चर्च का पैसा ईसाइयों का, मस्जिद का पैसा मुस्लिमों का, फिर हिंदू मंदिरों की कमाई सरकार की जेब में क्यों? हमारे मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण आखिर कब तक

मैं जब भी किसी बड़े मंदिर में दर्शन करने जाता हूं और वहां रखी उस बड़ी सी हुंडी (दानपात्र) को देखता हूं, तो मेरे अंदर एक अजीब सी आग भड़क उठती है। हम और आप बड़ी श्रद्धा से अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई उस दानपात्र में डालते हैं।

कोई गरीब अपनी बेटी की शादी के लिए जोड़े हुए पैसों में से 100 रुपये निकाल कर डालता है, तो कोई किसान अपनी अच्छी फसल की मन्नत पूरी होने पर भगवान के चरणों में अपना चढ़ावा रखता है। हम सोचते हैं की ये पैसा हमारे धर्म के काम आएगा, हमारे मंदिरों को और भव्य बनाएगा, गुरुकुल खुलेंगे, गौशालाएं चलेंगी।

लेकिन धिक्कार है हमारे इस सड़े हुए सिस्टम पर! असलियत तो ये है की हमारे उस दान के पैसे से भगवान का कोई काम नहीं हो रहा। वो सारा का सारा पैसा सीधे भ्रष्ट नेताओं और सरकारी बाबुओं की जेबों में जा रहा है, क्योंकि हमारे मंदिरों का पूरा नियंत्रण सरकार के पास है!

चर्च का चंदा ईसाइयों का है। मस्जिद में आने वाला जकात और पैसा मुस्लिमों का है। लेकिन जैसे ही बात हमारे भव्य हिंदू मंदिरों की आती है, तो इन गद्दार नेताओं के मुंह से लार टपकने लगती है।

आज मैं इसी ‘सेक्युलर डकैती’ का वो खौफनाक कच्चा चिट्ठा खोलने जा रहा हूं जिसे पढ़कर हर उस सच्चे हिंदू का खून खौल उठेगा जिसके सीने में रत्ती भर भी शर्म और सनातन के लिए प्रेम बचा होगा।

तिरुपति बालाजी से सिद्धिविनायक तक, हिन्दू मंदिरों का पैसा लूटकर अपनी तिजोरी भर रही गद्दार सरकारें

ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए। हम दिन-रात छाती पीटते हैं की हमारा देश सेक्युलर है। संविधान कहता है की सरकार का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा। तो फिर भाई, सरकार सिर्फ हमारे ही धर्म के ठेकेदार क्यों बनी बैठी है?

देश में लाखों मस्जिदें हैं, चर्च हैं, गुरुद्वारे हैं। क्या किसी डीएम (DM) या सरकारी बाबू की हिम्मत है की वो जुमे की नमाज के बाद मस्जिद की दानपेटी खोलकर उसके पैसे गिन ले? क्या किसी नेता की औकात है की वो संडे की प्रार्थना के बाद चर्च के खजाने पर अपना ताला जड़ दे?

नहीं ना! वहां तो बाकायदा उनके अपने बोर्ड बने हुए हैं। वक्फ बोर्ड अपनी मर्जी से अरबों की ज़मीनें खरीदता है, बेचता है। डायोसीज (Diocese) अपने स्कूल-कॉलेज चलाते हैं। वहां सरकार एक चवन्नी भी नहीं छू सकती।

और अगर गलती से सरकार ने वहां उंगली करने की कोशिश भी की, तो पूरा का पूरा इकोसिस्टम सड़कों पर आकर आगजनी करने लगता है।

लेकिन बात जब हिंदुओं की आती है, तो हमारे तिरुपति बालाजी, काशी विश्वनाथ, सबरीमाला, सिद्धिविनायक, और वैष्णो देवी जैसे जितने भी बड़े और भव्य मंदिर हैं- जहाँ अरबों रुपये का चढ़ावा आता है- वहां सब जगह इन सरकारी गिद्धों ने अपने पंजे गड़ा रखे हैं।

ये कैसा दोगलापन है? ये लोग हमारे भगवान को, हमारी आस्था को बस एक ‘कमाई का धंधा’ समझ कर बैठे हैं। हिंदू चुपचाप टैक्स भी भरे, और जब मंदिर में जाए तो वहां भी इन नेताओं की तिजोरियां भरे। अब ये बर्दाश्त से बाहर हो चुका है।

स्वर्गीय स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने 2012 में ही सुप्रीम कोर्ट में इन मंदिरों की आज़ादी के लिए पिटीशन डाल दी थी, जिस पर आज 12-14 साल बाद भी कोर्ट तारीख-पे-तारीख दे रहा है। रात को आतंकवादियों की फांसी रुकवाने के लिए कोर्ट खोलने वाले सिस्टम के पास बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था के लिए टाइम ही नहीं है।

अंग्रेजों का हिन्दू मंदिरों के खिलाफ बनाया गया वो काला कानून जिसे हमारे गद्दार नेताओं ने अपना हथियार बना लिया

अब आप सोच रहे होंगे की ये बीमारी शुरू कहां से हुई? ये कोई आज की बात नहीं है। ये खेल शुरू किया था अंग्रेजों ने। 1817 में वो मद्रास एंडोवमेंट एक्ट (Madras Endowment Act) लेकर आए थे।

उनका सीधा सा मकसद था की भारत के जो मंदिर हैं, उनमें अथाह सोना और खजाना भरा पड़ा है, उसे कैसे लूटा जाए। अंग्रेजों ने मंदिरों को अपने कंट्रोल में लेना शुरू कर दिया ताकि उस पैसे से वो अपनी फौज खड़ी कर सकें और भारत पर राज कर सकें।

चलिए, अंग्रेज तो लुटेरे थे, उनका तो काम ही लूटना था। लेकिन 1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तो इन काले अंग्रेजों (हमारे वामपंथी और सेक्युलर नेताओं) ने क्या किया? उन्होंने उस काले कानून को फाड़कर कूड़े में फेंकने के बजाय, उसे और भी खतरनाक बना दिया।

1951 में HR&CE (Hindu Religious and Charitable Endowments) एक्ट नाम का एक खौफनाक हंटर हमारे मंदिरों पर मार दिया गया। सिर्फ तमिलनाडु में ही आज 44,000 से ज्यादा मंदिर इस HR&CE नाम के सरकारी राक्षस के जबड़े में फंसे हुए हैं।

HR&CE विभाग मंदिरों की कुल कमाई (हुंडी, दान, प्रॉपर्टी का किराया) में से लगभग 12 से 18 प्रतिशत हिस्सा ‘एडमिनिस्ट्रेटिव और ऑडिट फीस’ के नाम पर जबरन काट लेता है।

सरल शब्दों में कहें तो जो पैसा एक भक्त ने भगवान के काम के लिए दानपेटी में डाला था, उस पैसे से HR&CE के सरकारी बाबुओं, कमिश्नरों और मंत्रियों की तनख्वाहें, भत्ते, गाड़ियां और उनके एसी कमरों का खर्च निकल रहा है। यह हिन्दुओं की आस्था पर लगाया गया एक लीगल टैक्स है।

और सबसे बड़ी बेशर्मी तो देखिए! सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है की सरकार का काम मंदिर चलाना नहीं है। अगर किसी मंदिर के मैनेजमेंट में कोई दिक्कत है, तो सरकार कुछ समय के लिए वहां जा सकती है, उसे ठीक करे और फिर वापस मंदिर समाज को सौंप दे। 

ये किसी न किसी बहाने, नए-नए नियम-कानून बनाकर हमारे मंदिरों पर कुंडली मारे बैठे हैं। इन्हें हमारी पूजा-पाठ, आगम शास्त्रों और परंपराओं से कोई मतलब नहीं है; इन्हें बस उस दानपात्र से मतलब है जो हर दिन सोने-चांदी और नोटों से भर जाता है।

हिन्दू मंदिरों के चढ़ावे पर सरकार का डाका और हमारे ही पैसे से पल रहा जेहादी इकोसिस्टम

अगर आपको लगता है की आपके चढ़ावे का पैसा भगवान के भव्य शृंगार या वेद पाठशालाओं पर खर्च हो रहा है, तो आज अपनी मुगालते वाली नींद से जाग जाइए। हमारे मंदिरों से जो अरबों-खरबों की कमाई होती है, उसका कच्चा चिट्ठा सुनेंगे तो पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी।

तिरुपति बालाजी, सिद्धिविनायक, और केरल के गुरुवायुर मंदिर से हर साल जो करोड़ों का रेवेन्यू आता है, राज्य सरकारें उसे ‘एडमिनिस्ट्रेटिव चार्ज’ (Administrative Charge) और टैक्स के नाम पर बेरहमी से लूट लेती हैं।

जो पैसा मंदिर के विकास में लगना चाहिए था, उससे ये सरकारी बाबू अपनी नई-नई वीआईपी (VIP) गाड़ियां खरीदते हैं। 

उनके एसी कमरों का बिल हमारे दान के पैसों से भरा जाता है। राज्य सरकारें अपने घाटे के बजट को पूरा करने के लिए हमारे मंदिरों को एटीएम (ATM) मशीन की तरह इस्तेमाल करती हैं। सड़क बनानी है- मंदिर के फंड से पैसा निकाल लो। कोई सरकारी योजना लॉन्च करनी है- मंदिर का खजाना खाली कर दो।

लेकिन भाई, सबसे खौफनाक और ज़हरीला सच तो अब मैं आपको बताने जा रहा हूं। केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसी जगहों पर हमारे उसी खून-पसीने के चढ़ावे के पैसे का इस्तेमाल अप्रत्यक्ष रूप से उन जेहादियों और चरमपंथियों को पालने में किया जा रहा है जो दिन-रात हमें मिटाने के सपने देखते हैं।

ये बात किसी से छुपी नहीं है की सेक्युलर सरकारें तुष्टिकरण की राजनीति के तहत हमारे मंदिरों के फंड को डाइवर्ट करती हैं। हज यात्राओं पर जो सब्सिडी दी जाती थी, मदरसों को जो करोड़ों की ग्रांट बांटी जाती है, क्या आपको लगता है वो पैसा आसमान से टपकता है? वो पैसा हमारे तिरुपति और सबरीमाला के खजानों से निचोड़ा जाता है! 

एक गरीब हिंदू मंदिर में 500 रुपये चढ़ाता है, और वही 500 रुपये घूम-फिर कर किसी मदरसे में पल रहे कट्टरपंथी की बिरयानी और उसकी तालीम पर खर्च हो जाते हैं। धिक्कार है हमारी इस नपुंसक खामोशी पर!

हम अपनी ही बर्बादी की फंडिंग खुद कर रहे हैं और हमें पता तक नहीं है। ये सीधे-सीधे हमारे धर्म के खिलाफ एक ‘इकोनॉमिक जिहाद’ है जिसे खुद सरकारें स्पॉन्सर कर रही हैं।

मंदिर की अरबों की ज़मीनों पर भू-माफिया और वक्फ का खौफनाक कब्ज़ा

बात सिर्फ दानपात्र के कैश तक नहीं रुकती। इन मंदिरों के नाम पर हमारे पूर्वजों ने, राजा-महाराजाओं ने लाखों एकड़ उपजाऊ ज़मीनें दान में दी थीं ताकि उन ज़मीनों की खेती और लगान से मंदिर का खर्च चले, गरीबों को अन्नदान हो। आज उन ज़मीनों का क्या हाल है?

अकेले तमिलनाडु में हिंदू मंदिरों की लगभग 4.7 लाख एकड़ ज़मीन है। लेकिन आज की तारीख में उसमें से हजारों एकड़ ज़मीन पर भू-माफियाओं, बाहुबली नेताओं और सबसे खौफनाक बात- गैर-हिंदुओं और वक्फ (Waqf) के दलालों ने अवैध कब्ज़ा कर रखा है। और हमारे मंदिर के वो जो सरकारी ‘मैनेजर’ बाबू बैठे हैं ना, वो चंद रुपयों की रिश्वत खाकर आंखें बंद किए पड़े हैं।

जो ज़मीन आज के मार्केट रेट के हिसाब से करोड़ों की कमाई दे सकती है, उसे इन गद्दार बाबुओं ने अपने चहेतों को 50 रुपये या 100 रुपये महीने की लीज़ पर बांट रखा है। और वो भी सालों से किराया नहीं दे रहे।

ये सिर्फ ज़मीनों का लैंड जिहाद नहीं है, ये हमारी पूरी की पूरी आस्था को मिटाने का नंगा नाच है। हमारे मंदिरों में जो सदियों पुरानी अष्टधातु की मूर्तियां थीं, जो चोल और पल्लव राजवंशों के समय के बेशकीमती गहने थे, वो रातों-रात गायब हो जाते हैं।

उनकी स्मगलिंग का एक पूरा का पूरा इंटरनेशनल सिंडिकेट चल रहा है। भगवान की मूर्तियां चुराकर विदेशों के म्यूजियम में करोड़ों में बेची जा रही हैं, और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

अरे भाई, जब मंदिर का पुजारी या मठाधीश ही अपने मंदिर का मालिक नहीं होगा, तो वहां की सुरक्षा कौन करेगा? ये जो सरकारी क्लर्क और बाबू ट्रांसफर होकर मंदिर का कंट्रोल संभालने आते हैं, इन्हें हमारी आस्था से क्या लेना-देना? इनके लिए तो ये सिर्फ एक ‘पोस्टिंग’ है जहाँ से इन्हें मलाई खानी है।

ये लोग मंदिर की पवित्र ज़मीनों पर गैर-हिंदुओं को दुकानें अलॉट कर देते हैं। हमारे मंदिर के बाहर वो लोग अपनी दुकानें लगाकर बैठ जाते हैं जिन्हें ना हमारे राम से मतलब है ना हमारे महादेव से!

मस्जिदों पर मुल्लों का राज और हिन्दू मंदिरों में सरकार की तानाशाही

अब मैं आपको वो सच बताने जा रहा हूं जो इस सेक्युलर सिस्टम के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा है। एक तरफ हमारे मंदिरों की एक-एक ईंट, एक-एक पाई सरकार के कब्ज़े में है। दूसरी तरफ जरा उन अल्पसंख्यकों का हाल देख लीजिए जिनके नाम पर ये नेता दिन-रात छाती पीटते हैं।

1995 के वक्फ एक्ट ने इन मुसलमानो को इतनी असीमित और खौफनाक ताकत दे दी की आज ये देश के सबसे बड़े ज़मीन मालिक बन चुके हैं। वक्फ बोर्ड जिस ज़मीन पर उंगली रख दे, जिस गांव या ऐतिहासिक धरोहर को अपना बता दे, वो ज़मीन रातों-रात उनकी हो जाती है।

पुलिस कुछ नहीं कर सकती, आम आदमी कोर्ट-कचहरी में धक्के खाता रहता है। अभी हाल ही में तो देखा आपने की कैसे तमिलनाडु और महाराष्ट्र के पूरे-पूरे हिंदू गांवों को इन्होंने अपना बता दिया!

एक तरफ इन मुल्लों को इतनी आज़ादी है की वो अपनी मस्जिदों का सारा चंदा खुद रखते हैं। वहां कोई सरकारी बाबू जा ही नहीं सकता। दूसरी तरफ आर्टिकल 30 (Article 30) के तहत इन ईसाइयों और मुसलमानों को अपने खुद के स्कूल-कॉलेज, मदरसे और कॉन्वेंट चलाने की पूरी आज़ादी है।

वहां वो खुलेआम कुरान और बाइबल पढ़ाते हैं, कट्टरपंथी सोच की फैक्ट्री चलाते हैं, और हमारी ही सेक्युलर सरकारें उन्हें करोड़ों की ग्रांट देती हैं।

लेकिन बहुसंख्यक हिंदू? बहुसंख्यक हिंदू अपने ही देश में एक लाचार और गुलाम की तरह जी रहा है। अगर कोई हिंदू मंदिर अपने पैसे से कोई वेद पाठशाला खोलना चाहे, या हमारे बच्चों को गीता और रामायण पढ़ाना चाहे, तो उसे सरकारी बाबुओं के सौ चक्कर काटने पड़ते हैं और फिर भी परमिशन नहीं मिलती।

क्योंकि अगर हिंदू अपने धर्म के बारे में जान गया, तो इन सेक्युलर सरकारों का धंधा कैसे चलेगा? ये सरासर एक ‘सिस्टेमेटिक’ साज़िश है।

हमारे पैसे से हमारी ही जड़ें काटी जा रही हैं। हमें शिक्षा के अधिकार से महरूम कर दिया गया है और हमारे संस्थानों को लूट का अड्डा बना दिया गया है। ये दोगलापन अब बर्दाश्त की सारी हदें पार कर चुका है।

सरकारी दानपात्र में एक फूटी कौड़ी नहीं डालेगा हिन्दू, अब सरकार से छीनकर लेंगे अपने मंदिर

तो भाई, अब सवाल ये है की आखिर कब तक? कब तक हम हिंदू ऐसे ही रोते रहेंगे और ये गद्दार नेता हमारे पैसे पर ऐश करते रहेंगे? बहुत हो गया कोर्ट-कचहरी का इंतज़ार।

बहुत हो गईं पिटीशन और अपीलें। अब ये साफ हो चुका है की ये सरकारें बातों से मानने वाली नहीं हैं। ‘फ्री हिंदू टेंपल्स’ अब सिर्फ ट्विटर का कोई ट्रेंड नहीं है, बल्कि ये इस देश के 100 करोड़ हिंदुओं के वजूद की लड़ाई है।

अब हमें भीख नहीं मांगनी है। हमें अपने मंदिरों को इन सरकारी गिद्धों के चंगुल से नोच कर वापस लाना है। और इसकी शुरुआत कोई बड़ा नेता नहीं करेगा, इसकी शुरुआत आप और हम करेंगे- इसी वक्त से!

सबसे पहला और सबसे तगड़ा काम जो हमें आज से ही शुरू करना है, वो है- इस सरकारी हुंडी (दानपात्र) का पूर्ण बहिष्कार! एकदम डंके की चोट पर बहिष्कार! जब तक ये सरकारी बाबू हमारे मंदिरों से बाहर नहीं निकलते, तब तक हमें उस लोहे की दानपेटी में एक फूटी कौड़ी नहीं डालनी है।

अगर आपको भगवान के लिए कुछ देना ही है, तो सीधे उस मंदिर के पुजारी के हाथ में दीजिये। उसकी दक्षिणा दीजिये ताकि वो अपने परिवार का पेट पाल सके।

अगर कुछ चढ़ाना है तो सीधा फल लाइए, फूल लाइए, गायों के लिए चारा खरीदिए, मंदिर के लिए ईंट-सीमेंट खरीद कर दे दीजिये। लेकिन कैश मत दीजिये।

जिस दिन इन सरकारी दानपात्रों में पैसा गिरना बंद हो जाएगा, उसी दिन इन भ्रष्ट नेताओं और बाबुओं की नानी मर जाएगी। ये लोग वहां बैठे ही सिर्फ उस पैसे के लिए हैं। अगर मलाई ही नहीं मिलेगी, तो ये खुद-ब-खुद भाग खड़े होंगे। हमें इनकी ‘इकोनॉमिक सप्लाई’ को पूरी तरह से काटना होगा।

दूसरी बात, अब हिंदू समाज को अपनी जातियों, अपने फालतू के आपसी विवादों से ऊपर उठकर सड़कों पर उतरना होगा। जब ये जेहादी और पत्थरबाज़ छोटी-छोटी बातों पर पूरे देश में आग लगा सकते हैं, तो क्या हम अपने भगवान के घर को बचाने के लिए एक नहीं हो सकते?

हमारे मठाधीशों, संतों, अखाड़ों और आम जनता को मिलकर एक ऐसा महा-आंदोलन खड़ा करना होगा जिसकी गूंज सीधे दिल्ली के तख्त तक पहुंचे।

सरकार को एक अल्टीमेटम देना होगा- या तो 1951 के इस काले HR&CE कानून को फाड़कर कूड़ेदान में डालो और मंदिर समाज को सौंपो, वरना हम अपने मंदिरों का कंट्रोल खुद अपने हाथों में ले लेंगे। हमारे मंदिर हमारे पूर्वजों की धरोहर हैं, किसी मुख्यमंत्री या सरकारी बाबू की जागीर नहीं।

हिंदू धर्म कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसे कोई भी ऐरा-गैरा आकर लूट ले। हमने मुगलों के अत्याचार सहे, हमने अंग्रेजों की गोलियां खाईं, पर अपना सनातन नहीं छोड़ा। तो आज इन चंद भ्रष्ट नेताओं के आगे हम कैसे घुटने टेक दें?

अब समय आ गया है अपने शस्त्र और शास्त्र दोनों उठाने का। अब आवाज़ इतनी बुलंद होनी चाहिए की इन सरकारों की दीवारें हिल जाएं। हमारे मंदिरों की एक-एक पाई पर सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं का हक है, और हम उसे हर हाल में वापस लेकर रहेंगे!

वंदे मातरम! जय श्री राम! हर हर महादेव!

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