अंतरिक्ष में तिरंगा फहरा कर दी आजादी की बधाई और जमीन पर भारत तक ट्रेन लाने का कर दिया ऐतिहासिक ऐलान, हर मुश्किल में हमारी ढाल बनने वाले 'रूस' ने फिर दिखा दिया की वो ही हिंदुस्तान का सबसे सच्चा दोस्त

अंतरिक्ष में तिरंगा फहरा कर दी आजादी की बधाई और जमीन पर भारत तक ट्रेन लाने का कर दिया ऐतिहासिक ऐलान, हर मुश्किल में हमारी ढाल बनने वाले ‘रूस’ ने फिर दिखा दिया की वो ही हिंदुस्तान का सबसे सच्चा दोस्त

सच कहूं तो जब भी दुनिया में कोई बड़ा बवाल होता है या कोई मुसीबत आती है, तो दूर से ज्ञान बांटने वाले और ट्विटर पर झूठी हमदर्दी दिखाने वाले हज़ारों मिल जाते हैं।

खासकर ये अमेरिका और पश्चिमी देश, जो हमेशा खुद को दुनिया का चौधरी समझते हैं।

ये लोग कैमरे के सामने तो बड़ी मीठी-मीठी बातें करेंगे, लेकिन जब आपको सच में किसी की ज़रूरत होगी, तो ये सबसे पहले अपना फोन स्विच ऑफ कर लेते हैं।

लेकिन इस पूरी दुनिया में एक देश ऐसा है, जो ना तो कभी फालतू का दिखावा करता है और ना ही पीठ पीछे कोई गंदा खेल खेलता है।

जब भी हिंदुस्तान को ज़रूरत पड़ी, वो बिना एक सेकंड सोचे अपनी जान की बाज़ी लगाकर हमारे साथ खड़ा हो गया।

जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ हमारे इकलौते और सबसे पक्के यार- रूस (Russia) की।

आज जब भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है, तो इस जश्न के माहौल में रूस ने दो ऐसे ऐतिहासिक काम कर दिए हैं, जिसके सुन कर हर हिंदुस्तानी का दिल गदगद हो जायेगा।

एक तरफ जमीन से मिलों दूर अंतरिक्ष में हमारा तिरंगा लहराया गया है, तो दूसरी तरफ ज़मीन पर रूस से सीधे हिंदुस्तान तक ट्रेन लाने का मास्टरप्लान रख दिया गया है।

चलो आज तुम्हें बताता हूँ की असली यारी क्या होती है और कैसे रूस ने बिना कुछ बोले दुनिया को बता दिया है की सच्ची दोस्ती क्या होती है।

अंतरिक्ष में लहराया तिरंगा, रूसी अंतरिक्ष यात्रियों ने भारत के आज़ादी के जश्न को बना दिया ऐतिहासिक

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) में बैठे तीन रूसी अंतरिक्ष यात्रियों- प्योत्र डबरोव, अन्ना किकिना और एंड्री फेद्याव ने जो किया है ना, उसने करोड़ों हिंदुस्तानियों का दिल जीत लिया है।

इन तीनों रूसी एस्ट्रोनॉट्स ने आज़ादी के जश्न पर कोई कोरा और सूखा सा कागज़ी सन्देश नहीं भेजा (जैसा अक्सर पश्चिमी देशों के नेता अपनी PR के लिए करते हैं)।

इन्होंने बाकायदा अपने हाथों में भारत का तिरंगा पकड़ा, उसे शान से लहराया और स्पेस स्टेशन से एक वीडियो मैसेज जारी करके पूरी दुनिया के सामने डंके की चोट पर कहा की “भारत हमारा सबसे सच्चा और पक्का दोस्त है।”

ये वो जज़्बात हैं जो किसी कागज़ पर साइन हुई संधियों से नहीं बनते, ये दशकों के भरोसे से बनते हैं।

जब हम स्पेस में लहराते इस तिरंगे को देखते हैं, तो यादें सीधे 1984 में चली जाती हैं। वो दौर याद है आपको? जब हमारा स्पेस प्रोग्राम अभी बस खड़ा ही हो रहा था।

हमारे पास ना तो ऐसे भारी रॉकेट थे और ना ही कोई ऐसी तकनीक की हम अपने किसी इंसान को अंतरिक्ष में भेज सकें।

तब अमेरिका कहाँ था? वो तो हमें ज्ञान दे रहा था और हम पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाने की फिराक में रहता था। उस वक़्त भी रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने ही आगे बढ़कर हमारा हाथ थामा था।

रूस ने ही हमारे विंग कमांडर राकेश शर्मा को अपने ‘सोयुज़ टी-11’ (Soyuz T-11) मिशन में बैठाकर अंतरिक्ष की सैर कराई थी।

और अंतरिक्ष से जब इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से पूछा था की “ऊपर से हमारा हिंदुस्तान कैसा दिखता है?”, तो उनका वो जवाब- “सारे जहाँ से अच्छा…” आज भी हमारे कानों में गूंजता है।

दोस्त, ये वो पल था जब रूस ने हमें उंगली पकड़कर अंतरिक्ष में चलना सिखाया था। और आज, 42 साल बाद भी, जब दुनिया इतनी बदल गई है, पॉलिटिक्स इतनी गंदी हो चुकी है, तब भी रूस अंतरिक्ष में हमारा झंडा वैसे ही फहरा रहा है।

यही तो होती है सच्ची यारी! कोई और देश ऐसा कर सकता है क्या? बिल्कुल नहीं।

अब भारत तक आएगी पुतिन की ट्रेन, अमेरिका और पश्चिमी देशों के पसीने छुड़ाने वाला है ये ग्लोबल मास्टरप्लान

अभी कुछ ही दिन पहले रूस के उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन (Marat Khusnullin) ने एक ऐसा भयंकर जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) प्रपोजल सामने रख दिया है, जिसे सुनकर यूरोप और अमेरिका की सांसें अटक गई हैं।

उन्होंने ऐलान किया है की रूस से लेकर सीधे हिंद महासागर (Indian Ocean) और भारत तक एक डायरेक्ट रेलवे लिंक (Direct Train Route) बिछाया जाना चाहिए।

अब तुम कहोगे की यार ट्रेन ही तो है, इसमें इतनी कौन सी बड़ी बात है? अरे भाई, इस ट्रेन के पीछे जो जिओपॉलिटिक्स का गेम है ना, वो सीधा अमेरिका की दादागिरी के ताबूत में आखिरी कील ठोकने वाला है।

चलो इसे थोड़ी आसान भाषा में समझते हैं। अभी रूस और भारत के बीच जितना भी बड़ा व्यापार होता है (चाहे वो कच्चा तेल हो, हथियार हों, या फर्टिलाइज़र), वो सब समंदर के रास्ते से होकर आता है।

जहाज़ों को स्वेज़ नहर, मेडिटेरेनियन सी, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से होकर गुज़रना पड़ता है।

अब दिक्कत क्या है की समंदर के इन सारे रास्तों (Chokepoints) पर अमेरिका और उसके चेले-चपाटों (NATO) ने अपनी बड़ी-बड़ी नेवी और जंगी जहाज़ लगा रखे हैं।

जब भी अमेरिका को खुजली होती है, वो किसी भी देश के जहाज़ को रोक कर दादागिरी दिखाने लगता है। वो धमकियां देता है की “हमारे हिसाब से नहीं चलोगे तो हम समंदर के रास्ते ब्लॉक कर देंगे।”

और दूसरा आपको पता ही है की ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की वजह से Strait of Hormuz में क्या हो रहा है! बहुत मुश्किलों से वहां से व्यापार हो पा रहा है।

पुतिन ने इन देशों की दादागिरी का जो तोड़ निकाला है, वो वाकई किसी मास्टरमाइंड से कम नहीं है।

पुतिन ने कहा की समंदर को मारो गोली, हम सीधे ज़मीन के रास्ते हिंदुस्तान तक अपनी रेल की पटरियां बिछाएंगे! ये प्रस्तावित ट्रेन रूट रूस से शुरू होकर सेंट्रल एशिया की बर्फीली वादियों, तुर्कमेनिस्तान, और ईरान से होते हुए सीधे भारत तक पहुंचेगा।

मतलब रास्ते में ना तो कोई अमेरिकी जहाज़ होगा, ना कोई पश्चिमी देश की पाबंदी, और ना ही स्वेज़ नहर के ब्लॉक होने का कोई डर।

ज़रा सोचो, जिस सामान को रूस से भारत पहुंचने में पानी के जहाज़ों से हफ्तों और महीनों का टाइम लगता है, वो इस रेल रूट के चालू होते ही बस कुछ ही दिनों में सीधे भारत के स्टेशनों पर उतरने लगेगा!

इससे हमारा लॉजिस्टिक्स (Logistics) का खर्च इतना कम हो जाएगा की भारत और रूस का व्यापार रॉकेट की स्पीड से बढ़ेगा।

और सबसे बड़ी बात, ये कोई हवा-हवाई बात नहीं है। रूस ने ईरान के अंदर भी रेलवे लाइन बिछाने में पहले से ही भारी इन्वेस्टमेंट कर रखा है (INSTC प्रोजेक्ट)। अब उसी लाइन को सीधे भारत तक जोड़ने की बात हो रही है।

ज्ञान देने वाले पश्चिमी देशों का दोगलापन, जब दुनिया थोपना चाहती थी भारत पर पाबंदियां, तब रूस ने हमें दिया सस्ता तेल और हथियार

अगर आपको दुनिया के सबसे बड़े ‘हिपोक्रेट’ (दोगले) लोगों की शक्लें देखनी हों, तो एक बार अमेरिका और यूरोप के नेताओं की तरफ देख लेना।

ये वो लोग हैं जो दिन भर मानवाधिकार, लोकतंत्र और ‘ग्लोबल रूल्स’ का राग अलापते हैं, लेकिन जब बात इनके अपने फायदे की आती है, तो ये सारे नियम उठाकर गटर में फेंक देते हैं।

जब से यूक्रेन वाला युद्ध शुरू हुआ है, इन पश्चिमी मुल्कों ने जिस तरह का दोगलापन (Double standards) दिखाया है, उसने भारत की जनता के सामने इनका असली और बदसूरत चेहरा पूरी तरह से नंगा कर दिया है।

याद है ना आपको 2022 का वो टाइम? जब रूस और यूक्रेन की जंग शुरू हुई, तो अमेरिका और यूरोप के नेताओं ने रातों-रात रूस पर दुनिया भर के सैंक्शन (पाबंदियां) लगा दिए।

इनका ईकोसिस्टम ऐसे रोना धोना करने लगा जैसे दुनिया कल ही खत्म होने वाली हो। और फिर इन्होंने भारत की तरफ आंखें तरेरनी शुरू कीं।

वाशिंगटन से लेकर लंदन तक बैठे ये सूट-बूट वाले नेता हमें ज्ञान देने लगे की “भारत को इतिहास के सही पन्ने पर खड़ा होना चाहिए… भारत रूस से तेल खरीदना बंद करे… वरना इसका अंजाम बुरा होगा।”

मतलब हद है यार! सदियों तक पूरी दुनिया को लूटने वाले और इराक से लेकर सीरिया तक लाखों बेगुनाहों का खून बहाने वाले ये गोरे लोग हमें सिखाएंगे की सही और गलत क्या है?

जब भारत ने साफ कह दिया की भाई हमारा देश 140 करोड़ लोगों का है, हमें अपनी इकॉनमी चलानी है, हम तो वहीं से तेल खरीदेंगे जहाँ से हमें सस्ता मिलेगा।

और ऐसे मुश्किल वक़्त में जब पूरी दुनिया हमारे खिलाफ लॉबिंग कर रही थी, तब कौन खड़ा था हमारे साथ? वही अपना पुराना और पक्का यार- रूस!

पुतिन ने कहा की तुम पाबंदियों की चिंता मत करो, तुम हमारे सबसे भरोसेमंद दोस्त हो, हम तुम्हें भारी डिस्काउंट पर कच्चा तेल (Crude Oil) देंगे।

भारत ने रूस से भर-भर के सस्ता कच्चा तेल खरीदा। हमारी रिफाइनरियों ने रात-दिन उस कच्चे तेल को रिफाइन करके पेट्रोल, डीज़ल और एविएशन फ्यूल (हवाई जहाज़ का ईंधन) बनाया।

और सबसे बड़ा मज़ाक पता है क्या हुआ? भारत ने यही रिफाइन किया हुआ तेल वापस उन्हीं बेशर्म यूरोपीय देशों को महंगे दामों पर बेच दिया जो कल तक हमें रूस से दूर रहने का ज्ञान पेल रहे थे!

रूस ने सस्ते तेल की वो पाइपलाइन खोलकर ना सिर्फ हमारी इकॉनमी को क्रैश होने से बचाया, बल्कि हमें अरबों डॉलर का फायदा भी करवाया।

अब ज़रा बात हथियारों की भी कर लेते हैं। जब बात डिफेंस और हथियारों की आती है, तो अमेरिका और रूस के बीच का फर्क शीशे की तरह साफ हो जाता है।

अमेरिका से जब भी भारत ने कोई हथियार मांगा, तो वो 100 तरह की शर्तें लेकर आ जाते हैं।

आप उनका हथियार किसी तीसरी जगह इस्तेमाल नहीं कर सकते, उनके हथियार को खोलकर उसकी तकनीक नहीं देख सकते, और अगर आपने उनकी बात नहीं मानी तो वो स्पेयर पार्ट्स (Spare parts) की सप्लाई रोक देते हैं।

मतलब हथियार देकर वो आपको अपना गुलाम बनाना चाहते हैं। देख लो पाकिस्तान का हाल, F-16 तो दे दिए, लेकिन चाबी आज भी अमेरिका के पास है।

लेकिन रूस की यारी बिल्कुल अलग है। अमेरिका ने भारत को धमकी दी थी की अगर तुमने रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा, तो हम तुम पर CAATSA कानून के तहत भयंकर पाबंदियां लगा देंगे।

दुनिया का कोई और देश होता तो अमेरिका की इस गीदड़भभकी से डर कर सौदा रद्द कर देता। लेकिन ना भारत झुका और ना रूस पीछे हटा।

रूस ने दुनिया का सबसे खतरनाक और अचूक मिसाइल डिफेंस सिस्टम (S-400) ठीक टाइम पर भारत को डिलीवर कर दिया।

आज वो सिस्टम हमारे बॉर्डर्स पर तैनात है और चीन से लेकर पाकिस्तान तक किसी की हिम्मत नहीं है की हमारे हवाई क्षेत्र (Airspace) में आंख उठाकर भी देख ले।

अमेरिका बस दांत पीसकर रह गया और वो भारत का बाल भी बांका नहीं कर पाया।

और ‘ब्रह्मोस’ (BrahMos) को कैसे भूल सकते हैं यार! पश्चिमी देश अपनी पुरानी और रद्दी तकनीक हमें अरबों डॉलर में बेचते हैं, लेकिन कोई भी अपनी ‘कोर टेक्नोलॉजी’ हमारे साथ शेयर नहीं करता ताकि हम हमेशा उनके टुकड़ों पर पलते रहें।

लेकिन रूस ने अपनी सबसे सीक्रेट और घातक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की तकनीक भारत के साथ साझा की। भारत के डीआरडीओ (DRDO) और रूस ने मिलकर ‘ब्रह्मोस’ बनाई, जो आज दुनिया की सबसे तेज़ और खतरनाक क्रूज़ मिसाइल है।

ब्रह्मोस का नाम ही भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा (Moskva) नदी को मिलाकर बना है। आज हम सिर्फ ब्रह्मोस को अपनी सेना में इस्तेमाल ही नहीं कर रहे, बल्कि फिलीपींस जैसे देशों को एक्सपोर्ट करके करोड़ों डॉलर भी कमा रहे हैं।

क्या अमेरिका या फ्रांस ने कभी ऐसा किया की हमारे साथ मिलकर कोई ऐसा हथियार बनाया हो जिससे भारत पूरी दुनिया में अपना रुतबा कायम कर सके?

बिल्कुल नहीं! ये यारी, ये भरोसा और ये भाईचारा सिर्फ और सिर्फ रूस ही निभा सकता है।

1971 का वो खौफनाक मंज़र जब अमेरिका ने भेज दिया था अपना सातवां बेड़ा और भारत की रक्षा के लिए रूस ने उतार दी थीं अपनी न्यूक्लियर पनडुब्बियां

जब दोस्ती की कसौटी की बात आती है ना, तो वो शांति के वक़्त नहीं, बल्कि मौत के साये में परखी जाती है।

अगर आपको जानना है की भारत और रूस का रिश्ता सिर्फ कागज़ों वाला नहीं बल्कि खून का क्यों है, तो आपको इतिहास के पन्नों को पलटकर 1971 में जाना होगा। 1971 का वो साल, जब हिंदुस्तान एक ऐसे मुहाने पर खड़ा था जहाँ पूरी दुनिया उसे मिटाने पर तुली थी।

ये वो कहानी है जिसे हर हिंदुस्तानी बच्चे को स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि उसे पता चले की आस्तीन का सांप कौन है और जान पर खेलकर बचाने वाला मसीहा कौन!

उस वक़्त पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में पाकिस्तानी फौज ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दी थीं।

लाखों बेगुनाहों का कत्लेआम हो रहा था, औरतों की इज़्ज़त लूटी जा रही थी। तब हमारी ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था की अब पानी सिर के ऊपर जा चुका है और पाकिस्तान के दो टुकड़े करने ही पड़ेंगे।

लेकिन पाकिस्तान अकेला नहीं था भाई। उस वक़्त पाकिस्तान अमेरिका की गोद में बैठा हुआ था।

अमेरिका का तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) और उसका कुख्यात सेक्रेटरी हेनरी किसिंजर (Henry Kissinger) पाकिस्तान को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे।

निक्सन को भारत से इतनी नफरत थी की वो हर हाल में हिंदुस्तान को मटियामेट करना चाहता था।

जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फौज को मारना शुरू किया और ढाका की तरफ कूच किया, तो अमेरिका में हड़कंप मच गया।

निक्सन ने पाकिस्तान को बचाने के लिए अपना सबसे खतरनाक और विशाल जंगी बेड़ा- ‘टास्क फोर्स 74’ (Task Force 74), जिसे सातवां बेड़ा (7th Fleet) भी कहा जाता है, बंगाल की खाड़ी की तरफ रवाना कर दिया।

इस बेड़े में दुनिया का सबसे बड़ा न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर ‘USS Enterprise’ शामिल था, जिस पर दर्जनों लड़ाकू विमान और घातक बम लदे थे।

और सिर्फ अमेरिका ही नहीं, इधर अरब सागर (Arabian Sea) से दोगले ब्रिटेन ने भी अपना एयरक्राफ्ट कैरियर ‘HMS Eagle’ भारत को डराने के लिए भेज दिया।

हमारा देश पूरी तरह से घिर चुका था। हमारे पास उस वक़्त ना तो न्यूक्लियर बम थे और ना ही इतनी बड़ी नेवी जो इन दोनों महाशक्तियों से एक साथ टकरा सके।

लेकिन अमेरिका एक बात भूल गया था। भारत ने उसी साल अगस्त में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के साथ ‘शांति, मित्रता और सहयोग’ की एक ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर किए थे।

जब इंदिरा गांधी ने मॉस्को की तरफ देखा, तो रूस ने सोचने में एक पल भी नहीं लगाया।

जैसे ही अमेरिका का सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी के करीब पहुँचा, अचानक समंदर का सीना चीरते हुए रूस की न्यूक्लियर पनडुब्बियां (Nuclear Submarines) और घातक क्रूज़र जहाज़ पानी की सतह पर आ गए!

रूस के एडमिरल व्लादिमीर क्रुग्ल्याकोव (Vladimir Kruglyakov) ने अपनी पनडुब्बियों को अमेरिका और ब्रिटेन के जहाज़ों के ठीक सामने ला खड़ा किया।

रूस ने वाशिंगटन को सीधा और खौफनाक अल्टीमेटम दे दिया- “अगर भारत की तरफ एक भी गोली चली, या तुम्हारे जहाज़ एक इंच भी आगे बढ़े, तो हम अपनी न्यूक्लियर मिसाइलें छोड़ देंगे और तीसरा विश्व युद्ध यहीं से शुरू हो जाएगा।”

अमेरिका के रडार स्क्रीन पर जब रूसी न्यूक्लियर पनडुब्बियों के सिग्नल चमके, तो उनके कमांडरों के पसीने छूट गए। निक्सन का सारा गुरूर समंदर के उसी खारे पानी में डूब गया।

अमेरिका का सातवां बेड़ा और ब्रिटेन के जहाज़ वहीँ समंदर में खड़े-खड़े तमाशा देखते रहे और उनकी हिम्मत नहीं हुई की वो एक इंच भी आगे बढ़ें।

रूस ने समंदर में वो लोहे की दीवार खड़ी कर दी थी जिसे भेदने की औकात उस वक़्त किसी गोरे मुल्क में नहीं थी।

और नतीजा क्या हुआ? अमेरिका और ब्रिटेन के देखते ही देखते, हमारी बहादुर फौज ने पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को घुटनों के बल बिठाकर सरेंडर करवा लिया और दुनिया के नक़्शे पर एक नया देश बन गया- बांग्लादेश।

उस दिन अगर रूस अपनी जान की बाज़ी लगाकर अपनी न्यूक्लियर पनडुब्बियां नहीं भेजता, तो अमेरिका ने बंगाल की खाड़ी में भयंकर तबाही मचा दी होती।

ऐसी यारी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती दोस्त।

कश्मीर मुद्दे पर जब भी दुनिया ने भारत की पीठ में छुरा घोंपना चाहा, तब रूस के वीटो पावर ने ढाल बनकर की हमारे देश की रक्षा

आज़ादी के बाद से ही कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिका, ब्रिटेन और पूरे पश्चिमी ईकोसिस्टम ने हमेशा एक ही गंदा खेल खेला है- किसी भी तरह से कश्मीर को भारत से अलग करके पाकिस्तान को सौंप दो या उसे एक ‘इंटरनेशनल विवाद’ बना दो।

जब भी पाकिस्तान इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लेकर गया, अमेरिका और ब्रिटेन ने हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया।

इन दोगले देशों ने UNSC में ऐसे-ऐसे प्रस्ताव ड्राफ्ट किए, जिनसे भारत के हाथ बांध दिए जाएं और कश्मीर में जनमत संग्रह (Plebiscite) थोप दिया जाए या वहां इंटरनेशनल फोर्स बैठा दी जाए।

अगर वो प्रस्ताव पास हो जाते, तो भारत के लिए बहुत बड़ी कूटनीतिक और सैन्य मुसीबत खड़ी हो जाती।

लेकिन जब-जब अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत की पीठ में छुरा घोंपने के लिए अपना हाथ उठाया, तब-तब सोवियत संघ (रूस) के राजदूत ने अपना हाथ उठाकर जोर से कहा- “न्येत (Nyet)” मतलब “नहीं”!

1957 हो, 1962 हो या फिर 1971 का युद्ध… जब भी पूरी दुनिया भारत के खिलाफ वोट कर रही थी, तब रूस ने अपनी ‘वीटो पावर’ (Veto Power) का ब्रह्मास्त्र चलाकर अमेरिका और ब्रिटेन के सारे प्रस्तावों को उठाकर कचरे के डिब्बे में डाल दिया।

वीटो का मतलब होता है की अगर सुरक्षा परिषद का एक भी स्थायी सदस्य किसी प्रस्ताव को नामंजूर कर दे, तो वो प्रस्ताव वहीं फाड़ दिया जाता है।

रूस ने दुनिया की परवाह किए बिना बार-बार भारत के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया और साफ शब्दों में कहा की “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, और किसी भी बाहरी देश को इसमें दखल देने का कोई हक़ नहीं है।”

और ये दोस्ती सिर्फ पुराने ज़माने की बात नहीं है दोस्त! अभी कुछ ही साल पहले जब 5 अगस्त 2019 को हमारी सरकार ने कश्मीर से आर्टिकल 370 (Article 370) को उखाड़ कर फेंक दिया था, तब क्या हुआ था?

पूरी दुनिया का लिबरल मीडिया हल्ला कर रहा था। अमेरिका और यूरोप के कुछ मानवाधिकार वाले ठेकेदार चीख रहे थे।

पाकिस्तान तो रोते-रोते चीन की गोद में बैठ गया और चीन ने चाहा की इस मुद्दे को फिर से UNSC में उठाया जाए और भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जाए।

लेकिन उस वक़्त भी मॉस्को से व्लादिमीर पुतिन की आवाज़ गूंजी। रूस ने पूरे इंटरनेशनल फोरम में कहा की-

“आर्टिकल 370 को हटाना भारत के संविधान के दायरे में आता है, ये पूरी तरह से हिंदुस्तान का ‘आंतरिक मामला’ (Internal matter) है, और इसमें संयुक्त राष्ट्र या किसी भी और देश की कोई भूमिका नहीं है।” फुल स्टॉप!

रूस के इस एक बयान ने चीन और पाकिस्तान के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। कश्मीर आज अगर पूरी शान से भारत का मुकुट बना हुआ है, तो उसमें हमारी फौज की शहादत के साथ-साथ रूस के उन ऐतिहासिक ‘वीटो’ का भी बहुत बड़ा हाथ है।

चाहे समंदर में न्यूक्लियर पनडुब्बी उतारनी हो, चाहे संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर का ब्रह्मास्त्र चलाना हो, या आसमान में तिरंगा लहराना हो….

रूस ने बार-बार साबित किया है की दुनिया की इस भयंकर और मतलबी भीड़ में, हिंदुस्तान का अगर कोई एक सच्चा यार है… तो वो सिर्फ और सिर्फ रूस है।

जय हिन्द! रूस-भारत दोस्ती अमर रहे!

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