राजनीति में एक बहुत पुरानी कहावत है की अगर आप बिना होमवर्क किए परीक्षा देने जाएंगे, तो फेल होना तो पक्का है, पर कभी-कभी आप क्लास में ऐसा मज़ाक बन जाते हैं की लोग सालों तक आप पर हंसते हैं।
हमारे राहुल बाबा के साथ भी अक्सर यही होता है। वो किसी भी आधी-अधूरी खबर को पकड़कर सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस में आ जाते हैं और ऐसी चीजें बोल देते हैं की पूरी कांग्रेस पार्टी को समझ नहीं आता की अब अपना चेहरा कहाँ छुपाएं।
देवभूमि के रामलीला मैदान का वो सियासी कार्यक्रम जहाँ गूंजे अल्लाह-हू-अकबर के नारे और शुरू हुआ सारा बवाल
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है 8 अगस्त 2026 से। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उत्तराखंड के दौरे पर थे और हल्द्वानी के ऐतिहासिक ‘रामलीला मैदान’ में उनकी एक बड़ी जनसभा रखी गई थी।
अब ज़रा ध्यान से सुनिएगा, नाम से ही साफ़ है- रामलीला मैदान। उत्तराखंड और हल्द्वानी के लोगों के लिए ये कोई साधारण पार्क या सिर्फ राजनीति का अखाड़ा नहीं है।
ये वो पवित्र मंच है जहाँ भगवान श्री राम की लीलाओं का मंचन होता है, जहाँ वर्षों से हिन्दुओं की गहरी धार्मिक आस्थाएँ जुड़ी हुई हैं।
खड़गे जी आए, उन्होंने अपना भाषण दिया, और चले गए। यहाँ तक किसी को कोई एतराज़ नहीं था। लोकतंत्र है भाई, सब अपनी बात रख सकते हैं।
लेकिन असली बवाल तब शुरू हुआ जब जनसभा खत्म हुई और उनके कार्यकर्ता वहां से गए। स्थानीय लोगों ने देखा की जिस मंच से भगवान राम की स्तुति होती है, वहां कथित तौर पर शराब और पानी की जूठी बोतलें फेंकी हुई थीं।
चारों तरफ ऐसी गंदगी फैलाई गई थी जिसे देखकर किसी भी धर्मपरायण सनातनी का दिल दहल जाए।
पर बात सिर्फ बोतलों और गंदगी की नहीं थी दोस्त। सबसे बड़ा घाव तो तब लगा जब वीडियोज़ और स्थानीय रिपोर्ट्स सामने आईं की खड़गे जी की इस जनसभा के दौरान, उसी पवित्र हिन्दू मंच से कुछ कार्यकर्ताओं ने जोश में आकर “अल्लाह-हू-अकबर” के नारे लगा दिए थे।
अब आप ही बताइए, रामलीला मैदान में अल्लाह-हू-अकबर के नारों का क्या काम? क्या यह जानबूझकर बहुसंख्यक हिन्दू समाज की भावनाओं को चिढ़ाने का कोई सस्ता पॉलिटिकल स्टंट था?
एक ऐसे राज्य में जिसे पूरी दुनिया ‘देवभूमि’ कहती है, वहां के सबसे पवित्र सांस्कृतिक मंच को जिहादी नारों की गूंज से भर देना कहाँ की सेक्युलर राजनीति है?
ज़ाहिर सी बात है, जब यह बात हल्द्वानी और आस-पास के इलाकों में फैली, तो स्थानीय युवाओं और ‘श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास’ से जुड़े लोगों का खून खौलना ही था।
उनका गुस्सा खड़गे जी के वहां आने से बिल्कुल नहीं था, उनका गुस्सा इस बात से था की उनके भगवान के मंच को अल्लाह-हू-अकबर के नारों से अपवित्र क्यों किया गया!
खड़गे जी के अपमान का नहीं बल्कि अल्लाह-हू-अकबर के नारों की कालिख धोने का था वो शुद्धिकरण जिसमें वाल्मीकि समाज ने खुद दी आहुति
जब किसी पवित्र स्थान की मर्यादा भंग होती है, तो हमारी सनातनी परंपरा में उसका ‘शुद्धिकरण’ किया जाता है, ताकि उस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा और पवित्रता को वापस स्थापित किया जा सके।
10 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के इन्ही स्थानीय हिन्दू युवाओं ने तय किया की वो रामलीला मैदान जाएंगे, वहां फैली उस गंदगी को साफ़ करेंगे और उस मंच को गंगाजल से धोकर एक शांतिपूर्ण हवन करेंगे।
उन्होंने बाकायदा वही किया। मंच को धोया गया, वैदिक मंत्रोच्चार हुए और हवन में आहुति दी गई। लेकिन इसी बीच दिल्ली में बैठे कांग्रेस के ‘बांटो और राज करो’ वाले इकोसिस्टम को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया।
उन्होंने सोशल मीडिया पर चिल्लाना शुरू कर दिया की “देखो! खड़गे जी दलित हैं, इसलिए उनके जाने के बाद RSS विचारधारा वालों ने मंच को अछूत मानकर धोया है।”
कांग्रेसी प्रवक्ताओं ने इसे रातों-रात बीजेपी बनाम दलितों की लड़ाई बना दिया।
लेकिन जब इस हवन का असली सच सामने आया, तो इन सारों की बोलती बंद हो गई। आपको पता है इस पूरे शुद्धिकरण अभियान का नेतृत्व कौन कर रहा था?
इस हवन में सबसे आगे बैठकर मंत्र पढ़ने वाले और आहुति देने वाले युवाओं का नाम है अमित कुमार और अंकित पाल। और ये दोनों ही युवा खुद हमारे सम्मानित वाल्मीकि समाज (Dalit Community) से आते हैं!
अब ज़रा कांग्रेस की इस छुआछूत वाली थ्योरी का लॉजिक समझिए। एक तरफ कांग्रेस कह रही है की खड़गे जी दलित हैं, इसलिए उनके साथ छुआछूत हुई।
दूसरी तरफ उस मंच पर बैठकर जो लड़के गंगाजल छिड़क रहे हैं और पूरे विधान से हवन कर रहे हैं, वो खुद वाल्मीकि समाज के हैं!
तो भाई, जब एक दलित युवा ही हवन कर रहा है, तो फिर छुआछूत हुई किसके साथ? क्या एक दलित का दूसरे दलित से छुआछूत हो रहा है? ये कैसी बिना सिर-पैर की बात है!
हवन करने वाले अमित कुमार और अंकित पाल ने मीडिया के सामने आकर डंके की चोट पर साफ़ कर दिया था की-
“हमें खड़गे जी की जाति से कोई लेना-देना नहीं है। वो एक बड़े नेता हैं। लेकिन जिस मंच से राम जी की लीला होती है, वहां अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाकर जो कालिख पोती गई है, हम तो बस उसे धोने आए हैं।”
मतलब साफ़ है दोस्त! यह पूरा मामला कभी जाति का था ही नहीं। यह मामला शुद्ध रूप से धर्म का था, हिन्दू आस्था का था। वाल्मीकि समाज हमेशा से सनातन धर्म का मज़बूत और अग्रिम रक्षक रहा है।
महर्षि वाल्मीकि के बिना तो रामायण की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब उनके भगवान राम के मंच का अपमान हुआ, तो वो युवा खुद हवन सामग्री लेकर शुद्धिकरण के लिए पहुँच गए।
लेकिन कांग्रेस को तो इस सच्चाई से कोई मतलब ही नहीं था। उन्हें तो बस एक ऐसा मौका चाहिए था जिससे वो हिन्दुओं को आपस में जातियों के नाम पर लड़ा सकें और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ वाले असली विवाद पर चुपचाप मिट्टी डाल सकें।
आधी-अधूरी जानकारी और विक्टिम कार्ड की जल्दबाज़ी में राहुल बाबा ने खड़ी कर दी अपने लिए ही मुसीबत
जैसे ही हल्द्वानी में रामलीला मैदान के उस शुद्धिकरण हवन की तस्वीरें और वीडियो बाहर आए, दिल्ली में बैठे कांग्रेसी रणनीतिकारों की बांछें खिल गईं।
इन्होंने सच्चाई जानने की ज़हमत ही नहीं उठाई की हवन किसने किया और क्यों किया? इन्होंने बस अपना पुराना ‘विक्टिम कार्ड’ वाला टूलकिट निकाला और मीडिया में रोना शुरू कर दिया।
मल्लिकार्जुन खड़गे जी, जो खुद इतने वरिष्ठ नेता हैं, उन्होंने भी संसद से लेकर अपनी राजनीतिक सभाओं में इसे अपनी जाति से जोड़ दिया।
उन्होंने भावुक होकर कहा की “मैं अछूत हूँ, इसलिए मेरे जाने के बाद उस जगह को धोया गया।”
लेकिन कहानी में असली तड़का तो तब लगा जब 29 अगस्त 2026 को हमारे ‘जननायक’ राहुल बाबा मैदान में उतरे। राहुल गांधी ने बिना कोई ग्राउंड रिपोर्ट लिए, दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डाली।
पूरे गुस्से और ड्रामाई अंदाज़ में राहुल गांधी ने कह दिया की “यह आरएसएस और बीजेपी की दलित विरोधी मानसिकता का जीता-जागता सबूत है।”
राहुल बाबा यहीं नहीं रुके, उन्होंने तो माइक पर बाकायदा मांग कर डाली की “जिन लोगों ने भी यह शुद्धिकरण हवन किया है, उन पर तुरंत SC/ST Act के तहत FIR दर्ज होनी चाहिए और उन्हें जेल में डालना चाहिए!”
जब राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो हल्द्वानी पहुंचा, तो हवन करने वाले वाल्मीकि समाज के वो युवा (अमित कुमार और उनके साथी) बेहद आहत हो गए।
अमित कुमार का सीधा सा सवाल था, “मैं एक वाल्मीकि हूँ, एक सच्चा हिन्दू हूँ। मैंने अपने भगवान राम के मंच को अल्लाह-हू-अकबर के नारों की कालिख से बचाने के लिए वहां जाकर हवन किया। इसमें छुआछूत कहाँ से आ गई? दिल्ली में बैठा एक नेता मुझे टीवी पर कैसे ‘अछूत’ और ‘जातिवादी’ कह सकता है?”
बस फिर क्या था! सियासत का सबसे ऐतिहासिक उलटफेर हुआ और 30 अगस्त 2026 को अमित कुमार सीधे हल्द्वानी कोतवाली पहुँच गए और उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ ही पुलिस में शिकायत ठोक दी!
जी हाँ! जिस SC/ST एक्ट की मांग राहुल गांधी दूसरों के लिए कर रहे थे, वाल्मीकि समाज के युवा ने उसी एक्ट के तहत राहुल बाबा को घेर लिया।
पुलिस ने तथ्यों को देखा, वीडियो को देखा और अमित कुमार की शिकायत पर सीधे राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज कर ली।
देवभूमि के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सामने आकर कांग्रेस और राहुल गांधी के इस ‘छुआछूत’ वाली बात की धज्जियां उड़ा दी हैं।
सीएम धामी ने कहा की देवभूमि उत्तराखंड में कोई भी व्यक्ति मल्लिकार्जुन खड़गे जी की जाति नहीं जानता, इसलिए उनका अपमान करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
उन्होंने राहुल गांधी को आईना दिखाते हुए स्पष्ट किया की रामलीला मैदान में कांग्रेस की जनसभा में एक धर्म विशेष के लोगों ने जानबूझकर ‘धार्मिक उन्माद’ वाले भड़काऊ नारे लगाए थे।
उसी जिहादी नारेबाजी और मैदान में फैलाई गई गंदगी के विरोध में कुछ स्थानीय धार्मिक संगठनों के युवाओं ने अपनी आस्था के तहत वो शुद्धिकरण किया था।
धामी ने कांग्रेस को ‘मुद्दा-विहीन’ पार्टी बताते हुए सीधा तंज कसा की जो लोग तुष्टिकरण और वोटबैंक के लिए ये विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं..
पूरा देश जानता है की इन्होंने सत्ता में रहते हुए दलित नेताओं- बाबू जगजीवन राम, सीताराम केसरी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर का कितना भयानक अपमान किया था।
राहुल बाबा को अब यह बात समझ लेनी चाहिए की राजनीति में ‘विक्टिम कार्ड’ और ‘दलित कार्ड’ खेलने से पहले थोड़ा होमवर्क करना बहुत ज़रूरी होता है।
आज के ज़माने में माइक के सामने झूठ बोलने और नैरेटिव फैलाने की आदत महंगी पड़ सकती है।
