इन्वेस्ट करके रखा जाता है।
तमाम अर्थशास्त्रियों और रिज़र्व बैंक के पुराने डेटा बता रहे थे की भारत में काले धन का महज़ 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा ही कैश के रूप में मौजूद रहता है। बाकी का 95 प्रतिशत तो सिस्टम के अंदर सफ़ेद बनकर दौड़ रहा होता है।
खैर, उस रात तो टीवी पर दावों की आंधी चल रही थी। पूरा देश इस ‘चाणक्य-नीति’ पर मुग्ध था और एक नए सवेरे का इंतज़ार कर रहा था।
लेकिन जैसे ही अगली सुबह हुई और बैंकों के शटर खुले, तो देश ने देखा की काले धन वाले भ्रष्ट सेठ तो किसी लाइन में नज़र ही नहीं आ रहे, बल्कि अपना ही दो-चार हज़ार रुपया बदलवाने के लिए देश का आम गरीब, मज़दूर और मिडिल क्लास सड़कों पर धक्के खा रहा है।
3. ATM के बाहर देशभक्ति की चाशनी में लिपटी कतारें
बिना होमवर्क के लिए गए फैसले ने कैसे निकाल दिया आम आदमी का दिवाला

जब 8 नवंबर की खुमारी उतरी और 10 नवंबर की सुबह बैंकों के शटर खुले (9 नवंबर को सारे बैंक पब्लिक के लिए बंद थे), तो देश ने एक ऐसा नज़ारा देखा जो आज़ाद भारत के इतिहास में शायद पहले कभी किसी ने नहीं देखा था।
बैंकों के बाहर एक किलोमीटर लंबी लाइनें लगी थीं। ये लाइनें किसी फ्री के राशन या खैरात के लिए नहीं थीं, बल्कि ये देश का आम टैक्सपेयर, मज़दूर और मिडिल क्लास था, जो अपना ही मेहनत का पैसा बैंक से वापस मांगने के लिए भिखारी की तरह खड़ा कर दिया गया था।
सरकार का दावा था की लाइन में वो भ्रष्टाचारी लगेंगे जिनके गद्दों के नीचे काला धन छिपा है। लेकिन ज़रा याद कीजिए उन दिनों की तस्वीरें!
क्या आपको उन लंबी कतारों में कोई अरबपति, कोई भ्रष्ट नेता या कोई बड़ा बिल्डर खड़ा नज़र आया? बिल्कुल नहीं! लाइनों में तो वो दिहाड़ी मज़दूर खड़ा था जिसकी उस दिन की दिहाड़ी मारी गई थी।
वो बूढ़ा पेंशनर खड़ा था जिसे अपनी दवाइयों के लिए नकद चाहिए था। और सबसे ज़्यादा तो वो आम घरेलू औरतें खड़ी थीं, जिन्होंने सालों से अपने पतियों से छिपाकर, चावल और आटे के डिब्बों में दो-चार हज़ार रुपये की ‘इमरजेंसी सेविंग्स’ जोड़ रखी थी।
नोटबंदी ने रातों-रात महिलाओं की उस गुल्लक को सरेआम सड़क पर लाकर रख दिया।
जब चारों तरफ हाहाकार मचने लगा और लोगों ने सवाल पूछने शुरू किए की “भाई, ये कैसा मास्टरस्ट्रोक है जिसमें आम आदमी पिस रहा है?”, तो सत्ता के सिपहसालारों ने एक बहुत ही इमोशनल नैरेटिव सेट कर दिया।
इस पूरी अव्यवस्था और तकलीफ को ‘देशभक्ति की चाशनी’ में लपेट दिया गया। सरकार की मशीनरी का टीवी डिबेट्स में एक ही डायलॉग गूंजने लगा-
“अरे, जब हमारे जवान सियाचिन के बॉर्डर पर माइनस 20 डिग्री में देश के लिए खड़े रह सकते हैं, तो क्या आप देश से करप्शन मिटाने के लिए दो घंटे लाइन में नहीं खड़े हो सकते?”
वाह! क्या गज़ब का तर्क था! मतलब सरकार बिना किसी प्लानिंग के, बिना नया कैश छापे रातों-रात 86 प्रतिशत पैसा मार्केट से सोख ले, और जब जनता अपने ही पैसों के लिए तड़पे, तो उसे बॉर्डर के जवानों का ताना देकर गिल्ट (Guilt) में डाल दिया जाए।
इसे कहते हैं अपनी नाकामी को नेशनलिज़्म के रैपर में पैक करके बेचना। आम आदमी, जो स्वभाव से ही भावुक होता है, वो बेचारा इस देशभक्ति वाले तर्क के आगे कुछ बोल ही नहीं पाया और चुपचाप उस यातना को ‘देश-निर्माण’ का हिस्सा मानकर सहने लगा।
4. काले धन पर प्रहार बताकर ला गए दो हज़ार का नया गुलाबी नोट
और ATM मशीनों के कैलिब्रेट ना होने से सड़कों पर तड़पता आम हिंदुस्तानी

अगर आप नोटबंदी के इस पूरे एपिसोड का सबसे बड़ा और सबसे तार्किक मज़ाक ढूंढेंगे, तो वो था 2000 रुपये का गुलाबी नोट।
ज़रा सरकार की ‘चाणक्य-नीति’ का लेवल देखिए! कहा गया की 1000 और 500 के नोटों की वजह से लोग सूटकेस और अलमारी में भरकर आसानी से काला धन इकट्ठा कर लेते हैं, इसलिए इन्हें बंद किया जा रहा है।
ठीक है मान लिया। लेकिन 1000 का नोट बंद करके उसकी जगह बाज़ार में 2000 रुपये का नया नोट क्यों उतार दिया गया?
यार, ये तो बेसिक गणित है! अगर कोई भ्रष्ट आदमी पहले एक सूटकेस में 1 करोड़ रुपये (हज़ार के नोटों में) छिपाता था, तो अब 2000 के नोट आने के बाद उसी सूटकेस में 2 करोड़ रुपये आ जाएंगे!
काले धन की कमर तोड़ने के नाम पर आपने तो भ्रष्टाचारियों का काम और आसान कर दिया था। और तो और, उस वक़्त कुछ BJP के समर्थक न्यूज़ एंकरों ने तो टीवी पर आकर ये तक बता दिया था की इन नए 2000 के नोटों में ‘नैनो जीपीएस चिप’ (Nano GPS Chip) लगी है, जिसे अगर कोई ज़मीन के 120 मीटर नीचे भी गाड़ देगा, तो सैटेलाइट से पता चल जाएगा!
ऐसी हास्यास्पद अफ़वाहों ने इस पूरे गंभीर पॉलिसी ब्लंडर को एक कॉमेडी शो बनाकर रख दिया था।
अब आते हैं सरकार के ‘बिना होमवर्क’ वाले एग्जीक्यूशन पर। सरकार ने नए 500 और 2000 के नोट तो छाप दिए (1000 के नोट को पूरी तरह बंद कर दिया), लेकिन शायद वित्त मंत्रालय और रिज़र्व बैंक के बड़े-बड़े बाबू ये भूल गए की एटीएम (ATM) मशीनें कैसे काम करती हैं।
पुराने नोटों के मुकाबले नए नोटों का साइज़ (लंबाई-चौड़ाई) बिल्कुल अलग था। पूरे भारत में उस समय लगभग 2 लाख 20 हज़ार एटीएम मशीनें थीं।
मशीनों की कैसेट (जिसमें नोट रखे जाते हैं) पुराने नोटों के साइज़ के हिसाब से कैलिब्रेट थीं। नतीजा क्या हुआ? देश के लाखों एटीएम रातों-रात प्लास्टिक के कबाड़ डिब्बों में तब्दील हो गए, क्योंकि उनमें नए नोट फिट ही नहीं बैठ रहे थे।
पूरे देश के इंजीनियर हफ्तों तक एक-एक एटीएम पर मैन्युअली (हाथों से) जाकर उन मशीनों के खांचे बदल रहे थे। और तब तक सड़कों पर आम हिंदुस्तानी कैश के लिए पागलों की तरह एक बैंक से दूसरे एटीएम के चक्कर काट रहा था।
इस अव्यवस्था का जो इंसानी मूल्य (Human Cost) देश ने चुकाया, वो बेहद डरावना था। मीडिया और विपक्ष के पक्के आंकड़ों के अनुसार, बैंकों की लंबी लाइनों में खड़े-खड़े हार्ट अटैक और थकान से 100 से ज़्यादा आम नागरिकों की मौत हो गई।

इलाज के लिए अस्पताल कैश मांग रहे थे और लोगों के घरों में रखा पैसा रद्दी बन चुका था। सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि बैंक के कर्मचारियों की भी हालत ख़राब हो गयी थी। 16-16 घंटे की शिफ्ट में काम करते हुए कई बैंक अधिकारियों ने भी अपनी जान गँवा दी।
लेकिन सत्ता के अहंकार का आलम ये था की इन 100 से ज़्यादा मौतों पर सिस्टम के माथे पर एक शिकन तक नहीं आई।
इसे बस एक ‘यज्ञ में दी गई छोटी सी आहुति’ बताकर पल्ला झाड़ लिया गया। लेकिन ज़मीनी हकीकत ये थी की इस यज्ञ में भ्रष्टाचारियों का बाल भी बांका नहीं हुआ था, स्वाहा सिर्फ आम आदमी की जेब और उसकी इज़्ज़त हो रही थी।
5. कैश पर ज़िंदा रहने वाले लाखों छोटे व्यापार (MSME) हुए तबाह
‘ब्लैक मनी’ का पता नहीं, लेकिन ‘वाइट मनी’ वाले मजदूर जरूर हो गए थे बर्बाद
दिल्ली के आलीशान दफ्तरों में बैठने वाले अर्थशास्त्रियों और सत्ता के रणनीतिकारों से सबसे बड़ी चूक ये हुई की वे भारत के असली बाज़ार की नब्ज़ ही नहीं पहचान पाए।
उन्हें लगा की पूरी इकॉनमी शायद क्रेडिट कार्ड और ऑनलाइन बैंकिंग पर चलती है। लेकिन सच्चाई क्या थी?
2016 के भारत की 80 प्रतिशत से ज़्यादा अर्थव्यवस्था इनफॉर्मल सेक्टर (Informal Sector) यानी असंगठित क्षेत्र पर टिकी थी, और इस सेक्टर के फेफड़ों में ऑक्सीजन का काम करता था- ‘हार्ड कैश’ (नकद)।
ज़रा सूरत के कपड़ा बाज़ार, कानपुर के चमड़ा उद्योग, मुरादाबाद के पीतल कारखानों या तिरुपुर की होज़री फैक्ट्रियों के बारे में सोचिए। ये कोई मल्टीनेशनल कंपनियां नहीं हैं जो चेक से एडवांस पेमेंट करती हों। यहाँ माल नकद में आता है, नकद में बिकता है, और शाम को दिहाड़ी मज़दूरों को उनका हक़ नकद में उनके हाथों पर रखा जाता है।
जब सरकार ने रातों-रात 86 प्रतिशत कैश मार्केट से सोख लिया, तो ये कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं थी, बल्कि ये इनफॉर्मल सेक्टर के फेफड़ों से सीधे ऑक्सीजन का पाइप खींच लेने जैसा था।
नतीजा वही हुआ जो होना था। पूरा का पूरा सप्लाई चेन ताश के पत्तों की तरह धराशायी हो गया। आम आदमी की जेब में पैसा नहीं था, तो उसने बाज़ार से सामान खरीदना बंद कर दिया।
रिटेलर का माल नहीं बिका, तो उसने होलसेलर (थोक व्यापारी) को ऑर्डर देना बंद कर दिया। होलसेलर के पास कैश नहीं था, तो उसने फैक्ट्रियों से माल उठाना बंद कर दिया।

और जब फैक्ट्री के मालिक का माल ही नहीं बिका और उसके पास नकद बचा ही नहीं, तो उसने अपनी मशीनों पर ताला जड़ दिया।
एक झटके में भारत का वो मध्यम और छोटा व्यापार (MSME) तबाह हो गया, जो देश में सबसे ज़्यादा रोज़गार पैदा करता था।
आज भी अगर आप किसी पुराने छोटे व्यापारी से जाकर 2016 की नोटबंदी के बारे में पूछेंगे, तो उसकी आँखों में आपको वो दर्द साफ़ दिखाई देगा।
कई छोटे कारखाने जो उस दौर में बंद हुए, वो दोबारा कभी खुल ही नहीं पाए। जिस ब्लैक मनी को ख़त्म करने का तिलिस्म बुना गया था, उसकी आड़ में दरअसल उस ‘वाइट मनी’ वाले छोटे व्यापारी का गला घोंट दिया गया, जो हर दिन कुआं खोदकर पानी पीने पर मज़बूर था।
6. फैक्ट्रियों पर लटकते ताले और बीज के लिए तरसते किसानों के खाली हाथ
इस मास्टरस्ट्रोक का शिकार कोई और नहीं बल्कि गरीब ही थे
अर्थव्यवस्था कोई हवा में उड़ने वाली चीज़ नहीं है, यह ज़मीन पर मज़दूरों के पसीने से चलती है। जब फैक्ट्रियों और बाज़ारों से कैश गायब हुआ, तो इसका सबसे पहला और सबसे खौफनाक असर दिहाड़ी मज़दूरों पर पड़ा।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) जो देश के रोज़गार के आंकड़ों का सबसे विश्वसनीय और पक्का सोर्स माना जाता है, उसकी रिपोर्ट ने इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ का असली कच्चा-चिट्ठा खोल दिया था।
CMIE के डेटा के मुताबिक, नोटबंदी के ठीक बाद, यानी 2017 के शुरुआती चार महीनों में ही लगभग 15 लाख (1.5 Million) नौकरियाँ रातों-रात ख़त्म हो गईं।
ये 15 लाख लोग कौन थे? ये वो लोग थे जो शहरों में आकर पल्लेदारी करते थे, निर्माण स्थलों (Construction sites) पर ईंटें ढोते थे, या छोटी फैक्ट्रियों में हेल्पर का काम करते थे।
जब ठेकेदारों के पास कैश ही नहीं बचा, तो उन्होंने इन मज़दूरों को काम से निकाल दिया। शहरों में भुखमरी की नौबत आ गई और लाखों मज़दूरों को वापस अपने गांवों की ओर पलायन करना पड़ा।
और गांवों में क्या हाल था? सरकार ने शायद कलेंडर भी नहीं देखा था। नवंबर का महीना भारतीय कृषि (Agriculture) के लिए सबसे नाज़ुक और अहम समय होता है।
यह वो वक़्त होता है जब किसान खरीफ की फसल (धान आदि) काटकर बाज़ार में बेचता है, और उससे मिले कैश से रबी की फसल (गेहूं, सरसों) के लिए खाद, बीज और कीटनाशक खरीदता है।
लेकिन 8 नवंबर के बाद जब किसान अपनी फसल लेकर मंडियों में पहुँचा, तो वहां सन्नाटा पसरा था। आढ़तियों (Traders) और व्यापारियों के पास उसे देने के लिए एक रुपया नकद नहीं था।
किसानों को अपनी फसल कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ी। देश के कई हिस्सों से ऐसी रुला देने वाली तस्वीरें आईं जहां किसानों ने कैश क्रंच और ट्रांसपोर्ट का भाड़ा न निकाल पाने के कारण टमाटर, प्याज़ और अपनी खड़ी फसलें सड़कों पर फेंक दीं।
दूसरी तरफ, जब उसे गेहूं बोने के लिए बीज और खाद चाहिए थी, तो उसके हाथ खाली थे। सहकारी बैंकों (Cooperative Banks) में भी नए नोट नहीं पहुंचे थे।
रबी की बुवाई बुरी तरह से प्रभावित हुई और देश के अन्नदाता को साहूकारों के चंगुल में फँसने के लिए मजबूर कर दिया गया।
टीवी पर एंकर चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे थे की “कश्मीर में पत्थरबाज़ों को पैसा मिलना बंद हो गया है, आतंकवादियों की कमर टूट गई है!”
लेकिन ज़मीनी हकीकत ये थी की आतंकवादियों की कमर टूटी हो या न टूटी हो, इस देश के छोटे व्यापारी, मज़दूर और किसान की कमर ऐसी टूटी की उसे कई सालों तक प्लास्टर चढ़ा कर रखना पड़ा।
एक ऐसा फैसला, जिसे अमीरों को रुलाने के लिए लाया गया था, वो सड़कों पर सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़रीबों के आंसुओं का सैलाब बनकर रह गया।
7. मनमोहन सिंह की वो डरावनी भविष्यवाणी जो सच साबित हुई
औंधे मुंह गिरी भारत की दौड़ती भागती GDP

जब सड़कों पर अफ़रा-तफ़री मची थी और छोटे व्यापार दम तोड़ रहे थे, तब संसद के अंदर एक अलग ही खेल चल रहा था।
सत्ता पक्ष पूरे कॉन्फिडेंस में टेबल थपथपा रहा था। उन्हें लग रहा था की उन्होंने कोई ऐसा जादुई तीर छोड़ दिया है जो इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा।
लेकिन इसी शोर-शराबे के बीच राज्यसभा में एक ऐसे इंसान ने बोलना शुरू किया, जो अमूमन बहुत शांत रहता था, लेकिन जब इकोनॉमिक्स (अर्थशास्त्र) की बात आती थी, तो दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री उन्हें सुनने के लिए कान लगा लेते थे।
वो थे देश के पूर्व प्रधानमंत्री और रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह।
24 नवंबर 2016 को राज्यसभा में मनमोहन सिंह ने सत्ता के इस अति-उत्साह को एक ही झटके में पंक्चर कर दिया था।
उन्होंने अपने भाषण में चुभते हुए लहज़े में नोटबंदी को ‘ऑर्गनाइज़्ड लूट और लीगलाइज़्ड प्लंडर’ (Organised loot and legalised plunder – संगठित लूट और क़ानूनी डाका) करार दिया।
मनमोहन सिंह भारत की इकॉनमी के नस-नस से वाकिफ़ थे। उन्होंने भविष्यवाणी की थी की इस बिना सोचे-समझे किए गए फैसले से भारत की जीडीपी (GDP) में कम से कम 2 प्रतिशत की गिरावट आएगी।
अब ज़रा उस दौर के सत्ताधारी BJP पार्टी के प्रवक्ताओं का रवैया याद कीजिए। उन्होंने मनमोहन सिंह का खूब मज़ाक उड़ाया।
कहा गया की ये तो पुराने ख्यालात के हैं, इन्हें ‘न्यू इंडिया’ का डिजिटल विज़न समझ नहीं आ रहा है। इन्हें तो बस विरोध करना है।
लेकिन अर्थशास्त्र कभी नारों और भावनाओं पर नहीं चलता, वो चलता है पक्के गणित पर। और मनमोहन सिंह का गणित सत्ता के झूठे दावों पर भारी पड़ गया।
कुछ ही महीनों बाद जब सरकार के अपने ही सांख्यिकी विभाग (CSO) ने जीडीपी के आंकड़े जारी किए, तो सत्ता के गलियारों में सन्नाटा छा गया।
जो भारतीय अर्थव्यवस्था 2016 के शुरुआती महीनों में 8 प्रतिशत की रफ़्तार से कुलांचे भर रही थी, वो नोटबंदी के झटके से ऐसी औंधे मुंह गिरी की 5.7 प्रतिशत पर आकर हाँफने लगी।
यानी मनमोहन सिंह ने जो 2 प्रतिशत की गिरावट का डरावना सच बताया था, हकीकत में वो उससे भी कहीं ज़्यादा ख़राब निकला!
रातों-रात दुनिया की सबसे तेज़ रफ़्तार वाली इकॉनमी को एक ऐसे स्पीड-ब्रेकर पर चढ़ा दिया गया था, जिसने गाडी के शॉकर ही तोड़ दिए।
8. आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक के अति उत्साह में लगे इकॉनमी को वो झटके
जिसने दुनिया की सबसे तेज़ अर्थव्यवस्था की रफ़्तार पर लगा दिया भयंकर ब्रेक
आप सोच रहे होंगे की सिर्फ कैश गायब होने से जीडीपी इतनी भयंकर तरीके से कैसे लुढ़क सकती है? इसका अर्थशास्त्र बहुत सीधा है।
जब 86 प्रतिशत नकद सिस्टम से बाहर हुआ, तो लोगों ने बाज़ार से ख़रीदारी बंद कर दी। जब डिमांड घटी, तो फैक्ट्रियों ने प्रोडक्शन (उत्पादन) घटा दिया।
जब उत्पादन घटा, तो कच्चा माल (Raw Material) खरीदना बंद हो गया और मज़दूरों की छंटनी शुरू हो गई। इस पूरी साइकिल (Cycle) ने देश की ग्रोथ को कमजोर कर दिया।
और सबसे बड़ी विडंबना देखिए! जिस वक़्त देश का ये असंगठित क्षेत्र (Informal Sector) और छोटे व्यापारी नोटबंदी के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे थे, ठीक उसी वक़्त सिस्टम ने एक और ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेल दिया।
जुलाई 2017 में आधी रात को संसद में घंटा बजाकर आनन-फानन में जीएसटी (GST – गुड्स एंड सर्विस टैक्स) लागू कर दिया गया। ये तो बिल्कुल ‘एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा’ वाली बात हो गई।
जीएसटी अपने आप में एक अच्छा रिफॉर्म हो सकता था, लेकिन इसके लागू करने की टाइमिंग और इसका एग्जीक्यूशन किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
जो व्यापारी अभी तक कैश क्रंच से जूझ रहा था, उसे अचानक से चार-चार टैक्स स्लैब और उलझे हुए ऑनलाइन रिटर्न फाइलिंग के झमेले में डाल दिया गया।
नोटबंदी ने छोटे व्यापारियों का नकद छीना था और जीएसटी ने उनकी बची-खुची पूंजी को कंप्लायंस (Compliance) के जंजाल में फँसा दिया।
इस दोहरी मार ने भारत के आर्थिक इंजन में पानी डाल दिया। बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को तो कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उनका मार्केट शेयर बढ़ गया।
लेकिन वो छोटा व्यापारी जो भारत की असली इकॉनमी चलाता था, वो इस चक्रव्यूह में ऐसा फंसा की कई सालों तक उबर नहीं पाया।
अगर आप देखें, तो यह किसी देश की अर्थव्यवस्था पर उसके ही हुक्मरानों द्वारा किया गया एक ऐसा वार था, जिसे कोई भी बाहरी दुश्मन कभी नहीं कर सकता था।
सत्ता के अति-उत्साह (Overconfidence) ने वो काम कर दिया जो साल 2008 की भयंकर वैश्विक मंदी (Global Recession) भी भारत का नहीं कर पाई थी।
9. रिज़र्व बैंक के 99.3 प्रतिशत वाले आंकड़े ने दिखा आयना
सिस्टम के पिछले दरवाज़े से रातों-रात सफ़ेद हो गया मगरमच्छों का सारा काला धन

नवंबर 2016 से लेकर अगस्त 2018 तक पूरे देश में एक ही सवाल हवा में तैर रहा था- “भाई, आख़िर कितना काला धन पकड़ा गया?”
सरकार और उनके प्रवक्ताओं से जब भी ये सवाल पूछा जाता, तो वो बगलें झांकने लगते या फिर गोलमोल जवाब देकर बात को ‘कैशलेस इकॉनमी’ की तरफ मोड़ देते।
लेकिन कहते हैं ना की सच छिपता नहीं है, और अर्थशास्त्र (Economics) की दुनिया में तो बिल्कुल नहीं।
आख़िरकार अगस्त 2018 में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की। और भाई साहब, इस रिपोर्ट ने जो सच उगला, उसने ‘नोटबंदी के मास्टरस्ट्रोक’ वाले गुब्बारे में ऐसी सुई चुभोई की उसकी सारी हवा एक सेकंड में निकल गई।
ये रिपोर्ट इस पूरे एपिसोड का सबसे बड़ा और सबसे करारा ‘तथ्यात्मक प्रहार’ थी।
ज़रा पीछे चलिए। 2016 में जब नोटबंदी लागू हुई थी, तब सरकार के बड़े-बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में सीना ठोक कर कहा था की बाज़ार में मौजूद 15.41 लाख करोड़ रुपये (500 और 1000 के नोट) में से कम से कम 3 से 4 लाख करोड़ रुपया वापस नहीं आएगा!
उनका लॉजिक ये था की जो 3-4 लाख करोड़ वापस नहीं आएगा, वही ‘काला धन’ है, और वो रद्दी हो जाएगा। सरकार सोच रही थी की ये पैसा सीधा रिज़र्व बैंक का मुनाफ़ा बन जाएगा और सरकार की मौज हो जाएगी।
लेकिन रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट का आंकड़ा क्या था? 15.41 लाख करोड़ रुपये के बंद हुए नोटों में से 15.31 लाख करोड़ रुपये बैंकों में वापस लौट आए!
ज़रा इस गणित को ध्यान से समझिए। 99.3 प्रतिशत पैसा वापस सिस्टम में आ गया! मतलब जो पैसा वापस नहीं आया, वो महज़ 0.7 प्रतिशत (लगभग 10,720 करोड़ रुपये) था।
अब आप ही बताइए, क्या भारत में सिर्फ़ 10 हज़ार करोड़ का काला धन था? सच तो ये है की ये जो 0.7 प्रतिशत पैसा वापस नहीं आया, ये भी कोई भ्रष्ट नेताओं या माफियाओं का काला धन नहीं था।
ये वो पैसा था जो नेपाल या भूटान के लोगों के पास फंसा रह गया था, या किसी गरीब की पुरानी पैंट की जेब में छूट गया था, या किसी बुज़ुर्ग महिला की उस गुल्लक का था जो वो समय पर बैंक जाकर बदलवा नहीं पाई!
मतलब मगरमच्छ तो पूरा का पूरा समंदर पी गए, और सरकार के जाल में सिर्फ़ कुछ मरी हुई छोटी मछलियाँ आईं।
10. नए नोट छापने में फूंक दिए टैक्सपेयर्स के हज़ारों करोड़
भ्रष्ट सिस्टम की वाशिंग मशीन में धुल गया सारा असली काला धन
अब यहाँ एक बहुत ही तार्किक सवाल खड़ा होता है। अगर 99.3% पैसा वापस आ गया, तो फिर वो काला धन गया कहाँ जिसके नाम पर पूरे देश को 50 दिन तक लाइनों में खड़ा करके तड़पाया गया था?
इसका जवाब है- ‘सिस्टम की वाशिंग मशीन’। सत्ता के रणनीतिकार यह भूल गए की भारत का भ्रष्ट सिस्टम किसी भी नई पाबंदी में से अपना ‘जुगाड़’ निकालने में माहिर है।
जब आम आदमी 4000 रुपये बदलने के लिए चिलचिलाती धूप में लाइन में खड़ा था, तब बैंक के पिछले दरवाज़े से एक अलग ही VIP खेल चल रहा था।
भ्रष्ट बैंक अधिकारियों, सीए (CA) और दलालों के नेक्सस ने रातों-रात शेल कंपनियाँ (Shell Companies) खड़ी कर दीं।
काले धन के मगरमच्छों ने 15-20 प्रतिशत का कमीशन देकर अपना सारा का सारा कैश सीधे बैंकों के चेस्ट में पहुँचा दिया।
और तो और, जिस जन-धन योजना (Jan Dhan Yojana) को ग़रीबों के उत्थान के लिए लाया गया था, उसी का इस्तेमाल इन भ्रष्टाचारियों ने अपनी ढाल की तरह किया।
ग़रीबों को कुछ सौ रुपये का लालच देकर उनके खातों में अपना काला धन जमा करवाया गया और बाद में उसे वाइट (सफ़ेद) करके निकाल लिया गया।
नतीजा क्या निकला? नोटबंदी ने काले धन को ख़त्म नहीं किया, बल्कि उसे एक ‘फ्री क्लीनिंग सर्विस’ दे दी!
जो पैसा पहले अनअकाउंटेड (Unaccounted) था, वो सब बैंक में जमा होकर बिल्कुल लीगल और वाइट हो गया। काले धन के कुबेर रातों-रात शरीफ़ बन गए और टैक्स डिपार्टमेंट मुँह ताकता रह गया।
और इस पूरे कॉमेडी शो का सबसे दर्दनाक हिस्सा अभी बाकी है। ज़रा सोचिए, इस पूरी फालतू की कसरत में खर्च किसका हुआ?
RBI के आंकड़े ही बताते हैं की पुराने नोटों को नष्ट करने और नए 2000 और 500 के नोटों को छापने में सरकार के लगभग 7,965 करोड़ रुपये खर्च हो गए।
इसके अलावा ATM को कैलिब्रेट करने का खर्च, पूरे देश में नोटों को ट्रकों और हवाई जहाज़ों से पहुँचाने का लॉजिस्टिक खर्च अलग से।
मतलब, आप क्रोनोलॉजी समझिए! काले धन के नाम पर आपने 86 प्रतिशत इकॉनमी ठप कर दी। लाखों नौकरियां ख़त्म कर दीं। 100 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई। मगरमच्छों ने पिछले दरवाज़े से अपना सारा पैसा सफ़ेद कर लिया।
और इस पूरे तमाशे को करने के लिए आपने टैक्सपेयर्स के ही लगभग 8 हज़ार करोड़ रुपये (नोट छापने में) आग में झोंक दिए! इसे मास्टरस्ट्रोक कहना अर्थशास्त्र के मुँह पर तमाचा मारने जैसा नहीं तो और क्या है?
11. ‘काले धन’ से लेकर ‘कैशलेस इंडिया’ तक सरकार के बदलते बहानों का खेल
‘नोटबंदी’ के मास्टरस्ट्रोक की असली कड़वी सच्चाई
जब रिज़र्व बैंक के 99.3 प्रतिशत वाले आंकड़े ने सरेआम सरकार के दावों की हवा निकाल दी, तो सत्ता के गलियारों और PR वॉर रूम में भारी हड़कंप मचना तय था।
आखिर जिस ‘मास्टरस्ट्रोक’ के नाम पर पूरे देश को 50 दिन तक लाइनों में खड़ा किया गया था, वो तो अब एक ‘मास्टर-डिजास्टर’ साबित हो चुका था।
अब जनता को क्या जवाब दें? यहीं पर मॉडर्न पॉलिटिक्स की वो चालाकी काम आती है, जिसे अंग्रेज़ी में ‘शिफ्टिंग द गोलपोस्ट’ (Shifting the Goalpost) कहते हैं।
मतलब जब आप मैच हारने लगें, तो चुपचाप नियम ही बदल दीजिए!
जैसे-जैसे 2017 का साल आगे बढ़ा, आप अगर सत्ताधारी नेताओं के भाषणों को ध्यान से सुनेंगे, तो पाएंगे की उनके मुंह से अचानक ‘काला धन’, ‘जाली नोट’ और ‘टेरर फंडिंग’ जैसे शब्द गायब होने लगे।
इनकी जगह अब नए और फैंसी शब्दों ने ले ली- ‘डिजिटल इंडिया’, ‘कैशलेस इकॉनमी’ (Cashless Economy) और ‘लेस-कैश सोसाइटी’।
सरकार के प्रवक्ताओं ने टीवी स्टूडियोज़ में आकर चिल्लाना शुरू कर दिया की “नोटबंदी का असली मकसद तो देश को कैशलेस बनाना था! देखिए कैसे लोग अब डिजिटल पेमेंट (UPI) कर रहे हैं!”
यार, सच में? मतलब अगर आपको अपने घर में चूहे मारने हैं, तो क्या आप पूरे घर में पेट्रोल छिड़क कर आग लगा देंगे और फिर कहेंगे की “देखो, घर भले ही जल गया, लेकिन अब इसमें कोई चूहा नहीं है”?
डिजिटल इंडिया और UPI का बढ़ना वाकई देश के लिए एक बहुत अच्छी और पॉज़िटिव चीज़ रही है, इसमें कोई दो राय नहीं।
लेकिन क्या डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए देश की 86 प्रतिशत नकदी को रातों-रात रद्दी कर देना ज़रूरी था? क्या इसके लिए 15 लाख नौकरियाँ छीनना और 100 से ज़्यादा लोगों की बलि चढ़ाना लाज़मी था?
और हाँ, लगे हाथ उन दो बाकी दावों का भी पोस्टमार्टम कर ही लेते हैं, जिनका ढोल 8 नवंबर की रात पीटा गया था।
कहा गया था की पाकिस्तान से आने वाले जाली नोटों (Fake Currency) का धंधा बंद हो जाएगा। लेकिन हकीकत क्या थी? नोटबंदी के कुछ महीनों बाद ही बॉर्डर पार से वही नए गुलाबी 2000 के नोटों की एकदम परफेक्ट नकली खेप भारत के बाज़ारों में पकड़ी जाने लगी।
जो जाली नोट छापने वाले माफिया थे, उन्हें नए नोट का डिज़ाइन कॉपी करने में कुछ ही महीने लगे। आतंकवाद और पत्थरबाज़ी की फंडिंग भी कुछ दिनों के लिए ज़रूर रुकी, लेकिन जैसे ही नया कैश सिस्टम में आया, वो वापस अपने पुराने ढर्रे पर लौट आए।
यानी बीमारी का इलाज नहीं हुआ, बस आपने मरीज़ को एक तगड़ा शॉक दे दिया जो उसके लिए जानलेवा साबित हुआ।
12. जब दांव पड़ा उल्टा तो रातों-रात बदल दिया गया गोलपोस्ट
डिजिटल इंडिया की आड़ में छिपा दी गई एक ऐतिहासिक आर्थिक नाकामी
अगर इस पूरे पॉलिसी ब्लंडर का हम एक तार्किक एनालिसिस करें, तो एक बात बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो जाती है। राजनीतिक रूप से (Politically) यह कदम भले ही बीजेपी के लिए एक छलावा सा साबित हुआ हो- क्योंकि 2017 का यूपी चुनाव वो जीत गए थे।
लेकिन आर्थिक रूप से (Economically)? अर्थशास्त्र भावनाओं पर नहीं चलता। अर्थशास्त्र ने इस फैसले को कभी माफ़ नहीं किया। नोटबंदी दरअसल सत्ता के उस अति-आत्मविश्वास का सबसे भयंकर उदाहरण था, जहाँ नेता को लगने लगता है की “हमसे बेहतर कोई नहीं जानता।”
जब सिस्टम में किसी एक चेहरे या एक सेंट्रलाइज़्ड पावर (Centralised Power) पर इतनी ज़्यादा निर्भरता हो जाती है की नीचे के मंत्री, रिज़र्व बैंक के गवर्नर या बड़े-बड़े अर्थशास्त्री भी अपनी राय देने से डरने लगें, तो ऐसे ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ जन्म लेते हैं।
अगर इस फैसले से पहले ज़मीन पर बैठे व्यापारियों, किसानों या अर्थशास्त्रियों से थोड़ी सी भी सलाह ली गई होती, तो शायद देश को इस आर्थिक सुनामी से बचाया जा सकता था।
चाणक्य नीति कहती है की राजा को कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले अपने राज्य की नब्ज़ और अपनी प्रजा की ताक़त को तौल लेना चाहिए।
लेकिन जब सत्ता अपनी ही तालियों की गूँज में इतनी मग्न हो जाए की उसे ज़मीनी हकीकत दिखनी ही बंद हो जाए, तो वो चाणक्य नीति भी देश के लिए एक गहरा घाव बन जाती है।
(सत्ता के चक्रव्यूह और बीजेपी के सेल्फ-गोल की इस सीरीज़ के अगले एपिसोड में हम एक और ऐसे ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ का पोस्टमार्टम करेंगे। तब तक के लिए, तथ्यों की कसौटी पर अपनी नज़रें पैनी रखिए!)
दावा बनाम नतीजा
नीचे वही चार बातें हैं जो लेख में कही गई हैं. दावा और लेख का नतीजा साथ-साथ.
| कहा गया | लेख का नतीजा |
|---|---|
| काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक. 3 से 4 लाख करोड़ वापस ही नहीं आएगा. | RBI: 15.41 में से 15.31 लाख करोड़ लौटा. 99.3 प्रतिशत. बाहर रहा करीब 10,720 करोड़. |
| जाली नोटों का नेटवर्क बर्बाद हो जाएगा. | कुछ महीनों बाद नए 2000 के नोटों की नकली खेप बाज़ार में पकड़ी जाने लगी. |
| आतंक और नक्सली फंडिंग की रीढ़ टूट जाएगी. | फंडिंग कुछ दिनों रुकी, नया कैश आते ही पुराना ढर्रा लौट आया. |
| GDP पर डरने वाली बात नहीं. मनमोहन सिंह का 2 प्रतिशत वाला अंदेशा मज़ाक. | रफ़्तार 8 प्रतिशत से 5.7 प्रतिशत पर आ गई. लेख के मुताबिक गिरावट 2 प्रतिशत से भी ज़्यादा. |
पढ़कर जाँचिए
1. उस रात कितनी नकदी एक झटके में लीगल टेंडर नहीं रही?
जवाब: 86 प्रतिशत
2. RBI की रिपोर्ट में कितना प्रतिशत पुराना नोट वापस आया?
जवाब: 99.3 प्रतिशत
3. CMIE के मुताबिक नोटबंदी के बाद शुरुआती चार महीनों में कितनी नौकरियाँ गईं?
जवाब: 15 लाख
4. नए नोट छापने में लेख कितना खर्च बताता है?
जवाब: 7,965 करोड़
